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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

कथा में कहीं अधिक नरमांसभक्षण की उद्दाम प्रवृत्ति है। दोनों कथाओं में एकता का परिचायक कोई सूत्र नहीं है। बौद्धों का कल्माषपाद सौदास से भिन्न है। विकासवाद एवं ऐतिहासिकों के अनुसार विकसित कथा को नवीन एवं संक्षिप्त को प्राचीन माना जाता है। क्योंकि पूर्व की बातों को जानकर और परिष्कृत एवं रोचक बनाकर उनका निरूपण करना उत्तर वक्ता के लिए स्वाभाविक ही है। रामायण और महाभारत दोनों की अपेक्षा बौद्धों की कथा कहीं अधिक विकसित है, अतः उसकी नवीनता ही सिद्ध होती है। महाभारत आदिपर्व (अध्याय १७६–१७८) के अनुसार राजा कल्माषपाद किसी दिन मृगया के समय वन में वसिष्ठपुत्र शक्ति से मिलते हैं। मार्ग देने के प्रश्न पर विवाद छिड़ जाने पर राजा शक्ति पर कोड़े का प्रहार करते हैं। जिस पर शक्ति राजा को पुरुषाद बन जाने का शाप देते हैं। दोनों का विवाद सुनकर वसिष्ठ का अनर्थ चाहने- वाले विश्वामित्र किंकर राक्षस को आदेश देते हैं कि वह कल्माषपाद के शरीर में प्रवेश करे। बाद में किसी दिन एक ब्राह्मण ने कल्माषपाद से सामिष भोजन माँगा। राक्षसग्रस्त राजा ने अन्य मांस अप्राप्त होने के कारण ब्राह्मण को नरमांस खिलाने का आदेश दिया। पाचक ने वैसा ही किया, जिससे ब्राह्मण ने शक्ति के शाप का स्मरण दिलाकर राजा को पुरुषाद बनने का पुनः शाप दिया। राक्षस के आवेश तथा उपर्युक्त दो शापों के कारण कल्माषपाद वास्तव में नरभक्षक बन गया। उसने सर्वप्रथम शक्ति का ही भक्षण किया। अनन्तर विश्वामित्र के आदेश से किंकर राक्षस ने राजा को वसिष्ठ के १०० पुत्रों को खाने के लिए प्रेरित किया। पुत्रों की मृत्यु से वसिष्ठ आत्महत्या का असफल प्रयत्न करते हैं। बहुत समय बाद वन में कल्माषपाद वसिष्ठ के सामने आता है। अभिमन्त्रित जल द्वारा वसिष्ठ राक्षसत्व एवं शापों से उसे मुक्त कर देते हैं। इतना ही नहीं कल्माषपाद की प्रार्थना पर उसके लिए सन्तति भी उत्पन्न करते हैं। १२ वर्ष तक गर्भधारण करने के बाद अश्म से उदर खोलने से उसका जन्म होने से उसका नाम अश्मक हुआ। बुल्के कहते हैं कि “वैदिक साहित्य में वसिष्ठ और विश्वामित्र का वैर प्रसिद्ध है। महाभारत की और वैदिक साहित्य की कथा में मुख्य अन्तर यह है कि महाभारत के अनुसार वसिष्ठ शाप नहीं देते उल्टे वह कल्माषपाद को शाप से मुक्त कर देते हैं। अतएव कल्माषपाद के राक्षस बनने के शक्ति का शाप, किंकर राक्षस का प्रवेश एवं नरमां- साहार देने के कारण किसी ब्राह्मण का शाप इत्यादि अन्य कारण बताये गये हैं। अन्तिम कारण में सुतसोमजातक का प्रभाव देखा जा सकता है। सुतसोम में साधारण मांस के अभाव में राजा को नरमांस परोसा जाता है जैसा कि यहाँ अन्य मांस अप्राप्य होने से ब्राह्मण को नरमांस दिया जाता है।” परन्तु यह भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि प्रमेयत्व और वाच्यत्व रूप से तो सर्वत्र साम्य होता ही है, पर कथा में वह सादृश्य अभेद का प्रयोजक नहीं होता। सुतसोम- जातक एवं महाभारत की परस्पर अत्यन्त विलक्षणता उसकी भिन्नता ही सिद्ध करती है। "आत्मा वै पुत्रनामासि" आत्मा ही पुत्र होता है। इस दृष्टि से वसिष्ठ-पुत्र शक्ति का शाप भी वसिष्ठ का ही शाप माना जा सकता है। वसिष्ठ शापमुक्त होने की बात तो रामायणसम्मत है ही। वैदिक साहित्य का सौदास या सुदास पुरोहित होने से ब्राह्मण है। रामायण तथा महाभारत का सौदास क्षत्रिय राजा है। सुतसोमजातक का कल्माषपाद तो सौदास से भिन्न ही है। परवर्ती कथाओं में उन दोनों का अभेद पूर्णतया विरुद्ध होने से काल्पनिक ही है। बुल्के कहते हैं कि "बृहद्देवता के अनुसार वसिष्ठ ने सौ पुत्रों के वध के कारण सुदास को शाप दिया था। किन्तु महाभारत में सौदास शापग्रस्त होने के पश्चात् ही वसिष्ठ-पुत्रों का भक्षण करता है जैसा कि सुतसोमजातक में कल्माषपाद नरभक्षक बनने के बाद ही १०१ राजाओं का बलिदान तैयार करता है। जातक में बोधिसत्त्व सुतसोम नरभक्षक को उपदेश देकर व्यसन छोड़ने को प्रेरित करता है। जैसा कि महाभारत के अनुसार वसिष्ठ अभिमन्त्रित जल से कल्माषपाद को मुक्त करते हैं। इस प्रकार महाभारत की कथा पर सुतसोम की गहरी छाप है।” परन्तु यह भी संगत नहीं, क्योंकि कहा जा चुका है कि महाभारत प्राचीन है। सुतसोमजातक उसकी अपेक्षा अर्वाचीन है। इसके अतिरिक्त महाभारत का कल्माषपाद शाप आदि वश ही नरभक्षक बनता है, किन्तु सुत-

सोम का कल्माषपाद प्राचीन संस्कार वशात् पहले मांसभक्षक और फिर शाप आदि के बिना ही नरभक्षक बनता है। महाभारत का कल्माषपाद १०० ब्राह्मणों को खाता है, किन्तु सुतसोम जातक का कल्माषपाद देवता को बलिदान करने के लिए १०१ राजकुमारों को बटोरता भर है, खाता नहीं और बाद में उनको छोड़कर उनका राज्य लौटा देता है। महाभारत का कल्माषपाद शाप से एवं राक्षसावेश से नरभक्षक बनता है और अभिमन्त्रित जलप्रोक्षण कर वसिष्ठ के अनुग्रह वश मुक्त होता है। जातक का कल्माषपाद सुतसोम के उपदेश से ही आदत छोड़ता है। इस तरह दोनों में महान् अन्तर है। सुतसोमजातक का आख्यान लौकिक स्वाभाविक होने से भी अर्वाचीन प्रतीत होता है, किन्तु महाभारत और रामायण के दोनों आख्यान वर, शाप आदि अलौकिकता से सम्बन्ध रखते हैं, अतः वे प्राचीन हैं। महाभारत और रामायण की कथा संक्षिप्त है तथा सुतसोमजातक की कथा सविस्तर है। इस तरह दोनों में महान् अन्तर है। वेद के उपबृंहणार्थ ही महाभारत तथा रामायण का आविर्भाव है, अतः वैदिक साहित्य की कथा से उनका मेलजोल हो सकता है। बृहद्देवता की कथा का सुतसोमजातक की कथा से साम्य नहीं है, यह बुल्के भी मानते हैं। महाभारत में दो शापों का उल्लेख है। बुल्के कहते हैं कि "कल्माषपाद नाम का वैदिक साहित्य में सर्वथा अभाव है। महासुतसोमजातक गाथा ४७२, महाभारत तथा रामायण तीनों में समानरूप से मिलता है। इनमें सुतसोमजातक सबसे प्राचीन है। अतः पहले पहल यह नाम बौद्ध साहित्य में ही प्रयुक्त हुआ है। महाभारत, रामायण तथा पुराणों में सौदास, मित्रसह तथा कल्माषपाद तीनों नाम दिये हैं", पर यह सभी कुशकाशावलम्बन है। महाभारत और रामायण की बुद्ध से भी प्राचीनता सिद्ध की जा चुकी है। हरिवंशपुराण भी महाभारत समकालीन ही है। उसमें स्पष्ट उल्लेख है— "सुदासस्य सुतस्त्व्वासीत् सौदासो नाम पार्थिवः । ख्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्रसहस्तथा ॥" (हरिवं० १।५५।२१) अतः बुल्के का यह कहना "एक दीर्घकालीन विकास के अन्त में सौदास की कथा भक्तवत्सल भगवान् राम के गुणगान में परिणत हो गयी।" कथमपि सङ्गत नहीं है, अवश्य ही सौदास की कथा प्राचीन ही नहीं अतिप्राचीन है। परन्तु वह अतिप्राचीन काल से ही रामायण के अन्तर्गत होने से राम गुणगान के रूप में स्वीकृत है, पर बुल्के के विकासक्रम से नहीं। महाभारत, रामायण तथा पुराण सभी वेद के उपबृंहणार्थ ही निर्मित हैं। अतः वैदिक साहित्य से ही उनका सम्बन्ध है। किञ्चित् भेद होने पर कल्पभेद से समाधान है ही। आश्चर्य है कि बुल्के वेद में आनेवाले राम, सीता, दशरथ, जनक आदि का सम्बन्ध रामायण के राम, सीता, दशरथ आदि से मानने में आनाकानी करते हैं। वेदप्रातिशाख्य के वाल्मीकि से रामायण के वाल्मीकि का सम्बन्ध वे नहीं मानते हैं। वैदिक सौदास से सुतसोमजातक के सौदास का अत्यन्त वैलक्षण्य होने पर भी वे यथा- कथञ्चित् बादरायणसम्बन्ध-स्थापना का हठ करते हैं। 'किमाश्चर्यमतः परम् ।' शम्बूक-वध ६२८ वें अनु० में शम्बूक-वध के सम्बन्ध में उत्तरकाण्ड के अनुसार कहा गया है कि राम नारद से यह जान लेते हैं कि एक शूद्र का तपस्या करना ही ब्राह्मण-पुत्र की अकाल मृत्यु का हेतु है। राम पुष्पक पर आरूढ़ होकर शूद्र का पता लगाकर उसका वध करते हैं। राम के इस कार्य से वह स्वर्ग प्राप्त न कर सकेगा। इस कथन का इतना ही अभिप्राय है कि शम्बूक जो सदेह स्वर्ग प्राप्त करना चाहता था वह न कर सकेगा। किन्तु राजदण्ड से मृत्यु प्राप्त कर तो वह स्वर्गभागी होगा ही, अतः इसका अन्य वचनों के साथ समन्वय ही है, विरोध नहीं है। राम मृत पुत्र के पुनर्जीवन का वरदान माँग लेते हैं। अगस्त्य राम को श्वेत राजा और दण्डकारण्य की कथा सुनाते हैं।

