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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 678

अध्याय उत्तरकाण्ड ६०१ सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार रावण वाली के भवन में कैदी के रूप में रखा गया था। महासिकुल के अनुरोध से वाली ने मुक्त किया। जब अङ्गद की अवस्था दस वर्ष की थी, रावण उसे मारना चाहता था; क्योंकि अङ्गद मण्डो के अपमान का स्मरण दिलाता था। रावण छिपकर किष्किन्धा आया, किन्तु सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। वाली ने द्वन्द्वयुद्ध में उसे परास्त कर अपने यहाँ बन्दी बनाकर रखा। उत्तरकाण्ड (सर्ग २३) के बाद प्रक्षिप्त सर्ग में रावण यमलोक से बलि के भवन पहुँचा। बलि ने रावण को बता दिया कि भवन के द्वार पर जिस श्याम पुरुष से तुम्हारी भेंट हुई थी वही विष्णु हैं। यह सुनकर रावण लड़ने गया। किन्तु ब्रह्मा के वर का ध्यान रखकर विष्णु अन्तर्धान हो गये। दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार बलि ने अपने यहाँ पड़े चक्र को दिखाकर रावण से कहा, उसे उठाकर मेरे पास लाओ। रावण उसे हिलाने में समर्थ नहीं हुआ। अन्त में सारी शक्ति लगाकर उसे उठाया किन्तु मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। बलि ने कहा—यह चक्र मेरे पूर्वज का कुण्डल है तुम जिसे उठा नहीं सके। विष्णु ने उस महाशक्तिशाली को भी मार दिया था, जिसने इस कुण्डल को कान में पहना था। अध्यात्मरामायण (सर्ग १।१३।१०७-११५) के अनुसार बलि पत्नी के साथ चौसर खेलता था। बलि के हाथ से पासा गिर गया। बलि ने रावण से उठाने को कहा, वह रावण से उठा ही नहीं। दासी ने झट उठा दिया। भवन से रावण के निकलने पर बलि के अनुचरों ने उसे पकड़ लिया। घोड़े की लीद फेंकने का रावण से काम लिया। कुछ समय बाद द्वारस्थित विष्णु से उसने प्रार्थना की। विष्णु ने उसे पादाङ्गुष्ठ से आकाश में उछाल दिया और वह लङ्का पहुँच गया। रावण ने किसी दिन पश्चिम सागर में भीषणाकार कपिल को देखा। उनसे युद्ध करने की इच्छा की। कपिल ने प्रहार कर रावण को भूमि पर गिरा दिया और पाताल चले गये। रावण ने पीछा किया। वहाँ कपिल के समान तीन कोटि पुरुषों को देखकर वह वहाँ से शीघ्रता से निकल गया। एक अन्य स्थल पर रावण ने शयन कर रहे विष्णु के पास बैठी लक्ष्मी को देखा। लक्ष्मी को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाना चाहा। विष्णु हँस पड़े और वह भूमि पर गिर पड़ा। विष्णु ने रावण को अभयदान दिया एवं परिचय पूछने पर अपना विराट् रूप दिखा दिया (सर्ग २३ के बाद पञ्चम प्रक्षिप्त सर्ग)। रावण किसी दिन श्वेतद्वीप गया। वहाँ की युवतियों ने उसे लीलापूर्वक एक दूसरे के पास फेंक दिया। भयातुर रावण सागर मध्य में गिर गया। आनन्दरामायण के अनुसार श्वेतद्वीप की एक स्त्री ने रावण को परलङ्का तक फेंक दिया एवं वह अपनी बहन क्रौञ्चा के शौचकूपक में जा गिरा। भविष्यपुराण में हनुमान् द्वारा भी रावण की पराजय वर्णित है। उत्तरकाण्ड की कथा वस्तु वैश्रवण—विश्रवा और देववर्णिनी के पुत्र वैश्रवण का चतुर्थ लोकपाल तथा धनेश बनना एवं पुष्पक विमान प्राप्त कर लङ्का निवास (सर्ग १-३)। प्रहेति के वंश और हेति के वंश में उत्पन्न राक्षसों का लङ्का में निवास तथा विष्णु द्वारा पराजित होकर पाताल प्रवेश। रावण का जन्म, विश्रवा और कैकसी से दसग्रीव, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण का जन्म। तीनों भाइयों की तपस्या तथा ब्रह्मा से वरप्राप्ति (सर्ग ९, १०) रावण की आशङ्का से वैश्रवण का लङ्का त्याग तथा कैलास पर निवास। राक्षसों का लङ्का में प्रवेश तथा मन्दोदरी के साथ रावण का विवाह (सर्ग ११-१२)। ७६