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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

६१८ रामायणमीमांसा एकोनविंश किन्तु अश्वकर्ण आदि शब्दों के समान रूढ़ ही हो सकता है । उसका हनुमान् की कथा से क्या सम्बन्ध हो सकता है ? जैसे वेद के "अहमन्नाद" का सम्बन्ध मुसलमानों के अहमद नाद के साथ जोड़ना असङ्गत है । वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । हनुमान् का जन्म किष्किन्धाकाण्ड ( सर्ग ६६ ) के अनुसार पुञ्जिकस्थला अप्सरा शाप-वश वानर-योनि को प्राप्त हुई थी । वह कुञ्जर की पुत्री अञ्जना के रूप में प्रकट होकर केसरी की पत्नी बनी । कामरूपिणी होने के कारण उसने किसी दिन रूपयौवन-सम्पन्न मानवस्त्री का रूप ग्रहण किया । मरुत् देवता ने उसे इस रूप में देखा और आसक्त होकर उसका आलिङ्गन किया । अञ्जना के आपत्ति करने पर मरुत् ने उसे एक वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्न पुत्र, जिसकी गति वायु के समान होगी, उत्पन्न होने का वर प्रदान किया । “मनसाऽस्मि गतो यत्त्वां परिष्वज्य यशस्विनि । वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ॥१८॥ महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रमः । लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति मया समः ॥”१९॥ इस प्रामाणिक कथा को मिथ्या कल्पना कहना उन अंग्रेजों के लिए ही सम्भव है जिनके यहाँ मिथ्या इतिहास प्रामाणिक करने के लिए मिथ्या पार्लियामेन्ट्री प्रस्ताव भी बन सकता है । भारत में ऐसी मिथ्या कल्पनाओं को कोई स्थान नहीं है । वरदान के फलस्वरूप अञ्जना गर्भवती होकर एक गुफा में हनुमान् को जन्म देती है । उदीयमान सूर्य को देखकर और उसे फल समझकर शिशु उसे पकड़ने के लिए आकाश में कूद पड़ा । इन्द्र के वज्र से आहत होकर गिरि- शिखर पर गिरने से बायीं ठोढ़ी भग्न होने से उसका नाम हनुमान् पड़ा— “तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत । ततोऽभिनामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम् ॥२४॥” पुत्र की वैसी हालत देखकर वायुदेव ने कुपित हो अपनी गति बन्द कर दी । फलस्वरूप सब प्राणी व्याकुल हो उठे । तब सब देवता आकर वायु को मनाने लगे । ब्रह्मा ने हनुमान् को ब्रह्मास्त्रादि से अवध्यता, इन्द्र ने स्वेच्छा- मरण आदि वरदान दिये । बुल्के अपनी बात को सिद्ध करने के लिए ७४ वें सर्ग को ही प्रक्षिप्त कह देते हैं जो कि सर्वथा निराधार है । महाभारत में अञ्जना नाम न होने से भी रामायण की अञ्जना का अपलाप करना अनभिज्ञता ही है । वेदसार गीता में “इषे त्वा” मन्त्र का उल्लेख न होने पर भी वेद में उसका अस्तित्व है वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । उपनिषत्सार गीता में 'ईशा वास्यम्', 'अन्धं तमः प्रविशन्ति' शब्द नहीं हैं तो भी उपनिषद् में उक्त पाठ प्रक्षिप्त नहीं माना जाता है। ऐसे ही वाल्मीकिरामायण के सार महाभारत रामोपाख्यान में अञ्जना नाम न होनेपर भी वाल्मीकिरामायण के अञ्जना नाम को प्रक्षिप्त कहना निरी धृष्टता ही है । उपाधियों के बल पर हनुमान् की जन्मकथा को प्रक्षेप कहा जाता है। “महाभारत में हनुमान् को पाँच बार मारुतात्मज कहा गया है, तीन बार पवनात्मज कहा गया है, दो बार अनिलात्मज तथा एक बार वायुपुत्र कहा गया है । एक बार वायुतनय भी कहा गया है । किन्तु केसरीपुत्र और अञ्जनापुत्र एक बार भी नहीं कहा गया है । अतः प्रतीत होता है कि हनुमान् पहले वायु-तनय के नाम से विख्यात थे, बाद में केसरीपुत्र, अञ्जनापुत्र के रूप में

प्रसिद्ध हुए। रामायण में हनुमान् के निम्नलिखित नाम सर्वाधिक प्रयुक्त हुए हैं—मारुतात्मज, मारुति, पवनात्मज, वायुपुत्र, वायुसूनु, वायुसुत तथा अनिलात्मज इनके अतिरिक्त वातात्मज, मारुत, पवनसुत, अनिलसुत ये नाम भी कई बार आये हैं। वायुनन्दन, वायुसम्भव, मारुतनन्दन, वासवदूतसूनु, गन्धवहात्मज नाम एक एक बार आये हैं । हनुमान् की उत्पत्तिविषयक उपाधियों का बाहुल्य तथा केसरी अथवा अञ्जना के उल्लेख का अभाव देखकर दृढ़ धारणा बनती है कि वाल्मीकिरामायण के गायक बहुत दिनों तक हनुमान् को वायुपुत्र ही मानते थे और उस कथा से अनभिज्ञ थे जिसके अनुसार हनुमान् केसरी की पत्नी अथवा अञ्जना की सन्तान हैं। बालकाण्ड में जहाँ देवताओं द्वारा अप्सराओं, गन्धर्वियों और वानर-वानरियों से वानर और ऋक्षों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है वहाँ मारुत को ही हनुमान् का पिता माना है।" अतः बुल्के का उक्त तर्क स्वयं ही सापेक्ष एवं आधाररहित है। हनुमान् वायुपुत्र हैं यह तो सिद्धान्त में भी मान्य ही है। परन्तु वायु पवन देवता हैं। उनसे किसी वानरी में हनुमान् का वानररूप में जन्म मानना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में प्रमाणसिद्ध का परित्याग कर अप्रसिद्ध की कल्पना करना न्यायविरुद्ध है — “उपस्थितं परित्यक्त्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात् ।” वैसे सामान्यकल्पना भी विशेषपर्यवसायिनी होती है। इस तरह जब अञ्जना वानरी हनुमान् की माता सिद्ध हो जाती है तब उसके जिस किसी भी पति की कल्पना करनी होगी। पर जब यहाँ भी केसरी उसका पति प्रसिद्ध है तब पत्यन्तर की कल्पना भी निरर्थक ही है। प्रभावशाली भी वानर की अपेक्षा वायुदेवता का प्राणरूप से, हिरण्यगर्भरूप से एवं अष्टमूर्ति शिव का रूप होने से महत्त्व अधिक है। इसी लिए वातात्मज आदि नामों का अधिक प्रयोग हनुमान् के लिए हुआ है और यह उपाधि नहीं वस्तुस्थिति है। इस वस्तुस्थिति के रहते हुए भी अञ्जना-सुत केसरी-नन्दन आदि के साथ उसका विरोध नहीं है। जैसे—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन आदि की धर्मपुत्र, इन्द्रसूनु तथा पवनात्मज के रूप से प्रसिद्धि होने पर भी उनके कौन्तेय एवं पाण्डव होने में कोई बाधा नहीं पड़ती है । बुल्के यह भी कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड की जन्मकथा में अञ्जनीसुत मिलता ही है । किन्तु वह दाक्षिणात्य पाठ में ही मिलता है। गौड़ीय और पश्चिमोत्तरीय पाठों में नहीं मिलता है। समानान्तर स्थलों में इसका अभाव है। अतः यह प्रक्षेप ही है।" किन्तु उनका यह प्रलाप ही है, कारण जब पूर्व कथन के अनुसार तीनों पाठों में केसरी नाम मिलने पर भी उसे क्षेपक मानने में हिचक नहीं फिर किसी पाठ में न मिलने का अन्तर ढूंढ़ना क्या अज्ञता नहीं है। सिद्धान्त में तो तीनों ही पाठ प्रमाण हैं, अतः प्रक्षेप होने का प्रश्न ही नहीं उठता। “तथा केसरिणा त्वेष वायुना सोऽञ्जनीसुतः । प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ॥” (वा०रा०दा०पा० सर्ग ३६) “यदा केसरिणा ह्येष वायुनाञ्जनया तथा । प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ।।” ( प० पा० सर्ग ३९) “यदा केसरिणा त्वेष वायुना स्वजनैः सह । प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ॥” ( गौ० पा० सर्ग ४० ) भले ही समानान्तर स्थल में न हो। परन्तु उपर्युक्त तीनों ही पाठों में केसरी एवं अञ्जना का नाम है ही । इनके प्रक्षेप होने में भी कोई प्रमाण नहीं है । श्लोकार्थ यह है कि जब केसरी एवं वायु तथा अञ्जना के द्वारा प्रतिषेध करने पर भी यह हनुमान् वानर मर्यादा का उल्लङ्घन करता है । अर्थात् हनुमान् आश्रमों में ऋषियों के स्रुक् तथा वल्कलों को नष्ट कर देते थे । तब ऋषियों ने मृदु कोप से ही शाप दे दिया कि दीर्घकाल तक तुम अपने महान् बल पराक्रम को भूले रहोगे जब कोई तुम्हें तुम्हारे बल का स्मरण करायेगा तब तुम्हारा बल—तेज बढ़ेगा ।