६०८ रामायणमीमांसा एकोनविंश पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड अध्याय ३२।८९ तथा उत्तरखण्ड अध्याय २३०।४७) में भी देवताओं के वरदान से द्विज-पुत्र के जीवित होने का उल्लेख है। महाभारत शान्तिपर्व में कहा गया है कि— “श्रूयते शम्बुके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः। जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥” (म० भा० १२।१४९।६२) इसमें देवताओं के वरदान से नहीं, किन्तु राम के धर्म से द्विजपुत्र का पुनर्जीवन होना माना गया है। वस्तुतः बुल्के समन्वय की बात सोचते ही नहीं। उन्हें सर्वत्र विरोध ही दिखायी देता है। अन्यथा देवताओं के प्रसाद या धर्म से पुनर्जीवन में विरोध ही क्या है। धर्म भी तो देवता-प्रसाद का साधन है, अतः राम के धर्म से देवता-प्रसाद और उससे द्विजपुत्र का पुनर्जीवन होने में विरोध का लेश भी तो नहीं है। यही श्लोक इस बात का भी परम प्रमाण है कि रामायण महाभारत की अपेक्षा अति प्राचीन है। अतः रामकथा पर कृष्णकथा का प्रभाव अथवा महाभारत के रामोपाख्यान को वाल्मीकिरामायण का मूल मानना सर्वथा भ्रान्ति ही है। कालिदास के रघुवंश एवं उत्तररामचरित के अनुसार शम्बूक-वध के द्वारा ही ब्राह्मण पुत्र पुनर्जीवन प्राप्त करता है— “कृतदण्डः स्वयं राज्ञा लेभे शूद्रः सतां गतिम् । तपसा दुश्चरेणापि न स्वमार्गविलङ्घिना ॥” (र० वं० १५।५३) राजा के द्वारा दण्ड दिये जाने के कारण शूद्र को उत्कृष्ट सद्गति मिल गयी, जो कि स्वमार्गविपरीत दुश्चर तप से भी नहीं मिल सकती थी। उत्तररामचरित के अनुसार शम्बूक, वध के बाद, दिव्य रूप में प्रकट होकर राम से कहता है, मैं आपके प्रसाद से शाश्वत पद प्राप्त करूँगा। बुल्के कहते हैं कि परवर्ती राम-कथाओं में देवताओं के वरदान का उल्लेख नहीं है, किन्तु राम द्वारा शम्बूक-वध की क्रिया ही ब्राह्मण-पुत्र के पुनर्जीवन एवं शम्बूक की स्वर्गप्राप्ति दोनों घटनाओं की कारण मानी गयी है। किन्तु बुल्के यह नहीं समझते कि मीमांसकों के अनुसार कर्म ही फल देता है। उत्तरमीमांसा के अनुसार देवताप्रसाद द्वारा कर्म फल देता है। परिणाम दोनों का एक ही है। देवताओं का वरदान भी सत्कर्म द्वारा होता है। इसी लिए कहा गया है कि— ‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करै सो तस फल चाखा॥’ (रा० मा० २।२७।२) अतः प्रकृत में दोनों का समन्वय ही है। आनन्दरामायण के अनुसार मृत ब्राह्मण-बालक के माता-पिता को प्रीतिपूर्वक कहा गया था कि यदि उनका पुत्र पुनर्जीवित न होगा तो उन्हें कुश और लव मिल जायेंगे। ब्राह्मण ही नहीं अयोध्या में पाँच शव और एकत्रित हो गये थे : एक क्षत्रिय, एक वैश्य, एक तेली, एक लुहार की पुत्र-वधू एवं एक चमार। राम ने जैसे शूद्र को मारा सब जीवित हो गये। राम ने पहले शूद्र को वरदान दिया। उसने अपने उद्धार के अतिरिक्त अपनी जाति के लिए सद्गति माँगी। राम ने रामनाम का जप और कीर्तन शूद्रों की सद्गति का उपाय बताया। यह भी कहा कि शूद्र लोग आपस में मिल कर एक दूसरे से मिलते हुए नमस्कार के रूप में राम राम कहेंगे। इसी से उनका उद्धार होगा। तुम भी मेरे हाथ से मरकर वैकुण्ठ जाओगे।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६०९ कुछ अनभिज्ञ इसे राम की क्रूरता कह सकते हैं और स्वयं राम भी अपने दक्षिण हाथ को क्रूर कहते हैं—हे दक्षिण हस्त ! तुम ब्राह्मण-पुत्र के जीवन के लिए शूद्र मुनि पर कृपाण चलाओ, कतराते क्यों हो, तुम तो उस राम के बाहु हो जिसने निर्भरगर्भखिन्ना सीता के निर्वासन में अपनी पटुता दिखायी थी, फिर तुम्हें करुणा कैसी ? 'हे हस्त दक्षिण मृतस्य शिशोद्विजस्य् जीवातवे विसृज शूद्रमुनौ कृपाणम् । रामस्य बाहुरसि निर्भरगर्भखिन्न- सीताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते ।।” ( उ० रा० च० ) वेदादि शास्त्रोक्त कर्म ही धर्म है। यह— “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।” ( गीता १६।२४ ) “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ।” ( मी० द० १।१।१२ ) आदि से स्पष्ट है । तदनुसार चातुर्वर्ण्यधर्म के विपरीत आचरण अधर्म है। राम ने शम्बूक शूद्र को ही नहीं धर्मविपरीत ब्राह्मण रावण को भी प्राणदण्ड दिया था। अतः उनकी निष्पक्षता स्पष्ट है । धर्म पर चलनेवाले वानरों, भालुओं, गीध, काक तथा कोल, भिल्ल, किरात, निषाद आदि सबका ही आदर किया था। कोई भी कर्म अधिकारानुसार ही पुण्य हो सकता है। अनधिकारी का वेदाध्ययन, यज्ञ और तप भी पाप ही हो सकता है । यति को काञ्चन, ब्रह्मचारी को ताम्बूल तथा चोर को अभय का दान पाप ही है— “यतये काञ्चनं दत्त्वा ताम्बूलं ब्रह्मचारिणे । चोराय चाभयं दत्त्वा दातापि नरकं व्रजेत् ॥” एक यातायातनियामक का अपना काज छोड़कर किसी शिष्ट की रक्षा जैसे अच्छे काज में लगना भी अपराध है । स्वकर्तव्य में निष्ठा ही धर्म है— “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।” ( गीता० १८।४५ ) “स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः । विपरीत्तस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्चयः ॥” ( पुराणवचन ) यातायातनियामक के अन्यकार्याभिमुख होने पर यदि मोटर आदि का एक्सीडेंट हो जाय तो इसका उत्तरदायित्व सिवा नियामक के किसके ऊपर होगा ? वह एक मनुष्य को बचाने के लिए अपने कर्तव्य से विमुख होता है तो नियन्त्रण न-होने से अनेक एक्सीडेंट हो सकते हैं । सैकड़ों शिष्टों का जीवन संकटग्रस्त हो सकता है। अतः स्वधर्मविमुख अवश्य ही दण्डनीय है । एक न्यायाधीश के सामने किसी हत्यारे का हत्या का अपराध सिद्ध हो जाने पर न्यायाधीश का कर्तव्य है कि उसे प्राणदण्ड का आदेश दे, फिर भले ही उसके बूढ़े माँ, बाप तथा युवती स्त्री एवं दुधमुंहे बालकों का जीवन खतरे में पड़ जाय । यदि शम्बूक के समान कोई स्वास्थ्य अधिकारी (हेल्थ डिपार्टमेण्ट का अधिकारी ) सफाई का इन्चार्ज अपने पद का चार्ज बिना दिये तपस्या में बैठ जाय और सफाई की गड़बड़ी से प्लेग, कालरा आदि फैलने से ब्राह्मण आदि वर्णों के बालक मर जायें तो स्पष्ट ही इसका उत्तरदायित्व उसी पर है। जो अपना काम छोड़कर तप में बैठा है। हरएक समझदार उसके लिए प्राणदण्ड उचित ही समझेगा । कर्तव्यपालन की उपेक्षा का दुष्परिणाम सर्वप्रसिद्ध ही है। शास्त्रों में तप का विधान चतुर्थ वर्ण के लिए नहीं है । वैदिक चातुर्वर्ण्यधर्म का उल्लङ्घन करने के ७७

६१० रामायणमीमांसा एकोनविंश कारण ही ब्राह्मण रावण और शूद्र शम्बूक दोनों को दण्ड दिया गया था। कोई भी बुद्धिमान् यह भलीभाँति समझ सकता है कि जैसे ब्राह्मण अपना कर्म छोड़कर शूद्र का कर्म करे तो अवश्य अपराधी होगा वैसे ही शूद्र अपना कर्म छोड़कर ब्राह्मण का कर्म करने पर अपराधी क्यों न होगा ? पउमचरियं (पर्व ४३) के अनुसार खरदूषण-पत्नी शूर्पणखा का पुत्र शम्बूक सूर्यहास खड्ग प्राप्त करने के लिए १२ वर्ष तप करता है। खड्ग प्राप्त होता है। संयोग से उसी समय लक्ष्मण पहुँच जाते हैं। खड्ग को देख उठाकर बाँस काटते हैं और शम्बूक का सिर भी काटते हैं। चन्द्रनखा (शूर्पणखा) पुत्र से प्रतिदिन मिलने आती थी। उसे मरा देखकर विलाप करती है। वन में भटकती हुई राम और लक्ष्मण को देखकर उनपर आसक्त होती है। दोनों से अस्वीकृत होकर खर, दूषण एवं रावण को शम्बूक-वध की सूचना देती है। इस प्रकार शम्बूक-वध के कारण ही सीताहरण और राम-रावण-युद्ध होता है। किन्तु यह सब विकृत कल्पनामात्र है। तेलगू द्विपदरामायण के अनुसार शूर्पणखा का पति विद्युज्जिह्व रावण के विरुद्ध विद्रोह करने के कारण रावण द्वारा मारा जाता है। उसका पुत्र जम्बूमाली या जम्बुकुमार माता से पिता के वध का वृत्तान्त सुनकर खड्ग की प्राप्ति के उद्देश्य से साधना करता है और लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है (अरण्यकाण्ड १०)। आनन्दरामायण में शूर्पणखा-पुत्र साम्ब राक्षस है। वह ब्रह्मा से दिव्य खड्ग प्राप्त करता है। लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है (आ० रा० १।७।४१-४३)। कन्नड़ तोरवेरामायण के अनुसार शम्बूक राक्षस इन्द्रपद प्राप्त्यर्थ तपस्या करता है। उसके चारों ओर वाल्मीक बन गया। इन्द्र और नारद व्याध के रूप में मिलकर लक्ष्मण को मृगया का निमन्त्रण देते हैं। इन्द्र एक वराह की सृष्टि करते हैं जो वल्मीक की ओर जाता है। लक्ष्मण के बाण से वराह और शम्बूक दोनों का वध होता है। सेरतकाण्ड के अनुसार शूर्पणखा का दर्सासींगा तपस्या से चन्द्रवाली नामक खड्ग प्राप्त करता है। संयोग से वह लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है। रामकियेन के अनुसार रावण-भगिनी सम्मनखा थी। जिसका पति जिह्व तथा पुत्र कुम्भकश था। कुम्भ- कश ने गोदावरी के तट पर एक दिव्य खड्ग प्राप्त किया। परन्तु ब्रह्मा ने कुम्भकश को वह खड्ग हाथ में न देकर सामने गिरा दिया। उसने हाथ में न देने के कारण अपमान समझकर उसे नहीं लिया। लक्ष्मण आकर उसे उठाते हैं। कुम्भकश उनसे युद्ध करता है और मारा जाता है। रावण बाद में जिह्व का भी वध करता है। ब्रह्मचक्र में लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की दो पुत्रियों का वध वर्णित है। वस्तुतः जम्बूक, जम्बुमाली, शम्बूक राक्षस आदि शूर्पणखा सम्बन्धी व्यक्ति पृथक् है एवं वाल्मीकिरामायण का शम्बूक शूद्र पृथक् है। नामसाम्य से ही दोनों की एकता की भ्रान्ति हुई है। राम का अश्वमेध राम ने पहले राजसूय यज्ञ करने का विचार किया था, किन्तु भरत के विरोध करने पर लक्ष्मण के प्रस्तावानुसार अश्वमेध किया। उसी के प्रसङ्ग से सीता ने सतीत्व का प्रत्यय दिया और प्रकट दिव्य सिंहासन पर बैठकर भूमि में प्रविष्ट हो गयीं। राम ने बाद में भी बहुत से यज्ञ किये, किन्तु सर्वत्र काञ्चनी सीता ही उनके साथ रहीं। उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया— "न सीतायाः परां भार्या वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥" ९९।७

