रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१४ रामायणमीमांसा एकोनविंश आनन्दरामायण (सर्ग ४-६) के अनुसार पातालवासी रावणपुत्र मूलकासुर से पराजित होकर विभीषण पुनः राम के पास गये । राम सहायतार्थ गये । सात दिनों तक मूलकासुर के साथ युद्ध हुआ । हनुमान् ने पहले की भाँति द्रोणाचल लाकर मृत वानरों को जिलाया । ब्रह्मा ने आकर कहा कि मेरे वरदान के अनुसार यह किसी वीर के हाथ न मरेगा । किसी ऋषि ने इसे सीता के हाथ मरने का शाप दिया है । राम ने गरुड़ को सीता लाने भेजा । सीता ने लङ्का पहुँचकर तामसी छाया को युद्ध के लिए प्रेरित किया । इतने में वानर मूलकासुर का यज्ञ विध्वंस कर लौटे । सीता की तामसी छाया ने चण्डी का रूप धारणकर मूलकासुर का वध किया । हनुमच्चरित वाल्मीकिरामायण के अनुसार हनुमान् का चरित्र महत्त्वपूर्ण है । हनुमान् ही राम और लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले जाकर मैत्री कराते हैं । वर्षा ऋतु के पश्चात् सुग्रीव को राम के प्रति कर्त्तव्यपालन का स्मरण दिलाते हैं । राम की मुद्रिका लेकर सीता की खोज में वानरों के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान करते हैं और समुद्रलङ्घन कर सीता का पता लगाते हैं । उनका सन्देश लेकर राम के पास लौटते हैं । लङ्का-दहन वृत्तान्त को बुल्के प्रक्षिप्त कहते हैं, परन्तु वह उनकी भूल है । हनुमान् द्वारा लङ्का-दाह वाल्मीकिरामायण से सिद्ध है । अक्षयकुमार का वध भी लङ्का-दाह के प्रसङ्ग में वर्णित है । युद्ध में भी हनुमान् का प्रमुख भाग रहा है और अनेक बार औषध-पर्वत लाकर उन्होंने लक्ष्मण एवं अन्य वानरवीरों के प्राण बचाये हैं । इन अंशों को बुल्के प्रक्षिप्त कहते हैं । बुल्के यह भी कहते हैं कि प्राचीन रामायण में हनुमान् की जन्म-कथा का अभाव रहा होगा । परन्तु यह सब भी उनके निःसार अनुमान हैं । रामायण राम-पुत्र कुश और लव द्वारा गाया गया है, बुल्के के तथाकथित कुशीलवों द्वारा नहीं । अतएव उनके (कुशीलवों के) द्वारा रामायण की पूर्ति की गयी है, यह उनकी कल्पना निःसार है । प्रचलित वाल्मीकिरामायण ही प्रामाणिक रामायण है । हनुमान् की कथा पराक्रम, बुद्धिमत्ता, चिरजीवित्व, ब्रह्मचर्य, रामभक्ति, देवत्व ये हनुमान् के विशिष्ट गुण हैं । पउमचरियं के अनुसार हनुमान् रावण तथा सुग्रीव दोनों के रिश्तेदार माने गये हैं । रावण ने अपनी बहन चन्द्रनखा की पुत्री अनङ्गकुसुमा का तथा सुग्रीव ने अपनी पुत्री पद्मरागा का हनुमान् से विवाह किया था । युद्ध के बाद राम ने हनुमान् को राजा बनाकर उन्हें श्रीपर्वत के शिखर पर स्थित श्रीपुर प्रदान किया था । अन्त में दीक्षा लेकर हनुमान् निर्वाण प्राप्त करते हैं । जैनों की दीक्षा का मिथ्या प्रचार प्रसिद्ध ही है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो हनुमान् सूर्यनारायण से सम्पूर्ण वेद-वेदाङ्गों का अध्ययन करते हैं और ब्रह्मविद्या में वे प्रधानतया निष्णात हैं । रामायण के अनुसार वे अञ्जनापुत्र हैं, यह निर्विवाद है । बुल्के कहते हैं कि इसकी प्रामाणिकता सन्दिग्ध है । परन्तु बुल्के का पक्ष ही प्रमाणशून्य है । हनुमान् का अञ्जना-पुत्रत्व तो वाल्मीकि- रामायण से सिद्ध ही है । अध्यात्मरामायण (४।७।१९,२०) के अनुसार हनुमान् और अङ्गद नारायण की आराधना कर उनके पार्षद बने थे और मायाशक्ति के प्रभाव से वानररूप में उत्पन्न हुए थे । बुल्के प्रचलितरामायण की हनुमज्जन्म-कथा के विरुद्ध दो तर्क देते हैं—एक तो वाल्मीकिरामायण में केसरी एवं अञ्जना के उल्लेखों की कमी है । दूसरे हनुमान् की उपाधि वायु-पुत्र का निरन्तर उल्लेख मिलता है । परन्तु यह तर्क भी तर्काभास ही है, क्योंकि प्रामाणिक एक स्थल के वचन पर्याप्त होते हैं । प्रमाणाभास सैकड़ों वचन भी अकिञ्चित्कर होते हैं । फिर स्वयं बुल्के भी यह मानते हैं कि एक स्थल में तीनों पाठों के अनुसार हनुमान् के पिता के रूप में केसरी का उल्लेख हुआ है । फिर कई बार केसरी