रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१६ रामायणमीमांसा एकोनविंश “मुख्यो वानरमुख्यानां केसरी नाम यूथपः ।” ( वा० रा० ६।७३।५९ ) जब केसरी का नामनिर्देश है ही तब इसकी कोई आवश्यकता नहीं है कि अनेक बार उनका उल्लेख हो । स्वयं बुल्के यह भी मानते हैं कि युद्धकाण्ड में केसरी नाम तीन बार आया है। दो बार अन्य नामों के साथ और एक बार स्वतन्त्र— “केसरि हरिलोमानं विद्युद्दंष्ट्रं च वानरम् ।” ( वा० रा० ६।७३।५९ ) “केसरी पनसो गजः ।” ( वा० रा० ६।४।३३ ) “युद्धं केसरिणा संख्ये घोरं सम्पातिना कृतम् ।” ( वा० रा० ६।४९।२६ ) अन्य सूचियों में नाम होने से भी उक्त उल्लेखों को प्रक्षेप कैसे कहा जा सकता है ? बुल्के कहते हैं कि युद्धकाण्ड के अन्त में भरत द्वारा वानरों का स्वागत किया गया है। उसमें हनुमान् के अतिरिक्त १३ नाम आये हैं। पर उनमें केसरी का नाम नहीं है। दाक्षिणात्य पाठ के बालकाण्ड में वानरों की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में १२ वानरों के नाम हैं। वाली और केसरी को छोड़कर सब नाम युद्धकाण्ड के अन्त में भी आये हैं। ये ही प्रमुख माने जा सकते हैं, किन्तु केसरी उनमें नहीं है। बुल्के की उक्त बातों का सार यही है कि केसरी हनुमान् के पिता होते तो उनका भी प्रमुख स्थान होता । परन्तु यह आवश्यक नहीं है। जब केसरी को स्वतन्त्र रूप से वानरमुख्यों में मुख्य कहा गया है तब उनकी मुख्यता में सन्देह ही नहीं। थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि वे उतने मुख्य नहीं थे तो भी वे हनुमान् के पिता नहीं थे, यह कैसे सिद्ध होगा ? व्यवहार में कई स्थलों में देखा जाता है कि पिता की अपेक्षा भी पुत्र का महत्त्व अधिक होता है। श्रीशङ्कराचार्य का नाम जितना प्रसिद्ध है, उतना उनके पिता का नाम कहाँ प्रसिद्ध है ? कि बहुना राम का ही नाम जितना प्रसिद्ध है, उतना दशरथ का नाम कहाँ प्रसिद्ध है ? हनुमान् की जन्मकथा ( सर्ग ३५, ३६ ) में स्पष्टरूप से केसरी, अञ्जना और वायु का सम्बन्ध उल्लिखित है— “सूर्यदत्तवरस्वर्णः सुमेरुर्नाम पर्वत: । यत्र राज्यं प्रशास्त्यस्य केसरी नाम वै पिता ।। तस्य भार्या बभूवेष्टा ह्यञ्जनेति परिश्रुता । जनयामास तस्यां वै वायरात्मजमुत्तमम् ।।” ( वा० रा० ७।३५।१९, २० ) कभी का बहाना बनाकर बुल्के निरर्थक ही महत्त्वपूर्ण हनुमान्-कथा को प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं। बुल्के की दृष्टि में हनुमान् की जन्मकथा तीनों पाठों में मान्य है। उसके अतिरिक्त दान-वितरण के प्रसङ्ग में केसरी का नामोल्लेख अन्य नामों के साथ हुआ है। यह भी तीनों पाठों को सम्मत है। किसी पाठ में उल्लेख न होने को भी वे क्षेपक होने में हेतु मानते हैं, पर तीनों पाठों में भी हनुमान् की जन्मकथा और केसरी का उल्लेख होने पर भी वे इन अंशों को प्रक्षेप कह देते हैं। इससे बढ़कर धूल भीकना और क्या हो सकता है। अतः उनका यह कहना नितान्त भ्रान्तिपूर्ण है