भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 695, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 695

६१८ रामायणमीमांसा एकोनविंश किन्तु अश्वकर्ण आदि शब्दों के समान रूढ़ ही हो सकता है । उसका हनुमान् की कथा से क्या सम्बन्ध हो सकता है ? जैसे वेद के "अहमन्नाद" का सम्बन्ध मुसलमानों के अहमद नाद के साथ जोड़ना असङ्गत है । वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । हनुमान् का जन्म किष्किन्धाकाण्ड ( सर्ग ६६ ) के अनुसार पुञ्जिकस्थला अप्सरा शाप-वश वानर-योनि को प्राप्त हुई थी । वह कुञ्जर की पुत्री अञ्जना के रूप में प्रकट होकर केसरी की पत्नी बनी । कामरूपिणी होने के कारण उसने किसी दिन रूपयौवन-सम्पन्न मानवस्त्री का रूप ग्रहण किया । मरुत् देवता ने उसे इस रूप में देखा और आसक्त होकर उसका आलिङ्गन किया । अञ्जना के आपत्ति करने पर मरुत् ने उसे एक वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्न पुत्र, जिसकी गति वायु के समान होगी, उत्पन्न होने का वर प्रदान किया । “मनसाऽस्मि गतो यत्त्वां परिष्वज्य यशस्विनि । वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ॥१८॥ महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रमः । लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति मया समः ॥”१९॥ इस प्रामाणिक कथा को मिथ्या कल्पना कहना उन अंग्रेजों के लिए ही सम्भव है जिनके यहाँ मिथ्या इतिहास प्रामाणिक करने के लिए मिथ्या पार्लियामेन्ट्री प्रस्ताव भी बन सकता है । भारत में ऐसी मिथ्या कल्पनाओं को कोई स्थान नहीं है । वरदान के फलस्वरूप अञ्जना गर्भवती होकर एक गुफा में हनुमान् को जन्म देती है । उदीयमान सूर्य को देखकर और उसे फल समझकर शिशु उसे पकड़ने के लिए आकाश में कूद पड़ा । इन्द्र के वज्र से आहत होकर गिरि- शिखर पर गिरने से बायीं ठोढ़ी भग्न होने से उसका नाम हनुमान् पड़ा— “तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत । ततोऽभिनामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम् ॥२४॥” पुत्र की वैसी हालत देखकर वायुदेव ने कुपित हो अपनी गति बन्द कर दी । फलस्वरूप सब प्राणी व्याकुल हो उठे । तब सब देवता आकर वायु को मनाने लगे । ब्रह्मा ने हनुमान् को ब्रह्मास्त्रादि से अवध्यता, इन्द्र ने स्वेच्छा- मरण आदि वरदान दिये । बुल्के अपनी बात को सिद्ध करने के लिए ७४ वें सर्ग को ही प्रक्षिप्त कह देते हैं जो कि सर्वथा निराधार है । महाभारत में अञ्जना नाम न होने से भी रामायण की अञ्जना का अपलाप करना अनभिज्ञता ही है । वेदसार गीता में “इषे त्वा” मन्त्र का उल्लेख न होने पर भी वेद में उसका अस्तित्व है वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । उपनिषत्सार गीता में 'ईशा वास्यम्', 'अन्धं तमः प्रविशन्ति' शब्द नहीं हैं तो भी उपनिषद् में उक्त पाठ प्रक्षिप्त नहीं माना जाता है। ऐसे ही वाल्मीकिरामायण के सार महाभारत रामोपाख्यान में अञ्जना नाम न होनेपर भी वाल्मीकिरामायण के अञ्जना नाम को प्रक्षिप्त कहना निरी धृष्टता ही है । उपाधियों के बल पर हनुमान् की जन्मकथा को प्रक्षेप कहा जाता है। “महाभारत में हनुमान् को पाँच बार मारुतात्मज कहा गया है, तीन बार पवनात्मज कहा गया है, दो बार अनिलात्मज तथा एक बार वायुपुत्र कहा गया है । एक बार वायुतनय भी कहा गया है । किन्तु केसरीपुत्र और अञ्जनापुत्र एक बार भी नहीं कहा गया है । अतः प्रतीत होता है कि हनुमान् पहले वायु-तनय के नाम से विख्यात थे, बाद में केसरीपुत्र, अञ्जनापुत्र के रूप में

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