भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 708

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३१ जाता है। अतः वरदानों को विकास या कल्पना कहना भारी भूल ही है। जहाँ राम-कथा होती है वहाँ हनुमान् रहते हैं, यह विश्वास न होकर वस्तुस्थिति है ।। रामायण की अनुष्ठान-परम्परा में यह पाठ मिलता — “यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् । बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥” जहाँ-जहाँ रघुनाथ के गुणों, नामों तथा कथाओं का कीर्तन होता है वहाँ-वहाँ हाथ जोड़े, सिर झुकाये तथा बाष्पजल से परिपूर्णलोचन राक्षसान्तक हनुमान् विराजमान रहते हैं, उन्हें नमस्कार करो । ब्रह्मचर्य ६९६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “महीरावण की कथा में हनुमान् के एक पुत्र का उल्लेख है । लङ्का- दहन के अनन्तर समुद्र में स्नान करते समय हनुमान् का स्वेद अथवा श्लेष्मा निगलकर कोई मछली गर्भिणी हो गयी । उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ । मैरावणचरितम् (अ० १० ) के अनुसार उस पुत्र का नाम मत्स्यराज है । वह हनुमान् को अपना परिचय देते हुए कहता है— “तिमिङ्गिला हि मन्माता पिता च हनुमान् ।” हनुमान् यह कहकर आपत्ति करते हैं— “हनुमान् ब्रह्मचारीति विख्यातं भुवनेष्वपि ।” अतः पूर्वोक्त प्रसङ्ग से भी ब्रह्मचर्य में कोई बाधा नहीं । हनुमान् का ब्रह्मचर्य स्कन्दपुराण ( अवन्तीखण्ड अ० ८० ) से भी सिद्ध है । वहाँ का शिवलिङ्ग हनुमान् के ब्रह्मचर्य के प्रभाव से तथा ईश्वर के प्रसाद से कामप्रद है— “यद्यहं ब्रह्मचर्यञ्च जन्मपर्यन्तमुद्यतः । ईश्वरस्य प्रसादेन लिङ्गं कामप्रदं हि तत् ॥ (पद्मपु० पातालख० ४५।३१) पद्मपुराण रामाश्वमेध-वृत्तान्त में हनुमान् अपने को आजीवन ब्रह्मचारी कहते हैं— “आत्मयोगबलेनैव ब्रह्मचर्यप्रभावतः । पालयामि तदा वीर ! शत्रुघ्नो जीवतु क्षणात् ॥ (स्कन्दपु० अव०ख० ८३।३३) यदि मैंने जन्म से लेकर जीवनपर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन किया है तो क्षणभर में ही शत्रुघ्न जीवित हो जायें । पुराण परम प्रमाण हैं । लाङ्गूलोपनिद् ( अड्यारसंस्करण, पृ० २१३ ) तथा आनन्दरामायण ( मनोहरकाण्ड सर्ग १३ ) में हनुमान् को कुमारब्रह्मचारी कहा गया है। हनुमत्सहस्रनामस्तोत्र में ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय आदि नाम आये हैं। तुलसीदास ने हनुमान् को मन्मथमथन तथा ऊर्ध्वरेता कहा है । इस सम्बन्ध में उनके प्राकृतिक कौपीन का उल्लेख मिलता है। उड़िया महाभारत वनपर्व के अनुसार हनुमान् ने माता से कहा, जब तक मुझे वज्रकौपीन न मिले मैं जन्म नहीं लूँगा । पवन ने यह समाचार शिव को सुनाया । शिव ने अञ्जना को खिलाने के लिए कपड़े दिये । उसके फलस्वरूप हनुमान् ने कौपीन पहने हुए ही जन्म लिया । अर्जुनदासकृत रामविभा में भी ऐसी ही कथा है । भावार्थरामायण के अनुसार कौपीनयुक्त ही हनुमान् का जन्म हुआ ( ७।३५ ) । पद्मपुराण (पातालखण्ड ११२,१३५ में) हनुमान् को सुदृढ़बद्धमोञ्जीकौपीन और श्रीमन्मारुतिस्तव- राज में कौपीनधारी कहा गया है ।