अध्याय उत्तरकाण्ड ६११ रघुवंश आदि में भी काञ्चनी सीता का उल्लेख है। यह शङ्का होती थी कि राम तो स्वयं ही सर्वदेव विष्णु थे फिर उन्होंने किस अन्य देव का यजन किया होगा ? उसी का समाधान करते हुए अग्निपुराण ने कहा है—“राम वासुदेव स्वरूप ही थे। अश्वमेध से उन्होंने ब्रह्म- स्वरूप स्वात्मा का ही यजन किया था— “वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत् ।” ( अ० पु० १०।३३ ) आनन्दरामायण के अनुसार राम ने १०० अश्वमेध किये । रामचरितमानस के अनुसार राम ने कोटि अश्वमेध किये थे— “कोटिन वाजिमेध प्रभु कीन्हे। अमित दान विप्रन कहँ दीन्हे॥ कल्पभेद से स्वयं किये अथवा अन्य अधिकारियों को प्रेरणा देकर राम ने साक्षात् एवं परम्परा से कोटि- कोटि अश्वमेध किये। कोटि-कोटि शिवलिङ्गों की स्थापना भी राम ने की थी— “कोटिशः स्थापयामास शिवलिङ्गानि सर्वशः। ६३६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण में राम के लिए ब्रह्महत्या का उल्लेख नहीं है। परन्तु पुराणों में इसका उल्लेख है। उसके प्रायश्चित्तस्वरूप राम ने अश्वमेध किया था ।” वाल्मीकिरामायण से अविरुद्ध होने के कारण यह भी ठीक ही है। स्कन्दपुराण सेतुमाहात्म्य के अनुसार रावण-वधजन्य ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करने के लिए राम ने कोटि- तीर्थ में ( अध्याय २७ ) तथा गन्धमादन में ( अध्याय ४४ ) शिवलिङ्गों की स्थापना की थी। ब्राह्मखण्ड में राम ने वसिष्ठ से कहा था कि मेरे द्वारा बहुत से ब्रह्मराक्षसों की हत्या हुई है। उसके प्रायश्चित्तार्थ उत्तम तीर्थ का आप निर्देश करें— “मया तु सीताहरणे निहता ब्रह्मराक्षसाः। तत्पापस्य विशुद्ध्यर्थं वद तीर्थोत्तमोत्तमम् ॥” वसिष्ठ धर्मारण्य की यात्रा और उस तीर्थ के जीर्णोद्धार का उपदेश करते हैं ( धर्मारण्यखण्ड अध्याय ३१ )। जैमिनीय अश्वमेध ( अ० २९ ) के अनुसार राम ने प्रायश्चित्तस्वरूप अश्वमेध किया था। पद्मपुराण ( अध्याय ४४ ) में राम के अश्वमेध का विस्तृत वर्णन है। उसमें हनुमान् का शिव एवं इन्द्र आदि देवताओं के साथ युद्ध वर्णित है। राम की यात्राएँ राम की लङ्कायात्रा सब से अधिक महत्त्वपूर्ण है। नृसिंहपुराण ( अध्याय २७ ) के अनुसार राम ने उस अवसर पर लङ्का में पुण्यारण्य की स्थापना की थी। स्कन्दपुराण ( नागरखण्ड अध्याय १०१ ) के अनुसार लक्ष्मण के परमधाम प्रस्थान के बाद सुग्रीव को लेकर राम ने लङ्का-यात्रा की थी एवं विभीषण को देवपूजा का आदेश दिया था। वस्तुतः रामायण और पुराणों का समन्वय ही है। रामायण के अनुसार ही पुराणों की संगति लगानी उचित है। राम मर्यादापुरुषोत्तम थे। रावण ब्राह्मण था। भले ही वह अधम ब्राह्मण हो, पर उसके वध से भी धर्मशास्त्रानुसार ब्रह्महत्या होती ही है, क्योंकि “ब्राह्मणो न हन्तव्यः” इस वचन में ब्राह्मणजाति के हनन का निषेध

है। ब्राह्मण जाति में उत्तम, अधम, स्त्री, पुरुष सब आ जाते हैं। ब्राह्मण शब्द उद्देश्य है। उद्देश्यगत लिङ्ग और संख्या विवक्षित नहीं होती । स्कन्दपुराण नागरखण्ड के अनुसार विभीषण के अनुरोध से राम ने सेतु नष्ट कर दिया था। पद्मपुराण ( सृष्टिखण्ड अध्याय ३५ ) के अनुसार सीता के भूमिप्रवेश के बाद राम ने लक्ष्मण को अयोध्या का राज्यभार सौंपकर भरत के साथ पुष्पक पर चढ़कर पश्चिम में भरत के पुत्रों तथा लक्ष्मण के पुत्रों से मिलकर दक्षिण की ओर प्रस्थान किया और सुग्रीव को साथ लेकर लङ्का पहुँच गये । विभीषण ने राम को वामन की वैष्णवी मूर्ति प्रदान की तथा राम ने सेतुभङ्ग किया । शत्रुघ्न से मिलकर कान्यकुब्ज देश में जाकर राम ने वामन की मूर्ति स्थापित की । नारदपुराण ( पूर्वखण्ड ७९।२९ ) के अनुसार राम ने द्रविड़ देश में विभीषण को मुक्त किया था । किन्तु पद्मपुराण ( पातालखण्ड अध्याय १०० ) में यह उल्लेख है कि भगवान् शङ्कर शम्भु नामक ब्राह्मण के रूप में किसी दिन अयोध्या आये थे । राम को समाचार मिला कि द्रविड़ों ने विभीषण को कैदी बना लिया है । राम शम्भु के साथ दक्षिण जाकर श्रीरङ्गम् के कारावास में विभीषण से मिले । वहाँ पता लगा कि विभीषण ने अनजाने एक विप्र को पैरों तले कुचलकर मार डाला था । उसके बाद विभीषण एक पग भी आगे नहीं बढ़ सका, पर ब्राह्मणों द्वारा मारे जाने पर भी वह नहीं मर सका । ब्राह्मणों ने उसके वध के लिए राम से आग्रह किया। राम ने विभीषण को अपना भक्त कहकर उसे छुड़ाया तथा विभीषण अज्ञान से हुई ब्रह्महत्या का उचित प्रायश्चित्त कर के अपनी राजधानी में लौटा । आनन्दरामायण के अनुसार राम तथा सीता ने शतस्कन्ध रावण तथा मूलकासुर द्वारा पराजित विभीषण की सहायता के लिए लङ्का-यात्रा की थी। वाल्मीकिरामायण में भरत की गन्धर्वदेश की विजययात्रा का वर्णन है ( सर्ग १००,१०१ ) । इसके बाद उन्होंने लक्ष्मण के पुत्रों के लिए कारुपथ तथा मल्लदेश को वश में किया था । आनन्दरामायण ( राज्यकाण्ड सर्ग ६ ) के अनुसार राम स्वयं पृथ्वी के समस्त राजाओं पर विजय प्राप्त करते हैं । जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप आदि सप्त द्वीपों की यात्रा करते हैं ( आ० रा० राज्यका० सर्ग ७-९ ) । आनन्द- रामायण ( राज्यका० सर्ग २१ ) के अनुसार एक बार राम को वाल्मीकि और विश्वामित्र दोनों ने एक ही समय दूत भेजकर यज्ञ के लिए निमन्त्रण दिया । राम ने दोनों का निमन्त्रण स्वीकार किया । वहाँ अपने अन्य साथियों के दो- दो देह बना लिये और एक ही समय दोनों मुनियों के यहाँ पहुँच गये । सर्ग २४ में राम की यमपुर-यात्रा वर्णित है । सुमन्त्र की आयु ९ दिन शेष रहते हुए वह मर गया । राम ने यमपुर प्रस्थान किया। मार्ग में ही यमदूतों से भेंट हुई । राम ने उनको परास्त कर सुमन्त्र को लौटा लिया । आनन्दरामायण के पूर्णकाण्ड ( सर्ग १-४ ) में सोमवंशी राजाओं के आक्रमण का वर्णन है। राम अपनी सेना के साथ उनका सामना करने गये । हस्तिनापुर में ६ महीने तक भीषण युद्ध हुआ । अन्त में सीता के अनुरोध पर सन्धि हुई । बालकाण्ड तथा अयोध्याकाण्ड के कथानकों के अन्तर्गत भी राम की तीर्थयात्राएँ वर्णित हैं । स्कन्द- पुराण ( ब्राह्मख० धर्मारण्यमा० अध्याय ३३ ) में राम की धर्मारण्य की तीर्थयात्रा वर्णित है । ६३८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ७।४२ ) में रामाभिषेक के बाद तथा सीता- त्याग के पूर्व राम और सीता के विहार में अप्सराओं के नृत्य और मदिरा तथा मांस के सेवन का उल्लेख है।” परन्तु बुल्के को जानना चाहिये कि यज्ञ, यागादि में अनिषिद्ध तथा विहित मांस तथा दिव्य मधु निषिद्ध नहीं है ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६१३ राम ईश्वर थे । उनके वरदान से ही बहुत से ऋषि, मुनि तथा स्त्रियाँ व्रज की गोपाङ्गनाएँ हुई थीं । हिंडोल, होलिकोत्सव आदि तो अनादि काल से सनातन धर्म के महोत्सव अवतारों द्वारा आदृत होते ही रहे हैं । इसमें कृष्ण-लीला का प्रभाव देखना अनभिज्ञता ही है । अद्भुतरामायण भी शतकोटिप्रविस्तर रामायण के अन्तर्गत हो है । उसमें सर्ग १७-२७ के अनुसार एक बार विश्वामित्र आदि मुनियों ने आकर रावणवध के कारण राम की प्रशंसा की । इसपर सीता ने मुस्कुरा कर विश्रवा और कैकसी के पुत्र सहस्रस्कन्ध रावण की कथा सुनायी, जिसने इन्द्र आदि देवताओं को पुष्कर में कारागार में कैद किया था । कथा सुनकर राम सेना सहित पुष्कर जाते हैं । रावण वायव्य शर से समस्त सेना को अयोध्या तक उड़ा देता है तथा द्वन्द्वयुद्ध में राम मृतप्राय हो जाते हैं । तब सीता देवी महाविकट रूप धारण कर सहस्रस्कन्ध रावण तथा उसके योद्धाओं का सिर काटकर नाचने लगती हैं, जिससे सारी सृष्टि संकट में पड़ जाती है— “ननर्त जानकी देवी घोरकाली महाबला ।” २३-६३ ब्रह्मा आदि देवता सीता से नृत्य समाप्त करने का अनुरोध करते हैं। ब्रह्मा राम को पुन: जीवित करते हैं । राम परमशक्ति के रूप सीता की स्तुति करके उनसे अनुरोध करते हैं कि वह अपना विकट रूप त्याग दें तब सीता विकटरूप त्यागकर सौम्य रूप धारण करती हैं और राम के साथ पुष्पक पर चढ़कर अयोध्या जाती हैं । उक्त प्रसङ्ग सीतामाहात्म्य-वर्णन का अर्थवाद है । युद्ध-शोभार्थ जैसे राम इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र से मूर्च्छित हुए थे । वैसे ही प्रकृत प्रसङ्ग में भी समझना चाहिये । उड़िया राम-साहित्य में प्रस्तुत प्रसङ्ग के दो अन्य रूप मिलते हैं । विलङ्कारामायण के पूर्वखण्ड के अनुसार सहस्रस्कन्ध रावण ने राम, लक्ष्मण तथा हनुमान् को परास्त किया था । तब सीता ने मङ्गलादेवी से पुष्पधनुष तथा पाँच शर प्राप्त कर रावण पर चलाये और राम ने कामातुर रावण के समस्त सिर काट दिये । विलङ्काखण्ड के अनुसार दशशिर रावण के वध के अनन्तर सहस्रस्कन्ध रावण सन्धि प्रस्ताव ठुकरा कर युद्ध करने आया । शक्ति के प्रहार से उसने राम और लक्ष्मण को मूर्च्छित कर सीता का हरण करना चाहा, किन्तु सीता के शरीर से एक गन्धर्व- सेना निकली जिसने सहस्रस्कन्ध रावण का वध किया । आगारिया आदिवासियों में प्रचलित कथा के अनुसार सीता ने पातालवासी सहस्रस्कन्ध रावण की चर्चा की । राम ने एक बाण से उसे आहत कर दिया । पर उसने अपने पैर से बाण निकालकर राम को मारने के लिए उसी बाण को भेज दिया । राम मूर्च्छित हो गये । तब सीता ने लोगुन्दी के पास जाकर उससे कोयले का एक पात्र माँग लिया और यह निवेदन किया कि आज्ञासुर और लोहासुर को मेरे साथ भेज दीजिये । राजा की स्वीकृति हो गयी । कोयले का पात्र तथा तलवार लेकर सीता दोनों को साथ लेकर चल पड़ी । कोयले के धुएँ से सीता का रङ्ग काला पड़ गया । उन्होंने रावण के सिर काट डाले । आज्ञासुर तथा लोहासुर दोनों ने रावण का रक्त पी लिया । आनन्दरामायण ( राज्यका० सर्ग ४।८०-८५ ) के अनुसार शतशीर्ष रावण शोण नदी के तटपर माया- पुरी में रहता था । कुम्भकर्ण का पौत्र पौण्ड्रक उससे सहायता माँगने गया था । दोनों ने मिलकर विभीषण को पराजित कर दिया । विभीषण राम के पास सहायता के लिए आये । राम और सीता दोनों गये । युद्ध में राम परास्त हुए, किन्तु सीता ने दोनों का वध किया । तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार सीता ने अष्टादशभुजावाला विकट रूप धारण कर शतानन रावण का वध किया था । विलङ्कारामायण उत्तरखण्ड के अनुसार काली का रूप धारणकर सीता ने लक्षशीर्ष रावण का वध किया था ।

