रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरता है। फिर भी रावण विचलित नहीं हुआ और उसने बहुरूपिणी विद्यासिद्धि प्राप्त कर ली। गुणभद्र के अनुसार रावण विद्याएँ सिद्ध करने के लिए आदित्यपाद पर्वत पर तप करता है। राम एक विशाल सेना के साथ आक्रमण करते हैं। परिणामतः रावण साधना छोड़कर लङ्का चला जाता है। अनेक रामकथाओं में यह उल्लेख है कि रावण ने दैत्य-गुरु शुक्राचार्य के परामर्श से यज्ञ आरम्भ किया था। कृत्तिवास के अनुसार रावण ने शान्तिकर्म का आयोजन किया। चण्डीपाठ के लिए बृहस्पति को बुलाया। देवताओं ने पवन के द्वारा राम को चण्डीपाठ अशुद्ध कराने का परामर्श दिया। हनुमान् मक्खीरूप धारण कर जाकर चण्डीपाठ के दो अक्षर चाट आये। परन्तु बृहस्पति ने अभ्यास वश शुद्ध ही पाठ किया। हनुमान् ने विक्रमरूप दिखाया, वृहस्पति डर गये। हनुमान् ने ग्रन्थ छीनकर प्रथम अध्याय के तीन श्लोक मिटा दिये। अशुद्ध पाठ देखकर माहेश्वरी कैलास चली गयीं। सेरीराम के अनुसार रावण अपने यज्ञ के धूम से राम की साँस रोकना चाहता था। रामकेर्ति (सर्ग १०) के अनुसार रावण के पास विष था वह रावण की प्रार्थना पूर्ण होते ही अजेय हो जाता इत्यादि। यद्यपि यज्ञों में विघ्न करना अनुचित कार्य माना जाता है तथापि दुष्ट भावना होने से यज्ञ, तप, दान आदि सभी कर्म अधर्म हो जाते हैं। “तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वभाविको वेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्कः तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥” (म० भा० १।१।२७५) तप, अध्ययन, स्वाभाविक दारपरिग्रह, अग्निहोत्र आदि कर्म, उञ्छवृत्ति, शिलवृत्ति आदि पाप नहीं हैं परन्तु भावदोष से उक्त सभी कर्म पाप बन जाते हैं। रावण और इन्द्रजित् दूसरों की पत्नी, बहू-बेटियों का हरण एवं हजम करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए ही यज्ञादि कर्म करते थे, अतः वह पाप ही था। “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” (जै० सू० १।१।२) सूत्र में अर्थ शब्द का ग्रहण इसी लिए हैं कि अनर्थ श्येनयाग आदि धर्मकोटि में न गृहीत हों। ‘पशुना यजेत’ आदि वेद-वचनों में यज्ञ के उद्देश्य से पशु का आलम्भन विहित होने से पाप नहीं है। किन्तु ‘शत्रुमारणकामः श्येनेनाभिचरन् यजेत्’ इस आभिचारिक श्येनयाग में शत्रुमारणरूप हिंसा उद्देश्य है विधेय नहीं है। क्योंकि वह रागप्राप्त हिंसा ‘न हिंस्यात् सर्वाभूतानि’ निषिद्ध ही है। किन्तु ‘पशुना यजेत’ में हिंसा उद्देश्य एवं राग- प्राप्त नहीं है, विहित है, अतः वह धर्म ही है। सर्वथापि आभिचारिक कर्म पाप ही है। अतः उसका विध्वंस करना धर्म ही है। परन्तु हनुमान् द्वारा जो मन्दोदरी का सतीत्वभङ्ग आदि का वर्णन है तथा हनुमान् का यत्र तत्र स्त्रियों से विवाह या भोग आदि का वर्णन है वह सब विकृति ही है। काश्मीरीरामायण के अनुसार रावण ने कैलास जाकर शिव की सहायता माँगी थी। शिव ने उसे मकेश्वर लिङ्ग देकर आश्वासन दिया कि इस लिङ्ग के लङ्का में स्थापित हो जाने पर राम की विजय नहीं होगी। पर इस लिङ्ग को कहीं पृथिवी पर नहीं धरना चाहिये। मार्ग में रावण को लघुशङ्का लगी। उस मकेश्वर लिङ्ग को उसने नारद के हाथ में थमा दिया जो कि वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आ पहुँचे थे। नारद भूमि पर लिङ्ग रखकर चले गये। रावण पुनः उस लिङ्ग को उठाने में सफल नहीं हुआ। रावण के अन्य भी कई प्रयत्न रामकियेन में वर्णित हैं। उन्हें पिछले प्रसङ्ग में देखना चाहिये। पउमचरियं के अनुसार बहुरूपा विद्या सिद्ध करने के पश्चात् रावण सीता से मिलने गया। सीता ने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया और सीता यह कहकर मूच्छित हो गयीं कि मैं तभी तक जीवित रहूँगी जब तक राम, लक्ष्मण तथा भामण्डल की मृत्यु का समाचार नहीं पाती।