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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 709, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 709

६३२ रामायणमीमांसा एकोनविंश कहा जाता है कि हनुमान् ने किसी ऋषि के पास कौपीनमात्र छोड़कर उसका सर्वस्व लूट लिया था । ऋषि ने शाप दिया कि तुम्हारे पास भी कौपीन के अतिरिक्त कुछ न रहेगा । पुराणादि शास्त्रों के अनुसार हनुमान् का अखण्ड ब्रह्मचर्य प्रमाणित है । स्कन्द, हनुमान्, भीष्म आदि शास्त्रों में मुख्य ब्रह्मचारी गिने गये हैं । इसके विरुद्ध पउमचरियं तथा रामकियेन आदि में वर्णित हनुमान् का अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध विकृति ही समझना चाहिये । वाल्मीकिरामायण (६।१२५।४४) के अनुसार विजयी राम के प्रत्यागमन का समाचार सुनकर भरत ने दस हजार गायों, सैकड़ों ग्रामों के अतिरिक्त दिव्यरूप भूषणसम्पन्ना १६ कन्याएँ भी पत्नीरूप में हनुमान् को प्रदान की थीं । “सकुण्डलाः शुभाचारा भार्याः कन्यास्तु षोडश ।” परन्तु हर्षाद्रेक में भरत ने हनुमान् के लिए उक्त वस्तुएँ प्रदान कीं । इससे यह नहीं सिद्ध होता कि हनुमान् ने उन वस्तुओं को रख लिया । भागवत आदि ग्रन्थों के अनुसार राम आदि ने यज्ञ में ब्राह्मणों को समस्त भूमण्डल का दान दिया था । परन्तु ब्राह्मणों ने उसे स्वीकार नहीं किया । अतः हनुमान् के निमित्त उक्त वस्तुएँ प्रदान की गयीं । हनुमान् ने उन्हें अन्य अधिकारियों को प्रदान कर दिया होगा । पूर्वोक्त वचनों के साथ समन्वय करने से यही अर्थ निश्चित होता है । जैसे आज भी देवता तृप्त्यर्थ ब्राह्मणभोजन कराया जाता है । देवता को ग्रामादि समर्पण किये जाते हैं । उसी तरह भरत ने हनुमान् के निमित्त ग्राम आदि प्रदान किये थे । ७०० वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “हनुमान् की अन्य विशेताओं की भाँति ब्रह्मचर्य का मूल स्रोत वाल्मीकिरामायण को माना जा सकता है । रावण के अन्तःपुर में प्रविष्ट होकर वहाँ सुप्त अर्धनग्न स्त्रियों को निहार कर उनके सुव्यवस्थित मन में कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ— “कामं दृष्टा या सर्वा विश्वस्ता रावणस्त्रियः । न तु मे मनसः किञ्चिद्वैकृत्यमुपपद्यते ॥ मनो हि.........................मे सुव्यवस्थितम् ।” ( वा० रा० ५।४१, ४२ ) हनुमान् के संयम तथा धार्मिकता की दृष्टि से वाल्मीकिरामायण में उनके लिए महात्मा, महामनाः, संस्कारसम्पन्नः, कृतात्मा आदि विशेषण मिलते हैं । रावण के अन्तःपुर में प्रवेश करने पर उनको पाप की शङ्का होती है : “जगाम महतीं शङ्कां धर्मसाध्वसशङ्कितः ।” धर्मलोप निमित्त भय से शङ्कित हो वे महती शङ्का को प्राप्त हुए । ये सब बातें धार्मिक ब्रह्मचारी के ही मन में आ सकती हैं । आगे फिर बुल्के कहते हैं— “एष दोषो महान् हि स्यान्मम सीताभिभाषणे ।” ( वा० रा० ५।३०।३८ ) सीता के साथ बातचीत करने के कारण अपने को दोषी मानते हैं । अतः बहुत संभव है कि वाल्मीकि- रामायण में जो पापशङ्कालु तथा संयमी हनुमान् का चित्र प्रस्तुत किया गया है उसी के आधार पर उनके ब्रह्मचर्य की कल्पना की गयी है ।” बुल्के की पहले की बातें तो कुछ संगत सी थीं, परन्तु उनका निष्कर्ष उन्होंने गलत निकाला है । वस्तुतः उससे तो यह निष्कर्ष निकालना उचित है कि उक्त वचन उनके अखण्ड ब्रह्मचारी होने में प्रमाण हैं, क्योंकि धार्मिक ब्रह्मचारी पापभीरु के मन में ही इस प्रकार की बातें उठ सकती हैं । परन्तु यह नहीं कि उक्त पापशङ्कालु आदि होने के कारण पीछे से उनके अखण्ड ब्रह्मचारी होने की कल्पना कर ली गयी है ।

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