६१४ रामायणमीमांसा एकोनविंश आनन्दरामायण (सर्ग ४-६) के अनुसार पातालवासी रावणपुत्र मूलकासुर से पराजित होकर विभीषण पुनः राम के पास गये । राम सहायतार्थ गये । सात दिनों तक मूलकासुर के साथ युद्ध हुआ । हनुमान् ने पहले की भाँति द्रोणाचल लाकर मृत वानरों को जिलाया । ब्रह्मा ने आकर कहा कि मेरे वरदान के अनुसार यह किसी वीर के हाथ न मरेगा । किसी ऋषि ने इसे सीता के हाथ मरने का शाप दिया है । राम ने गरुड़ को सीता लाने भेजा । सीता ने लङ्का पहुँचकर तामसी छाया को युद्ध के लिए प्रेरित किया । इतने में वानर मूलकासुर का यज्ञ विध्वंस कर लौटे । सीता की तामसी छाया ने चण्डी का रूप धारणकर मूलकासुर का वध किया । हनुमच्चरित वाल्मीकिरामायण के अनुसार हनुमान् का चरित्र महत्त्वपूर्ण है । हनुमान् ही राम और लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले जाकर मैत्री कराते हैं । वर्षा ऋतु के पश्चात् सुग्रीव को राम के प्रति कर्त्तव्यपालन का स्मरण दिलाते हैं । राम की मुद्रिका लेकर सीता की खोज में वानरों के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान करते हैं और समुद्रलङ्घन कर सीता का पता लगाते हैं । उनका सन्देश लेकर राम के पास लौटते हैं । लङ्का-दहन वृत्तान्त को बुल्के प्रक्षिप्त कहते हैं, परन्तु वह उनकी भूल है । हनुमान् द्वारा लङ्का-दाह वाल्मीकिरामायण से सिद्ध है । अक्षयकुमार का वध भी लङ्का-दाह के प्रसङ्ग में वर्णित है । युद्ध में भी हनुमान् का प्रमुख भाग रहा है और अनेक बार औषध-पर्वत लाकर उन्होंने लक्ष्मण एवं अन्य वानरवीरों के प्राण बचाये हैं । इन अंशों को बुल्के प्रक्षिप्त कहते हैं । बुल्के यह भी कहते हैं कि प्राचीन रामायण में हनुमान् की जन्म-कथा का अभाव रहा होगा । परन्तु यह सब भी उनके निःसार अनुमान हैं । रामायण राम-पुत्र कुश और लव द्वारा गाया गया है, बुल्के के तथाकथित कुशीलवों द्वारा नहीं । अतएव उनके (कुशीलवों के) द्वारा रामायण की पूर्ति की गयी है, यह उनकी कल्पना निःसार है । प्रचलित वाल्मीकिरामायण ही प्रामाणिक रामायण है । हनुमान् की कथा पराक्रम, बुद्धिमत्ता, चिरजीवित्व, ब्रह्मचर्य, रामभक्ति, देवत्व ये हनुमान् के विशिष्ट गुण हैं । पउमचरियं के अनुसार हनुमान् रावण तथा सुग्रीव दोनों के रिश्तेदार माने गये हैं । रावण ने अपनी बहन चन्द्रनखा की पुत्री अनङ्गकुसुमा का तथा सुग्रीव ने अपनी पुत्री पद्मरागा का हनुमान् से विवाह किया था । युद्ध के बाद राम ने हनुमान् को राजा बनाकर उन्हें श्रीपर्वत के शिखर पर स्थित श्रीपुर प्रदान किया था । अन्त में दीक्षा लेकर हनुमान् निर्वाण प्राप्त करते हैं । जैनों की दीक्षा का मिथ्या प्रचार प्रसिद्ध ही है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो हनुमान् सूर्यनारायण से सम्पूर्ण वेद-वेदाङ्गों का अध्ययन करते हैं और ब्रह्मविद्या में वे प्रधानतया निष्णात हैं । रामायण के अनुसार वे अञ्जनापुत्र हैं, यह निर्विवाद है । बुल्के कहते हैं कि इसकी प्रामाणिकता सन्दिग्ध है । परन्तु बुल्के का पक्ष ही प्रमाणशून्य है । हनुमान् का अञ्जना-पुत्रत्व तो वाल्मीकि- रामायण से सिद्ध ही है । अध्यात्मरामायण (४।७।१९,२०) के अनुसार हनुमान् और अङ्गद नारायण की आराधना कर उनके पार्षद बने थे और मायाशक्ति के प्रभाव से वानररूप में उत्पन्न हुए थे । बुल्के प्रचलितरामायण की हनुमज्जन्म-कथा के विरुद्ध दो तर्क देते हैं—एक तो वाल्मीकिरामायण में केसरी एवं अञ्जना के उल्लेखों की कमी है । दूसरे हनुमान् की उपाधि वायु-पुत्र का निरन्तर उल्लेख मिलता है । परन्तु यह तर्क भी तर्काभास ही है, क्योंकि प्रामाणिक एक स्थल के वचन पर्याप्त होते हैं । प्रमाणाभास सैकड़ों वचन भी अकिञ्चित्कर होते हैं । फिर स्वयं बुल्के भी यह मानते हैं कि एक स्थल में तीनों पाठों के अनुसार हनुमान् के पिता के रूप में केसरी का उल्लेख हुआ है । फिर कई बार केसरी

अध्याय उत्तरकाण्ड ६१५ का उल्लेख होने पर भी कमी बतलाना सरासर झूठ है। देखो—सीता-हनुमान्-संवाद में वे सीता से कहते हैं— "अहं सुग्रीवसचिवो हनुमान् नाम वानरः ।” (वा० रा० ५।३४।३८) अगले सर्ग में वे पुनः अपना परिचय देते हैं—मैं केसरी की पत्नी से उत्पन्न हनुमान् हूँ— "माल्यवान् नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरिः। ततो गच्छति गोकर्णं पर्वतं केसरी हरिः॥ यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि । हनुमानिति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा।।" (वा० रा० ५।३५।७९-८१) वस्तुतः वानररूप में हनुमान् को देखकर सीता को यह शङ्का उत्पन्न हो गयी कि कहीं यह रावण ही तो नहीं है ? "स्वं परित्यज्य रूप यः परिव्राजकरूपवान् । जनस्थाने मया दृष्टस्त्वं स एव हि रावणः ।।" ( वा० रा० ५।३५।१५ ) सीता शङ्का मिटाने के लिए उन्हें राम के गुण कहने को प्रेरित करती हैं, क्योंकि रावण राम का द्वेषी है। यदि यह रावण होगा तो राम का गुण-वर्णन नहीं करेगा। यदि कृत्रिम भावना से वर्णन करेगा तो कृत्रिमता व्यक्त हो ही जायेगी। हनुमान् राम का गुण-वर्णन करते हैं और अपना परिचय देते हुए कहते हैं—मैं हनुमान् नामक वानर सुग्रीव का सचिव हूँ, मैं मायावी राक्षस नहीं हूँ--- "अहं सुग्रीवसचिवो हनुमन्नाम वानरः । नाहमस्मि तथा देवि यथा मामवगच्छसि ।।" ( वा० रा० ५।३४।३८ ) सीता पुनः राम और सुग्रीव के समागम के सम्बन्ध में एवं राम तथा लक्ष्मण के चिह्नों को पूछती है। हनुमान् गुणों तथा लक्षणों सहित राम का वर्णन तथा वानरों के साथ समागम आदि की कथा का वर्णन कर के शङ्का मिटाने के लिए पुनः कहते हैं—देवि ! मुझपर विश्वास कर मुझसे बोलो। मैं राम का दूत हूँ। तुम्हारे लिए जो राम का उद्योग है, तदर्थ ही आया हूँ— "अभिभाषस्व मां देवि ! दूतो दाशरथेरहम् ।” मुझे सुग्रीव-सचिव एवं पवनपुत्र हनुमान् ही समझो— "सुग्रीवसचिवं देवि ! बुद्धयस्व पवनात्मजम् ।” पवन-पुत्र होने से ही मैं समुद्र-लङ्घन कर सकने में समर्थ हुआ हूँ। शङ्का हो सकती थी कि तुम्हारा तिर्यग्देह है। तुम पवन-पुत्र कैसे हो ? इस बात का समाधान करते हुए हनुमान् ने अपने जन्म की बात कही। देवर्षियों से आदिष्ट होकर मेरे पिता केसरी ने शम्बसादन असुर का वध किया था। उन केसरी के क्षेत्र अञ्जना में वायु के द्वारा मेरा जन्म हुआ है। "यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि ।” इससे दोनों बातों का स्पष्ट समाधान हो जाता है। केसरी के पुत्र हैं एवं वायु के तेज से जन्म होने के कारण वायु-पुत्र भी हैं। इस तरह केसरी-पुत्र तथा वायु-पुत्र दोनों का समन्वय हो जाता है। अञ्जनापुत्र होने में तो विवाद का प्रश्न ही नहीं है। अतएव इन श्लोकों को प्रक्षिप्त कहना भी निर्मूल है।

