भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 679

६०२ रामायणमीमांसा एकोनविंश रावण की विजय-यात्रा—वैश्रवण को पराजित कर पुष्पक-प्राप्ति (सर्ग १३-१५)। रावण को नन्दी का शाप, रावण का कैलास उठाना, शिव से रावण नाम तथा चन्द्रहास खड्ग की प्राप्ति (सर्ग १६)। वेदवती का रावण को शाप प्रदान (सर्ग १७)। रावण द्वारा अनेक राजाओं को पराजित करना तथा राजा अनरण्य का रावण को शाप देना (सर्ग १८, १९)। रावण का यम पर आक्रमण तथा ब्रह्मा द्वारा उनकी रक्षा (सर्ग २०-२२)। शूर्पणखा के पति विद्युज्जिह्व का रावण द्वारा वध तथा वरुण-पुत्रों की पराजय (सर्ग २३)। रावण द्वारा अनेक कन्याओं और पत्नियों का हरण, नलकूबर का रावण को शाप देना (सर्ग २४-२६)। मेघनाद द्वारा इन्द्रबन्धन, देवताओं की प्रार्थना से मुक्ति और देवताओं से मेघनाद को वरप्राप्ति। हनुमत्कथा—हनुमान् की जन्मकथा और चरित्र (सर्ग ३५, ३६), सीतातयाग (सर्ग ३७), अतिथियों का प्रस्थान (सर्ग ३८-४०), नृग, निमि ययाति की कथाएँ (सर्ग ५३-५९)। शत्रुघ्न चरित्र (सर्ग ६०-७२), शम्बूक-वध (सर्ग ७३-८२), अश्वमेध और उसका माहात्म्य (सर्ग ८३-९०), नैमिषारण्य में अश्वमेध के अवसर पर लव-कुश का राम की सभा में रामायण का गान करना, कुशलव को सीता-पुत्र जान कर राम का वाल्मीकि के पास सन्देश भेजना, सभा के सम्मुख अपनी शुद्धि का साक्ष्य देने के लिए सीता से अनुरोध करना, सीता का शपथ- ग्रहण, पृथिवी का सीता को अपने साथ ले जाना (सर्ग ९१-९५), राम द्वारा सीता को लौटाने का पृथिवी से अनुरोध (सर्ग ९६-९८), कुश और लव द्वारा उत्तरकाण्ड का गान, सभाविसर्जन, माताओं का देहान्त (सर्ग ९९)। विजय-यात्राएँ—भरत-पुत्रों (तक्ष और पुष्कल) के तक्षशिला, पुष्कलावती में राज्यों की स्थापना, लक्ष्मण-पुत्रों (अङ्गद और चन्द्रकेतु) के अङ्गद्वीप और चन्द्रकान्त में राज्यों की स्थापना, काल का राम को विष्णु- रूप में आने का स्मरण कराना, दुर्वासा के आग्रह से लक्ष्मण का राम और काल के पास जाना, इसके कारण, काल के साथ हुई शर्त के अनुसार राम द्वारा लक्ष्मण का त्याग और लक्ष्मण का देह त्याग कर शेषरूप में व्यक्त होना, राम का कुशावती में कुश एवं श्रावस्ती में लव को प्रतिष्ठित करना, अपने पुत्रों (सुबाहु तथा शत्रुघाती) को राज्य देकर शत्रुघ्न का अयोध्या आना, सुग्रीव और वानरों का आना, राम द्वारा विभीषण एवं हनुमान् को अमरत्व का वरदान देना, राम का अपने भाइयों सहित विष्णुरूप में तथा वानरों का अंशानुसार देवताओं में प्रवेश करना एवं नागरिकों की सगुण ब्रह्मलोक की प्राप्ति। फलश्रुति (सर्ग १०९-१११)। उत्तरकाण्ड का विश्लेषण उत्तरकाण्ड के विश्लेषण में बुल्के कहते हैं कि "तीनों पाठों में इतनी ही विभिन्नता है कि दाक्षिणात्य पाठ में भृगु द्वारा विष्णु को प्रदत्त शाप सीता-त्याग का कारण माना गया है।" इतनी कम विभिन्नता से भी वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इसकी रचना अन्य काण्डों के बाद में हुई थी। यद्यपि यह स्वाभाविक ही है कि अन्तिम चरित्र की रचना अन्त में होती है तथापि उनका आशय इतना ही नहीं है। उनका अभिप्राय तो यह है कि उत्तर- काण्ड महर्षि वाल्मीकि की कृति ही नहीं है। यह तो किन्हीं अन्य व्यासों ने पीछे से जोड़ दिया है। परन्तु यह कथन अशुद्ध एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। क्योंकि पाठों एवं टीकाकारों की परम्पराओं में बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड भी सम्मिलित हैं ही। टीकाकारों ने समानरूप से सब पर टीकाएँ भी लिखी हैं। उत्तरकाण्ड के प्रक्षिप्त होने के तर्कों का पीछे खण्डन किया जा चुका है। बुल्के कहते हैं कि "वाल्मीकिरामायण में दो ही विस्तृत अंश हैं, जिनमें अशुद्ध श्लोकों का बाहुल्य पाया जाता है। विश्वामित्र की कथा (बालकाण्ड सर्ग ५७-६५) तथा रावणचरित (उत्तरकाण्ड सर्ग १-३६)। अशुद्धियों का बाहुल्य इन दोनों वृत्तान्तों को प्रक्षेप सिद्ध करता है।" परन्तु बुल्के के ये तर्क बिलकुल गलत हैं। वस्तुतः जिन अंशों को बुल्के अशुद्धियाँ कहते हैं वे आर्ष पाठ हैं, अशुद्धियाँ नहीं हैं। अन्यथा रघुवंश, माघ, किरात आदि में