भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 707

६३० रामायणमीमांसा एकोनविंश उत्तरकाण्ड के ४० वें सर्ग में यह प्रसङ्ग विस्तृत रूप से वर्णित है। महाभारत में हनुमान् ने कहा था कि हिमालय के जिस स्थान पर वे रहते हैं वहाँ गन्धर्वादि रामचरित गाया करते हैं। बुल्के कहते हैं कि “अब रामचरित का यह गान वरदान का रूप धारण कर लेता है।” परन्तु यह बुल्के की भ्रान्ति ही है, क्योंकि रामायण की बात ही पहली है। महाभारत का रामोपाख्यान तो उसी का संक्षेप है। अतः वरप्रदान की चर्चा न करके महाभारत में परिस्थितिमात्र का वर्णन किया गया है। रामायण की मूल बात यही है कि अभिषेक के बाद अयोध्या से बिदा लेते समय हनुमान् राम से चिरजीवित्वपूर्वक रामकथाश्रवण तथा रामभक्ति का वरदान मांगते हैं— “स्नेहो मे परमो राजंस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा । भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ॥ यावद्रामकथा वीर चरिष्यति महीतले । तावच्छरीरे वत्स्यन्तु मम प्राणा न संशयः ॥ यच्च