६२० रामायणमीमांसा एकोनविंश हनुमान् का बाल चरित वाल्मीकिरामायण (७।३५) में हनुमान् का बालचरित वर्णित है। राम ने अगस्त्य से प्रश्न करते हुए कहा था कि हनुमान् इतने शक्तिशाली होते हुए वाली के विरुद्ध सुग्रीव की सहायता करने में असमर्थ कैसे रहे ? मेरे विचार में तो हनुमान् अपना बल जानते ही नहीं थे। अगस्त्य ने बतलाया कि मुनियों के शाप से महान् बलवान् हनुमान् अपना बल भूले रहते थे। अगस्त्य ने बताया कि पर्वतराज सुमेरु का राजा केसरी था। उसकी पत्नी अञ्जना में वायुदेवता के तेज से हनुमान् की उत्पत्ति हुई। उत्पन्न होते ही भूख से व्याकुल होकर वह बालक सूर्य को फल समझकर पकड़ने के लिए आकाश में छलांग मारता है। उसे शिशु समझ तथा भावी महत्त्वपूर्ण कार्य-कलाप जानकर सूर्य ने अपने तेज से उसे जलने नहीं दिया। संयोग से उसी दिन सूर्यग्रहण था। राहु सूर्य के पास पहुँचा। वह हनुमान् का आक्रमण देखकर भागा और इन्द्र के पास जाकर उसने शिकायत की कि चन्द्र और सूर्य मेरे भक्ष्य हैं, आपने वे दूसरे को क्यों दे दिये ? आज एक अन्य राहु सूर्य को पकड़ रहा है। इन्द्र ऐरावत पर चढ़कर सूर्य के पास आते हैं। पहले तो हनुमान् सूर्य से बड़ा समझकर राहु की ओर झपटे, राहु इन्द्र को परित्राणार्थ पुकारने लगा। इन्द्र को देख ऐरावत को बड़ा फल समझकर हनुमान् उसपर टूट पड़े। तब इन्द्र ने वज्र-प्रहार किया, जिससे हनुभग्न होने के कारण वे हनुमान् कहलाये। पुत्र को आहत देखकर वायु ने सबके श्वासों को निरुद्ध कर दिया। अन्त में देवता, असुर एवं गन्धर्व सब ने मिलकर ब्रह्मा की शरण ली। ब्रह्मा उन सबके कष्ट का रहस्य प्रकट कर सब को साथ लेकर वायु के पास गये। ब्रह्मा ने अपने स्पर्शमात्र से हनुमान् को स्वस्थ कर दिया। भावी कार्य को ध्यान रख ब्रह्मा ने देवताओं से हनुमान् को वर प्रदान करने को कहा—इन्द्र ने काञ्चन पद्मों की माला प्रदान कर कहा मेरे वज्र से हनुभग्न होने से इसका नाम हनुमान् होगा और वरदान दिया कि अब इसपर वज्र का प्रभाव नहीं पड़ेगा। भगवान् सूर्य ने अपने तेज की शक्ति की १०० वीं कला प्रदान की और अध्ययन के समय शास्त्र- प्रदान का आश्वासन दिया। वरुण ने कहा—मेरे शस्त्रास्त्रों, वर्षा-जल तथा वरुणपाश से इसकी मृत्यु नहीं होगी। यम ने काल-दण्ड से अवध्य होने का वरदान दिया। कुबेर तथा भगवान् शङ्कर ने भी बहुत वर प्रदान किये। विश्वकर्मा ने कहा मेरे द्वारा निर्मित कोई शस्त्रास्त्र तुम पर सफल नहीं होगा। ब्रह्मा ने अजेय, कामचारी, कामरूप, कामग तथा अव्याहतगति, कीर्तिमान् तथा रोमहर्षकरकर्मकारी होने का वरदान दिया। वरदान के बाद हनुमान् ऋषियों के आश्रमों में स्रुव, स्रुक्, वल्कल आदि को अस्त-व्यस्त करने लगे, इस कारण ऋषियों ने मृदु कोप वश हनुमान् को अपना बल भूले रहने का शाप दिया और कहा कि यदि कोई तुम्हारे बल का स्मरण करायेगा तभी तुम्हारा बल प्रकट होगा। वाली और सुग्रीव के विवाद के समय किसी ने उनके बल का स्मरण नहीं कराया। जब समुद्र-लङ्घन का अवसर आया तो जाम्बवान् ने उनके बल का उन्हें स्मरण दिलाया था। पराक्रम, उत्साह, मति, प्रताप, सौशील्य, माधुर्य, नयानय-विज्ञान, गाम्भीर्य, चातुर्य, वीर्य, धैर्य आदि गुणों में हनुमान् की समता कोई भी नहीं कर सकता है। व्याकरण शास्त्र का अध्ययन करने के लिए सूर्य के उन्मुख होकर वे उदयगिरि से लेकर अस्ताचल तक पश्चात्पद चलते थे। वेद, वेदाङ्ग आदि सभी विद्याओं में तथा तपोनिधान में हनुमान् वृहस्पति से भी प्रतिस्पर्धा करते थे। रावण एवं वाली का महत्त्व सुनकर राम ने कहा था कि रावण तथा वाली का बहुत बड़ा बल था तथापि हनुमान् के समान उनका बल नहीं था। शौर्य, दक्षता, बल, धैर्य, प्रज्ञा, नीतिमत्ता, विक्रम तथा प्रभाव बहुत से गुण हनुमान् में ही रहते हैं। जाम्बवान् से आत्मकथा सुनकर हनुमान् विशाल रूप धारण करते हैं एवं समुद्रलङ्घन के लिए उद्यत होकर अपने बल का वर्णन करते हैं।

बुल्के कहते हैं कि पश्चिमोत्तरीय तथा गौड़ीय पाठों के अनुसार हनुमान् अपनी जन्मकथा का पुनः विवरण कर के अपने पिता केसरी के एक वरदान का उल्लेख करते हैं । पश्चिम समुद्र के तट पर प्रभासतीर्थ में एक महान् गज ऋषियों को तंग किया करता था। केसरी ने उसका वध किया । ऋषियों के अनुरोध से उन्होंने वायु के समान वीर्यवान् कामरूपी अव्यय पुत्र माँगा था। यद्यपि इसमें पुञ्जिक- स्थला का नाम नहीं है। इसमें बालचरित का वर्णन नहीं है। फिर भी वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों की कथाओं का समन्वय कर के ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित है । ब्रह्मपुराण (अध्याय ८४) के अनुसार केसरी की अञ्जना और अद्रिका दो पत्नियाँ थीं । अगस्त्य का आतिथ्यसत्कार कर के दोनों ने उत्तम बलवान् लोकोपकारक पुत्र माँगा । पश्चात् वायु से अञ्जना में हनुमान् तथा निर्ऋति से अद्रिका में पिशाचराज अद्रि की उत्पत्ति होती है। अद्रि गौतमी नदी के किसी तीर्थ में स्नान कराने के लिए अञ्जना को ले गये । वहाँ स्नान करने से अञ्जना, जो पहले अप्सरा थी, मुक्त हो गयी । उस तीर्थ का नाम अञ्जनं अथवा पैशाचं हुआ । अद्रिका को हनुमान् ने किसी दूसरे तीर्थ में स्नान कराया, जिससे वह भी मुक्त हो गयी । उस तीर्थ का नाम मार्जारं अथवा हनुमन्त पड़ा । स्कन्दपुराण के अनुसार शिव की कृपा से हनुमान् को अनेक वर मिले हैं। भविष्यपुराण ( ३।४।१३ ) के अनुसार वज्र से मारे जाने पर हनुमान् ने सूर्य को हाथ से नहीं जाने दिया । सूर्य का आर्त वचन सुनकर रावण आकर हनुमान् की पूँछ खींचने लगा । हनुमान् ने सूर्य को छोड़कर रावण से एक वर्ष पर्यन्त मल्ल युद्ध किया । अन्त में रावण की हार हुई । विश्वा ने आकर रुद्रावतार हनुमान् को तुष्ट किया । आनन्दरामायण ( १।१३।१६४-१६८) तथा भावार्थरामायण ( ७।३५) के अनुसार वायु अपने पुत्र को सूर्य की ओर बढ़ते देखकर उसे प्रचण्ड ताप से बचाने के लिए दौड़े, पर उसे लौटाने में असमर्थ होकर शीतल समीर द्वारा उसे ठंडा करने लगे । सूर्य के पास पहुँचकर सूर्य को निगलते राहु को देखकर पूंछ के प्रहार से हनुमान् ने राहु को अचेत कर दिया । तब केतु राहु की सहायता करने आया, किन्तु हनुमान् ने दोनों को परास्त किया । अन्त में दोनों इन्द्र की शरण में गये । वाल्मीकिरामायण के अनुसार पुराण की कथाओं का समन्वय हो ही जाता है । पउमचरियं के अनुसार आदित्यपुर के पवनञ्जय राजकुमार ने महेन्द्रपुर की राजकुमारी अञ्जना से विवाह किया, किन्तु २२ वर्ष तक पत्नी से उदासीन रहा। जब वह रावण की ओर से वरुण से युद्ध करने गया तब किसी दिन उसका अञ्जना के प्रति अनुराग जाग्रत हुआ । वह गुप्तरूप से उससे मिलने गया । अञ्जना गर्भिणी हुई । अतः सखी वसन्तमाला के साथ निर्वासित होकर किसी गुफा में पुत्र को जन्म देती है। बाद में अञ्जना का मामा प्रतिसूर्यक पुत्र सहित अञ्जना को हनुरुहपुर की ओर ले गया । बालक माता की गोद से उछलकर पर्वत-शिला पर गिरता है । माता ने देखा बालक के गिरने से पर्वत चूर-चूर हो गया। उससे उनका नाम धीशैल हुआ । पवनञ्जय ने अपनी पत्नी के सतीत्व का साक्ष्य दिया। पुत्रसहित अञ्जना ससुराल लौटी । हनुरुहपुर में रहने से बालक का नाम हनुमान् हुआ । गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार प्रभञ्जन ने अपनी पत्नी से अमिततेज नामक पुत्र उत्पन्न किया अमिततेज ने विजय-यात्रा में पर्वत पर दाहिना पैर रख कर बायें से सूर्य पर प्रहार किया । अपना शरीर त्रसरेणु जैसा बनाने से उसका नाम अणुमान् हुआ । यह सब वाल्मीकिरामायण को ही विकृत कर रूपान्तरण किया गया है। जैनों और बौद्धों द्वारा इन कथाओं को विकृत करने में यह भी प्रमाण है कि उन्होंने नगरों, ग्रामों आदि तथा पात्रों के जो नाम गढ़े हैं वे सर्वथा अप्रचलित तथा अव्यवहार्य हैं और उन नगरों और ग्रामों का कहीं अस्तित्व ऐतिहासिक नहीं है जब कि प्राचीन ग्रन्थों में उल्लिखित नगर, ग्राम आदि ज्यों के त्यों अभी तक मिलते हैं ।

