भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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कथा में कहीं अधिक नरमांसभक्षण की उद्दाम प्रवृत्ति है। दोनों कथाओं में एकता का परिचायक कोई सूत्र नहीं है। बौद्धों का कल्माषपाद सौदास से भिन्न है। विकासवाद एवं ऐतिहासिकों के अनुसार विकसित कथा को नवीन एवं संक्षिप्त को प्राचीन माना जाता है। क्योंकि पूर्व की बातों को जानकर और परिष्कृत एवं रोचक बनाकर उनका निरूपण करना उत्तर वक्ता के लिए स्वाभाविक ही है। रामायण और महाभारत दोनों की अपेक्षा बौद्धों की कथा कहीं अधिक विकसित है, अतः उसकी नवीनता ही सिद्ध होती है। महाभारत आदिपर्व (अध्याय १७६–१७८) के अनुसार राजा कल्माषपाद किसी दिन मृगया के समय वन में वसिष्ठपुत्र शक्ति से मिलते हैं। मार्ग देने के प्रश्न पर विवाद छिड़ जाने पर राजा शक्ति पर कोड़े का प्रहार करते हैं। जिस पर शक्ति राजा को पुरुषाद बन जाने का शाप देते हैं। दोनों का विवाद सुनकर वसिष्ठ का अनर्थ चाहने- वाले विश्वामित्र किंकर राक्षस को आदेश देते हैं कि वह कल्माषपाद के शरीर में प्रवेश करे। बाद में किसी दिन एक ब्राह्मण ने कल्माषपाद से सामिष भोजन माँगा। राक्षसग्रस्त राजा ने अन्य मांस अप्राप्त होने के कारण ब्राह्मण को नरमांस खिलाने का आदेश दिया। पाचक ने वैसा ही किया, जिससे ब्राह्मण ने शक्ति के शाप का स्मरण दिलाकर राजा को पुरुषाद बनने का पुनः शाप दिया। राक्षस के आवेश तथा उपर्युक्त दो शापों के कारण कल्माषपाद वास्तव में नरभक्षक बन गया। उसने सर्वप्रथम शक्ति का ही भक्षण किया। अनन्तर विश्वामित्र के आदेश से किंकर राक्षस ने राजा को वसिष्ठ के १०० पुत्रों को खाने के लिए प्रेरित किया। पुत्रों की मृत्यु से वसिष्ठ आत्महत्या का असफल प्रयत्न करते हैं। बहुत समय बाद वन में कल्माषपाद वसिष्ठ के सामने आता है। अभिमन्त्रित जल द्वारा वसिष्ठ राक्षसत्व एवं शापों से उसे मुक्त कर देते हैं। इतना ही नहीं कल्माषपाद की प्रार्थना पर उसके लिए सन्तति भी उत्पन्न करते हैं। १२ वर्ष तक गर्भधारण करने के बाद अश्म से उदर खोलने से उसका जन्म होने से उसका नाम अश्मक हुआ। बुल्के कहते हैं कि “वैदिक साहित्य में वसिष्ठ और विश्वामित्र का वैर प्रसिद्ध है। महाभारत की और वैदिक साहित्य की कथा में मुख्य अन्तर यह है कि महाभारत के अनुसार वसिष्ठ शाप नहीं देते उल्टे वह कल्माषपाद को शाप से मुक्त कर देते हैं। अतएव कल्माषपाद के राक्षस बनने के शक्ति का शाप, किंकर राक्षस का प्रवेश एवं नरमां- साहार देने के कारण किसी ब्राह्मण का शाप इत्यादि अन्य कारण बताये गये हैं। अन्तिम कारण में सुतसोमजातक का प्रभाव देखा जा सकता है। सुतसोम में साधारण मांस के अभाव में राजा को नरमांस परोसा जाता है जैसा कि यहाँ अन्य मांस अप्राप्य होने से ब्राह्मण को नरमांस दिया जाता है।” परन्तु यह भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि प्रमेयत्व और वाच्यत्व रूप से तो सर्वत्र साम्य होता ही है, पर कथा में वह सादृश्य अभेद का प्रयोजक नहीं होता। सुतसोम- जातक एवं महाभारत की परस्पर अत्यन्त विलक्षणता उसकी भिन्नता ही सिद्ध करती है। "आत्मा वै पुत्रनामासि" आत्मा ही पुत्र होता है। इस दृष्टि से वसिष्ठ-पुत्र शक्ति का शाप भी वसिष्ठ का ही शाप माना जा सकता है। वसिष्ठ शापमुक्त होने की बात तो रामायणसम्मत है ही। वैदिक साहित्य का सौदास या सुदास पुरोहित होने से ब्राह्मण है। रामायण तथा महाभारत का सौदास क्षत्रिय राजा है। सुतसोमजातक का कल्माषपाद तो सौदास से भिन्न ही है। परवर्ती कथाओं में उन दोनों का अभेद पूर्णतया विरुद्ध होने से काल्पनिक ही है। बुल्के कहते हैं कि "बृहद्देवता के अनुसार वसिष्ठ ने सौ पुत्रों के वध के कारण सुदास को शाप दिया था। किन्तु महाभारत में सौदास शापग्रस्त होने के पश्चात् ही वसिष्ठ-पुत्रों का भक्षण करता है जैसा कि सुतसोमजातक में कल्माषपाद नरभक्षक बनने के बाद ही १०१ राजाओं का बलिदान तैयार करता है। जातक में बोधिसत्त्व सुतसोम नरभक्षक को उपदेश देकर व्यसन छोड़ने को प्रेरित करता है। जैसा कि महाभारत के अनुसार वसिष्ठ अभिमन्त्रित जल से कल्माषपाद को मुक्त करते हैं। इस प्रकार महाभारत की कथा पर सुतसोम की गहरी छाप है।” परन्तु यह भी संगत नहीं, क्योंकि कहा जा चुका है कि महाभारत प्राचीन है। सुतसोमजातक उसकी अपेक्षा अर्वाचीन है। इसके अतिरिक्त महाभारत का कल्माषपाद शाप आदि वश ही नरभक्षक बनता है, किन्तु सुत-