भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 681

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६०४ रामायणमीमांसा एकोनविंश कोपभाजन बनकर रामायण का प्रतिनायक राक्षस रावण के रूप में प्रकट होता है।" परन्तु उनकी यह कल्पना निराधार है। प्रतापभानु की कथा सौदाश की कथा से सर्वथा भिन्न है। दोनों के नामों एवं रूपों में भी भिन्नता है। संसार में मांसभक्षण, सुरापान की सैकड़ों समान घटनाएँ घटती हैं। किन्तु सब की अभिन्नता नहीं कही जा सकती। वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के सर्ग ५९ के अनन्तर प्रक्षिप्त सर्ग के अनुसार गौतम नामक ब्राह्मण ने किसी दिन राजा ब्रह्मदत्त के यहाँ भोजन माँगा। संयोग वश आहार में कुछ मांस पड़ गया जिससे गौतम ने राजा को गीध बन जाने का शाप दिया। राजा के विनय से गौतम ने कहा कि राम के स्पर्श से तुम मुक्त होओगे। ब्रह्मदत्त गीध बन गया। वह राम का स्पर्श कर दिव्य रूपधारी पुरुष बन गया। इस कथा का भी सौदाश के साथ सम्बन्ध जोड़ना निराधार है। नामभेद तथा परिणामभेद भिन्नता के हेतु स्पष्ट ही हैं। मनुष्यमांस का निषेध सदा ही था। ज्ञानाज्ञानवश उसके प्रयोग से अनेक स्थलों पर अनर्थ संभावित हैं ही। अध्यात्मरामायण (६।५।५-५४) तथा आनन्दरामायण (१।१०।२१५-२१९) में रावण के गुप्तचर शुक के पूर्वजन्म के विषय में कथा मिलती है कि शुक नामक वनवासी ब्राह्मण देवताओं का हितकारी होने के कारण राक्षसों का शत्रु बन गया। एक दिन अगस्त्य उसके आश्रम में आये तो अवसर का लाभ उठाकर वज्रदंष्ट्र नामक राक्षस ने अगस्त्य का रूप धारण कर लिया और शुक से सामिष भोजन माँगा। वज्रदंष्ट्र ने शुक की पत्नी को मूच्छित कर दिया और स्वयं उसी का रूप धारण कर नरमांस परोसा और अन्तर्हित हो गया। इसपर अगस्त्य ने शाप दिया कि तुम नरमांसभक्षी राक्षस बन जाओ। शुक के द्वारा कारण पूछे जाने पर मुनि ने राक्षस की करतूत जान ली और शुक को आश्वासन दिया कि राम के आगमन पर तुम रावण-दूत बनकर राम का दर्शन पाओगे। रावण को तत्त्वज्ञान का उपदेश कर परम पद पाओगे। इस कथा का भी सौदाश के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। बुल्के ने सौदाश या सुदास नाममात्र के आधार पर ६२१ वें अनु० में अनेक व्यक्तियों का सम्बन्ध जोड़ लिया है। ऋग्वेद के अनुसार सुदास नामक राजा के दो पुरोहित थे। विश्वामित्र और वसिष्ठ। उन दोनों में वैर उत्पन्न हुआ। वैदिक साहित्य में (विश्वामित्र की प्रेरणा से) सौदासों द्वारा वसिष्ठ-पुत्र का वध तथा यज्ञ के प्रभाव से सौदासों पर वसिष्ठ की विजय उल्लिखित हैं। यहाँ भी सुदास पुरोहित ब्राह्मण थे। सौदाश राजा से उनका सम्बन्ध जोड़ना व्यर्थ है। जब वसिष्ठ और विश्वामित्र दोनों ही सुदास थे तब वसिष्ठ का सौदासों पर विजय की कहानी भी कल्पनामात्र ही है। बृहद्देवता में अध्याय ६ में कहा गया है कि वसिष्ठ ने सुदास को राक्षस बन जाने का शाप दिया था। इसी से यह क्यों न समझा जाय कि वसिष्ठ सुदास या सुदासों से भिन्न थे। बुल्के कहते हैं कि "इस कथा पर बौद्ध संसार में प्रसिद्ध सुतसोमजातक का प्रभाव पड़ा है। ब्राह्मण-धर्म के ग्रन्थों में सौदाश की कथा के दो रूप मिलते हैं। एक महाभारत का रूप, जिसमें वसिष्ठ दूसरों द्वारा अभिशप्त सौदाश को मुक्त करते हैं और दूसरा रामायण का रूप जिसके अनुसार वसिष्ठ ने सौदाश को राक्षस बन जाने का शाप दिया था। दोनों में समान रूप से यह तत्त्व विद्यमान है कि नरमांसाहार प्रदान करने के कारण सौदाश को १२ वर्ष तक राक्षस बनना पड़ा था।" सौदासीय कथा के रूपान्तर भी मिलते हैं। जिनके द्वारा राम का महत्त्व तथा उनकी दयालुता का भी प्रतिपादन है। महाभारत और रामायण के दोनों सौदासों पर विचार आगे किया जायगा। दोनों में तुल्यता होने पर भी उसका आधार बौद्ध साहित्य नहीं माना जा सकता है, क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत और रामायण दोनों ही बौद्ध साहित्य के पूर्ववर्ती हैं। बुद्ध के जन्म से बहुत पहले महाभारत की रचना हो चुकी थी। रामायण तो