भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 690

अध्याय उत्तरकाण्ड ६१३ राम ईश्वर थे । उनके वरदान से ही बहुत से ऋषि, मुनि तथा स्त्रियाँ व्रज की गोपाङ्गनाएँ हुई थीं । हिंडोल, होलिकोत्सव आदि तो अनादि काल से सनातन धर्म के महोत्सव अवतारों द्वारा आदृत होते ही रहे हैं । इसमें कृष्ण-लीला का प्रभाव देखना अनभिज्ञता ही है । अद्भुतरामायण भी शतकोटिप्रविस्तर रामायण के अन्तर्गत हो है । उसमें सर्ग १७-२७ के अनुसार एक बार विश्वामित्र आदि मुनियों ने आकर रावणवध के कारण राम की प्रशंसा की । इसपर सीता ने मुस्कुरा कर विश्रवा और कैकसी के पुत्र सहस्रस्कन्ध रावण की कथा सुनायी, जिसने इन्द्र आदि देवताओं को पुष्कर में कारागार में कैद किया था । कथा सुनकर राम सेना सहित पुष्कर जाते हैं । रावण वायव्य शर से समस्त सेना को अयोध्या तक उड़ा देता है तथा द्वन्द्वयुद्ध में राम मृतप्राय हो जाते हैं । तब सीता देवी महाविकट रूप धारण कर सहस्रस्कन्ध रावण तथा उसके योद्धाओं का सिर काटकर नाचने लगती हैं, जिससे सारी सृष्टि संकट में पड़ जाती है— “ननर्त जानकी देवी घोरकाली महाबला ।” २३-६३ ब्रह्मा आदि देवता सीता से नृत्य समाप्त करने का अनुरोध करते हैं। ब्रह्मा राम को पुन: जीवित करते हैं । राम परमशक्ति के रूप सीता की स्तुति करके उनसे अनुरोध करते हैं कि वह अपना विकट रूप त्याग दें तब सीता विकटरूप त्यागकर सौम्य रूप धारण करती हैं और राम के साथ पुष्पक पर चढ़कर अयोध्या जाती हैं । उक्त प्रसङ्ग सीतामाहात्म्य-वर्णन का अर्थवाद है । युद्ध-शोभार्थ जैसे राम इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र से मूर्च्छित हुए थे । वैसे ही प्रकृत प्रसङ्ग में भी समझना चाहिये । उड़िया राम-साहित्य में प्रस्तुत प्रसङ्ग के दो अन्य रूप मिलते हैं । विलङ्कारामायण के पूर्वखण्ड के अनुसार सहस्रस्कन्ध रावण ने राम, लक्ष्मण तथा हनुमान् को परास्त किया था । तब सीता ने मङ्गलादेवी से पुष्पधनुष तथा पाँच शर प्राप्त कर रावण पर चलाये और राम ने कामातुर रावण के समस्त सिर काट दिये । विलङ्काखण्ड के अनुसार दशशिर रावण के वध के अनन्तर सहस्रस्कन्ध रावण सन्धि प्रस्ताव ठुकरा कर युद्ध करने आया । शक्ति के प्रहार से उसने राम और लक्ष्मण को मूर्च्छित कर सीता का हरण करना चाहा, किन्तु सीता के शरीर से एक गन्धर्व- सेना निकली जिसने सहस्रस्कन्ध रावण का वध किया । आगारिया आदिवासियों में प्रचलित कथा के अनुसार सीता ने पातालवासी सहस्रस्कन्ध रावण की चर्चा की । राम ने एक बाण से उसे आहत कर दिया । पर उसने अपने पैर से बाण निकालकर राम को मारने के लिए उसी बाण को भेज दिया । राम मूर्च्छित हो गये । तब सीता ने लोगुन्दी के पास जाकर उससे कोयले का एक पात्र माँग लिया और यह निवेदन किया कि आज्ञासुर और लोहासुर को मेरे साथ भेज दीजिये । राजा की स्वीकृति हो गयी । कोयले का पात्र तथा तलवार लेकर सीता दोनों को साथ लेकर चल पड़ी । कोयले के धुएँ से सीता का रङ्ग काला पड़ गया । उन्होंने रावण के सिर काट डाले । आज्ञासुर तथा लोहासुर दोनों ने रावण का रक्त पी लिया । आनन्दरामायण ( राज्यका० सर्ग ४।८०-८५ ) के अनुसार शतशीर्ष रावण शोण नदी के तटपर माया- पुरी में रहता था । कुम्भकर्ण का पौत्र पौण्ड्रक उससे सहायता माँगने गया था । दोनों ने मिलकर विभीषण को पराजित कर दिया । विभीषण राम के पास सहायता के लिए आये । राम और सीता दोनों गये । युद्ध में राम परास्त हुए, किन्तु सीता ने दोनों का वध किया । तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार सीता ने अष्टादशभुजावाला विकट रूप धारण कर शतानन रावण का वध किया था । विलङ्कारामायण उत्तरखण्ड के अनुसार काली का रूप धारणकर सीता ने लक्षशीर्ष रावण का वध किया था ।