६२२ रामायणमीमांसा एकोनविंश बुल्के कहते हैं कि शैवपुराणों तथा अर्वाचीन रचनाओं में हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। पर यह उनकी दुष्कल्पना असङ्गत है। पुराण अतिप्राचीन हैं। तदनुसार हनुमान् रुद्रांश या रुद्रावतार ही हैं। विष्णु रावण के नाशार्थ आविर्भूत हुए। तब उनकी सहायता के लिए शिव हनुमान् के रूप में आये। नारदपुराण (पूर्वखण्ड अ० ७९) तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड अ० ६२) में हनुमान् को शिव का अंश कहा गया है। महानाटक (६।२७) में लङ्का को जलते देखकर रावण कहता है—मैंने अपने दस सिर चढ़ाकर दस रुद्रों को प्रसन्न किया था। हनुमान् ११वें रुद्र के अवतार हैं। तत्त्वसंग्रहरामायण (७।२) में हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। कृत्तिवासीय रामायण (६।१२९) के अनुसार सीता रामाभिषेक के बाद हनुमान् को परोस कर तृप्त कराने में असमर्थ हो ध्यान से जानती हैं कि वे रुद्रावतार हैं। आनन्दरामायण (१।११), तुलसीकृत दोहावली (१४२-३), विनयपत्रिका आदि में भी हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। भविष्यपुराण (प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ. खण्ड १३।३१-३६) में भी केसरी ही हनुमान् के पिता कहे गये हैं। किन्तु रुद्र और वायु सहायक हैं। रावण से त्रस्त देवताओं ने ११ वर्ष शिव की पूजा कर के वर पाया है कि शिव रावण का दमन करने के लिए अवतार लेंगे। अञ्जना गौतम की पुत्री थी। शिव ने रौद्र तेज से केसरी के मुख में प्रवेश किया। केसरी तुरन्त कामातुर हुआ। वायु ने भी केसरीदेह में प्रवेश किया। इस तरह १२ वर्ष तक रमण करने के बाद अञ्जना गर्भिणी हुई और उसने वानरानन पुत्र को जन्म दिया। पुत्र को कुरूप देखकर अञ्जना ने उसे पर्वत से नीचे फेंक दिया। वानरानन पुत्र के फेंकने से भूकम्प हुआ। शिवपुराण (शतरुद्रखण्ड अ० ३९-४२) के अनुसार प्रभञ्जन ने केसरी की पत्नी अञ्जनी से रुद्रावतार हनुमान् को उत्पन्न किया। कथासरित्सागर की कथाओं के अनुसार गौतम अपनी पुत्री को गर्भिणी होने का शाप देते हैं, क्योंकि उसने अपनी माता अहल्या का व्यभिचार प्रकट किया था। शाप सुनकर वह शिव की आराधना करती है। शिव की आज्ञा से नारद ने उसके कान में मन्त्र कह दिया। जिसके प्रभाव से उसने हनुमान् को जन्म दिया। मन्त्र-ग्रहण करते समय वह केसरी नामक वानर की ओर देख रही थी। इसी लिए वानरमुखवाला पुत्र हुआ। रामकियेन के अनुसार उसका नाम स्वाहा था। माता का व्यभिचार प्रकट करने पर माता ने उसको पुत्रप्रसव करने तक एक पैर पर खड़े रहने का शाप दिया था। शिव दयार्द्र होकर अपनी शक्ति तथा अपने अस्त्रों की शक्ति के साथ वायु को स्वाहा के पास भेज कर उसके मुख में रखने का आदेश देते हैं। फलतः तीन महीने के बाद हनुमान् वानर के रूप में स्वाहा के मुख से निकलते हैं। शिवपुराण (शतरुद्रसंहिता अ० २०) के अनुसार विष्णु को मोहिनीरूप में देखकर आविर्भूत शिव-शुक्र को सप्तर्षियों ने अञ्जना के कान में रख दिया। उसी से हनुमान् का जन्म हुआ। सारलादास के महाभारत (वनपर्व) के अनुसार अहल्या ने यह शाप दिया था कि तुम्हारा पुत्र बन्दर होगा। अञ्जना ने विवाह न करने का निश्चय किया। तपस्या करने लगी। उसके शरीर के चारों ओर वल्मीक हो गया। गौतम के अनुरोध से पवन उसे सप्ताह में भोजन देते हैं। उधर विवाह के पश्चात् शिव पशुओं का रूप धारण कर क्रीडा कर रहे थे। वानर-वानरी के रूप में रमण करते समय शिव का तेज पार्वती धारण न कर सकीं। तेज पृथ्वी पर गिर गया। उससे विभिन्न धातुएँ बनीं। शिव ने थोड़ा तेज वायु को दिया। पवन ने उसे अञ्जना को दिया। हनुमान् का जन्म हुआ। दक्षिण की किसी कथा के अनुसार वानर-वानरी के रूप में परमेश्वर और परमेश्वरी की क्रीड़ा से परमेश्वरी गर्भिणी हो गयी। वानर-पुत्र होने की आशङ्का से वायु से कहा कि वह भ्रूण को निकाल कर अन्य स्त्री के पेट में रख दे। वायु ने उस भ्रूण को अञ्जना के गर्भ में पहुँचाया। उसने वानर को प्रसव किया।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२३ पुराणों पर आधारित कथाओं का वाल्मीकिरामायण के साथ समन्वय करना उचित है । वायु का सम्बन्ध प्रायः सब कथाओं से जुड़ा है। तुलसीदासजी ने भी हनुमान् चालीसा में हनुमान् को "शंकरसुवन केसरी- नन्दन" कहा है । शिव का तेज शिवस्वरूप ही है । वायु, अग्नि आदि सभी ईश्वर की शक्ति से ही शक्तिमान् होते हैं । जैसे शिव-तेज धारणकर अग्नि ने उसे गङ्गा में निहित किया था उसी तरह शिवतेज धारणकर वायु ने अञ्जना में निहित किया है । अञ्जना गौतमपुत्री थी । उससे भी पहले पुञ्जिकस्थला अप्सरा थी, जो भी हो, वह शाप वश वानरी हुई । सेरीराम के अनुसार गौतम ने पुत्री अञ्जना को शाप दिया कि सौ वर्ष तक मुख बाकर सुई की नोक पर समुद्र के बीच में खड़ी रहो । वनवास के समय राम, लक्ष्मण और सीता एक स्थल पर पहुँचे जहाँ दो सरोवर थे । एक ऋषि ने कहा—स्वच्छजलवाले सरोवर में स्नान करने से मनुष्य पशुरूप धारण कर लेते हैं । पङ्किल जलवाले सरोवर में स्नान करने से पुनः मनुष्य बन जाते हैं। राम और सीता ने स्वच्छजलवाले सरोवर में स्नान कर लिया और दोनों वानर-वानरी हो गये । वृक्षों पर क्रीडा करने लगे, जिससे सीता गर्भिणी हो गयी । लक्ष्मण ने बड़ी कठिनाई से पुनः दोनों को पङ्किल जलवाले सरोवर में नहलाया तब वे पुनः मनुष्यरूप बन गये। राम ने सीता का भ्रूण निकाल दिया । वायु ने उसे सुई की नोक पर खड़ी अञ्जनी के मुख में रख दिया। बाद में अञ्जनी ने कुण्डलों से अलङ्कृत हनुमान् को जन्म दिया । सेरीराम के अन्य पाठानुसार अञ्जनी को देखकर राम अनुरक्त होते हैं, अपने तेज को वायु के द्वारा अञ्जना के मुख में रखवाते हैं । रामजातक के अनुसार सीता को खोजते समय राम एक फल खाने से वानर बन जाते हैं। अञ्जनी ने भी वही फल खाया वह भी वानरी हो गयी । दोनों हनुमान् को उत्पन्न करते हैं । हनुमान् के प्रति सीता और राम दोनों का वात्सल्य था । इसी आधार पर यह कथा बनी है । ईश्वर ही हिरण्यगर्भ तथा विराट् बनकर मनु-शतरूपा रूप में विभिन्न प्राणियों के रूप में सम्पूर्ण विश्व के प्राणियों का निर्माण करते हैं । फिर भी मर्यादापुरुषोत्तम राम एकपत्नीव्रत पालन करते हैं । वाल्मीकिरामायण में वर्णित राम और सीता के आदर्श के विपरीत कथाओं का वाच्यार्थ में प्रामाण्य नहीं है । पूर्वोक्त लक्ष्यार्थ में तो कोई विरोध नहीं है । वस्तुतः बौद्धजातक और उनके अनुसार उलटी सीधी गढ़ी गयी कथाओं का किसी प्रकार प्रामाण्य नहीं है । दशरथयज्ञ के पायस का एक अंश अञ्जना को प्राप्त हुआ था । उससे हनुमान् का जन्म होना उनकी विष्णुरूपता में भी प्रमाण है ( आ० रा० १।१।१०४-१०७) । सुवर्चला अप्सरा को नृत्य-दोष के कारण ब्रह्मा ने गृध्री होने का शाप दिया तथा उसे यह वरदान दिया कि कैकेयी का पायस अञ्जनी पर्वत पर फेंकने पर वह पुनः अप्सरा हो जायगी । समय आने पर गृध्री ने कैकेयी के हाथ से कुछ पायस छीनकर अञ्जनी पर्वत पर फेंका और अप्सरा होकर स्वर्ग चली गयी । वह पायस अञ्जना को मिला । उससे हनुमान् का जन्म हुआ । उसी रचना में अन्य स्थल पर उसके बाद वायु से भी सम्पर्क हुआ, जिससे हनुमान् की उत्पत्ति हुई । भावार्थरामायण में इसका समन्वय मिलता है । सुवर्चला अप्सरा शापवशात् गृध्री हुई । कैकेयी से पायस का कुछ अंश छीनकर उसे खाकर वही वानरी बन गयी । वानरी के रूप में वह गौतम की पुत्री और केसरी की पत्नी बन गयी । पायस खाने के फलस्वरूप हनुमान् का जन्म होता है ( बालकाण्ड २-२ तथा किष्किन्धा- काण्ड १-१०) । वाल्मीकिरामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों के अनुसार हनुमान् केसरी के क्षेत्रज और वायु के औरस पुत्र हैं । अञ्जना उनकी माता है । बुल्के के अनुसार विशेषताओं की दृष्टि से वायु-पुत्र उनकी काल्पनिक उपाधि नहीं है ।

६२४ रामायणमीमांसा एकोनविंश उनका ऐन्द्रजालिक या विद्याधर होना वायुपुत्र शब्द से कथमपि सिद्ध नहीं होता। जैनकथा भी रामायणीय कथा पर जहाँ तक निर्भर है वहीं तक मान्य है। रामायण विरोधी अंश सभी त्याज्य हैं। बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है कि ८ वीं या १० वीं शती से हनुमान् शिव के अवतार माने जाते हैं, क्योंकि पुराण कम से कम व्यास-काल के हैं जो कि ईसा से तीन हजार वर्ष से अधिक प्राचीन हैं। यह कहना भी गलत है कि रामायण की आधिकारिक कथावस्तु में शिव के लिए कोई स्थान नहीं है, क्योंकि रामायण में शिव के रामेश्वर-प्रसाद की चर्चा है। दशरथ के साथ शिवजी प्रकट होकर राम को विविध आशीर्वाद देते हैं। जब पुराणों के अनुसार हनुमान् रुद्रावतार हैं यह वस्तुस्थिति है, तब शैवों ने हनुमान् को रुद्रावतार मान लिया यह कहना प्रलापमात्र ही है। उपनिषद्ग्रन्थ वेद हैं। रामरहस्योपनिषद् में हनुमान् को शिव, सुग्रीव को विष्णु और जाम्बवान् को ब्रह्मा कहा गया है। ६८० वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "हनुमान् वानरगोत्रीय आदिवासी थे। किन्तु आगे चलकर उन्हें राम-कथा के अन्य आदिवासियों के समान वानर भी माना गया है। प्रचलित रामायण में हनुमान् के वानरत्वविषयक विशेषणों का बाहुल्य देखकर प्रतीत होता है कि वाल्मीकि के समय के पूर्व ही यह धारणा मान्यता प्राप्त करने लगी थी कि वे सब वस्तुतः वानर थे। फिर भी रामायण के वानर मनुष्यों की तरह बुद्धिमान् थे तथा मानवभाषा बोलते थे, कपड़े पहनते थे, घरों में रहते थे, विवाह-संस्कार को मान्यता देते थे एवं राजा का शासन मानते थे। अतः कवि की दृष्टि से वे निरे वानर नहीं थे। उनकी अपनी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था थी। अतः वे वास्तव में एक मानवजनजाति ही थे।" परन्तु बुल्के का उक्त कथन उनकी कल्पना पर ही निर्भर है, प्रामाणिक नहीं है। विद्या, बुद्धिमत्ता तथा पराक्रम हनुमान्, सुग्रीव आदि वास्तव में ही वानर थे। वाल्मीकिरामायण से यही सिद्ध है, अन्यथा पुच्छ आदि भी सब काल्पनिक ही मानने पड़ेंगे। जिसे किसी भी अंश को क्षेपक कहने में कुछ संकोच नहीं, वही ऐसी निराधार कल्पना कर सकता है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार भी वे सामान्य वानर थे, किन्तु ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, सूर्य आदि देवता हो रावण आदि राक्षसों के वधार्थ वास्तव में वानरों के रूप में उत्पन्न हुए थे। अतएव उनकी मानवों जैसी ही नहीं मानवों से भी अत्यन्त उत्कृष्ट बुद्धि थी तथा उनमें उत्कृष्ट बल था। वे विद्वान् वेदज्ञ भी थे। यह सब रामायण से ही सिद्ध है। जैसे ब्रज की गोपिकाएँ कोई सामान्य गोपिकाएँ नहीं हैं, वे विशिष्ट शक्तिरूपा हैं उसी तरह इन विशिष्ट अवतारी वानरों को भी समझना चाहिए। वे निरे वानर नहीं थे। उनकी धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था थी, यह सब ठीक है। वाल्मीकिरामायण में हनुमान् को सुग्रीव का पराक्रमी तथा बुद्धिमान् मन्त्री माना गया है। सर्वत्र ही रामसाहित्य में हनुमान् के पराक्रम तथा बुद्धिमत्ता को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। महाभारत के वनपर्व में भीम हनुमान् का परिचय देते हुए कहते हैं— “भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः । रामायणेऽतिविख्यातो शूरो वानरपुङ्गवः ॥” ( १११।४७ ) मेरा भ्राता गुणों से श्लाघ्य, बुद्धि, सत्त्व और बल से युक्त वानरपुङ्गव हनुमान् रामायण में अति विख्यात है। यह श्लोक भी रामायण पहले और महाभारत बाद का है इसमें प्रबल प्रमाण है। अतः कुछ पाश्चात्यों का तथा उनके अनुयायियों का महाभारत को रामायण से पुराना मानना निरा भ्रम ही है।

