भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 710, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 710

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३३ अर्थापत्ति प्रमाण द्वारा निश्चित अर्थ कल्पनामात्र नहीं होता । जैसे 'दिवा अभुञ्जान' होकर पीन होने से रात्रिभोजन का निश्चय प्रमा है कल्पनामात्र नहीं है। उसी तरह रावण की अर्धनग्न स्त्रियों के दर्शन से भी निर्विकार रहना और परस्त्रीदर्शन से पाप की शङ्का करना उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य की कल्पना भी प्रमाण ही है। किन्तु सीता के साथ अभिभाषण से धर्म-लोप के भय की शङ्का का कोई प्रश्न ही नहीं है। वहाँ मूल में ही अन्य प्रकार के दोष का स्पष्ट ही वर्णन है। क्योंकि हनुमान् सोचते हैं कि यदि मैं आज ही रात्रि-शेष में सीता को आश्वासन नहीं देता हूँ तो वह निश्चित देह त्याग देंगी। फिर वहाँ राम पूछेंगे कि सीता ने क्या कहा तो मैं उनसे क्या कहूँगा। यदि सेनासहित राम को लङ्का पर चढ़ाई के लिए लाऊँ भी तो सीता के देह त्यागने से वह व्यर्थ ही होगा। मैं सूक्ष्मरूप से वानररूप में मानुषी (नागरिकभाषा) में बोलूँगा। यदि द्विजाति के तुल्य संस्कृत (देवभाषा) में बोलूंगा तो मुझे रावण समझकर सीता शङ्कित होंगी एवं मेरे रूप और भाषण को सुनकर राक्षसों से त्रस्त सीता पुनः त्रास को प्राप्त होंगी। यदि त्रासवशात् मुझे रावण समझकर कुछ शब्द किया तो यमतुल्य शस्त्रास्त्रधारी राक्षस आयेंगे और मेरे वध या ग्रहण का प्रयत्न करेंगे। मेरे विशाल रूप को देखकर शङ्कित होंगे, राक्षसियाँ डरेंगी एवं राक्षसों को बुलायेंगी। मैं राक्षस- बल का निग्रह कर सकता हूँ। परन्तु तत्काल समुद्र पार करने में कठिनाई हो सकती है। मैं निगृहीत हुआ तो सीता का भी कोई लाभ न होगा। हो सकता है हिंसारुचि राक्षस सीता का वध ही कर डालें। युद्ध में मेरे मारे जाने या निगृहीत होने पर दूसरा कोई दिखायी नहीं देता है जो सागर से परिक्षिप्त राक्षसों से परिवारित इस गुप्त लङ्का में स्थित सीता का पता लगा सके। युद्धों में जीत निश्चित नहीं रहती। संशयित पक्ष मुझे नहीं रुचता। निश्चितफलवाले कार्य को कौन विद्वान् संशयित बनाना चाहेगा। सीता से मेरे भाषण से ये पूर्वोक्त दोष हो सकते हैं। परन्तु भाषण करके आश्वासन न देने पर वैदेही का प्राणत्याग संभव है। अयुक्त दूत के कारण सिद्धप्राय कार्य भी देशकालविरुद्ध होने से वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होने पर तम नष्ट हो जाता है। इस प्रसंग में ब्रह्मचर्य-नाश या धर्म-लोप आदि दोष की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अतः बुल्के द्वारा उक्त प्रसंग का प्रकृत में उद्धरण सर्वथा ही असंगत है। अनु० ७०१ में पुनः बुल्के अपनी दुष्कल्पनाओं को प्रमाणित करना चाहते हैं। वे कहते हैं, "रामभक्ति का भाव मध्यकालीन रामसाहित्य में व्याप्त है। अतः यह स्वाभाविक ही था कि आदिरामायण के उत्साही एवं विश्वस्त रामसेवक हनुमान् को उस साहित्य में आदर्श रामभक्त के रूप में प्रस्तुत किया जाय ।" अर्थात् बुल्के की दृष्टि में वस्तुतः हनुमान् रामभक्त नहीं थे। साहित्यिकों ने उन्हें आदर्श रामभक्त के रूप में कल्पित किया है। यह कहा जा चुका है कि आदिरामायण नाम का कोई ग्रन्थ नहीं है। प्रचलित रामायण ही मुख्य रामायण है। उसमें हनुमान् आदर्श भक्तरूप में वर्णित ही हैं और वह वस्तुस्थिति का चित्रण है, मिथ्या कल्पना नहीं है। अतएव शिवपुराण (शतरुद्र- संहिता अ० २०) में हनुमान् को भक्तप्रवर के अतिरिक्त रामभक्ति का प्रवर्तक होने का भी श्रेय दिया गया है। बुल्के का प्रत्येक शब्द आपत्तिजनक है, क्योंकि प्रमाणभूत शिवपुराण आदि के अनुसार हनुमान् श्रेष्ठ रामभक्त हैं और रामभक्ति के प्रचारक भी हैं ही। उन्हें श्रेय कौन दे सकता है— "स्थापयामास भूलोके रामभक्तिं कपीश्वरः । स्वयं भक्तवरो भूत्वा सीतारामसुखप्रदः ॥” स्वयं सीतारामसुखप्रद भक्तवर हनुमान् ने भूलोक में रामभक्ति की स्थापना की। फिर भी रामभक्ति पहले नहीं थी, यह नहीं कहा जा सकता। जैसे व्यास, वसिष्ठ आदि को अनादिसिद्ध वैदिक धर्म का प्रतिष्ठापक माना जाता है वैसे ही हनुमान् भी अनादिसिद्ध रामभक्ति के प्रतिष्ठापक हैं। अतएव बुल्के का यह कहना भी असंगत है कि "हनुमान् की रामभक्ति का प्राचीनतम उल्लेख रामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग ४० में मिलता है," क्योंकि उनकी दृष्टि में ८०

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