भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 706

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२९ हनुमत्संहिता के अनुसार हनुमान राम की चारुशीलानामक प्रधान सखी के रूप में अगस्त्य को भक्ति की शिक्षा देते हैं। शिवसंहिता में हनुमान् और अगस्त्य के संवादरूप में तत्त्वज्ञान वर्णित है। दि बंगाली रामायण्स पृ० ५१ के अनुसार हनुमान् ज्योतिषी एवं संगीतज्ञ भी थे। परन्तु यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। महाभारत के भीम और हनुमान् के संवाद के अनुसार हनुमान् गन्धर्वों एवं अप्सराओं से रामायण का गान नित्य ही सुनते रहते हैं। तुलसीदास ने भी विनयपत्रिका में 'गानगुनगरवगन्धर्वजेता' कहा है। सामगायक, सामगानाग्रणी आदि भी उन्हें कहा है। यह सब कोरी कल्पना नहीं है। ऋषि, महर्षि, सन्त, सत्यवक्ता लोग मिथ्या भावना या कल्पना की सृष्टि नहीं करते हैं। रामकथाओं में हनुमान् के महायशा, कीर्तिमान्, यशस्वी, चिरञ्जीवी होने का भी वर्णन है। बुल्के अनु० ६९३ में कहते हैं कि "महाभारत का रामोपाख्यान रामायण के किसी प्राचीन रूप पर निर्भर है। उसमें राम अथवा देवताओं द्वारा हनुमान् को प्रदत्त किसी वरदान का उल्लेख नहीं है।" पर यह भी उनकी भ्रान्ति ही है। महाभारत रामोपाख्यान तथाकथित किसी अन्य रामायण पर नहीं प्रचलित वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर है। परन्तु वह संक्षेप है, अतः प्रचलित रामायण की सभी बातों का उसमें समावेश न होना स्वाभाविक ही है। “रामकीर्त्या समं पुत्र ! जीवितं ते भविष्यति ।” ( म० भा० ३।२७५।४३ ) सीता ने कहा है—पुत्र ! रामकीर्ति के समान ही तुम्हारा भी जीवन अमर रहेगा। बुल्के अपनी दुष्कल्पना के अनुसार कहते हैं कि “बहुत संभव है, इस उक्ति के अनुसार हनुमान् के विषय में यह माना जाने लगा कि जीवित रहकर हनुमान् हिमालय पर निवास करते हैं। इस विश्वास का प्राचीनतम उल्लेख हनुमान् और भीम के संवाद में सुरक्षित है। जिसमें हनुमान् कहते हैं कि मैंने राम से यह वरदान माँगा था कि जब तक रामकथा पृथ्वी पर प्रचलित रहेगी तब तक मैं जीवित रहूँ ( म० भा० ३।१४७।३७ ) । पर हनुमान् यह भी कहते हैं—इस स्थान पर अप्सराएँ तथा गन्धर्व रामचरित गाकर मुझे आनन्दित करते रहते हैं। रामोपाख्यान का सहारा लेकर बुल्के प्रचलित रामायण को अर्वाचीन एवं प्रक्षेपपूर्ण कहते हैं। परन्तु मौके पर रामोपाख्यान को भी किसी विश्वासमात्र पर निर्भर मान लेते हैं। आश्चर्य है ऐसे पूर्वापर विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करके बुल्के अपना और दूसरों का समय नष्ट करने में क्यों प्रवृत्त हुए ? वस्तुतः— “यावद्रामकथा वीर भवेल्लोकेषु शत्रुहन् । तावज्जीवेयमित्येवं तथास्त्विति च सोऽब्रवीत् ।।'' (वा० रा० ३।१४७।३७) जब इस तरह रामोपाख्यान में भी राम के वरदान का उल्लेख है ही तब यह कैसे कहा जाय कि मूल- रामायण में हनुमान् को प्रदत्त किसी वरदान की बात नहीं थी। जैसे राम अनन्त हैं वैसे रामकथा भी अनन्त है। तदनुसार हनुमान् का जीवन भी अनन्त ही है। रामायण में भी यही कहा गया है— “मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर । तावद्रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन् ।।'' ( वा० रा० ७।१०८।३० ) रामायण उत्तरकाण्ड में राम द्वारा हनुमान् को दो बार वरदान देने का उल्लेख है। स्वर्गारोहण के पूर्व राम कहते हैं—हरीश्वर ! लोक में जब तक मेरी कथाएँ प्रचलित रहेंगी तब तक तुम मेरी आज्ञा का पालन करते हुए सुप्रसन्न होकर मेरी कथा में रमण करो— “मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर । तावद्रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन् ।।'' ( वा० रा० ७।१०८।३० ) ।