रामायण में अनेक स्थलों पर हनुमान् की प्रशंसा है। सर्वत्र उनकी वीरता एवं विशिष्ट प्रज्ञा का वर्णन है। हनुमान् का देवत्व भी स्वाभाविक ही है। हनुमान् ही क्यों सुग्रीव आदि सभी वानर देवता ही हैं। उपनिषद् में हनुमान् को शिव कहा गया है। उपनिषद् को अर्वाचीन कहना सर्वथा निराधार ही है। हनुमान् का पराक्रम प्रसिद्ध है। वाल्मीकिरामायण में हनुमान् के लिए निम्नोक्त विशेषण प्रयुक्त हैं—वीर, वीर्यवान्, महाबल, महातेज, महाबाहु, महावेग, भीमविक्रम, अरिन्दम, बलवीर्यसंवृत, जितश्रम, वज्रसंहनन, महाकाय, महोत्कट, अमितौज, मारुततुल्यवेग, मारुतवेगविक्रम, मनोजव, मेघस्वन, महास्वन, घननादनिःस्वन, चण्डविक्रम, गरुडानिलविक्रम, रणचण्डविक्रम, अरिमर्दन, शत्रुसैन्यानां निहन्ता आदि। ६८३ वें अनु० में बुल्के यह भी कहते हैं कि "उनके समुद्रलङ्घन की कथा संभवतः किसी आश्चर्यजनक तथा असाधारण लङ्घन के आधार पर उत्पन्न हुई । लङ्कादहन, औषधपर्वत का आनयन, जन्म के बाद ही सूर्य तक छलांग मारना ये वृत्तान्त प्रचलित रामायण में प्रक्षिप्त हैं।" यह सब कथन दुरभिसन्धिपूर्ण इसाइयत मनोवृत्ति का परिचायक है। परन्तु उन्हें ईसा के चमत्कारों में अविश्वास और प्रक्षेप की कल्पना करने का साहस नहीं होता । निश्चित ही वाल्मीकिरामायण अनादि अपौरुषेय वेदों के आधार पर आधारित है। उसमें अप्रामाण्य की शङ्का भी नहीं होती। उपनिषदों में हनुमान् के समुद्रलङ्घन, लङ्का-दहन आदि की चर्चा है। क्या किसी नाले के पार कूद जाने से समुद्रलङ्घन की कल्पना हो सकती है ? जिसने वाल्मीकिरामायण का समुद्रोल्लङ्घन का वर्णन सुना है वह बुल्के के कथन को प्रलाप ही मानेगा ? औषध-पर्वत का आनयन भी साधारण पत्थर लाने का उपचार नहीं है और न ही सूर्य तक छलांग लगाने की कल्पना का कोई लौकिक आधार है। परन्तु दैवी और आसुरी शक्तियों की ओर ध्यान देने से यह असंभव नहीं है। रामकियेन आदि ने भी इन घटनाओं को काल्पनिक नहीं माना है। ईसा ने अन्धे की आँखें दे दी और कुष्ठी को निर्मल काया दी । यदि ईसाइयों के अनुसार यह सत्य है तो अनादि वैदिक धर्म के विशिष्ट पुरुषों में उक्त चमत्कार में कोई आश्चर्य ही नहीं है । बाइबिल आदि ही अर्वाचीन ग्रन्थ हैं। उनके पाठ और वृत्तान्तों के सम्बन्ध में ईसाइयों में ही बहुत मतभेद हैं। बुल्के को चाहिए कि वे अपना घर संभालें। वस्तुतः वेद और रामायण के अध्ययन के वे अधिकारी ही नहीं हैं। उनकी अनधिकार चेष्टा का ही दुष्परिणाम उनकी तथाकथित रामकथा है। अतएव केवल रामायणों में ही नहीं महाभारत आदि में भी हनुमान् के लोकोत्तर पराक्रम का वर्णन है । महाभारत के अनुसार हिमालय के मार्ग में सोये हुए हनुमान् को जगाकर भीम ने उन्हें हट जाने को कहा—हनुमान् ने कहा, लांघकर चले जाओ अन्यथा पूंछ हटाकर चले जाओ । भीम पूंछ हटाने लगे । वे पूंछ को हिलाने में भी समर्थ नहीं हुए। दोनों हाथ लगाने से भी पूंछ टस से मस नहीं हुई। भीम ने समझ लिया कि ये हनुमान् हैं। भीम के अनुरोध पर उन्होंने भीम को समुद्रलङ्घन करनेवाला रूप दिखाया और चतुर्युगीन चातुर्वर्ण्य का उपदेश दिया एवं भावी युद्ध में उन्हें सहायता देने का आश्वासन दिया ( म० भा० ३।१५७।१५०) । इससे भी रामायण की प्राचीनता तथा महाभारत की अर्वाचीनता स्पष्ट सिद्ध है । आनन्दरामायण मनोहरकाण्ड के अनुसार द्वापर के अन्त में अर्जुन की धनुष्कोटि तीर्थ में हनुमान् से भेंट हुई। अर्जुन ने कहा सेतु-निर्माण में व्यर्थ ही परिश्रम हुआ। शरसेतु क्यों नहीं बनाया गया । हनुमान् ने कहा मुझ जैसे वानरों के भार से सेतु डूब जाता । अर्जुन ने कहा मैं अभी सेतु बनाता हूँ यदि वह आपके भार से डूब जाय तो मैं अग्निप्रवेश करूँगा। हनुमान् ने भी कहा—यदि मेरे भार से सेतु न टूटा न तो मैं आपकी ध्वजा पर बैठकर सहायता करूँगा । अर्जुन ने शतयोजन सेतु का निर्माण कर दिया । हनुमान् ने अपने अँगूठे से ही सेतु भग्न कर दिया । अर्जुन ७९

६२६ रामायणमीमांसा एकोनविंश चिता में बैठने को तैयार हो गये । कृष्ण वहाँ बटु के रूप में पहुँचे । सारा हाल सुनकर बोले साक्षी के अभाव में आप दोनों का काम व्यर्थ हुआ । मेरे सामने अपनी सामर्थ्य दिखाइये । अब की बार कृष्ण ने सेतु के नीचे अपना चक्र रख दिया जिससे हनुमान् के भार से भी सेतु न टूटा । वे तुरन्त जान गये कि ये भगवान् हैं । किसी कथा के अनुसार भगवान् ने कच्छप-रूप धारण कर शरसेतु की रक्षा की । हनुमान् ने समझ लिया । भगवान् ने कृष्णरूप में दर्शन देकर उनका आलिङ्गन किया । भगवान् ने सेतु भी समुद्र में डुबाकर अर्जुन का गर्व दूर किया । उस समय से हनुमान् अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान हुए । इन सब प्रमाणों के रहते बुल्के आदि कैसे महाभारत को प्राचीन मानकर रामायण पर उसका प्रभाव बतलाते हैं, यही आश्चर्य है । तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार अर्जुन ने कृष्ण से कहा—मैं समुद्र पर सेतु बना सकता हूँ । राम ने सेतु क्यों बनवाया ? कृष्ण ने कहा वह महाकाय वानर वीरों के लिए बनाया गया था। अर्जुन ने गर्व से कहा—मेरा सेतु किसी भी भार का सहन कर सकता है। कृष्ण ने हनुमान् को बुलवाया । अर्जुन ने सेतु बनाया । पर वह हनुमान् के चढ़ते ही चूर्ण हो गया । भगवान् ने वराहरूप से संभाला। हनुमान् ने कृष्ण के अनुरोध से महाभारत में अर्जुन के ध्वजपर बैठना स्वीकार किया । कर्णदान काव्य में कहा गया है कि सारलादास के महाभारत कर्णपर्व के अनुसार कर्ण के साथ युद्ध करते समय अर्जुन को गर्व हुआ कि कर्ण के बाण से मेरा रथ थोड़ा ही पीछे हटता है, किन्तु मेरे बाणों से कर्ण का रथ चौगुनी दूरी तक पीछे हट जाता है । किन्तु कृष्ण ने यह कहकर कर्ण की ही प्रशंसा की कि कर्ण का रथ हल्का है और यह रथ मेरु-मन्दर के तुल्य भारी है, इसपर सभी देवता विद्यमान हैं । ध्वज में हनुमान् हैं, फिर भी कर्ण इसे अपने बाणों से हटा देता है । कृष्णावतार के समय भगवान् ने हनुमान् को बुलाकर द्वारका के किसी उपवन में निवास कराया । कृष्ण ने सत्यभामा, सुदर्शन तथा गरुड़ तीनों का गर्व दूर करना चाहा । गरुड़ से कहा—अमुक वन में रहनेवाले वानर को पकड़ लाओ । हनुमान् ने उन्हें ६०,००० योजन पार समुद्र में फेंक दिया । बाद में कृष्ण ने पुनः गरुड़ को भेजा कि हनुमान् को द्वारका के राजभवन में आने का निमन्त्रण दे आओ स्वयं धनुर्धारी राम बन गये । सत्यभामा को सीता का रूप धारण करने को कहा । सुदर्शन से कहा—सावधान ! कोई भी प्रवेश न करने पाये । हनुमान् गरुड़ के बहुत पहले द्वारका पहुँच गये । सुदर्शन चक्र को मुख में रखकर राजभवन में प्रवेश किया । वे रामरूपी कृष्ण के सामने नतमस्तक होकर तुरन्त पहचान गये कि सत्यभामा सीता नहीं है । कृष्ण ने हनुमान् को द्वारपाल नियुक्त किया । दाशरथि (१८०६ ई०—१८४७ ई०) की पाञ्चाली के "सत्यभामा, सुदर्शनचक्र ओ गरुड़ेर दर्पचूर्ण" अध्याय के अनुसार कृष्ण ने गरुड़ को हिमालय से एक नील कमल लाने को भेजा । वहाँ उनका हनुमान् से युद्ध हुआ । हनुमान् ने गरुड़ को काँख में दबाकर एक नील कमल के साथ द्वारका के लिए प्रस्थान किया । सुदर्शन ने हनुमान् को महल के द्वार पर रोकने का प्रयास किया, किन्तु सुदर्शन हनुमान् का एक बाल भी बाँका न कर सके । उन्होंने अपनी हार मान ली । इतने में कृष्ण ने यह देखकर कि हनुमान् आ रहे हैं राम का रूप धारण कर लिया । सत्यभामा को सीता का रूप धारण करने को कहा, किन्तु वह समर्थ नहीं हुईं । रुक्मिणी ने सीता का रूप धारण किया । सत्यभामा और उनकी सखियाँ उनकी हँसी उड़ाने लगीं । हनुमान् ने राम के चरणों पर नील कमल रखकर गरुड़ को काँख से निकाल दिया । ऐसी कथाएँ अन्यत्र भी हैं ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२७ पउमचरियं के अनुसार हनुमान् ने वरुण के १०० पुत्रों को कैद कर लिया था। पर्व ५० में हनुमान् ने अपने दादा महेन्द्र को सेना सहित पराजित किया था। स्कन्दपुराण (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यमा० अ० ३६,३७) में हनुमान् के प्रभाव से धर्मारण्य के निवासियों की सुख-शान्ति तथा हनुमान् द्वारा कुम्भीपाल की पराजय से वहाँ के ब्राह्मणों की सुरक्षा का वर्णन है। आनन्दरामायण (राज्यकाण्ड सर्ग १८) के अनुसार राम ने ब्राह्मणों को रामनाथपुर का राज्य प्रदान किया तथा हनुमान् को उनकी सहायता के लिए नियुक्त किया। बाद में हनुमान् ने देवालय की पाषाण मूर्ति से प्रकट होकर एक दुष्ट राजा को शूली पर चढ़ाया था। आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड सर्ग १२२) में स्त्रीराज्य की कथा मिलती है। एक रामभक्त ब्राह्मण की सहायता के लिए प्रकट होकर हनुमान् ने अपने गर्जन से ही सब पुरुषों को मार डाला, जिससे उस देश का स्त्रीराज्य नाम पड़ा। भावार्थरामायण (७।१) में भी हनुमान् को राम द्वारा स्त्रीराज्य में भेजने की कथा है। यह भी कहा जाता है कि वीरमाता अञ्जना ने अपने दूध की धारा से एक पर्वतश्रेणी को बहा दिया था। रामायण में हनुमान् के लिए सचिवोत्तम, मन्त्रिसत्तम, पिङ्गाधिपमन्त्री, कपिराजहितकर, प्लवङ्गाधिप- मन्त्रिसत्तम आदि विशेषण आते हैं। प्रज्ञासूचक विशेषणों में मतिमान्, महामति, महाप्राज्ञ, मेधावी, बुद्धिमतां वरिष्ठ, धीमान्, साधुबुद्धि, अचिन्त्यबुद्धि, वाक्यज्ञ, वाक्यविशारद आदि विशेषण विशेषरूप से आते हैं। हनुमान् संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं के विद्वान् थे। अशोकवाटिका में वे इसी लिए संस्कृत नहीं बोलते कि संस्कृत बोलने से सीता उन्हें रावण न समझ लें— “वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् । यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ॥ रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति । अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत् ॥ (वा० रा० ५।३०।१७,१८) ६८९ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “हनुमान् की विभिन्न शास्त्रों में पहुँच का उल्लेख मूलरामायण में नहीं रहा होगा। हनुमान् की जन्म-कथा में उनको सर्वशास्त्रविदांवर की उपाधि दी गयी है (वा० रा० ४।६६।२) ।” सर्वत्र ही बुल्के को अपनी अनर्गल बात को सिद्ध करने के लिए रामायण 'की कथाओं को क्षेपक कहना पड़ता है। अन्यथा वाल्मीकिरामायण में तो हनुमान् को सर्वशास्त्रविदों में श्रेष्ठ कहा ही गया है। वाल्मीकिरामायण ४।५४।५ में भी हनुमान् को सर्वशास्त्रविशारद कहा गया है। अन्य स्थलों में भी हनुमान् की तत्त्वज्ञता वर्णित है— “निश्चितार्थोऽर्थतत्त्वज्ञः कालधर्मविशेषवित् ।” (वा० रा० ४।२९।६) तथा— “विदिताः सर्वलोकास्ते” (वा० रा० ४।४४।४)। बुल्के कहते हैं कि अधिक संभव है कि ये बाद के प्रक्षेप हों, पर वे सात जन्म लेकर भी हनुमान् की सब शास्त्रों में पहुँच नहीं थी, इसमें कोई प्रमाण नहीं बतला सकते । उत्तरकाण्ड की कथा में अगस्त्यजी ने राम को स्पष्ट बताया ही था कि हनुमान् ने सूर्य भगवान् से व्याकरणादि वेदाङ्ग, वेद, छन्द आदि का अध्ययन कर सब को धारण किया था । परन्तु बुल्के के पास इन सबको प्रक्षेप कहने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है। महाभारत आरण्यक पर्व में भी हनुमान् और भीम के संवाद में हनुमान् को शास्त्रज्ञ कहा गया है। वे भीम को चार युगों (अध्याय

