रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 682, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंबुद्ध एवं बौद्ध साहित्य से लाखों वर्ष पहले निर्मित हो चुकी थी। यह इतिहास-विवेचन में देखें। इसके अतिरिक्त बौद्ध साहित्य के महासुतसोम की इनसे भिन्नता भी है। ५२२ वें अनु० में सुतसोम के सम्बन्ध में कहा गया है कि सुतसोम इन्द्रप्रस्थ के राजा कौरव्य का राज- कुमार था। जो तक्षशिला में ब्रह्मदत्त के रूप कल्माषपाद का सहपाठी था। बाद में अपने पिता के स्थान पर राजा बन गया था। कल्माषपाद भी वाराणसी का राजा था। वह पूर्व जन्म में नरभक्षक यक्ष था। अतः वह प्रतिदिन मांस खाता था। किसी दिन कुत्ते राजा का मांसाहार ले गये। रसोइये ने मनुष्य मांस बनाकर परोस दिया। राजा ने उसे पसन्द किया। तब रसोइये ने रहस्य खोला। राजा ने प्रतिदिन के लिए नरमांस तैयार करने का आदेश दिया। राजा ने सब कैदियों को खा लिया। बाद में नागरिकों का भी वध होने लगा। जनता में खलबली मच गयी। रसोइया रँगे हाथ पकड़ा गया। उसने कहा—राजा को नरमांस अपेक्षित होता है। राजा तथा रसोइया दोनों निर्वासित कर दिये गये। राजा वन में मनुष्य-वध किया करता था और रसोइया उनका मांस भूनकर परोसता था। किसी दिन राजा रसोइये को भी खा गया। एक ब्राह्मण के अपहरण के कारण लोगों ने राजा का पीछा किया। राजा के पैर में चोट आ गयी। राजा ने एक वृक्ष-देवता से यह प्रतिज्ञा की कि अच्छा होने पर मैं तुम्हें भारतवर्ष भर के १०१ राजकुमारों को अर्पित करूँगा। सात दिन भोजन न करने के कारण उसका घाव भर गया। उसने समझा कि यह देवता की कृपा है। वह पूर्व जन्म के अपने साथी यक्ष से मन्त्र पाकर शीघ्रगामी यक्ष बन गया और उसने एक सो राजाओं को कैद कर लिया। इसके बाद उसने देवता के आदेश से सुतसोम को भी पकड़ लिया। सुतसोम ने उस दिन पूजा करते समय किसी ब्राह्मण को आश्वासन दिया था कि स्नान से लौटकर आपकी बात सुनूँगा, इसलिए उसने नरभक्षक से निवेदन किया मुझे ब्राह्मण के प्रति अपनी प्रतिज्ञा पूरा करने का अवसर दिया जाय। नरभक्षक ने उसे अनुमति दे दी। सुतसोम ब्राह्मण के पास जाकर चार गाथाएं सीखकर और बदले में उसे चार हजार मुद्राएँ देकर कल्माषपाद के पास लौटा। वह इन चार गाथाओं को सुनकर प्रसन्न हुआ और उसने सुतसोम से चार वर माँगने को कहा। सुतसोम ने कहा—१. मैं आपको सौ वर्ष तक जीवित देखना चाहता हूँ। २. आप उन एक सौ राजकुमारों को न खायें। ३. आप उनका राज्य वापस कर दें। ४. आप नरभक्षण त्याग दें। दोनों में देर तक वार्तालाप होता रहा। फलतः कल्माषपाद ने अपनी आदत को छोड़ना स्वीकार कर लिया। राजकुमारों को छोड़ दिया और उनके राज्य भी वापस दे दिये। जिस स्थान पर नरभक्षक का हृदय-परिवर्तन हुआ, वहाँ कम्मासदम्भ नामक नगर बस गया। बौद्ध साहित्य की परवर्ती रचनाओं में मांसाहारी कल्माषपाद को तथा सौदास को अभिन्न माना गया है और सौदास के मांसाहारी बनने का कारण यह बताया गया है कि वह सिंहिनी की सन्तान था। कथा का यह रूप जातकमाला के सुतसोमजातक, लङ्कावतारसूत्र, सिंहसौदासमांसभक्षणनिवृत्ति के चीनी अनुवाद, भद्रकल्पावदान आदि में सुरक्षित है। जैनी ग्रन्थों में इसकी चर्चा है (पउमचरियं २२।७२-९५) । महाभारत अश्वमेधपर्व (अध्याय ५६-५८) में सत्यसन्ध उत्तंक तथा सौदास के विषय में जो कथा मिलती है उसपर बौद्ध जातक की छाप स्पष्ट है। किन्तु बुल्के का यह अनुमान सही नहीं है कि बौद्ध साहित्य का प्रभाव रामायण या महाभारत पर पड़ा है। जैसा कहा जा चुका है कि महाभारत और रामायण उससे पूर्ववर्ती हैं। बौद्ध- कथा तो अहिंसा एवं मांसभक्षणनिवृत्ति के उद्देश्य से लिखी गयी है। वह ऐतिहासिक ही हो यह आवश्यक नहीं है। सुखावबोधार्थ आख्यायिकाएँ कल्पित भी होती हैं। कल्माषपाद नाम और नरमांसभक्षण तुल्य होने पर भी रामायण के अनुसार यह अनजान में हुए अपराध के कारण वसिष्ठ-शाप से १२ वर्ष के लिए राक्षस हुआ था। उसके कल्माषपाद होने का हेतु भी क्षमा एवं सहिष्णुता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। उसके विपरीत सुतसोमजातक के कल्माषपाद की