भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 699

६२२ रामायणमीमांसा एकोनविंश बुल्के कहते हैं कि शैवपुराणों तथा अर्वाचीन रचनाओं में हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। पर यह उनकी दुष्कल्पना असङ्गत है। पुराण अतिप्राचीन हैं। तदनुसार हनुमान् रुद्रांश या रुद्रावतार ही हैं। विष्णु रावण के नाशार्थ आविर्भूत हुए। तब उनकी सहायता के लिए शिव हनुमान् के रूप में आये। नारदपुराण (पूर्वखण्ड अ० ७९) तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड अ० ६२) में हनुमान् को शिव का अंश कहा गया है। महानाटक (६।२७) में लङ्का को जलते देखकर रावण कहता है—मैंने अपने दस सिर चढ़ाकर दस रुद्रों को प्रसन्न किया था। हनुमान् ११वें रुद्र के अवतार हैं। तत्त्वसंग्रहरामायण (७।२) में हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। कृत्तिवासीय रामायण (६।१२९) के अनुसार सीता रामाभिषेक के बाद हनुमान् को परोस कर तृप्त कराने में असमर्थ हो ध्यान से जानती हैं कि वे रुद्रावतार हैं। आनन्दरामायण (१।११), तुलसीकृत दोहावली (१४२-३), विनयपत्रिका आदि में भी हनुमान् को रुद्रावतार कहा गया है। भविष्यपुराण (प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ. खण्ड १३।३१-३६) में भी केसरी ही हनुमान् के पिता कहे गये हैं। किन्तु रुद्र और वायु सहायक हैं। रावण से त्रस्त देवताओं ने ११ वर्ष शिव की पूजा कर के वर पाया है कि शिव रावण का दमन करने के लिए अवतार लेंगे। अञ्जना गौतम की पुत्री थी। शिव ने रौद्र तेज से केसरी के मुख में प्रवेश किया। केसरी तुरन्त कामातुर हुआ। वायु ने भी केसरीदेह में प्रवेश किया। इस तरह १२ वर्ष तक रमण करने के बाद अञ्जना गर्भिणी हुई और उसने वानरानन पुत्र को जन्म दिया। पुत्र को कुरूप देखकर अञ्जना ने उसे पर्वत से नीचे फेंक दिया। वानरानन पुत्र के फेंकने से भूकम्प हुआ। शिवपुराण (शतरुद्रखण्ड अ० ३९-४२) के अनुसार प्रभञ्जन ने केसरी की पत्नी अञ्जनी से रुद्रावतार हनुमान् को उत्पन्न किया। कथासरित्सागर की कथाओं के अनुसार गौतम अपनी पुत्री को गर्भिणी होने का शाप देते हैं, क्योंकि उसने अपनी माता अहल्या का व्यभिचार प्रकट किया था। शाप सुनकर वह शिव की आराधना करती है। शिव की आज्ञा से नारद ने उसके कान में मन्त्र कह दिया। जिसके प्रभाव से उसने हनुमान् को जन्म दिया। मन्त्र-ग्रहण करते समय वह केसरी नामक वानर की ओर देख रही थी। इसी लिए वानरमुखवाला पुत्र हुआ। रामकियेन के अनुसार उसका नाम स्वाहा था। माता का व्यभिचार प्रकट करने पर माता ने उसको पुत्रप्रसव करने तक एक पैर पर खड़े रहने का शाप दिया था। शिव दयार्द्र होकर अपनी शक्ति तथा अपने अस्त्रों की शक्ति के साथ वायु को स्वाहा के पास भेज कर उसके मुख में रखने का आदेश देते हैं। फलतः तीन महीने के बाद हनुमान् वानर के रूप में स्वाहा के मुख से निकलते हैं। शिवपुराण (शतरुद्रसंहिता अ० २०) के अनुसार विष्णु को मोहिनीरूप में देखकर आविर्भूत शिव-शुक्र को सप्तर्षियों ने अञ्जना के कान में रख दिया। उसी से हनुमान् का जन्म हुआ। सारलादास के महाभारत (वनपर्व) के अनुसार अहल्या ने यह शाप दिया था कि तुम्हारा पुत्र बन्दर होगा। अञ्जना ने विवाह न करने का निश्चय किया। तपस्या करने लगी। उसके शरीर के चारों ओर वल्मीक हो गया। गौतम के अनुरोध से पवन उसे सप्ताह में भोजन देते हैं। उधर विवाह के पश्चात् शिव पशुओं का रूप धारण कर क्रीडा कर रहे थे। वानर-वानरी के रूप में रमण करते समय शिव का तेज पार्वती धारण न कर सकीं। तेज पृथ्वी पर गिर गया। उससे विभिन्न धातुएँ बनीं। शिव ने थोड़ा तेज वायु को दिया। पवन ने उसे अञ्जना को दिया। हनुमान् का जन्म हुआ। दक्षिण की किसी कथा के अनुसार वानर-वानरी के रूप में परमेश्वर और परमेश्वरी की क्रीड़ा से परमेश्वरी गर्भिणी हो गयी। वानर-पुत्र होने की आशङ्का से वायु से कहा कि वह भ्रूण को निकाल कर अन्य स्त्री के पेट में रख दे। वायु ने उस भ्रूण को अञ्जना के गर्भ में पहुँचाया। उसने वानर को प्रसव किया।

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा) · पृष्ठ 699, कुल 1049 में से · BharatKosha