रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 667, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंश अध्याय उत्तरकाण्ड बुल्के उत्तरकाण्ड, जो उनकी दृष्टि में प्रक्षेप है, में रावणचरित को प्रक्षेप मानते हैं । रामचरित से अलग रावण के विषय में स्वतन्त्र काव्य का कहीं निर्देश नहीं है । वैदिक साहित्य में रावण, कुबेर, विश्रवा, वैश्रवण आदि का संकेत नहीं किया गया है । पाली जातकट्ठवण्णना में बेस्सवण ( यक्षों के राजा ) का बहुत स्थलों पर उल्लेख है; रावण का कहीं भी उल्लेख नहीं है, किन्तु धनेश, कुबेर, वैश्रवण आदि का उल्लेख स्वतन्त्ररूप से बहुत स्थलों पर किया गया है । इससे यह अनुमान दृढ़ हो जाता है कि वैश्रवण अथवा कुबेर रावण-कथा से पूर्व ही प्रसिद्ध हो चुके थे । बाद में ही रावण के साथ उनका सम्बन्ध स्थापित किया गया है । पर बुल्के का उक्त कथन निस्सार एवं निराधार ही है । वैदिक साहित्य में कुबेर, वैश्रवण नाम हैं तो वैदिक साहित्य में राम, दशरथ, जनक आदि के नाम भी हैं ही । रावण का नाम भी रामतापनीय आदि उपनिषदों में है ही । अथर्ववेद में दशशीर्ष ब्राह्मण का भी स्पष्ट उल्लेख है । उपनिषद् भी वैदिक साहित्य ही हैं । रावण भी विश्रवा का पुत्र है, यह रामायण से सिद्ध ही है । रामायण वेद का ही उपबृंहण है । वेद का विवरण धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण आदि द्वारा ही होता है । शिखा और यज्ञोपवीत का नाममात्र वेदमन्त्रों में है । परन्तु शिखा कहाँ हो, यज्ञोपवीत कैसे बने और कहाँ पहना जाय, इसका स्पष्ट निरूपण धर्मशास्त्रों से ही होता है । इसी तरह वैश्रवण, कुबेर कौन हैं ? विश्रवा कौन हैं ? उनके पिता कौन हैं ? पत्नी कौन है ? वैश्रवण के कितने भाई थे ? इन सब बातों का परिज्ञान इतिहास-पुराणों से ही होता है । तत्तद्वैदिक शाखाओं में प्रवक्ता कौन हैं ? गोत्र क्या है ? वेदाधिकारी कौन होते हैं ? इत्यादि सब बातों का पूरा परिज्ञान इतिहास- पुराण से ही संभव है । अन्यथा मिथ्या सम्बन्ध कल्पना किसने की ? किसने देखा ? इत्यादि बातों का उत्तर देना बुल्के के लिए मुश्किल हो जायगा । बुल्के यह भी कहते हैं कि रावण के नाम से बहुत सी अर्वाचीन रचनाओं का उल्लेख मिलता है— अर्कप्रकाश ( वैद्यक ), कुमारतन्त्र, इन्द्रजाल ( उड्डीश ), प्राकृतकामधेनु, प्राकृतलङ्केश्वर, ऋग्वेदभाष्य, रावणभेट आदि । बलरामदास के रामायण में माना गया है कि रावण ने वैदिक मन्त्रों का सम्पादन कर वेदों की एक नयी शाखा चलायी थी । बुल्के का यह भी कथन निस्सार है कि वे अपने मतानुसार ही इन ग्रन्थों को अर्वाचीन कहते हैं । उनके अनुसार तो वेद भी, जो लाखों वर्ष पुराने ही नहीं, किन्तु अनादि हैं, रावण की अपेक्षा अर्वाचीन ही ठहरेंगे, क्योंकि पाश्चात्य ई० पू० दो या तीन हजार वर्ष की ही वेदरचना मानते हैं । परन्तु यह मत असङ्गत है, क्योंकि वेद नित्य, अनादि और अपौरुषेय हैं । ( देखिये वेद की अपौरुषेयता ) । वेद के साथ ही वेदाङ्ग भी होते हैं । किसी को क्या आवश्यकता पड़ी है कि जो स्वयं ऋग्भाष्य लिखकर उसे रावण के नाम से प्रसिद्ध करे । वेदों की कोई नई शाखा मान्य नहीं होती है, अतः रावणनिर्मित वेदशाखा सर्वथा अप्रामाणिक है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामाभिषेक के बाद तपस्वी लोग राम का अभिनन्दन करने आये थे । इसी अवसर पर अगस्त्य ने राक्षसवंश का इतिहास सुनाया था । महाभारत में रावणचरितवर्णन रामोपाख्यान के प्रारम्भ में है । पउमचरियं राक्षस तथा वानरों के वंश के इतिहास से प्रारम्भ होता है ।