६२८ रामायणमीमांसा एकोनविंश १४८ ) तथा चार वर्णों ( अध्याय १४९ ) के धर्मों का उपदेश करते हैं । किन्तु बुल्के अन्यत्र महाभारत में न होने के कारण वाल्मीकिरामायण में विद्यमान अंशों को क्षेपक कहते हैं परन्तु महाभारत के आरण्यक पर्व में हनुमान् के लिए शास्त्रज्ञ होने का उल्लेख होते देखकर कहते हैं कि यह उल्लेख उत्तरकाण्ड के प्रभाव से हुआ है । उत्तरकाण्ड को तो वे प्रक्षेप मानते ही हैं । वस्तुतः उनके ही पूर्वोक्त तर्कों के अनुसार महाभारत आरण्यक पर्व से समर्थित होने के कारण उत्तरकाण्ड को प्रामाणिक काण्ड मानने के लिए उन्हें बाध्य होना चाहिये । साथ ही उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं है कि वे महाभारत के स्वयं रामोपाख्यान की छाप वाल्मीकिरामायण पर मान चुके हैं । फिर उन्हें महा- भारत पर उत्तरकाण्ड का प्रभाव मानने का क्या अधिकार है । यों उनकी अधिकांश बाते उन्हीं के विरुद्ध हैं । सिद्धान्ततः दाक्षिणात्य पाठ भी प्रामाणिक ही है । उसमें स्पष्ट कहा है कि हनुमान् तीनों वेदों एवं व्याकरण के महान् विद्वान् थे— “नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः । नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम् ॥ नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम् ॥” ( वा० रा० ४।३।२८,२९ ) राम कहते हैं जिसे ऋग्वेद में शिक्षा नहीं प्राप्त है, जो यजुर्वेद नहीं जानता तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं है वह ऐसा भाषण नहीं कर सकता जैसा हनुमान् ने भाषण किया । निश्चय ही इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण शास्त्र का बहुत प्रकार से अध्ययन किया है । तभी बहुत बोलने पर भी किसी अपशब्द का उच्चारण नहीं किया । इन उद्धरणों से स्पष्ट ही हनुमान् की वेद-वेदाङ्गविज्ञता सिद्ध होती है । वस्तुस्थिति तो यह है कि वे विद्याधिपति शिव ही हैं । उनके अनुग्रह से आज भी बड़े बड़े विद्वान् पैदा होते हैं । परन्तु बुल्के अपनी मनोवृत्ति का परिचय देते हुए कहते हैं—"रामायण के कुशीलव ( गायक ) हनुमान् का ज्ञान-भण्डार बढ़ाते रहे हैं।" परन्तु आज के रामायण गायक तो विचारे हनुमान् की कृपा से अपना ज्ञान-भण्डार बढ़ाते हैं, किन्तु हनुमान् का ज्ञानभण्डार कोई मनुष्य कैसे बढ़ा सकता है ? बुल्के समझते हैं कि हनुमान् वस्तुतः वैसे नहीं थे, किन्तु व्यासों ने बढ़ाकर वैसा वर्णन किया है । पर उनकी यह समझ भ्रान्तिपूर्ण ही है । भारतीय व्यास पाश्चात्यों के समान मिथ्या इतिहास गढ़ने के अभ्यासी नहीं हैं । छन्दःशास्त्र के भी हनुमान् विद्वान् थे । बुल्के कहते हैं "इसी लिए हनुमन्नाटक की रचना का श्रेय हनुमान् को दिया गया है।" पर बुल्के को यह सोचना चाहिये था कि कोई भी ग्रन्थकर्ता के रूप में अपना ही नाम चाहता है । स्वयं ग्रन्थ लिखकर अपना उससे सम्बन्ध न जोड़कर अन्य को रचयिता के रूप में प्रसिद्ध करना बुल्के के यहाँ प्रसिद्ध है ? तो फिर अपनी रामकथा को ही दूसरे की रचना क्यों नहीं कहते ? कहा जाता है कि वाल्मीकि महर्षि की रुचिरक्षा की दृष्टि से हनुमान् ने अपनी रचना को समुद्र में फेंक दिया था । तुलसीदास ने विनयपत्रिका में वस्तुस्थिति के अनुसार ही हनुमान् को वेदवेदान्तविद् कहा है, केवल उपाधि नहीं दी । अध्यात्मरामायण ( १।१।३२-५२ ) के अनुसार सीता और राम हनुमान् को वेदान्त का उत्कृष्ट तत्त्व बतलाते हैं । मुक्तिकोपनिषद् तथा रामगीता में हनुमान् को उच्च दार्शनिक शिक्षा दी जाने का उल्लेख है । अद्भुत- रामायण ( सर्ग १०-१५ ) में राम हनुमान् को अपना विष्णुरूप दिखा कर उन्हें सांख्ययोग तथा भक्तियोग का उपदेश करते हैं । रामरहस्योपनिषद् अर्वाचीन नहीं अतिप्राचीन साक्षात् वेदस्वरूप है । उसके अनुसार हनुमान् सनकादिकों को रामोपासना की पद्धति बतलाते हैं ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२९ हनुमत्संहिता के अनुसार हनुमान राम की चारुशीलानामक प्रधान सखी के रूप में अगस्त्य को भक्ति की शिक्षा देते हैं। शिवसंहिता में हनुमान् और अगस्त्य के संवादरूप में तत्त्वज्ञान वर्णित है। दि बंगाली रामायण्स पृ० ५१ के अनुसार हनुमान् ज्योतिषी एवं संगीतज्ञ भी थे। परन्तु यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। महाभारत के भीम और हनुमान् के संवाद के अनुसार हनुमान् गन्धर्वों एवं अप्सराओं से रामायण का गान नित्य ही सुनते रहते हैं। तुलसीदास ने भी विनयपत्रिका में 'गानगुनगरवगन्धर्वजेता' कहा है। सामगायक, सामगानाग्रणी आदि भी उन्हें कहा है। यह सब कोरी कल्पना नहीं है। ऋषि, महर्षि, सन्त, सत्यवक्ता लोग मिथ्या भावना या कल्पना की सृष्टि नहीं करते हैं। रामकथाओं में हनुमान् के महायशा, कीर्तिमान्, यशस्वी, चिरञ्जीवी होने का भी वर्णन है। बुल्के अनु० ६९३ में कहते हैं कि "महाभारत का रामोपाख्यान रामायण के किसी प्राचीन रूप पर निर्भर है। उसमें राम अथवा देवताओं द्वारा हनुमान् को प्रदत्त किसी वरदान का उल्लेख नहीं है।" पर यह भी उनकी भ्रान्ति ही है। महाभारत रामोपाख्यान तथाकथित किसी अन्य रामायण पर नहीं प्रचलित वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर है। परन्तु वह संक्षेप है, अतः प्रचलित रामायण की सभी बातों का उसमें समावेश न होना स्वाभाविक ही है। “रामकीर्त्या समं पुत्र ! जीवितं ते भविष्यति ।” ( म० भा० ३।२७५।४३ ) सीता ने कहा है—पुत्र ! रामकीर्ति के समान ही तुम्हारा भी जीवन अमर रहेगा। बुल्के अपनी दुष्कल्पना के अनुसार कहते हैं कि “बहुत संभव है, इस उक्ति के अनुसार हनुमान् के विषय में यह माना जाने लगा कि जीवित रहकर हनुमान् हिमालय पर निवास करते हैं। इस विश्वास का प्राचीनतम उल्लेख हनुमान् और भीम के संवाद में सुरक्षित है। जिसमें हनुमान् कहते हैं कि मैंने राम से यह वरदान माँगा था कि जब तक रामकथा पृथ्वी पर प्रचलित रहेगी तब तक मैं जीवित रहूँ ( म० भा० ३।१४७।३७ ) । पर हनुमान् यह भी कहते हैं—इस स्थान पर अप्सराएँ तथा गन्धर्व रामचरित गाकर मुझे आनन्दित करते रहते हैं। रामोपाख्यान का सहारा लेकर बुल्के प्रचलित रामायण को अर्वाचीन एवं प्रक्षेपपूर्ण कहते हैं। परन्तु मौके पर रामोपाख्यान को भी किसी विश्वासमात्र पर निर्भर मान लेते हैं। आश्चर्य है ऐसे पूर्वापर विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करके बुल्के अपना और दूसरों का समय नष्ट करने में क्यों प्रवृत्त हुए ? वस्तुतः— “यावद्रामकथा वीर भवेल्लोकेषु शत्रुहन् । तावज्जीवेयमित्येवं तथास्त्विति च सोऽब्रवीत् ।।'' (वा० रा० ३।१४७।३७) जब इस तरह रामोपाख्यान में भी राम के वरदान का उल्लेख है ही तब यह कैसे कहा जाय कि मूल- रामायण में हनुमान् को प्रदत्त किसी वरदान की बात नहीं थी। जैसे राम अनन्त हैं वैसे रामकथा भी अनन्त है। तदनुसार हनुमान् का जीवन भी अनन्त ही है। रामायण में भी यही कहा गया है— “मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर । तावद्रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन् ।।'' ( वा० रा० ७।१०८।३० ) रामायण उत्तरकाण्ड में राम द्वारा हनुमान् को दो बार वरदान देने का उल्लेख है। स्वर्गारोहण के पूर्व राम कहते हैं—हरीश्वर ! लोक में जब तक मेरी कथाएँ प्रचलित रहेंगी तब तक तुम मेरी आज्ञा का पालन करते हुए सुप्रसन्न होकर मेरी कथा में रमण करो— “मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर । तावद्रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन् ।।'' ( वा० रा० ७।१०८।३० ) ।

