भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 692, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 692

अध्याय उत्तरकाण्ड ६१५ का उल्लेख होने पर भी कमी बतलाना सरासर झूठ है। देखो—सीता-हनुमान्-संवाद में वे सीता से कहते हैं— "अहं सुग्रीवसचिवो हनुमान् नाम वानरः ।” (वा० रा० ५।३४।३८) अगले सर्ग में वे पुनः अपना परिचय देते हैं—मैं केसरी की पत्नी से उत्पन्न हनुमान् हूँ— "माल्यवान् नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरिः। ततो गच्छति गोकर्णं पर्वतं केसरी हरिः॥ यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि । हनुमानिति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा।।" (वा० रा० ५।३५।७९-८१) वस्तुतः वानररूप में हनुमान् को देखकर सीता को यह शङ्का उत्पन्न हो गयी कि कहीं यह रावण ही तो नहीं है ? "स्वं परित्यज्य रूप यः परिव्राजकरूपवान् । जनस्थाने मया दृष्टस्त्वं स एव हि रावणः ।।" ( वा० रा० ५।३५।१५ ) सीता शङ्का मिटाने के लिए उन्हें राम के गुण कहने को प्रेरित करती हैं, क्योंकि रावण राम का द्वेषी है। यदि यह रावण होगा तो राम का गुण-वर्णन नहीं करेगा। यदि कृत्रिम भावना से वर्णन करेगा तो कृत्रिमता व्यक्त हो ही जायेगी। हनुमान् राम का गुण-वर्णन करते हैं और अपना परिचय देते हुए कहते हैं—मैं हनुमान् नामक वानर सुग्रीव का सचिव हूँ, मैं मायावी राक्षस नहीं हूँ--- "अहं सुग्रीवसचिवो हनुमन्नाम वानरः । नाहमस्मि तथा देवि यथा मामवगच्छसि ।।" ( वा० रा० ५।३४।३८ ) सीता पुनः राम और सुग्रीव के समागम के सम्बन्ध में एवं राम तथा लक्ष्मण के चिह्नों को पूछती है। हनुमान् गुणों तथा लक्षणों सहित राम का वर्णन तथा वानरों के साथ समागम आदि की कथा का वर्णन कर के शङ्का मिटाने के लिए पुनः कहते हैं—देवि ! मुझपर विश्वास कर मुझसे बोलो। मैं राम का दूत हूँ। तुम्हारे लिए जो राम का उद्योग है, तदर्थ ही आया हूँ— "अभिभाषस्व मां देवि ! दूतो दाशरथेरहम् ।” मुझे सुग्रीव-सचिव एवं पवनपुत्र हनुमान् ही समझो— "सुग्रीवसचिवं देवि ! बुद्धयस्व पवनात्मजम् ।” पवन-पुत्र होने से ही मैं समुद्र-लङ्घन कर सकने में समर्थ हुआ हूँ। शङ्का हो सकती थी कि तुम्हारा तिर्यग्देह है। तुम पवन-पुत्र कैसे हो ? इस बात का समाधान करते हुए हनुमान् ने अपने जन्म की बात कही। देवर्षियों से आदिष्ट होकर मेरे पिता केसरी ने शम्बसादन असुर का वध किया था। उन केसरी के क्षेत्र अञ्जना में वायु के द्वारा मेरा जन्म हुआ है। "यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि ।” इससे दोनों बातों का स्पष्ट समाधान हो जाता है। केसरी के पुत्र हैं एवं वायु के तेज से जन्म होने के कारण वायु-पुत्र भी हैं। इस तरह केसरी-पुत्र तथा वायु-पुत्र दोनों का समन्वय हो जाता है। अञ्जनापुत्र होने में तो विवाद का प्रश्न ही नहीं है। अतएव इन श्लोकों को प्रक्षिप्त कहना भी निर्मूल है।