रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 697, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें६२० रामायणमीमांसा एकोनविंश हनुमान् का बाल चरित वाल्मीकिरामायण (७।३५) में हनुमान् का बालचरित वर्णित है। राम ने अगस्त्य से प्रश्न करते हुए कहा था कि हनुमान् इतने शक्तिशाली होते हुए वाली के विरुद्ध सुग्रीव की सहायता करने में असमर्थ कैसे रहे ? मेरे विचार में तो हनुमान् अपना बल जानते ही नहीं थे। अगस्त्य ने बतलाया कि मुनियों के शाप से महान् बलवान् हनुमान् अपना बल भूले रहते थे। अगस्त्य ने बताया कि पर्वतराज सुमेरु का राजा केसरी था। उसकी पत्नी अञ्जना में वायुदेवता के तेज से हनुमान् की उत्पत्ति हुई। उत्पन्न होते ही भूख से व्याकुल होकर वह बालक सूर्य को फल समझकर पकड़ने के लिए आकाश में छलांग मारता है। उसे शिशु समझ तथा भावी महत्त्वपूर्ण कार्य-कलाप जानकर सूर्य ने अपने तेज से उसे जलने नहीं दिया। संयोग से उसी दिन सूर्यग्रहण था। राहु सूर्य के पास पहुँचा। वह हनुमान् का आक्रमण देखकर भागा और इन्द्र के पास जाकर उसने शिकायत की कि चन्द्र और सूर्य मेरे भक्ष्य हैं, आपने वे दूसरे को क्यों दे दिये ? आज एक अन्य राहु सूर्य को पकड़ रहा है। इन्द्र ऐरावत पर चढ़कर सूर्य के पास आते हैं। पहले तो हनुमान् सूर्य से बड़ा समझकर राहु की ओर झपटे, राहु इन्द्र को परित्राणार्थ पुकारने लगा। इन्द्र को देख ऐरावत को बड़ा फल समझकर हनुमान् उसपर टूट पड़े। तब इन्द्र ने वज्र-प्रहार किया, जिससे हनुभग्न होने के कारण वे हनुमान् कहलाये। पुत्र को आहत देखकर वायु ने सबके श्वासों को निरुद्ध कर दिया। अन्त में देवता, असुर एवं गन्धर्व सब ने मिलकर ब्रह्मा की शरण ली। ब्रह्मा उन सबके कष्ट का रहस्य प्रकट कर सब को साथ लेकर वायु के पास गये। ब्रह्मा ने अपने स्पर्शमात्र से हनुमान् को स्वस्थ कर दिया। भावी कार्य को ध्यान रख ब्रह्मा ने देवताओं से हनुमान् को वर प्रदान करने को कहा—इन्द्र ने काञ्चन पद्मों की माला प्रदान कर कहा मेरे वज्र से हनुभग्न होने से इसका नाम हनुमान् होगा और वरदान दिया कि अब इसपर वज्र का प्रभाव नहीं पड़ेगा। भगवान् सूर्य ने अपने तेज की शक्ति की १०० वीं कला प्रदान की और अध्ययन के समय शास्त्र- प्रदान का आश्वासन दिया। वरुण ने कहा—मेरे शस्त्रास्त्रों, वर्षा-जल तथा वरुणपाश से इसकी मृत्यु नहीं होगी। यम ने काल-दण्ड से अवध्य होने का वरदान दिया। कुबेर तथा भगवान् शङ्कर ने भी बहुत वर प्रदान किये। विश्वकर्मा ने कहा मेरे द्वारा निर्मित कोई शस्त्रास्त्र तुम पर सफल नहीं होगा। ब्रह्मा ने अजेय, कामचारी, कामरूप, कामग तथा अव्याहतगति, कीर्तिमान् तथा रोमहर्षकरकर्मकारी होने का वरदान दिया। वरदान के बाद हनुमान् ऋषियों के आश्रमों में स्रुव, स्रुक्, वल्कल आदि को अस्त-व्यस्त करने लगे, इस कारण ऋषियों ने मृदु कोप वश हनुमान् को अपना बल भूले रहने का शाप दिया और कहा कि यदि कोई तुम्हारे बल का स्मरण करायेगा तभी तुम्हारा बल प्रकट होगा। वाली और सुग्रीव के विवाद के समय किसी ने उनके बल का स्मरण नहीं कराया। जब समुद्र-लङ्घन का अवसर आया तो जाम्बवान् ने उनके बल का उन्हें स्मरण दिलाया था। पराक्रम, उत्साह, मति, प्रताप, सौशील्य, माधुर्य, नयानय-विज्ञान, गाम्भीर्य, चातुर्य, वीर्य, धैर्य आदि गुणों में हनुमान् की समता कोई भी नहीं कर सकता है। व्याकरण शास्त्र का अध्ययन करने के लिए सूर्य के उन्मुख होकर वे उदयगिरि से लेकर अस्ताचल तक पश्चात्पद चलते थे। वेद, वेदाङ्ग आदि सभी विद्याओं में तथा तपोनिधान में हनुमान् वृहस्पति से भी प्रतिस्पर्धा करते थे। रावण एवं वाली का महत्त्व सुनकर राम ने कहा था कि रावण तथा वाली का बहुत बड़ा बल था तथापि हनुमान् के समान उनका बल नहीं था। शौर्य, दक्षता, बल, धैर्य, प्रज्ञा, नीतिमत्ता, विक्रम तथा प्रभाव बहुत से गुण हनुमान् में ही रहते हैं। जाम्बवान् से आत्मकथा सुनकर हनुमान् विशाल रूप धारण करते हैं एवं समुद्रलङ्घन के लिए उद्यत होकर अपने बल का वर्णन करते हैं।