६३० रामायणमीमांसा एकोनविंश उत्तरकाण्ड के ४० वें सर्ग में यह प्रसङ्ग विस्तृत रूप से वर्णित है। महाभारत में हनुमान् ने कहा था कि हिमालय के जिस स्थान पर वे रहते हैं वहाँ गन्धर्वादि रामचरित गाया करते हैं। बुल्के कहते हैं कि “अब रामचरित का यह गान वरदान का रूप धारण कर लेता है।” परन्तु यह बुल्के की भ्रान्ति ही है, क्योंकि रामायण की बात ही पहली है। महाभारत का रामोपाख्यान तो उसी का संक्षेप है। अतः वरप्रदान की चर्चा न करके महाभारत में परिस्थितिमात्र का वर्णन किया गया है। रामायण की मूल बात यही है कि अभिषेक के बाद अयोध्या से बिदा लेते समय हनुमान् राम से चिरजीवित्वपूर्वक रामकथाश्रवण तथा रामभक्ति का वरदान मांगते हैं— “स्नेहो मे परमो राजंस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा । भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ॥ यावद्रामकथा वीर चरिष्यति महीतले । तावच्छरीरे वत्स्यन्तु मम प्राणा न संशयः ॥ यच्च

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३१ जाता है। अतः वरदानों को विकास या कल्पना कहना भारी भूल ही है। जहाँ राम-कथा होती है वहाँ हनुमान् रहते हैं, यह विश्वास न होकर वस्तुस्थिति है ।। रामायण की अनुष्ठान-परम्परा में यह पाठ मिलता — “यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् । बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥” जहाँ-जहाँ रघुनाथ के गुणों, नामों तथा कथाओं का कीर्तन होता है वहाँ-वहाँ हाथ जोड़े, सिर झुकाये तथा बाष्पजल से परिपूर्णलोचन राक्षसान्तक हनुमान् विराजमान रहते हैं, उन्हें नमस्कार करो । ब्रह्मचर्य ६९६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “महीरावण की कथा में हनुमान् के एक पुत्र का उल्लेख है । लङ्का- दहन के अनन्तर समुद्र में स्नान करते समय हनुमान् का स्वेद अथवा श्लेष्मा निगलकर कोई मछली गर्भिणी हो गयी । उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ । मैरावणचरितम् (अ० १० ) के अनुसार उस पुत्र का नाम मत्स्यराज है । वह हनुमान् को अपना परिचय देते हुए कहता है— “तिमिङ्गिला हि मन्माता पिता च हनुमान् ।” हनुमान् यह कहकर आपत्ति करते हैं— “हनुमान् ब्रह्मचारीति विख्यातं भुवनेष्वपि ।” अतः पूर्वोक्त प्रसङ्ग से भी ब्रह्मचर्य में कोई बाधा नहीं । हनुमान् का ब्रह्मचर्य स्कन्दपुराण ( अवन्तीखण्ड अ० ८० ) से भी सिद्ध है । वहाँ का शिवलिङ्ग हनुमान् के ब्रह्मचर्य के प्रभाव से तथा ईश्वर के प्रसाद से कामप्रद है— “यद्यहं ब्रह्मचर्यञ्च जन्मपर्यन्तमुद्यतः । ईश्वरस्य प्रसादेन लिङ्गं कामप्रदं हि तत् ॥ (पद्मपु० पातालख० ४५।३१) पद्मपुराण रामाश्वमेध-वृत्तान्त में हनुमान् अपने को आजीवन ब्रह्मचारी कहते हैं— “आत्मयोगबलेनैव ब्रह्मचर्यप्रभावतः । पालयामि तदा वीर ! शत्रुघ्नो जीवतु क्षणात् ॥ (स्कन्दपु० अव०ख० ८३।३३) यदि मैंने जन्म से लेकर जीवनपर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन किया है तो क्षणभर में ही शत्रुघ्न जीवित हो जायें । पुराण परम प्रमाण हैं । लाङ्गूलोपनिद् ( अड्यारसंस्करण, पृ० २१३ ) तथा आनन्दरामायण ( मनोहरकाण्ड सर्ग १३ ) में हनुमान् को कुमारब्रह्मचारी कहा गया है। हनुमत्सहस्रनामस्तोत्र में ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय आदि नाम आये हैं। तुलसीदास ने हनुमान् को मन्मथमथन तथा ऊर्ध्वरेता कहा है । इस सम्बन्ध में उनके प्राकृतिक कौपीन का उल्लेख मिलता है। उड़िया महाभारत वनपर्व के अनुसार हनुमान् ने माता से कहा, जब तक मुझे वज्रकौपीन न मिले मैं जन्म नहीं लूँगा । पवन ने यह समाचार शिव को सुनाया । शिव ने अञ्जना को खिलाने के लिए कपड़े दिये । उसके फलस्वरूप हनुमान् ने कौपीन पहने हुए ही जन्म लिया । अर्जुनदासकृत रामविभा में भी ऐसी ही कथा है । भावार्थरामायण के अनुसार कौपीनयुक्त ही हनुमान् का जन्म हुआ ( ७।३५ ) । पद्मपुराण (पातालखण्ड ११२,१३५ में) हनुमान् को सुदृढ़बद्धमोञ्जीकौपीन और श्रीमन्मारुतिस्तव- राज में कौपीनधारी कहा गया है ।

६३२ रामायणमीमांसा एकोनविंश कहा जाता है कि हनुमान् ने किसी ऋषि के पास कौपीनमात्र छोड़कर उसका सर्वस्व लूट लिया था । ऋषि ने शाप दिया कि तुम्हारे पास भी कौपीन के अतिरिक्त कुछ न रहेगा । पुराणादि शास्त्रों के अनुसार हनुमान् का अखण्ड ब्रह्मचर्य प्रमाणित है । स्कन्द, हनुमान्, भीष्म आदि शास्त्रों में मुख्य ब्रह्मचारी गिने गये हैं । इसके विरुद्ध पउमचरियं तथा रामकियेन आदि में वर्णित हनुमान् का अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध विकृति ही समझना चाहिये । वाल्मीकिरामायण (६।१२५।४४) के अनुसार विजयी राम के प्रत्यागमन का समाचार सुनकर भरत ने दस हजार गायों, सैकड़ों ग्रामों के अतिरिक्त दिव्यरूप भूषणसम्पन्ना १६ कन्याएँ भी पत्नीरूप में हनुमान् को प्रदान की थीं । “सकुण्डलाः शुभाचारा भार्याः कन्यास्तु षोडश ।” परन्तु हर्षाद्रेक में भरत ने हनुमान् के लिए उक्त वस्तुएँ प्रदान कीं । इससे यह नहीं सिद्ध होता कि हनुमान् ने उन वस्तुओं को रख लिया । भागवत आदि ग्रन्थों के अनुसार राम आदि ने यज्ञ में ब्राह्मणों को समस्त भूमण्डल का दान दिया था । परन्तु ब्राह्मणों ने उसे स्वीकार नहीं किया । अतः हनुमान् के निमित्त उक्त वस्तुएँ प्रदान की गयीं । हनुमान् ने उन्हें अन्य अधिकारियों को प्रदान कर दिया होगा । पूर्वोक्त वचनों के साथ समन्वय करने से यही अर्थ निश्चित होता है । जैसे आज भी देवता तृप्त्यर्थ ब्राह्मणभोजन कराया जाता है । देवता को ग्रामादि समर्पण किये जाते हैं । उसी तरह भरत ने हनुमान् के निमित्त ग्राम आदि प्रदान किये थे । ७०० वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “हनुमान् की अन्य विशेताओं की भाँति ब्रह्मचर्य का मूल स्रोत वाल्मीकिरामायण को माना जा सकता है । रावण के अन्तःपुर में प्रविष्ट होकर वहाँ सुप्त अर्धनग्न स्त्रियों को निहार कर उनके सुव्यवस्थित मन में कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ— “कामं दृष्टा या सर्वा विश्वस्ता रावणस्त्रियः । न तु मे मनसः किञ्चिद्वैकृत्यमुपपद्यते ॥ मनो हि.........................मे सुव्यवस्थितम् ।” ( वा० रा० ५।४१, ४२ ) हनुमान् के संयम तथा धार्मिकता की दृष्टि से वाल्मीकिरामायण में उनके लिए महात्मा, महामनाः, संस्कारसम्पन्नः, कृतात्मा आदि विशेषण मिलते हैं । रावण के अन्तःपुर में प्रवेश करने पर उनको पाप की शङ्का होती है : “जगाम महतीं शङ्कां धर्मसाध्वसशङ्कितः ।” धर्मलोप निमित्त भय से शङ्कित हो वे महती शङ्का को प्राप्त हुए । ये सब बातें धार्मिक ब्रह्मचारी के ही मन में आ सकती हैं । आगे फिर बुल्के कहते हैं— “एष दोषो महान् हि स्यान्मम सीताभिभाषणे ।” ( वा० रा० ५।३०।३८ ) सीता के साथ बातचीत करने के कारण अपने को दोषी मानते हैं । अतः बहुत संभव है कि वाल्मीकि- रामायण में जो पापशङ्कालु तथा संयमी हनुमान् का चित्र प्रस्तुत किया गया है उसी के आधार पर उनके ब्रह्मचर्य की कल्पना की गयी है ।” बुल्के की पहले की बातें तो कुछ संगत सी थीं, परन्तु उनका निष्कर्ष उन्होंने गलत निकाला है । वस्तुतः उससे तो यह निष्कर्ष निकालना उचित है कि उक्त वचन उनके अखण्ड ब्रह्मचारी होने में प्रमाण हैं, क्योंकि धार्मिक ब्रह्मचारी पापभीरु के मन में ही इस प्रकार की बातें उठ सकती हैं । परन्तु यह नहीं कि उक्त पापशङ्कालु आदि होने के कारण पीछे से उनके अखण्ड ब्रह्मचारी होने की कल्पना कर ली गयी है ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३३ अर्थापत्ति प्रमाण द्वारा निश्चित अर्थ कल्पनामात्र नहीं होता । जैसे 'दिवा अभुञ्जान' होकर पीन होने से रात्रिभोजन का निश्चय प्रमा है कल्पनामात्र नहीं है। उसी तरह रावण की अर्धनग्न स्त्रियों के दर्शन से भी निर्विकार रहना और परस्त्रीदर्शन से पाप की शङ्का करना उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य की कल्पना भी प्रमाण ही है। किन्तु सीता के साथ अभिभाषण से धर्म-लोप के भय की शङ्का का कोई प्रश्न ही नहीं है। वहाँ मूल में ही अन्य प्रकार के दोष का स्पष्ट ही वर्णन है। क्योंकि हनुमान् सोचते हैं कि यदि मैं आज ही रात्रि-शेष में सीता को आश्वासन नहीं देता हूँ तो वह निश्चित देह त्याग देंगी। फिर वहाँ राम पूछेंगे कि सीता ने क्या कहा तो मैं उनसे क्या कहूँगा। यदि सेनासहित राम को लङ्का पर चढ़ाई के लिए लाऊँ भी तो सीता के देह त्यागने से वह व्यर्थ ही होगा। मैं सूक्ष्मरूप से वानररूप में मानुषी (नागरिकभाषा) में बोलूँगा। यदि द्विजाति के तुल्य संस्कृत (देवभाषा) में बोलूंगा तो मुझे रावण समझकर सीता शङ्कित होंगी एवं मेरे रूप और भाषण को सुनकर राक्षसों से त्रस्त सीता पुनः त्रास को प्राप्त होंगी। यदि त्रासवशात् मुझे रावण समझकर कुछ शब्द किया तो यमतुल्य शस्त्रास्त्रधारी राक्षस आयेंगे और मेरे वध या ग्रहण का प्रयत्न करेंगे। मेरे विशाल रूप को देखकर शङ्कित होंगे, राक्षसियाँ डरेंगी एवं राक्षसों को बुलायेंगी। मैं राक्षस- बल का निग्रह कर सकता हूँ। परन्तु तत्काल समुद्र पार करने में कठिनाई हो सकती है। मैं निगृहीत हुआ तो सीता का भी कोई लाभ न होगा। हो सकता है हिंसारुचि राक्षस सीता का वध ही कर डालें। युद्ध में मेरे मारे जाने या निगृहीत होने पर दूसरा कोई दिखायी नहीं देता है जो सागर से परिक्षिप्त राक्षसों से परिवारित इस गुप्त लङ्का में स्थित सीता का पता लगा सके। युद्धों में जीत निश्चित नहीं रहती। संशयित पक्ष मुझे नहीं रुचता। निश्चितफलवाले कार्य को कौन विद्वान् संशयित बनाना चाहेगा। सीता से मेरे भाषण से ये पूर्वोक्त दोष हो सकते हैं। परन्तु भाषण करके आश्वासन न देने पर वैदेही का प्राणत्याग संभव है। अयुक्त दूत के कारण सिद्धप्राय कार्य भी देशकालविरुद्ध होने से वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होने पर तम नष्ट हो जाता है। इस प्रसंग में ब्रह्मचर्य-नाश या धर्म-लोप आदि दोष की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अतः बुल्के द्वारा उक्त प्रसंग का प्रकृत में उद्धरण सर्वथा ही असंगत है। अनु० ७०१ में पुनः बुल्के अपनी दुष्कल्पनाओं को प्रमाणित करना चाहते हैं। वे कहते हैं, "रामभक्ति का भाव मध्यकालीन रामसाहित्य में व्याप्त है। अतः यह स्वाभाविक ही था कि आदिरामायण के उत्साही एवं विश्वस्त रामसेवक हनुमान् को उस साहित्य में आदर्श रामभक्त के रूप में प्रस्तुत किया जाय ।" अर्थात् बुल्के की दृष्टि में वस्तुतः हनुमान् रामभक्त नहीं थे। साहित्यिकों ने उन्हें आदर्श रामभक्त के रूप में कल्पित किया है। यह कहा जा चुका है कि आदिरामायण नाम का कोई ग्रन्थ नहीं है। प्रचलित रामायण ही मुख्य रामायण है। उसमें हनुमान् आदर्श भक्तरूप में वर्णित ही हैं और वह वस्तुस्थिति का चित्रण है, मिथ्या कल्पना नहीं है। अतएव शिवपुराण (शतरुद्र- संहिता अ० २०) में हनुमान् को भक्तप्रवर के अतिरिक्त रामभक्ति का प्रवर्तक होने का भी श्रेय दिया गया है। बुल्के का प्रत्येक शब्द आपत्तिजनक है, क्योंकि प्रमाणभूत शिवपुराण आदि के अनुसार हनुमान् श्रेष्ठ रामभक्त हैं और रामभक्ति के प्रचारक भी हैं ही। उन्हें श्रेय कौन दे सकता है— "स्थापयामास भूलोके रामभक्तिं कपीश्वरः । स्वयं भक्तवरो भूत्वा सीतारामसुखप्रदः ॥” स्वयं सीतारामसुखप्रद भक्तवर हनुमान् ने भूलोक में रामभक्ति की स्थापना की। फिर भी रामभक्ति पहले नहीं थी, यह नहीं कहा जा सकता। जैसे व्यास, वसिष्ठ आदि को अनादिसिद्ध वैदिक धर्म का प्रतिष्ठापक माना जाता है वैसे ही हनुमान् भी अनादिसिद्ध रामभक्ति के प्रतिष्ठापक हैं। अतएव बुल्के का यह कहना भी असंगत है कि "हनुमान् की रामभक्ति का प्राचीनतम उल्लेख रामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग ४० में मिलता है," क्योंकि उनकी दृष्टि में ८०