६१६ रामायणमीमांसा एकोनविंश “मुख्यो वानरमुख्यानां केसरी नाम यूथपः ।” ( वा० रा० ६।७३।५९ ) जब केसरी का नामनिर्देश है ही तब इसकी कोई आवश्यकता नहीं है कि अनेक बार उनका उल्लेख हो । स्वयं बुल्के यह भी मानते हैं कि युद्धकाण्ड में केसरी नाम तीन बार आया है। दो बार अन्य नामों के साथ और एक बार स्वतन्त्र— “केसरि हरिलोमानं विद्युद्दंष्ट्रं च वानरम् ।” ( वा० रा० ६।७३।५९ ) “केसरी पनसो गजः ।” ( वा० रा० ६।४।३३ ) “युद्धं केसरिणा संख्ये घोरं सम्पातिना कृतम् ।” ( वा० रा० ६।४९।२६ ) अन्य सूचियों में नाम होने से भी उक्त उल्लेखों को प्रक्षेप कैसे कहा जा सकता है ? बुल्के कहते हैं कि युद्धकाण्ड के अन्त में भरत द्वारा वानरों का स्वागत किया गया है। उसमें हनुमान् के अतिरिक्त १३ नाम आये हैं। पर उनमें केसरी का नाम नहीं है। दाक्षिणात्य पाठ के बालकाण्ड में वानरों की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में १२ वानरों के नाम हैं। वाली और केसरी को छोड़कर सब नाम युद्धकाण्ड के अन्त में भी आये हैं। ये ही प्रमुख माने जा सकते हैं, किन्तु केसरी उनमें नहीं है। बुल्के की उक्त बातों का सार यही है कि केसरी हनुमान् के पिता होते तो उनका भी प्रमुख स्थान होता । परन्तु यह आवश्यक नहीं है। जब केसरी को स्वतन्त्र रूप से वानरमुख्यों में मुख्य कहा गया है तब उनकी मुख्यता में सन्देह ही नहीं। थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि वे उतने मुख्य नहीं थे तो भी वे हनुमान् के पिता नहीं थे, यह कैसे सिद्ध होगा ? व्यवहार में कई स्थलों में देखा जाता है कि पिता की अपेक्षा भी पुत्र का महत्त्व अधिक होता है। श्रीशङ्कराचार्य का नाम जितना प्रसिद्ध है, उतना उनके पिता का नाम कहाँ प्रसिद्ध है ? कि बहुना राम का ही नाम जितना प्रसिद्ध है, उतना दशरथ का नाम कहाँ प्रसिद्ध है ? हनुमान् की जन्मकथा ( सर्ग ३५, ३६ ) में स्पष्टरूप से केसरी, अञ्जना और वायु का सम्बन्ध उल्लिखित है— “सूर्यदत्तवरस्वर्णः सुमेरुर्नाम पर्वत: । यत्र राज्यं प्रशास्त्यस्य केसरी नाम वै पिता ।। तस्य भार्या बभूवेष्टा ह्यञ्जनेति परिश्रुता । जनयामास तस्यां वै वायरात्मजमुत्तमम् ।।” ( वा० रा० ७।३५।१९, २० ) कभी का बहाना बनाकर बुल्के निरर्थक ही महत्त्वपूर्ण हनुमान्-कथा को प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं। बुल्के की दृष्टि में हनुमान् की जन्मकथा तीनों पाठों में मान्य है। उसके अतिरिक्त दान-वितरण के प्रसङ्ग में केसरी का नामोल्लेख अन्य नामों के साथ हुआ है। यह भी तीनों पाठों को सम्मत है। किसी पाठ में उल्लेख न होने को भी वे क्षेपक होने में हेतु मानते हैं, पर तीनों पाठों में भी हनुमान् की जन्मकथा और केसरी का उल्लेख होने पर भी वे इन अंशों को प्रक्षेप कह देते हैं। इससे बढ़कर धूल भीकना और क्या हो सकता है। अतः उनका यह कहना नितान्त भ्रान्तिपूर्ण है

अध्याय उत्तरकाण्ड ६१७ वायुपुत्र नाम के सम्बन्ध में बुल्के ६६२ वें अनु० में कहते हैं "रामायणरचना के पहले ही वायुपुत्र शब्द एक निश्चित अर्थ में प्रचलित था । सुमंगजातक में वायुस्स पुत्त अर्थात् विद्याधर की कथा मिलती है, जिसमें न तो हनुमान् का उल्लेख है और न किसी अन्य वानर का । यह विद्याधर ऐन्द्रजालिक है और वायुस्स पुत्त का अर्थ अन्यत्र भी विद्याधर अथवा जादूगर है। महाभारत में भी वातिक शब्द इससे मिलता जुलता अर्थ रखता है । रामायण में हनुमान् समुद्र लांघते हैं । सीता का पता लगाते हैं । अन्य वानरों की अपेक्षा अधिक बुद्धि- मान् तथा कार्यकुशल माने जाते हैं। अद्भुतरस से पूर्ण उनके उस चरित्रचित्रण को ध्यान में रखकर उनको वायुपुत्र (अर्थात् विद्याधर, ऐन्द्रजालिक) की उपाधि मिली होगी । बाद में वायुपुत्र नाम के आधार पर प्रचलित जन्मकथा का विकास हुआ होगा । इसके अनुसार वायु ने किसी शापभ्रष्टा अप्सरा से हनुमान् को उत्पन्न किया था, यह कथा गढ़ ली गयी ।" यह पाश्चात्यों के रिसर्च का नमूना है। वे अपने दिमागी फितूर के आधार पर धड़ल्ले के साथ प्रामाणिक आधारों को प्रक्षिप्त घोषित करने का दुःसाहस कर बैठते हैं— "उपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात् ।” की उन्हें चिन्ता नहीं होती। साथ ही वे इतनी पक्षपातपूर्ण संकीर्ण मनोवृत्ति के होते हैं कि उसके लिए कुछ भी अनर्थ कर डालना उनके लिए असंभव नहीं। उन्हें वैदिक उपनिषदों, वाल्मीकिरामायण तथा महाभारत में प्रामाण्य बुद्धि नहीं, परन्तु केवल कपोलकल्पित बौद्ध जातकों में अटल विश्वास न भी रखते हों तो भी वैदिक वाङ्मय को दूषित करने के लिए उनका सहारा अवश्य लेते हैं। वस्तुस्थिति यह है कि बौद्ध जातक स्वयं में ही प्रामाणिक नहीं हैं । बौद्धधर्म के अनुयायियों ने बौद्ध माहात्म्य-वर्णन के लिए उनकी कल्पनाएँ की हैं। क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से बुद्ध एवं सभी बौद्ध जातक अर्वाचीन हैं। वाल्मीकिरामायण महाकाव्य लाखों वर्ष प्राचीन भगवान् राम का समकालीन है। सुतरां सुमग्ग जातक के वायुस्स पुत्त के आधार पर वाल्मीकिरामायण के वायुपुत्र की कल्पना कोई भी समझदार नहीं कर सकता । सुमग्गजातक को भारत में कोई जानता तक नहीं, जब कि वाल्मीकिरामायण को बच्चा बच्चा जानता है । वाल्मीकिरामायण का परम्परा से अध्ययन, पाठ एवं अनुष्ठान होता आ रहा है। उसपर अनेक संस्कृत की गम्भीर टीकाएँ हुई हैं। वाल्मीकिरामायण के आधार पर देश-विदेशों में सहस्रों रामायण आदि ग्रन्थ लिखे गये हैं। उस रामायणमहामाला के दिव्य रत्न हनुमान् या वायुपुत्र का आधार सुमग्गाजातक में ढूंढ़ना जब कि उसमें हनुमान् या किसी वानर का नाम तक नहीं है, अनभिज्ञता की पराकाष्ठा ही कही जायगी । अन्य भाषा तथा अन्य सभ्यता में उसी शब्द के अन्य अर्थ हो सकते हैं। परन्तु दूसरी भाषा या दूसरी सभ्यता में उसका वही अर्थ हो यह नहीं कहा जा सकता है । आर्य शब्द का अन्य भाषा में जो भी अर्थ होता हो भारतीय भाषा में उसका श्रेष्ठ ही अर्थ है। दस्त शब्द का किसी भाषा में हाथ अर्थ हो, परन्तु भारतीय भाषा में उसका वही अर्थ नहीं है । वाल्मीकिरामायण में हनुमान् के लिए वायुपुत्र शब्द का अन्वर्थ ही प्रयोग हुआ है और वे वायु के पुत्र थे । इस सन्दर्भ की कथा भी वहीं प्रसिद्ध है । इतना ही नहीं रावण आदि ने वरदान माँगा था कि हम नर और वानरों से अतिरिक्त और किसी से न मरें । तदर्थ ही विष्णु नररूप में तथा अन्य देवता वानररूप में उत्पन्न हुए हैं। न केवल हनुमान् ही अपितु जाम्बवान्, सुग्रीव, बाली, नल, नील आदि भी तत्तद्देवताओं के अवतार हैं। इन पूर्वापर की सभी कथाओं को प्रक्षेप या मिथ्या कहकर अप्रसिद्ध अर्वाचीन सुमग्गजातक के वायुस्स पुत्त का वायुपुत्र से सम्बन्ध जोड़ना सर्वथा उपहासास्पद ही है। वायुस्स पुत्त शब्द का विद्याधर या ऐन्द्रजालिक स्वाभाविक अर्थ भी नहीं है, ७८

६१८ रामायणमीमांसा एकोनविंश किन्तु अश्वकर्ण आदि शब्दों के समान रूढ़ ही हो सकता है । उसका हनुमान् की कथा से क्या सम्बन्ध हो सकता है ? जैसे वेद के "अहमन्नाद" का सम्बन्ध मुसलमानों के अहमद नाद के साथ जोड़ना असङ्गत है । वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । हनुमान् का जन्म किष्किन्धाकाण्ड ( सर्ग ६६ ) के अनुसार पुञ्जिकस्थला अप्सरा शाप-वश वानर-योनि को प्राप्त हुई थी । वह कुञ्जर की पुत्री अञ्जना के रूप में प्रकट होकर केसरी की पत्नी बनी । कामरूपिणी होने के कारण उसने किसी दिन रूपयौवन-सम्पन्न मानवस्त्री का रूप ग्रहण किया । मरुत् देवता ने उसे इस रूप में देखा और आसक्त होकर उसका आलिङ्गन किया । अञ्जना के आपत्ति करने पर मरुत् ने उसे एक वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्न पुत्र, जिसकी गति वायु के समान होगी, उत्पन्न होने का वर प्रदान किया । “मनसाऽस्मि गतो यत्त्वां परिष्वज्य यशस्विनि । वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ॥१८॥ महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रमः । लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति मया समः ॥”१९॥ इस प्रामाणिक कथा को मिथ्या कल्पना कहना उन अंग्रेजों के लिए ही सम्भव है जिनके यहाँ मिथ्या इतिहास प्रामाणिक करने के लिए मिथ्या पार्लियामेन्ट्री प्रस्ताव भी बन सकता है । भारत में ऐसी मिथ्या कल्पनाओं को कोई स्थान नहीं है । वरदान के फलस्वरूप अञ्जना गर्भवती होकर एक गुफा में हनुमान् को जन्म देती है । उदीयमान सूर्य को देखकर और उसे फल समझकर शिशु उसे पकड़ने के लिए आकाश में कूद पड़ा । इन्द्र के वज्र से आहत होकर गिरि- शिखर पर गिरने से बायीं ठोढ़ी भग्न होने से उसका नाम हनुमान् पड़ा— “तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत । ततोऽभिनामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम् ॥२४॥” पुत्र की वैसी हालत देखकर वायुदेव ने कुपित हो अपनी गति बन्द कर दी । फलस्वरूप सब प्राणी व्याकुल हो उठे । तब सब देवता आकर वायु को मनाने लगे । ब्रह्मा ने हनुमान् को ब्रह्मास्त्रादि से अवध्यता, इन्द्र ने स्वेच्छा- मरण आदि वरदान दिये । बुल्के अपनी बात को सिद्ध करने के लिए ७४ वें सर्ग को ही प्रक्षिप्त कह देते हैं जो कि सर्वथा निराधार है । महाभारत में अञ्जना नाम न होने से भी रामायण की अञ्जना का अपलाप करना अनभिज्ञता ही है । वेदसार गीता में “इषे त्वा” मन्त्र का उल्लेख न होने पर भी वेद में उसका अस्तित्व है वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । उपनिषत्सार गीता में 'ईशा वास्यम्', 'अन्धं तमः प्रविशन्ति' शब्द नहीं हैं तो भी उपनिषद् में उक्त पाठ प्रक्षिप्त नहीं माना जाता है। ऐसे ही वाल्मीकिरामायण के सार महाभारत रामोपाख्यान में अञ्जना नाम न होनेपर भी वाल्मीकिरामायण के अञ्जना नाम को प्रक्षिप्त कहना निरी धृष्टता ही है । उपाधियों के बल पर हनुमान् की जन्मकथा को प्रक्षेप कहा जाता है। “महाभारत में हनुमान् को पाँच बार मारुतात्मज कहा गया है, तीन बार पवनात्मज कहा गया है, दो बार अनिलात्मज तथा एक बार वायुपुत्र कहा गया है । एक बार वायुतनय भी कहा गया है । किन्तु केसरीपुत्र और अञ्जनापुत्र एक बार भी नहीं कहा गया है । अतः प्रतीत होता है कि हनुमान् पहले वायु-तनय के नाम से विख्यात थे, बाद में केसरीपुत्र, अञ्जनापुत्र के रूप में

