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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

रामायण में अनेक स्थलों पर हनुमान् की प्रशंसा है। सर्वत्र उनकी वीरता एवं विशिष्ट प्रज्ञा का वर्णन है। हनुमान् का देवत्व भी स्वाभाविक ही है। हनुमान् ही क्यों सुग्रीव आदि सभी वानर देवता ही हैं। उपनिषद् में हनुमान् को शिव कहा गया है। उपनिषद् को अर्वाचीन कहना सर्वथा निराधार ही है। हनुमान् का पराक्रम प्रसिद्ध है। वाल्मीकिरामायण में हनुमान् के लिए निम्नोक्त विशेषण प्रयुक्त हैं—वीर, वीर्यवान्, महाबल, महातेज, महाबाहु, महावेग, भीमविक्रम, अरिन्दम, बलवीर्यसंवृत, जितश्रम, वज्रसंहनन, महाकाय, महोत्कट, अमितौज, मारुततुल्यवेग, मारुतवेगविक्रम, मनोजव, मेघस्वन, महास्वन, घननादनिःस्वन, चण्डविक्रम, गरुडानिलविक्रम, रणचण्डविक्रम, अरिमर्दन, शत्रुसैन्यानां निहन्ता आदि। ६८३ वें अनु० में बुल्के यह भी कहते हैं कि "उनके समुद्रलङ्घन की कथा संभवतः किसी आश्चर्यजनक तथा असाधारण लङ्घन के आधार पर उत्पन्न हुई । लङ्कादहन, औषधपर्वत का आनयन, जन्म के बाद ही सूर्य तक छलांग मारना ये वृत्तान्त प्रचलित रामायण में प्रक्षिप्त हैं।" यह सब कथन दुरभिसन्धिपूर्ण इसाइयत मनोवृत्ति का परिचायक है। परन्तु उन्हें ईसा के चमत्कारों में अविश्वास और प्रक्षेप की कल्पना करने का साहस नहीं होता । निश्चित ही वाल्मीकिरामायण अनादि अपौरुषेय वेदों के आधार पर आधारित है। उसमें अप्रामाण्य की शङ्का भी नहीं होती। उपनिषदों में हनुमान् के समुद्रलङ्घन, लङ्का-दहन आदि की चर्चा है। क्या किसी नाले के पार कूद जाने से समुद्रलङ्घन की कल्पना हो सकती है ? जिसने वाल्मीकिरामायण का समुद्रोल्लङ्घन का वर्णन सुना है वह बुल्के के कथन को प्रलाप ही मानेगा ? औषध-पर्वत का आनयन भी साधारण पत्थर लाने का उपचार नहीं है और न ही सूर्य तक छलांग लगाने की कल्पना का कोई लौकिक आधार है। परन्तु दैवी और आसुरी शक्तियों की ओर ध्यान देने से यह असंभव नहीं है। रामकियेन आदि ने भी इन घटनाओं को काल्पनिक नहीं माना है। ईसा ने अन्धे की आँखें दे दी और कुष्ठी को निर्मल काया दी । यदि ईसाइयों के अनुसार यह सत्य है तो अनादि वैदिक धर्म के विशिष्ट पुरुषों में उक्त चमत्कार में कोई आश्चर्य ही नहीं है । बाइबिल आदि ही अर्वाचीन ग्रन्थ हैं। उनके पाठ और वृत्तान्तों के सम्बन्ध में ईसाइयों में ही बहुत मतभेद हैं। बुल्के को चाहिए कि वे अपना घर संभालें। वस्तुतः वेद और रामायण के अध्ययन के वे अधिकारी ही नहीं हैं। उनकी अनधिकार चेष्टा का ही दुष्परिणाम उनकी तथाकथित रामकथा है। अतएव केवल रामायणों में ही नहीं महाभारत आदि में भी हनुमान् के लोकोत्तर पराक्रम का वर्णन है । महाभारत के अनुसार हिमालय के मार्ग में सोये हुए हनुमान् को जगाकर भीम ने उन्हें हट जाने को कहा—हनुमान् ने कहा, लांघकर चले जाओ अन्यथा पूंछ हटाकर चले जाओ । भीम पूंछ हटाने लगे । वे पूंछ को हिलाने में भी समर्थ नहीं हुए। दोनों हाथ लगाने से भी पूंछ टस से मस नहीं हुई। भीम ने समझ लिया कि ये हनुमान् हैं। भीम के अनुरोध पर उन्होंने भीम को समुद्रलङ्घन करनेवाला रूप दिखाया और चतुर्युगीन चातुर्वर्ण्य का उपदेश दिया एवं भावी युद्ध में उन्हें सहायता देने का आश्वासन दिया ( म० भा० ३।१५७।१५०) । इससे भी रामायण की प्राचीनता तथा महाभारत की अर्वाचीनता स्पष्ट सिद्ध है । आनन्दरामायण मनोहरकाण्ड के अनुसार द्वापर के अन्त में अर्जुन की धनुष्कोटि तीर्थ में हनुमान् से भेंट हुई। अर्जुन ने कहा सेतु-निर्माण में व्यर्थ ही परिश्रम हुआ। शरसेतु क्यों नहीं बनाया गया । हनुमान् ने कहा मुझ जैसे वानरों के भार से सेतु डूब जाता । अर्जुन ने कहा मैं अभी सेतु बनाता हूँ यदि वह आपके भार से डूब जाय तो मैं अग्निप्रवेश करूँगा। हनुमान् ने भी कहा—यदि मेरे भार से सेतु न टूटा न तो मैं आपकी ध्वजा पर बैठकर सहायता करूँगा । अर्जुन ने शतयोजन सेतु का निर्माण कर दिया । हनुमान् ने अपने अँगूठे से ही सेतु भग्न कर दिया । अर्जुन ७९