भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 701

६२४ रामायणमीमांसा एकोनविंश उनका ऐन्द्रजालिक या विद्याधर होना वायुपुत्र शब्द से कथमपि सिद्ध नहीं होता। जैनकथा भी रामायणीय कथा पर जहाँ तक निर्भर है वहीं तक मान्य है। रामायण विरोधी अंश सभी त्याज्य हैं। बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है कि ८ वीं या १० वीं शती से हनुमान् शिव के अवतार माने जाते हैं, क्योंकि पुराण कम से कम व्यास-काल के हैं जो कि ईसा से तीन हजार वर्ष से अधिक प्राचीन हैं। यह कहना भी गलत है कि रामायण की आधिकारिक कथावस्तु में शिव के लिए कोई स्थान नहीं है, क्योंकि रामायण में शिव के रामेश्वर-प्रसाद की चर्चा है। दशरथ के साथ शिवजी प्रकट होकर राम को विविध आशीर्वाद देते हैं। जब पुराणों के अनुसार हनुमान् रुद्रावतार हैं यह वस्तुस्थिति है, तब शैवों ने हनुमान् को रुद्रावतार मान लिया यह कहना प्रलापमात्र ही है। उपनिषद्ग्रन्थ वेद हैं। रामरहस्योपनिषद् में हनुमान् को शिव, सुग्रीव को विष्णु और जाम्बवान् को ब्रह्मा कहा गया है। ६८० वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "हनुमान् वानरगोत्रीय आदिवासी थे। किन्तु आगे चलकर उन्हें राम-कथा के अन्य आदिवासियों के समान वानर भी माना गया है। प्रचलित रामायण में हनुमान् के वानरत्वविषयक विशेषणों का बाहुल्य देखकर प्रतीत होता है कि वाल्मीकि के समय के पूर्व ही यह धारणा मान्यता प्राप्त करने लगी थी कि वे सब वस्तुतः वानर थे। फिर भी रामायण के वानर मनुष्यों की तरह बुद्धिमान् थे तथा मानवभाषा बोलते थे, कपड़े पहनते थे, घरों में रहते थे, विवाह-संस्कार को मान्यता देते थे एवं राजा का शासन मानते थे। अतः कवि की दृष्टि से वे निरे वानर नहीं थे। उनकी अपनी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था थी। अतः वे वास्तव में एक मानवजनजाति ही थे।" परन्तु बुल्के का उक्त कथन उनकी कल्पना पर ही निर्भर है, प्रामाणिक नहीं है। विद्या, बुद्धिमत्ता तथा पराक्रम हनुमान्, सुग्रीव आदि वास्तव में ही वानर थे। वाल्मीकिरामायण से यही सिद्ध है, अन्यथा पुच्छ आदि भी सब काल्पनिक ही मानने पड़ेंगे। जिसे किसी भी अंश को क्षेपक कहने में कुछ संकोच नहीं, वही ऐसी निराधार कल्पना कर सकता है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार भी वे सामान्य वानर थे, किन्तु ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, सूर्य आदि देवता हो रावण आदि राक्षसों के वधार्थ वास्तव में वानरों के रूप में उत्पन्न हुए थे। अतएव उनकी मानवों जैसी ही नहीं मानवों से भी अत्यन्त उत्कृष्ट बुद्धि थी तथा उनमें उत्कृष्ट बल था। वे विद्वान् वेदज्ञ भी थे। यह सब रामायण से ही सिद्ध है। जैसे ब्रज की गोपिकाएँ कोई सामान्य गोपिकाएँ नहीं हैं, वे विशिष्ट शक्तिरूपा हैं उसी तरह इन विशिष्ट अवतारी वानरों को भी समझना चाहिए। वे निरे वानर नहीं थे। उनकी धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था थी, यह सब ठीक है। वाल्मीकिरामायण में हनुमान् को सुग्रीव का पराक्रमी तथा बुद्धिमान् मन्त्री माना गया है। सर्वत्र ही रामसाहित्य में हनुमान् के पराक्रम तथा बुद्धिमत्ता को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। महाभारत के वनपर्व में भीम हनुमान् का परिचय देते हुए कहते हैं— “भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः । रामायणेऽतिविख्यातो शूरो वानरपुङ्गवः ॥” ( १११।४७ ) मेरा भ्राता गुणों से श्लाघ्य, बुद्धि, सत्त्व और बल से युक्त वानरपुङ्गव हनुमान् रामायण में अति विख्यात है। यह श्लोक भी रामायण पहले और महाभारत बाद का है इसमें प्रबल प्रमाण है। अतः कुछ पाश्चात्यों का तथा उनके अनुयायियों का महाभारत को रामायण से पुराना मानना निरा भ्रम ही है।