प्रसिद्ध हुए। रामायण में हनुमान् के निम्नलिखित नाम सर्वाधिक प्रयुक्त हुए हैं—मारुतात्मज, मारुति, पवनात्मज, वायुपुत्र, वायुसूनु, वायुसुत तथा अनिलात्मज इनके अतिरिक्त वातात्मज, मारुत, पवनसुत, अनिलसुत ये नाम भी कई बार आये हैं। वायुनन्दन, वायुसम्भव, मारुतनन्दन, वासवदूतसूनु, गन्धवहात्मज नाम एक एक बार आये हैं । हनुमान् की उत्पत्तिविषयक उपाधियों का बाहुल्य तथा केसरी अथवा अञ्जना के उल्लेख का अभाव देखकर दृढ़ धारणा बनती है कि वाल्मीकिरामायण के गायक बहुत दिनों तक हनुमान् को वायुपुत्र ही मानते थे और उस कथा से अनभिज्ञ थे जिसके अनुसार हनुमान् केसरी की पत्नी अथवा अञ्जना की सन्तान हैं। बालकाण्ड में जहाँ देवताओं द्वारा अप्सराओं, गन्धर्वियों और वानर-वानरियों से वानर और ऋक्षों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है वहाँ मारुत को ही हनुमान् का पिता माना है।" अतः बुल्के का उक्त तर्क स्वयं ही सापेक्ष एवं आधाररहित है। हनुमान् वायुपुत्र हैं यह तो सिद्धान्त में भी मान्य ही है। परन्तु वायु पवन देवता हैं। उनसे किसी वानरी में हनुमान् का वानररूप में जन्म मानना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में प्रमाणसिद्ध का परित्याग कर अप्रसिद्ध की कल्पना करना न्यायविरुद्ध है — “उपस्थितं परित्यक्त्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात् ।” वैसे सामान्यकल्पना भी विशेषपर्यवसायिनी होती है। इस तरह जब अञ्जना वानरी हनुमान् की माता सिद्ध हो जाती है तब उसके जिस किसी भी पति की कल्पना करनी होगी। पर जब यहाँ भी केसरी उसका पति प्रसिद्ध है तब पत्यन्तर की कल्पना भी निरर्थक ही है। प्रभावशाली भी वानर की अपेक्षा वायुदेवता का प्राणरूप से, हिरण्यगर्भरूप से एवं अष्टमूर्ति शिव का रूप होने से महत्त्व अधिक है। इसी लिए वातात्मज आदि नामों का अधिक प्रयोग हनुमान् के लिए हुआ है और यह उपाधि नहीं वस्तुस्थिति है। इस वस्तुस्थिति के रहते हुए भी अञ्जना-सुत केसरी-नन्दन आदि के साथ उसका विरोध नहीं है। जैसे—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन आदि की धर्मपुत्र, इन्द्रसूनु तथा पवनात्मज के रूप से प्रसिद्धि होने पर भी उनके कौन्तेय एवं पाण्डव होने में कोई बाधा नहीं पड़ती है । बुल्के यह भी कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड की जन्मकथा में अञ्जनीसुत मिलता ही है । किन्तु वह दाक्षिणात्य पाठ में ही मिलता है। गौड़ीय और पश्चिमोत्तरीय पाठों में नहीं मिलता है। समानान्तर स्थलों में इसका अभाव है। अतः यह प्रक्षेप ही है।" किन्तु उनका यह प्रलाप ही है, कारण जब पूर्व कथन के अनुसार तीनों पाठों में केसरी नाम मिलने पर भी उसे क्षेपक मानने में हिचक नहीं फिर किसी पाठ में न मिलने का अन्तर ढूंढ़ना क्या अज्ञता नहीं है। सिद्धान्त में तो तीनों ही पाठ प्रमाण हैं, अतः प्रक्षेप होने का प्रश्न ही नहीं उठता। “तथा केसरिणा त्वेष वायुना सोऽञ्जनीसुतः । प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ॥” (वा०रा०दा०पा० सर्ग ३६) “यदा केसरिणा ह्येष वायुनाञ्जनया तथा । प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ।।” ( प० पा० सर्ग ३९) “यदा केसरिणा त्वेष वायुना स्वजनैः सह । प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ॥” ( गौ० पा० सर्ग ४० ) भले ही समानान्तर स्थल में न हो। परन्तु उपर्युक्त तीनों ही पाठों में केसरी एवं अञ्जना का नाम है ही । इनके प्रक्षेप होने में भी कोई प्रमाण नहीं है । श्लोकार्थ यह है कि जब केसरी एवं वायु तथा अञ्जना के द्वारा प्रतिषेध करने पर भी यह हनुमान् वानर मर्यादा का उल्लङ्घन करता है । अर्थात् हनुमान् आश्रमों में ऋषियों के स्रुक् तथा वल्कलों को नष्ट कर देते थे । तब ऋषियों ने मृदु कोप से ही शाप दे दिया कि दीर्घकाल तक तुम अपने महान् बल पराक्रम को भूले रहोगे जब कोई तुम्हें तुम्हारे बल का स्मरण करायेगा तब तुम्हारा बल—तेज बढ़ेगा ।

६२० रामायणमीमांसा एकोनविंश हनुमान् का बाल चरित वाल्मीकिरामायण (७।३५) में हनुमान् का बालचरित वर्णित है। राम ने अगस्त्य से प्रश्न करते हुए कहा था कि हनुमान् इतने शक्तिशाली होते हुए वाली के विरुद्ध सुग्रीव की सहायता करने में असमर्थ कैसे रहे ? मेरे विचार में तो हनुमान् अपना बल जानते ही नहीं थे। अगस्त्य ने बतलाया कि मुनियों के शाप से महान् बलवान् हनुमान् अपना बल भूले रहते थे। अगस्त्य ने बताया कि पर्वतराज सुमेरु का राजा केसरी था। उसकी पत्नी अञ्जना में वायुदेवता के तेज से हनुमान् की उत्पत्ति हुई। उत्पन्न होते ही भूख से व्याकुल होकर वह बालक सूर्य को फल समझकर पकड़ने के लिए आकाश में छलांग मारता है। उसे शिशु समझ तथा भावी महत्त्वपूर्ण कार्य-कलाप जानकर सूर्य ने अपने तेज से उसे जलने नहीं दिया। संयोग से उसी दिन सूर्यग्रहण था। राहु सूर्य के पास पहुँचा। वह हनुमान् का आक्रमण देखकर भागा और इन्द्र के पास जाकर उसने शिकायत की कि चन्द्र और सूर्य मेरे भक्ष्य हैं, आपने वे दूसरे को क्यों दे दिये ? आज एक अन्य राहु सूर्य को पकड़ रहा है। इन्द्र ऐरावत पर चढ़कर सूर्य के पास आते हैं। पहले तो हनुमान् सूर्य से बड़ा समझकर राहु की ओर झपटे, राहु इन्द्र को परित्राणार्थ पुकारने लगा। इन्द्र को देख ऐरावत को बड़ा फल समझकर हनुमान् उसपर टूट पड़े। तब इन्द्र ने वज्र-प्रहार किया, जिससे हनुभग्न होने के कारण वे हनुमान् कहलाये। पुत्र को आहत देखकर वायु ने सबके श्वासों को निरुद्ध कर दिया। अन्त में देवता, असुर एवं गन्धर्व सब ने मिलकर ब्रह्मा की शरण ली। ब्रह्मा उन सबके कष्ट का रहस्य प्रकट कर सब को साथ लेकर वायु के पास गये। ब्रह्मा ने अपने स्पर्शमात्र से हनुमान् को स्वस्थ कर दिया। भावी कार्य को ध्यान रख ब्रह्मा ने देवताओं से हनुमान् को वर प्रदान करने को कहा—इन्द्र ने काञ्चन पद्मों की माला प्रदान कर कहा मेरे वज्र से हनुभग्न होने से इसका नाम हनुमान् होगा और वरदान दिया कि अब इसपर वज्र का प्रभाव नहीं पड़ेगा। भगवान् सूर्य ने अपने तेज की शक्ति की १०० वीं कला प्रदान की और अध्ययन के समय शास्त्र- प्रदान का आश्वासन दिया। वरुण ने कहा—मेरे शस्त्रास्त्रों, वर्षा-जल तथा वरुणपाश से इसकी मृत्यु नहीं होगी। यम ने काल-दण्ड से अवध्य होने का वरदान दिया। कुबेर तथा भगवान् शङ्कर ने भी बहुत वर प्रदान किये। विश्वकर्मा ने कहा मेरे द्वारा निर्मित कोई शस्त्रास्त्र तुम पर सफल नहीं होगा। ब्रह्मा ने अजेय, कामचारी, कामरूप, कामग तथा अव्याहतगति, कीर्तिमान् तथा रोमहर्षकरकर्मकारी होने का वरदान दिया। वरदान के बाद हनुमान् ऋषियों के आश्रमों में स्रुव, स्रुक्, वल्कल आदि को अस्त-व्यस्त करने लगे, इस कारण ऋषियों ने मृदु कोप वश हनुमान् को अपना बल भूले रहने का शाप दिया और कहा कि यदि कोई तुम्हारे बल का स्मरण करायेगा तभी तुम्हारा बल प्रकट होगा। वाली और सुग्रीव के विवाद के समय किसी ने उनके बल का स्मरण नहीं कराया। जब समुद्र-लङ्घन का अवसर आया तो जाम्बवान् ने उनके बल का उन्हें स्मरण दिलाया था। पराक्रम, उत्साह, मति, प्रताप, सौशील्य, माधुर्य, नयानय-विज्ञान, गाम्भीर्य, चातुर्य, वीर्य, धैर्य आदि गुणों में हनुमान् की समता कोई भी नहीं कर सकता है। व्याकरण शास्त्र का अध्ययन करने के लिए सूर्य के उन्मुख होकर वे उदयगिरि से लेकर अस्ताचल तक पश्चात्पद चलते थे। वेद, वेदाङ्ग आदि सभी विद्याओं में तथा तपोनिधान में हनुमान् वृहस्पति से भी प्रतिस्पर्धा करते थे। रावण एवं वाली का महत्त्व सुनकर राम ने कहा था कि रावण तथा वाली का बहुत बड़ा बल था तथापि हनुमान् के समान उनका बल नहीं था। शौर्य, दक्षता, बल, धैर्य, प्रज्ञा, नीतिमत्ता, विक्रम तथा प्रभाव बहुत से गुण हनुमान् में ही रहते हैं। जाम्बवान् से आत्मकथा सुनकर हनुमान् विशाल रूप धारण करते हैं एवं समुद्रलङ्घन के लिए उद्यत होकर अपने बल का वर्णन करते हैं।

