भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५८२ रामायणमीमांसा अष्टादश रावण सीता का पातिव्रत्य देखकर दयार्द्र हो गया और सोचने लगा कि मैंने सीता का हरण कर पाप किया । परन्तु बिना युद्ध के लौटाने से अपयश होगा । अतः वह युद्ध में राम और लक्ष्मण को हराकर सीता को लौटा देने का संकल्प करता है । तोरवेरामायण के अनुसार युद्ध के लिए प्रस्थान करने से पहले वह अपनी सारी सम्पत्ति दरिद्रों में बाँट देता है, जेल के बन्दियों को रिहा कर देता है और आदेश निकालता है कि यदि मैं युद्ध में मारा गया तो विश्वासपात्र विभीषण को गद्दी पर बैठाया जाय, अनेक परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न भावनाएँ प्राणियों के हृदय में उठती ही हैं । उक्त कथा में उन्हीं का उल्लेख हुआ है । मर्मस्थान अध्यात्मरामायण ( ६।११।५३ ) के अनुसार रावण की नाभि में अमृतकुण्ड था । विभीषण से यह रहस्य जानकर राम ने आग्नेय बाण से उसे सुखाया था । आनन्दरामायण, रङ्गनाथरामायण आदि में भी इसका उल्लेख है । कृत्तिवास के अनुसार तपस्या के पश्चात् ब्रह्मा ने कहा था कि तुम्हारे सिर एवं भुजाएँ कटने पर फिर उत्पन्न हो जायेंगी और रावण को ब्रह्मास्त्र देकर कहा इसी ब्रह्मास्त्र से तुम्हारा मर्मस्थान भेदित होने पर ही मृत्यु होगी । रावण ने उसे मन्दोदरी के रक्षण में दे रखा था । विभीषण ने यह रहस्य राम को बताया । हनुमान् ने मन्दोदरी के पास ब्राह्मण वेष में जाकर कहा, जब तक ब्रह्मास्त्र तुम्हारे पास है रावण नहीं मर सकता है, किन्तु मुझे शङ्का है कि विभीषण कहीं यह जान न ले । तुमने उसे कहाँ छिपा रखा है । मन्दोदरी ने कहा मैं सावधान हूँ। मैंने उसे स्फटिक के खंभे में छिपा रखा है। हनुमान् ने लाठी से खंभा तोड़ दिया तथा ब्रह्मास्त्र राम के पास ले गये । सेरीराम के अनुसार सीता ने हनुमान् से कहा था कि इसके पास एक मायावी खड्ग है। मन्दोदरी उसकी पूजा करती है । हनुमान् ने जाकर मन्दोदरी से रावण की मृत्यु का समाचार सुनाया । वह शोकसन्तप्त हुई । हनुमान् ने उससे लाभ उठाया और खड्ग लेकर राम को दे दिया । विहोरराम-कथा के अनुसार रावण का जीव मञ्जूषा में बन्द था । हनुमान् और लक्ष्मण ने मञ्जूषा लेकर उसे मुक्त किया । रामकियेन के अनुसार रावण का जीव उसके गुरु के पास था। हनुमान् और अङ्गद उसे छल से प्राप्त करते हैं । ब्रह्मचक्र के अनुसार लङ्का-दहन के पश्चात् रावण ने अपना हृदय किसी ऋषि के यहाँ सुरक्षित रखा था । हनुमान् ने रावण का रूप धरकर उसे प्राप्त कर लिया । पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२ अध्याय ) के अनुसार अतिकाय और महाकाय गुप्तचर राम की सेना में पकड़े गये । महानाटक तथा रामचरितमानस के अनुसार रावण के हृदय में सीता और सीता के हृदय में राम और राम के हृदय में विश्व था । अतः रावण जब सिर कटते-कटते व्याकुल हो सीता को भूलता है, तब हृदय में बाण मारकर राम रावण को मारते हैं । महाभारत ( ३।२७४ ) के अनुसार रावण ने राम और लक्ष्मण का रूप धारण करनेवाले बहुत से मायामय योद्धाओं को उत्पन्न किया था । महाभारत ( ३।२७४।३१ ) के अनुसार ब्रह्मास्त्र से राम ने रावण को इस प्रकार जलाया था कि उसका भस्म भी शेष नहीं रहा। किसी कथा के अनुसार मन्दोदरी रावण की चिता पर सती हो गयी थी ।