रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 694, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय उत्तरकाण्ड ६१७ वायुपुत्र नाम के सम्बन्ध में बुल्के ६६२ वें अनु० में कहते हैं "रामायणरचना के पहले ही वायुपुत्र शब्द एक निश्चित अर्थ में प्रचलित था । सुमंगजातक में वायुस्स पुत्त अर्थात् विद्याधर की कथा मिलती है, जिसमें न तो हनुमान् का उल्लेख है और न किसी अन्य वानर का । यह विद्याधर ऐन्द्रजालिक है और वायुस्स पुत्त का अर्थ अन्यत्र भी विद्याधर अथवा जादूगर है। महाभारत में भी वातिक शब्द इससे मिलता जुलता अर्थ रखता है । रामायण में हनुमान् समुद्र लांघते हैं । सीता का पता लगाते हैं । अन्य वानरों की अपेक्षा अधिक बुद्धि- मान् तथा कार्यकुशल माने जाते हैं। अद्भुतरस से पूर्ण उनके उस चरित्रचित्रण को ध्यान में रखकर उनको वायुपुत्र (अर्थात् विद्याधर, ऐन्द्रजालिक) की उपाधि मिली होगी । बाद में वायुपुत्र नाम के आधार पर प्रचलित जन्मकथा का विकास हुआ होगा । इसके अनुसार वायु ने किसी शापभ्रष्टा अप्सरा से हनुमान् को उत्पन्न किया था, यह कथा गढ़ ली गयी ।" यह पाश्चात्यों के रिसर्च का नमूना है। वे अपने दिमागी फितूर के आधार पर धड़ल्ले के साथ प्रामाणिक आधारों को प्रक्षिप्त घोषित करने का दुःसाहस कर बैठते हैं— "उपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात् ।” की उन्हें चिन्ता नहीं होती। साथ ही वे इतनी पक्षपातपूर्ण संकीर्ण मनोवृत्ति के होते हैं कि उसके लिए कुछ भी अनर्थ कर डालना उनके लिए असंभव नहीं। उन्हें वैदिक उपनिषदों, वाल्मीकिरामायण तथा महाभारत में प्रामाण्य बुद्धि नहीं, परन्तु केवल कपोलकल्पित बौद्ध जातकों में अटल विश्वास न भी रखते हों तो भी वैदिक वाङ्मय को दूषित करने के लिए उनका सहारा अवश्य लेते हैं। वस्तुस्थिति यह है कि बौद्ध जातक स्वयं में ही प्रामाणिक नहीं हैं । बौद्धधर्म के अनुयायियों ने बौद्ध माहात्म्य-वर्णन के लिए उनकी कल्पनाएँ की हैं। क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से बुद्ध एवं सभी बौद्ध जातक अर्वाचीन हैं। वाल्मीकिरामायण महाकाव्य लाखों वर्ष प्राचीन भगवान् राम का समकालीन है। सुतरां सुमग्ग जातक के वायुस्स पुत्त के आधार पर वाल्मीकिरामायण के वायुपुत्र की कल्पना कोई भी समझदार नहीं कर सकता । सुमग्गजातक को भारत में कोई जानता तक नहीं, जब कि वाल्मीकिरामायण को बच्चा बच्चा जानता है । वाल्मीकिरामायण का परम्परा से अध्ययन, पाठ एवं अनुष्ठान होता आ रहा है। उसपर अनेक संस्कृत की गम्भीर टीकाएँ हुई हैं। वाल्मीकिरामायण के आधार पर देश-विदेशों में सहस्रों रामायण आदि ग्रन्थ लिखे गये हैं। उस रामायणमहामाला के दिव्य रत्न हनुमान् या वायुपुत्र का आधार सुमग्गाजातक में ढूंढ़ना जब कि उसमें हनुमान् या किसी वानर का नाम तक नहीं है, अनभिज्ञता की पराकाष्ठा ही कही जायगी । अन्य भाषा तथा अन्य सभ्यता में उसी शब्द के अन्य अर्थ हो सकते हैं। परन्तु दूसरी भाषा या दूसरी सभ्यता में उसका वही अर्थ हो यह नहीं कहा जा सकता है । आर्य शब्द का अन्य भाषा में जो भी अर्थ होता हो भारतीय भाषा में उसका श्रेष्ठ ही अर्थ है। दस्त शब्द का किसी भाषा में हाथ अर्थ हो, परन्तु भारतीय भाषा में उसका वही अर्थ नहीं है । वाल्मीकिरामायण में हनुमान् के लिए वायुपुत्र शब्द का अन्वर्थ ही प्रयोग हुआ है और वे वायु के पुत्र थे । इस सन्दर्भ की कथा भी वहीं प्रसिद्ध है । इतना ही नहीं रावण आदि ने वरदान माँगा था कि हम नर और वानरों से अतिरिक्त और किसी से न मरें । तदर्थ ही विष्णु नररूप में तथा अन्य देवता वानररूप में उत्पन्न हुए हैं। न केवल हनुमान् ही अपितु जाम्बवान्, सुग्रीव, बाली, नल, नील आदि भी तत्तद्देवताओं के अवतार हैं। इन पूर्वापर की सभी कथाओं को प्रक्षेप या मिथ्या कहकर अप्रसिद्ध अर्वाचीन सुमग्गजातक के वायुस्स पुत्त का वायुपुत्र से सम्बन्ध जोड़ना सर्वथा उपहासास्पद ही है। वायुस्स पुत्त शब्द का विद्याधर या ऐन्द्रजालिक स्वाभाविक अर्थ भी नहीं है, ७८