रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुल्के कहते हैं कि पश्चिमोत्तरीय तथा गौड़ीय पाठों के अनुसार हनुमान् अपनी जन्मकथा का पुनः विवरण कर के अपने पिता केसरी के एक वरदान का उल्लेख करते हैं । पश्चिम समुद्र के तट पर प्रभासतीर्थ में एक महान् गज ऋषियों को तंग किया करता था। केसरी ने उसका वध किया । ऋषियों के अनुरोध से उन्होंने वायु के समान वीर्यवान् कामरूपी अव्यय पुत्र माँगा था। यद्यपि इसमें पुञ्जिक- स्थला का नाम नहीं है। इसमें बालचरित का वर्णन नहीं है। फिर भी वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों की कथाओं का समन्वय कर के ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित है । ब्रह्मपुराण (अध्याय ८४) के अनुसार केसरी की अञ्जना और अद्रिका दो पत्नियाँ थीं । अगस्त्य का आतिथ्यसत्कार कर के दोनों ने उत्तम बलवान् लोकोपकारक पुत्र माँगा । पश्चात् वायु से अञ्जना में हनुमान् तथा निर्ऋति से अद्रिका में पिशाचराज अद्रि की उत्पत्ति होती है। अद्रि गौतमी नदी के किसी तीर्थ में स्नान कराने के लिए अञ्जना को ले गये । वहाँ स्नान करने से अञ्जना, जो पहले अप्सरा थी, मुक्त हो गयी । उस तीर्थ का नाम अञ्जनं अथवा पैशाचं हुआ । अद्रिका को हनुमान् ने किसी दूसरे तीर्थ में स्नान कराया, जिससे वह भी मुक्त हो गयी । उस तीर्थ का नाम मार्जारं अथवा हनुमन्त पड़ा । स्कन्दपुराण के अनुसार शिव की कृपा से हनुमान् को अनेक वर मिले हैं। भविष्यपुराण ( ३।४।१३ ) के अनुसार वज्र से मारे जाने पर हनुमान् ने सूर्य को हाथ से नहीं जाने दिया । सूर्य का आर्त वचन सुनकर रावण आकर हनुमान् की पूँछ खींचने लगा । हनुमान् ने सूर्य को छोड़कर रावण से एक वर्ष पर्यन्त मल्ल युद्ध किया । अन्त में रावण की हार हुई । विश्वा ने आकर रुद्रावतार हनुमान् को तुष्ट किया । आनन्दरामायण ( १।१३।१६४-१६८) तथा भावार्थरामायण ( ७।३५) के अनुसार वायु अपने पुत्र को सूर्य की ओर बढ़ते देखकर उसे प्रचण्ड ताप से बचाने के लिए दौड़े, पर उसे लौटाने में असमर्थ होकर शीतल समीर द्वारा उसे ठंडा करने लगे । सूर्य के पास पहुँचकर सूर्य को निगलते राहु को देखकर पूंछ के प्रहार से हनुमान् ने राहु को अचेत कर दिया । तब केतु राहु की सहायता करने आया, किन्तु हनुमान् ने दोनों को परास्त किया । अन्त में दोनों इन्द्र की शरण में गये । वाल्मीकिरामायण के अनुसार पुराण की कथाओं का समन्वय हो ही जाता है । पउमचरियं के अनुसार आदित्यपुर के पवनञ्जय राजकुमार ने महेन्द्रपुर की राजकुमारी अञ्जना से विवाह किया, किन्तु २२ वर्ष तक पत्नी से उदासीन रहा। जब वह रावण की ओर से वरुण से युद्ध करने गया तब किसी दिन उसका अञ्जना के प्रति अनुराग जाग्रत हुआ । वह गुप्तरूप से उससे मिलने गया । अञ्जना गर्भिणी हुई । अतः सखी वसन्तमाला के साथ निर्वासित होकर किसी गुफा में पुत्र को जन्म देती है। बाद में अञ्जना का मामा प्रतिसूर्यक पुत्र सहित अञ्जना को हनुरुहपुर की ओर ले गया । बालक माता की गोद से उछलकर पर्वत-शिला पर गिरता है । माता ने देखा बालक के गिरने से पर्वत चूर-चूर हो गया। उससे उनका नाम धीशैल हुआ । पवनञ्जय ने अपनी पत्नी के सतीत्व का साक्ष्य दिया। पुत्रसहित अञ्जना ससुराल लौटी । हनुरुहपुर में रहने से बालक का नाम हनुमान् हुआ । गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार प्रभञ्जन ने अपनी पत्नी से अमिततेज नामक पुत्र उत्पन्न किया अमिततेज ने विजय-यात्रा में पर्वत पर दाहिना पैर रख कर बायें से सूर्य पर प्रहार किया । अपना शरीर त्रसरेणु जैसा बनाने से उसका नाम अणुमान् हुआ । यह सब वाल्मीकिरामायण को ही विकृत कर रूपान्तरण किया गया है। जैनों और बौद्धों द्वारा इन कथाओं को विकृत करने में यह भी प्रमाण है कि उन्होंने नगरों, ग्रामों आदि तथा पात्रों के जो नाम गढ़े हैं वे सर्वथा अप्रचलित तथा अव्यवहार्य हैं और उन नगरों और ग्रामों का कहीं अस्तित्व ऐतिहासिक नहीं है जब कि प्राचीन ग्रन्थों में उल्लिखित नगर, ग्राम आदि ज्यों के त्यों अभी तक मिलते हैं ।