बुल्के कहते हैं कि पश्चिमोत्तरीय तथा गौड़ीय पाठों के अनुसार हनुमान् अपनी जन्मकथा का पुनः विवरण कर के अपने पिता केसरी के एक वरदान का उल्लेख करते हैं । पश्चिम समुद्र के तट पर प्रभासतीर्थ में एक महान् गज ऋषियों को तंग किया करता था। केसरी ने उसका वध किया । ऋषियों के अनुरोध से उन्होंने वायु के समान वीर्यवान् कामरूपी अव्यय पुत्र माँगा था। यद्यपि इसमें पुञ्जिक- स्थला का नाम नहीं है। इसमें बालचरित का वर्णन नहीं है। फिर भी वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों की कथाओं का समन्वय कर के ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित है । ब्रह्मपुराण (अध्याय ८४) के अनुसार केसरी की अञ्जना और अद्रिका दो पत्नियाँ थीं । अगस्त्य का आतिथ्यसत्कार कर के दोनों ने उत्तम बलवान् लोकोपकारक पुत्र माँगा । पश्चात् वायु से अञ्जना में हनुमान् तथा निर्ऋति से अद्रिका में पिशाचराज अद्रि की उत्पत्ति होती है। अद्रि गौतमी नदी के किसी तीर्थ में स्नान कराने के लिए अञ्जना को ले गये । वहाँ स्नान करने से अञ्जना, जो पहले अप्सरा थी, मुक्त हो गयी । उस तीर्थ का नाम अञ्जनं अथवा पैशाचं हुआ । अद्रिका को हनुमान् ने किसी दूसरे तीर्थ में स्नान कराया, जिससे वह भी मुक्त हो गयी । उस तीर्थ का नाम मार्जारं अथवा हनुमन्त पड़ा । स्कन्दपुराण के अनुसार शिव की कृपा से हनुमान् को अनेक वर मिले हैं। भविष्यपुराण ( ३।४।१३ ) के अनुसार वज्र से मारे जाने पर हनुमान् ने सूर्य को हाथ से नहीं जाने दिया । सूर्य का आर्त वचन सुनकर रावण आकर हनुमान् की पूँछ खींचने लगा । हनुमान् ने सूर्य को छोड़कर रावण से एक वर्ष पर्यन्त मल्ल युद्ध किया । अन्त में रावण की हार हुई । विश्वा ने आकर रुद्रावतार हनुमान् को तुष्ट किया । आनन्दरामायण ( १।१३।१६४-१६८) तथा भावार्थरामायण ( ७।३५) के अनुसार वायु अपने पुत्र को सूर्य की ओर बढ़ते देखकर उसे प्रचण्ड ताप से बचाने के लिए दौड़े, पर उसे लौटाने में असमर्थ होकर शीतल समीर द्वारा उसे ठंडा करने लगे । सूर्य के पास पहुँचकर सूर्य को निगलते राहु को देखकर पूंछ के प्रहार से हनुमान् ने राहु को अचेत कर दिया । तब केतु राहु की सहायता करने आया, किन्तु हनुमान् ने दोनों को परास्त किया । अन्त में दोनों इन्द्र की शरण में गये । वाल्मीकिरामायण के अनुसार पुराण की कथाओं का समन्वय हो ही जाता है । पउमचरियं के अनुसार आदित्यपुर के पवनञ्जय राजकुमार ने महेन्द्रपुर की राजकुमारी अञ्जना से विवाह किया, किन्तु २२ वर्ष तक पत्नी से उदासीन रहा। जब वह रावण की ओर से वरुण से युद्ध करने गया तब किसी दिन उसका अञ्जना के प्रति अनुराग जाग्रत हुआ । वह गुप्तरूप से उससे मिलने गया । अञ्जना गर्भिणी हुई । अतः सखी वसन्तमाला के साथ निर्वासित होकर किसी गुफा में पुत्र को जन्म देती है। बाद में अञ्जना का मामा प्रतिसूर्यक पुत्र सहित अञ्जना को हनुरुहपुर की ओर ले गया । बालक माता की गोद से उछलकर पर्वत-शिला पर गिरता है । माता ने देखा बालक के गिरने से पर्वत चूर-चूर हो गया। उससे उनका नाम धीशैल हुआ । पवनञ्जय ने अपनी पत्नी के सतीत्व का साक्ष्य दिया। पुत्रसहित अञ्जना ससुराल लौटी । हनुरुहपुर में रहने से बालक का नाम हनुमान् हुआ । गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार प्रभञ्जन ने अपनी पत्नी से अमिततेज नामक पुत्र उत्पन्न किया अमिततेज ने विजय-यात्रा में पर्वत पर दाहिना पैर रख कर बायें से सूर्य पर प्रहार किया । अपना शरीर त्रसरेणु जैसा बनाने से उसका नाम अणुमान् हुआ । यह सब वाल्मीकिरामायण को ही विकृत कर रूपान्तरण किया गया है। जैनों और बौद्धों द्वारा इन कथाओं को विकृत करने में यह भी प्रमाण है कि उन्होंने नगरों, ग्रामों आदि तथा पात्रों के जो नाम गढ़े हैं वे सर्वथा अप्रचलित तथा अव्यवहार्य हैं और उन नगरों और ग्रामों का कहीं अस्तित्व ऐतिहासिक नहीं है जब कि प्राचीन ग्रन्थों में उल्लिखित नगर, ग्राम आदि ज्यों के त्यों अभी तक मिलते हैं ।

६२२ रामायणमीमांसा एकोनविंश बुल्के कहते हैं कि शैवपुराणों तथा अर्वाचीन रचनाओं में हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। पर यह उनकी दुष्कल्पना असङ्गत है। पुराण अतिप्राचीन हैं। तदनुसार हनुमान् रुद्रांश या रुद्रावतार ही हैं। विष्णु रावण के नाशार्थ आविर्भूत हुए। तब उनकी सहायता के लिए शिव हनुमान् के रूप में आये। नारदपुराण (पूर्वखण्ड अ० ७९) तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड अ० ६२) में हनुमान् को शिव का अंश कहा गया है। महानाटक (६।२७) में लङ्का को जलते देखकर रावण कहता है—मैंने अपने दस सिर चढ़ाकर दस रुद्रों को प्रसन्न किया था। हनुमान् ११वें रुद्र के अवतार हैं। तत्त्वसंग्रहरामायण (७।२) में हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। कृत्तिवासीय रामायण (६।१२९) के अनुसार सीता रामाभिषेक के बाद हनुमान् को परोस कर तृप्त कराने में असमर्थ हो ध्यान से जानती हैं कि वे रुद्रावतार हैं। आनन्दरामायण (१।११), तुलसीकृत दोहावली (१४२-३), विनयपत्रिका आदि में भी हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। भविष्यपुराण (प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ. खण्ड १३।३१-३६) में भी केसरी ही हनुमान् के पिता कहे गये हैं। किन्तु रुद्र और वायु सहायक हैं। रावण से त्रस्त देवताओं ने ११ वर्ष शिव की पूजा कर के वर पाया है कि शिव रावण का दमन करने के लिए अवतार लेंगे। अञ्जना गौतम की पुत्री थी। शिव ने रौद्र तेज से केसरी के मुख में प्रवेश किया। केसरी तुरन्त कामातुर हुआ। वायु ने भी केसरीदेह में प्रवेश किया। इस तरह १२ वर्ष तक रमण करने के बाद अञ्जना गर्भिणी हुई और उसने वानरानन पुत्र को जन्म दिया। पुत्र को कुरूप देखकर अञ्जना ने उसे पर्वत से नीचे फेंक दिया। वानरानन पुत्र के फेंकने से भूकम्प हुआ। शिवपुराण (शतरुद्रखण्ड अ० ३९-४२) के अनुसार प्रभञ्जन ने केसरी की पत्नी अञ्जनी से रुद्रावतार हनुमान् को उत्पन्न किया। कथासरित्सागर की कथाओं के अनुसार गौतम अपनी पुत्री को गर्भिणी होने का शाप देते हैं, क्योंकि उसने अपनी माता अहल्या का व्यभिचार प्रकट किया था। शाप सुनकर वह शिव की आराधना करती है। शिव की आज्ञा से नारद ने उसके कान में मन्त्र कह दिया। जिसके प्रभाव से उसने हनुमान् को जन्म दिया। मन्त्र-ग्रहण करते समय वह केसरी नामक वानर की ओर देख रही थी। इसी लिए वानरमुखवाला पुत्र हुआ। रामकियेन के अनुसार उसका नाम स्वाहा था। माता का व्यभिचार प्रकट करने पर माता ने उसको पुत्रप्रसव करने तक एक पैर पर खड़े रहने का शाप दिया था। शिव दयार्द्र होकर अपनी शक्ति तथा अपने अस्त्रों की शक्ति के साथ वायु को स्वाहा के पास भेज कर उसके मुख में रखने का आदेश देते हैं। फलतः तीन महीने के बाद हनुमान् वानर के रूप में स्वाहा के मुख से निकलते हैं। शिवपुराण (शतरुद्रसंहिता अ० २०) के अनुसार विष्णु को मोहिनीरूप में देखकर आविर्भूत शिव-शुक्र को सप्तर्षियों ने अञ्जना के कान में रख दिया। उसी से हनुमान् का जन्म हुआ। सारलादास के महाभारत (वनपर्व) के अनुसार अहल्या ने यह शाप दिया था कि तुम्हारा पुत्र बन्दर होगा। अञ्जना ने विवाह न करने का निश्चय किया। तपस्या करने लगी। उसके शरीर के चारों ओर वल्मीक हो गया। गौतम के अनुरोध से पवन उसे सप्ताह में भोजन देते हैं। उधर विवाह के पश्चात् शिव पशुओं का रूप धारण कर क्रीडा कर रहे थे। वानर-वानरी के रूप में रमण करते समय शिव का तेज पार्वती धारण न कर सकीं। तेज पृथ्वी पर गिर गया। उससे विभिन्न धातुएँ बनीं। शिव ने थोड़ा तेज वायु को दिया। पवन ने उसे अञ्जना को दिया। हनुमान् का जन्म हुआ। दक्षिण की किसी कथा के अनुसार वानर-वानरी के रूप में परमेश्वर और परमेश्वरी की क्रीड़ा से परमेश्वरी गर्भिणी हो गयी। वानर-पुत्र होने की आशङ्का से वायु से कहा कि वह भ्रूण को निकाल कर अन्य स्त्री के पेट में रख दे। वायु ने उस भ्रूण को अञ्जना के गर्भ में पहुँचाया। उसने वानर को प्रसव किया।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२३ पुराणों पर आधारित कथाओं का वाल्मीकिरामायण के साथ समन्वय करना उचित है । वायु का सम्बन्ध प्रायः सब कथाओं से जुड़ा है। तुलसीदासजी ने भी हनुमान् चालीसा में हनुमान् को "शंकरसुवन केसरी- नन्दन" कहा है । शिव का तेज शिवस्वरूप ही है । वायु, अग्नि आदि सभी ईश्वर की शक्ति से ही शक्तिमान् होते हैं । जैसे शिव-तेज धारणकर अग्नि ने उसे गङ्गा में निहित किया था उसी तरह शिवतेज धारणकर वायु ने अञ्जना में निहित किया है । अञ्जना गौतमपुत्री थी । उससे भी पहले पुञ्जिकस्थला अप्सरा थी, जो भी हो, वह शाप वश वानरी हुई । सेरीराम के अनुसार गौतम ने पुत्री अञ्जना को शाप दिया कि सौ वर्ष तक मुख बाकर सुई की नोक पर समुद्र के बीच में खड़ी रहो । वनवास के समय राम, लक्ष्मण और सीता एक स्थल पर पहुँचे जहाँ दो सरोवर थे । एक ऋषि ने कहा—स्वच्छजलवाले सरोवर में स्नान करने से मनुष्य पशुरूप धारण कर लेते हैं । पङ्किल जलवाले सरोवर में स्नान करने से पुनः मनुष्य बन जाते हैं। राम और सीता ने स्वच्छजलवाले सरोवर में स्नान कर लिया और दोनों वानर-वानरी हो गये । वृक्षों पर क्रीडा करने लगे, जिससे सीता गर्भिणी हो गयी । लक्ष्मण ने बड़ी कठिनाई से पुनः दोनों को पङ्किल जलवाले सरोवर में नहलाया तब वे पुनः मनुष्यरूप बन गये। राम ने सीता का भ्रूण निकाल दिया । वायु ने उसे सुई की नोक पर खड़ी अञ्जनी के मुख में रख दिया। बाद में अञ्जनी ने कुण्डलों से अलङ्कृत हनुमान् को जन्म दिया । सेरीराम के अन्य पाठानुसार अञ्जनी को देखकर राम अनुरक्त होते हैं, अपने तेज को वायु के द्वारा अञ्जना के मुख में रखवाते हैं । रामजातक के अनुसार सीता को खोजते समय राम एक फल खाने से वानर बन जाते हैं। अञ्जनी ने भी वही फल खाया वह भी वानरी हो गयी । दोनों हनुमान् को उत्पन्न करते हैं । हनुमान् के प्रति सीता और राम दोनों का वात्सल्य था । इसी आधार पर यह कथा बनी है । ईश्वर ही हिरण्यगर्भ तथा विराट् बनकर मनु-शतरूपा रूप में विभिन्न प्राणियों के रूप में सम्पूर्ण विश्व के प्राणियों का निर्माण करते हैं । फिर भी मर्यादापुरुषोत्तम राम एकपत्नीव्रत पालन करते हैं । वाल्मीकिरामायण में वर्णित राम और सीता के आदर्श के विपरीत कथाओं का वाच्यार्थ में प्रामाण्य नहीं है । पूर्वोक्त लक्ष्यार्थ में तो कोई विरोध नहीं है । वस्तुतः बौद्धजातक और उनके अनुसार उलटी सीधी गढ़ी गयी कथाओं का किसी प्रकार प्रामाण्य नहीं है । दशरथयज्ञ के पायस का एक अंश अञ्जना को प्राप्त हुआ था । उससे हनुमान् का जन्म होना उनकी विष्णुरूपता में भी प्रमाण है ( आ० रा० १।१।१०४-१०७) । सुवर्चला अप्सरा को नृत्य-दोष के कारण ब्रह्मा ने गृध्री होने का शाप दिया तथा उसे यह वरदान दिया कि कैकेयी का पायस अञ्जनी पर्वत पर फेंकने पर वह पुनः अप्सरा हो जायगी । समय आने पर गृध्री ने कैकेयी के हाथ से कुछ पायस छीनकर अञ्जनी पर्वत पर फेंका और अप्सरा होकर स्वर्ग चली गयी । वह पायस अञ्जना को मिला । उससे हनुमान् का जन्म हुआ । उसी रचना में अन्य स्थल पर उसके बाद वायु से भी सम्पर्क हुआ, जिससे हनुमान् की उत्पत्ति हुई । भावार्थरामायण में इसका समन्वय मिलता है । सुवर्चला अप्सरा शापवशात् गृध्री हुई । कैकेयी से पायस का कुछ अंश छीनकर उसे खाकर वही वानरी बन गयी । वानरी के रूप में वह गौतम की पुत्री और केसरी की पत्नी बन गयी । पायस खाने के फलस्वरूप हनुमान् का जन्म होता है ( बालकाण्ड २-२ तथा किष्किन्धा- काण्ड १-१०) । वाल्मीकिरामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों के अनुसार हनुमान् केसरी के क्षेत्रज और वायु के औरस पुत्र हैं । अञ्जना उनकी माता है । बुल्के के अनुसार विशेषताओं की दृष्टि से वायु-पुत्र उनकी काल्पनिक उपाधि नहीं है ।