६३४ रामायणमीमांसा एकोनविंश

उत्तरकाण्ड सम्पूर्ण प्रक्षेप ही है। उनकी तथाकथित आदिरामायण भी ई० पू० २०० की है। परन्तु रामभक्ति तो व्यास, वसिष्ठ, वाल्मीकि आदि के समय से ही प्रचलित है। तभी तो व्यास के महाभारत तथा पुराणों एवं रामसम- कालीन वाल्मीकिरामायण में रामभक्ति का उल्लेख है ही। वरप्राप्ति का प्राचीनतम वृत्तान्त रामभक्ति के विषय में मौन है, यह कहना भी निराधार ही है, कारण वाल्मीकिरामायण का वर्तमान रूप ही प्राचीनतम रूप है। उसमें रामभक्ति वरप्राप्ति का उल्लेख है ही। श्रीभागवत, पाञ्चरात्र आदि में भी हनुमान् की रामभक्ति का सर्वाधिक महत्त्व वर्णित है। उनके चिरजी- वित्त्व का उद्देश्य भी भक्ति ही है। अतएव अध्यात्मरामायण उत्तरकाण्ड में रामाभिषेक के अनन्तर हनुमान् यही वरदान मांगते हैं कि मैं निरन्तर रामनाम का स्मरण करते हुए सशरीर जीवित रहूँ— “त्वन्नाम स्मरतो राम न तृप्यति मनो मम। अतस्त्वन्नाम सततं स्मरन् स्थास्यामि भूतले॥ यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम्। मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोऽयं मेऽभिकाङ्क्षितः॥” (अ० रा० ७।१६।१२,१३) हे राम ! आपका नाम स्मरण करते हुए मेरा मन तृप्त नहीं होता। अतः मैं सतत आपका नाम स्मरण करता हुआ भूतल में रहूँगा। राम ! जब तक भूतल में आपका नाम रहेगा तब तक मेरा शरीर बना रहे। यही मुझे वरदान अभीष्ट है। आनन्दरामायण (सारकाण्ड) में कहा गया है— “यत्र तत्र कथा लोके प्रचरिष्यति ते शुभा। तत्र तत्र गतिर्मेऽस्तु श्रवणार्थं सदैव हि॥” (आ० रा० १।१२।१४३) जहाँ-जहाँ संसार में आपकी कथा प्रचारित हो वहाँ-वहाँ कथा-श्रवणार्थ मेरी गति हो। तत्त्वसंग्रहरामायण (५।११) में कहा गया है, जब हनुमान् सीता का पता लगाकर राम के पास पहुँचे तब राम ने उनको हृदय से लगाकर यह आशीर्वाद दिया कि जहाँ कहीं भी मेरे नाम का उच्चारण होगा वहाँ तुम भी उपस्थित रहोगे। अन्त में तुम चतुरानन ब्रह्मा बनकर संसार की सृष्टि करोगे। पश्चात् मुझमें मिल जाओगे। आनन्दरामायण (१।१३।१७६,१७७) के अनुसार ब्रह्मा ने हनुमान् को वरदान दिया कि तुम अमर और अबाधगति होओगे एवं हरिभक्त बनकर विष्णु की सहायता करोगे। भविष्यपुराण में भी इसका उल्लेख है। भविष्यपु० (प्रतिसर्गपर्वखण्ड ४।१३।४६,४७) के अनुसार तपस्या करके हनुमान् ने ब्रह्मा से यह वरदान पाया था कि त्रेतायुग में राम प्रकट होंगे। तुम उनकी भक्ति कर पूर्णकाम हो जाओगे— “तस्य भक्तिञ्च सम्प्राप्य पूर्णकामो भविष्यसि।” श्रीभागवत (५।१९।१-५) के अनुसार हनुमान् हिमालय के किंपुरुषवर्ष में किन्नरों के साथ अविचल भक्तिभाव से राम की उपासना करते रहते हैं। बङ्गाल की राम-कथाओं के अनुसार लक्ष्मण शिव की वाटिका में फल तोड़ने गये थे। वहाँ हनुमान् द्वारपाल थे। उनसे लक्ष्मण का युद्ध हुआ। अन्त में शिव और राम भी आ पहुँचे। उनका भी युद्ध हुआ। शिव ने हनुमान् को राम की सेवा के लिए प्रदान किया। स्कन्दपुराण के अनुसार हनुमान् ने कई स्थलों पर शिवलिङ्गों की स्थापना की थी। पद्मपुराण (पाताल- खण्ड ११०।१७०-१८१) के अनुसार हनुमान् शिव की भक्ति करते हैं। वहाँ राम और शिव की एकता का वर्णन है। शिव और विष्णु की अभिन्नता तथा हनुमान् द्वारा दोनों की उपासना भी पुराणों में वर्णित है।

बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ६।१२८।७८, ७९ ) के अनुसार रामाभिषेक के बाद राम से मिली हुई माला सीता ने हनुमान् को प्रदान की। हनुमान् की रामभक्ति सिद्ध करने के लिए अर्वाचीन साहित्य में इस घटना को एक नवीन रूप दिया गया है। कृत्तिवासरामायण ( ६।१२८ ) के अनुसार हनुमान् ने माला हाथ में लेकर उसे ध्यान से देखा और उसकी बहुमूल्य मणियाँ तोड़कर वे खाने लगे। पूछने पर इस व्यवहार का कारण यह बताया कि इसमें रामनाम अङ्कित नहीं है। अतः मेरी दृष्टि में इसका कोई मूल्य नहीं है। इसपर किसी ने पूछा क्या तुम्हारे शरीर में राम-नाम अङ्कित है। यह सुनकर हनुमान् ने नखों से छाती फाड़कर दिखलाया। उनके शरीर में सर्वत्र रामनाम का उल्लेख था। भावार्थरामायण ( ६।८७ ) के अनुसार माला ग्रहण कर हनुमान् ने विचार किया। इस माला के कारण मेरे हृदय में अहङ्कार उत्पन्न हो सकता है, अतः उन्होंने दांतों से मणियों को फोड़ा और कहा हम वानरों को भोजन से अतिरिक्त क्या चाहिये।" परन्तु मिथ्या भाषण से बचनेवाले भक्त निरर्थक मिथ्या कल्पना से सदा परहेज ही करते हैं। अतः 'नह्यमूलं प्ररोहति' के आधार पर वह कल्पना निर्मूल नहीं है। वाल्मीकिरामायण में इसका विरोध भी नहीं है। बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ७।३९।२६, २७ ) में अयोध्या में वानर सैनिक मधु, मांसादि का सेवन करते हुए मास भर रहे। परन्तु भक्तिलीन होने के कारण उन्हें वह समय मुहूर्त्तमात्र ही प्रतीत हुआ ।” परन्तु वानरों को मांस खाने का संस्कार नहीं होता है। अतः मधु का अर्थ शहद और मांस का अर्थ फलों का भीतर का गूदा ही समझना चाहिये। क्योंकि मद्य में दुर्गन्धि ही होती है सुगन्धि नहीं। किन्तु प्रकृत में सुगन्धिमधुपान का वर्णन है— “ते पिबन्तः सुगन्धीनि मधूनि मधुपिङ्गलाः । मांसानि च सुसृष्टानि मूलानि च फलानि च ॥ एवं तेषां निवस्तां मासः साग्रो ययौ तदा। मुहूर्त्तमिव ते सर्वे रामभक्त्या च मेनिरे ॥” बुल्के कई स्थानों के अनुसार हनुमान् द्वारा राम के उच्छिष्ट खाने और राम के साथ भोजन करने की चर्चा करते हैं। परन्तु यह सब मर्यादापुरुषोत्तम वैदिक वर्णाश्रमी राम की मर्यादा के विरुद्ध होने से कल्पनामात्र ही समझना चाहिये । स्कन्दपुराण ( अवन्तीखण्ड, रेवाखण्ड ८३।२९ ) में शिव ने हनुमान् के नामों को लोकों के कल्याणकारी कहा है— “उपकाराय लोकानां नामानि तव मारुते ।” परन्तु बुल्के हनुमान् के देवत्व को आठवीं ईसवी शती की कल्पना मानते हैं, जो उनका भ्रम ही है। पुराणों का प्रामाण्य और प्राचीनता अच्छी तरह सिद्ध कर दी गयी है। व्यास भगवान् के समय से पूर्व ही हनुमान् के मन्त्र, नाम आदि का जप होता था । अतएव १० वीं तथा १५ वीं शती में हनुमद्भक्ति का पूर्ण विकास हुआ एवं १५ वीं शती में उनकी मूर्ति की पूजा प्रचलित हुई, बुल्के का यह कथन भी अत्यन्त भ्रमपूर्ण ही है; क्योंकि उनका उक्त कथन पुराणों की अर्वाचीनता मानने से ही सङ्गत हो सकता है। पर वह स्वयं ही निर्मूल है। पुराण अनादि हैं, द्वापर के अन्त में व्यास द्वारा उनका आविर्भाव हुआ है। राम का आविर्भाव भी गत त्रेता में न होकर २४ वें त्रेता में हुआ था जो करोड़ों वर्ष पूर्व का काल है। सुतरां हनुमान् की आराधना भी करोड़ों वर्षों से चली आ रही है।