६२४ रामायणमीमांसा एकोनविंश उनका ऐन्द्रजालिक या विद्याधर होना वायुपुत्र शब्द से कथमपि सिद्ध नहीं होता। जैनकथा भी रामायणीय कथा पर जहाँ तक निर्भर है वहीं तक मान्य है। रामायण विरोधी अंश सभी त्याज्य हैं। बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है कि ८ वीं या १० वीं शती से हनुमान् शिव के अवतार माने जाते हैं, क्योंकि पुराण कम से कम व्यास-काल के हैं जो कि ईसा से तीन हजार वर्ष से अधिक प्राचीन हैं। यह कहना भी गलत है कि रामायण की आधिकारिक कथावस्तु में शिव के लिए कोई स्थान नहीं है, क्योंकि रामायण में शिव के रामेश्वर-प्रसाद की चर्चा है। दशरथ के साथ शिवजी प्रकट होकर राम को विविध आशीर्वाद देते हैं। जब पुराणों के अनुसार हनुमान् रुद्रावतार हैं यह वस्तुस्थिति है, तब शैवों ने हनुमान् को रुद्रावतार मान लिया यह कहना प्रलापमात्र ही है। उपनिषद्ग्रन्थ वेद हैं। रामरहस्योपनिषद् में हनुमान् को शिव, सुग्रीव को विष्णु और जाम्बवान् को ब्रह्मा कहा गया है। ६८० वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "हनुमान् वानरगोत्रीय आदिवासी थे। किन्तु आगे चलकर उन्हें राम-कथा के अन्य आदिवासियों के समान वानर भी माना गया है। प्रचलित रामायण में हनुमान् के वानरत्वविषयक विशेषणों का बाहुल्य देखकर प्रतीत होता है कि वाल्मीकि के समय के पूर्व ही यह धारणा मान्यता प्राप्त करने लगी थी कि वे सब वस्तुतः वानर थे। फिर भी रामायण के वानर मनुष्यों की तरह बुद्धिमान् थे तथा मानवभाषा बोलते थे, कपड़े पहनते थे, घरों में रहते थे, विवाह-संस्कार को मान्यता देते थे एवं राजा का शासन मानते थे। अतः कवि की दृष्टि से वे निरे वानर नहीं थे। उनकी अपनी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था थी। अतः वे वास्तव में एक मानवजनजाति ही थे।" परन्तु बुल्के का उक्त कथन उनकी कल्पना पर ही निर्भर है, प्रामाणिक नहीं है। विद्या, बुद्धिमत्ता तथा पराक्रम हनुमान्, सुग्रीव आदि वास्तव में ही वानर थे। वाल्मीकिरामायण से यही सिद्ध है, अन्यथा पुच्छ आदि भी सब काल्पनिक ही मानने पड़ेंगे। जिसे किसी भी अंश को क्षेपक कहने में कुछ संकोच नहीं, वही ऐसी निराधार कल्पना कर सकता है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार भी वे सामान्य वानर थे, किन्तु ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, सूर्य आदि देवता हो रावण आदि राक्षसों के वधार्थ वास्तव में वानरों के रूप में उत्पन्न हुए थे। अतएव उनकी मानवों जैसी ही नहीं मानवों से भी अत्यन्त उत्कृष्ट बुद्धि थी तथा उनमें उत्कृष्ट बल था। वे विद्वान् वेदज्ञ भी थे। यह सब रामायण से ही सिद्ध है। जैसे ब्रज की गोपिकाएँ कोई सामान्य गोपिकाएँ नहीं हैं, वे विशिष्ट शक्तिरूपा हैं उसी तरह इन विशिष्ट अवतारी वानरों को भी समझना चाहिए। वे निरे वानर नहीं थे। उनकी धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था थी, यह सब ठीक है। वाल्मीकिरामायण में हनुमान् को सुग्रीव का पराक्रमी तथा बुद्धिमान् मन्त्री माना गया है। सर्वत्र ही रामसाहित्य में हनुमान् के पराक्रम तथा बुद्धिमत्ता को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। महाभारत के वनपर्व में भीम हनुमान् का परिचय देते हुए कहते हैं— “भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः । रामायणेऽतिविख्यातो शूरो वानरपुङ्गवः ॥” ( १११।४७ ) मेरा भ्राता गुणों से श्लाघ्य, बुद्धि, सत्त्व और बल से युक्त वानरपुङ्गव हनुमान् रामायण में अति विख्यात है। यह श्लोक भी रामायण पहले और महाभारत बाद का है इसमें प्रबल प्रमाण है। अतः कुछ पाश्चात्यों का तथा उनके अनुयायियों का महाभारत को रामायण से पुराना मानना निरा भ्रम ही है।

रामायण में अनेक स्थलों पर हनुमान् की प्रशंसा है। सर्वत्र उनकी वीरता एवं विशिष्ट प्रज्ञा का वर्णन है। हनुमान् का देवत्व भी स्वाभाविक ही है। हनुमान् ही क्यों सुग्रीव आदि सभी वानर देवता ही हैं। उपनिषद् में हनुमान् को शिव कहा गया है। उपनिषद् को अर्वाचीन कहना सर्वथा निराधार ही है। हनुमान् का पराक्रम प्रसिद्ध है। वाल्मीकिरामायण में हनुमान् के लिए निम्नोक्त विशेषण प्रयुक्त हैं—वीर, वीर्यवान्, महाबल, महातेज, महाबाहु, महावेग, भीमविक्रम, अरिन्दम, बलवीर्यसंवृत, जितश्रम, वज्रसंहनन, महाकाय, महोत्कट, अमितौज, मारुततुल्यवेग, मारुतवेगविक्रम, मनोजव, मेघस्वन, महास्वन, घननादनिःस्वन, चण्डविक्रम, गरुडानिलविक्रम, रणचण्डविक्रम, अरिमर्दन, शत्रुसैन्यानां निहन्ता आदि। ६८३ वें अनु० में बुल्के यह भी कहते हैं कि "उनके समुद्रलङ्घन की कथा संभवतः किसी आश्चर्यजनक तथा असाधारण लङ्घन के आधार पर उत्पन्न हुई । लङ्कादहन, औषधपर्वत का आनयन, जन्म के बाद ही सूर्य तक छलांग मारना ये वृत्तान्त प्रचलित रामायण में प्रक्षिप्त हैं।" यह सब कथन दुरभिसन्धिपूर्ण इसाइयत मनोवृत्ति का परिचायक है। परन्तु उन्हें ईसा के चमत्कारों में अविश्वास और प्रक्षेप की कल्पना करने का साहस नहीं होता । निश्चित ही वाल्मीकिरामायण अनादि अपौरुषेय वेदों के आधार पर आधारित है। उसमें अप्रामाण्य की शङ्का भी नहीं होती। उपनिषदों में हनुमान् के समुद्रलङ्घन, लङ्का-दहन आदि की चर्चा है। क्या किसी नाले के पार कूद जाने से समुद्रलङ्घन की कल्पना हो सकती है ? जिसने वाल्मीकिरामायण का समुद्रोल्लङ्घन का वर्णन सुना है वह बुल्के के कथन को प्रलाप ही मानेगा ? औषध-पर्वत का आनयन भी साधारण पत्थर लाने का उपचार नहीं है और न ही सूर्य तक छलांग लगाने की कल्पना का कोई लौकिक आधार है। परन्तु दैवी और आसुरी शक्तियों की ओर ध्यान देने से यह असंभव नहीं है। रामकियेन आदि ने भी इन घटनाओं को काल्पनिक नहीं माना है। ईसा ने अन्धे की आँखें दे दी और कुष्ठी को निर्मल काया दी । यदि ईसाइयों के अनुसार यह सत्य है तो अनादि वैदिक धर्म के विशिष्ट पुरुषों में उक्त चमत्कार में कोई आश्चर्य ही नहीं है । बाइबिल आदि ही अर्वाचीन ग्रन्थ हैं। उनके पाठ और वृत्तान्तों के सम्बन्ध में ईसाइयों में ही बहुत मतभेद हैं। बुल्के को चाहिए कि वे अपना घर संभालें। वस्तुतः वेद और रामायण के अध्ययन के वे अधिकारी ही नहीं हैं। उनकी अनधिकार चेष्टा का ही दुष्परिणाम उनकी तथाकथित रामकथा है। अतएव केवल रामायणों में ही नहीं महाभारत आदि में भी हनुमान् के लोकोत्तर पराक्रम का वर्णन है । महाभारत के अनुसार हिमालय के मार्ग में सोये हुए हनुमान् को जगाकर भीम ने उन्हें हट जाने को कहा—हनुमान् ने कहा, लांघकर चले जाओ अन्यथा पूंछ हटाकर चले जाओ । भीम पूंछ हटाने लगे । वे पूंछ को हिलाने में भी समर्थ नहीं हुए। दोनों हाथ लगाने से भी पूंछ टस से मस नहीं हुई। भीम ने समझ लिया कि ये हनुमान् हैं। भीम के अनुरोध पर उन्होंने भीम को समुद्रलङ्घन करनेवाला रूप दिखाया और चतुर्युगीन चातुर्वर्ण्य का उपदेश दिया एवं भावी युद्ध में उन्हें सहायता देने का आश्वासन दिया ( म० भा० ३।१५७।१५०) । इससे भी रामायण की प्राचीनता तथा महाभारत की अर्वाचीनता स्पष्ट सिद्ध है । आनन्दरामायण मनोहरकाण्ड के अनुसार द्वापर के अन्त में अर्जुन की धनुष्कोटि तीर्थ में हनुमान् से भेंट हुई। अर्जुन ने कहा सेतु-निर्माण में व्यर्थ ही परिश्रम हुआ। शरसेतु क्यों नहीं बनाया गया । हनुमान् ने कहा मुझ जैसे वानरों के भार से सेतु डूब जाता । अर्जुन ने कहा मैं अभी सेतु बनाता हूँ यदि वह आपके भार से डूब जाय तो मैं अग्निप्रवेश करूँगा। हनुमान् ने भी कहा—यदि मेरे भार से सेतु न टूटा न तो मैं आपकी ध्वजा पर बैठकर सहायता करूँगा । अर्जुन ने शतयोजन सेतु का निर्माण कर दिया । हनुमान् ने अपने अँगूठे से ही सेतु भग्न कर दिया । अर्जुन ७९