आनन्दरामायण (१।१२) के अनुसार सीता ने हनुमान् को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि विश्वशान्ति के उद्देश्य से गाँव-गाँव में तुम्हारी मूत्ति की पूजा की जायगी— "ग्रामारामपत्तनेषु व्रजखेटकसद्मसु । वनदुर्गपर्वतेषु सर्वदेवालयेषु च ॥ वाटिकोपवनाश्वत्थवटवृन्दावनादिषु । नदीषु क्षेत्रतीर्थेषु जलाशयेपुरेषु च ॥ त्वन्मूत्ति पूजयिष्यन्ति मानवा विघ्नशान्तये । भूतप्रेतपिशाचाद्या नश्यन्ति स्मरणात्तव ।।" (आ० रा० १।१२।१४७-१४९) ग्रामों, उद्यानों, नगरों, गोशालाओं, कसबों, घरों में, वनों, पर्वतों, दुर्गों तथा सभी देवालयों में, नदियों में; क्षेत्रों, तीर्थों, जलाशयों में, पुरों में, वाटिकाओं, उपवनों, अश्वत्थों, वटों तथा वन्दावनादि में विघ्ननिवृत्ति के लिए मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे । तुम्हारे स्मरणमात्र से भूत, प्रेत, पिशाच आदि नष्ट हो जायेंगे । आज सीताजी का यह वरदान प्रत्यक्ष सिद्ध हो रहा है । सर्वत्र हनुमान् की मूर्ति की पूजा चल रही है। भूत, प्रेतों तथा विघ्नों के निवारणार्थ हनुमान् का स्मरण कारगर सिद्ध हो रहा है। कई स्थानों में बड़े बड़े प्रेतराज हनुमान् के सेवक बनकर दुखियों का दुःख दूर कर रहे हैं । इस तरह हनुमान् का देवत्व जाज्वल्यमान है । हनुमान् का संकटमोचन नाम भी प्रसिद्ध है । बुल्के कहते हैं कि प्रायः भूतों और प्रेतों की निवृत्ति के उद्देश्य से ही हनुमत्पूजा होती है। परन्तु यह भी ठीक नहीं है । मुख्य रूप से राम-प्राप्ति के हेतु ही हनुमान् की पूजा की जातो है— "तुम्हरे भजन राम कहँ भावै । जन्म जन्म कर दुख बिसरावै ॥" (हनु० चा०) हनुमान् के ध्यान से राम का ध्यान होता है— "बन्दहुँ पवनकुमार खलबन पावक ज्ञानघन । जासु हृदय आगार वसहिं राम शर चाप धर ॥" (रा० मा० १।१७) "पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित बसहु सदा सुरभूप ॥" (हनु० चा०) आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड १३) के अनुसार राम ने विभीषण को हनुमत्कवच प्रदान किया है। उसमें भूतों एवं ज्वरों से छुटकारा मिलने की चर्चा है । वहीं गरुड़जी राम को कपि (हनुमान्) पूजन का विधान बताते हैं । महामारीनिवृत्त्यर्थ उसका विधान बताते हैं । आनन्दरामायण (राज्यकाण्ड) में सीता ने भी हनुमान् की पूजा की थी— "गोमयेनाञ्जनेयं सा कुड्ये कृत्वाच्यं जानकी । अकरोत् प्रत्यहं पुच्छवृद्धि स्वाङ्गुलिमात्रातः ॥'' क्या राम ने या जानकी ने हनुमान् की पूजा १५ वीं ईसवी में सीखी है। बुल्के स्वयं ही सोचें । पर वे तो इसे कल्पनामात्र कहेंगे, यही दुःसाहस है । लाङ्गलोपनिषद् के अनुसार हनुमान् एकादशरुद्रावतार, श्रीरामसेवक, कुमारब्रह्मचारी एवं सब रोगों और शूलों के निवारक हैं । उन्हें गर्भदोषघ्न, पुत्रपौत्रद भी कहा गया है, यह ठीक ही है । मारुतिस्तव में तो हनुमान् को पापतापसुसमापनतत्पर कहा है, वह भी ठीक ही है । हनुमत्सहस्रनामस्तोत्र में उनको महावीर, सर्वविद्याविशारद, वेद-वेदान्तपारग, रामभक्तिविधायक, पिशाचग्रहघातक, अपस्मारहर आदि के साथ ही साथ संसारभयनाशक, शरणागत-

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३७ वत्सल, भगवान् जगन्नाथ, जगदीश, अनादि, परब्रह्म भी कहा गया हैं और रुद्रावतार होने से उनके वे सब नाम सङ्गत हैं—"एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे" के अनुसार वे ब्रह्मरूप ही हैं। अतएव बुल्के का यह कहना गलत है कि "इन शब्दावलियों को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिये। पूजा की दृष्टि से संकटमोचनरूप ही प्रधान है। भूतों, बीमारियों तथा बाँझपन से छुटकारा पाने के लिए उनकी अधिकतर शरण ली जाती है।" बुल्के की दृष्टि में तो यह भी कल्पना या विश्वासमात्र ही है। पर उनका यह कहना निरर्थक ही है। ७१० वें अनु० में बुल्के अपने मन की दुर्भावनाओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं। "हनूमत्पूजा के कारणों पर विचार करने से विदित होता है कि रुद्रावतार माने जाने के कारण उनके प्रति श्रद्धा जाग्रत् होना स्वाभाविक ही था। किन्तु १० वीं, १५ वीं ईसवी में हनूमद्भक्ति का पूर्ण विकास आश्चर्यजनक ही है। उनकी संकटमोचनरूप में उपासना जो आजकल व्यापक रूप से प्रचलित है, उसका मुख्य आधार रामायण में चित्रित राक्षसों का वध, ओषधिपर्वत का आनयन नहीं, किन्तु उसका मुख्य कारण यह है कि हनुमान् का सम्बन्ध यक्ष-पूजा से स्थापित किया गया था। अत्यन्त प्राचीन काल से गाँव गाँव में यक्षों की पूजा होती थी। वे रक्षक देवता (जातक ५४५), द्वारपाल, सन्तान देनेवाले तथा वृक्षों में निवास करनेवाले (जातक ३०७ और ५०९) माने जाते थे। यक्ष तथा वीर शब्द पर्यायवाची ही हैं। उधर महावीर हनुमान् की ख्याति रामायण की लोकप्रियता द्वारा शताब्दियों से चली आ रही थी। अतः अन्य यक्षों अर्थात् वीरों के साथ हनुमान् की भी पूजा होने लगी। इस अत्यन्त प्राचीन पूजा से सम्बन्ध हो जाने पर हनुमान् की लोकप्रियता बहुत ही बढ़ गयी। उस समय तक जिस उद्देश्य से और जिस रूप में यक्षों की पूजा होती रही अब उसी उद्देश्य और उसी रूप में महावीर हनुमान् की पूजा होने लगी। हनुमान् के संकटमोचन रूप तथा द्वारपालवाला रूप वीरपूजा से सम्बन्ध रखते हैं। प्राचीन वीरपूजा तथा हनूमत्पूजा के उद्देश्यों में जो सादृश्य है वह उपर्युक्त विकास की वास्तविकता सिद्ध करता है। परन्तु डा० वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार आजकल तक हनुमान् की पूजा के दो रूप प्रचलित हैं—एक वीरपूजा या यक्षपूजा जिसमें मूत्ति से सम्बन्ध नहीं होता तथा एक दूसरा रूप जिसमें वानर की मूर्ति है और जो रामकथा पर निर्भर है।" वस्तुतः यह सब बुल्के की अनर्गल अटकल है। उपस्थित प्रत्यक्ष हेतुओं को छोड़कर अनुपस्थित हेतु ढूँढ़ने का कार्य "अव्यापारेषु" व्यापारमात्र है। यदि वीर-पूजा अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित थी तब तो हनूमत्पूजा भी अत्यन्त प्राचीन काल से ही माननी चाहिये, फिर १० वीं १५ वीं ई० में ही आश्चर्यजनक हनूमत्पूजा का पूर्ण विकास हुआ यह क्यों ? यदि यह रामायण का प्रभाव है तो हनुमान् की पूजा में उससे अन्य प्रभाव ढूँढ़ने की क्या आवश्यकता है ? फिर स्कन्दपुराण के १२ नामों की सूची का एक नाम भी यक्षपूजा से सम्बन्ध नहीं रखता। द्वादश नाम निम्नोक्त हैं—हनुमान्, अञ्जनीसुत, वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ट, फाल्गुनगोत्र, पिङ्गाक्ष, अमितविक्रम, उदधिक्रमणश्रेष्ठ, दशग्रीवदर्पहा, लक्ष्मणप्राणदाता तथा सीताशोकनिवर्तन (स्कन्दपु० अवन्तीखण्ड अ० ८३) । आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड १३।८, ९) में भी ये नाम हैं। स्कन्दपुराण के एक अन्य स्थल (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यमा० अ० ३७) में हनुमान् की स्तुति में १९ विशेषण मिलते हैं। उनमें से एक ही सर्वव्याधिहर संकटमोचन रूप से सम्बन्ध रखता है। परन्तु संकटमोचन रूप भी यक्षरूपनिरपेक्ष हनुमान् का ही है। शक्तिघात के समय लक्ष्मण का, अहिरावण की माया के समय राम-लक्ष्मण दोनों का, रावण के आतङ्क से सीता का तथा इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र- प्रयोग के समय राम, लक्ष्मण तथा सभी वानर भालू वीरों का संकट काटने के कारण हनुमान् ही वस्तुतः संकटमोचन- पदवाच्य हैं, न कि बुल्केकल्पित यक्ष । भारतीय वाङ्मय की दृष्टि से वेद अनादि हैं। उन्हीं पर वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायण, पुराण आदि आधारित हैं। इन सद्ग्रन्थों के आधार पर हनुमान् की पूजा अति-प्राचीनकाल से प्रचलित है। यक्षपूजा आदि