भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६३४ रामायणमीमांसा एकोनविंश

उत्तरकाण्ड सम्पूर्ण प्रक्षेप ही है। उनकी तथाकथित आदिरामायण भी ई० पू० २०० की है। परन्तु रामभक्ति तो व्यास, वसिष्ठ, वाल्मीकि आदि के समय से ही प्रचलित है। तभी तो व्यास के महाभारत तथा पुराणों एवं रामसम- कालीन वाल्मीकिरामायण में रामभक्ति का उल्लेख है ही। वरप्राप्ति का प्राचीनतम वृत्तान्त रामभक्ति के विषय में मौन है, यह कहना भी निराधार ही है, कारण वाल्मीकिरामायण का वर्तमान रूप ही प्राचीनतम रूप है। उसमें रामभक्ति वरप्राप्ति का उल्लेख है ही। श्रीभागवत, पाञ्चरात्र आदि में भी हनुमान् की रामभक्ति का सर्वाधिक महत्त्व वर्णित है। उनके चिरजी- वित्त्व का उद्देश्य भी भक्ति ही है। अतएव अध्यात्मरामायण उत्तरकाण्ड में रामाभिषेक के अनन्तर हनुमान् यही वरदान मांगते हैं कि मैं निरन्तर रामनाम का स्मरण करते हुए सशरीर जीवित रहूँ— “त्वन्नाम स्मरतो राम न तृप्यति मनो मम। अतस्त्वन्नाम सततं स्मरन् स्थास्यामि भूतले॥ यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम्। मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोऽयं मेऽभिकाङ्क्षितः॥” (अ० रा० ७।१६।१२,१३) हे राम ! आपका नाम स्मरण करते हुए मेरा मन तृप्त नहीं होता। अतः मैं सतत आपका नाम स्मरण करता हुआ भूतल में रहूँगा। राम ! जब तक भूतल में आपका नाम रहेगा तब तक मेरा शरीर बना रहे। यही मुझे वरदान अभीष्ट है। आनन्दरामायण (सारकाण्ड) में कहा गया है— “यत्र तत्र कथा लोके प्रचरिष्यति ते शुभा। तत्र तत्र गतिर्मेऽस्तु श्रवणार्थं सदैव हि॥” (आ० रा० १।१२।१४३) जहाँ-जहाँ संसार में आपकी कथा प्रचारित हो वहाँ-वहाँ कथा-श्रवणार्थ मेरी गति हो। तत्त्वसंग्रहरामायण (५।११) में कहा गया है, जब हनुमान् सीता का पता लगाकर राम के पास पहुँचे तब राम ने उनको हृदय से लगाकर यह आशीर्वाद दिया कि जहाँ कहीं भी मेरे नाम का उच्चारण होगा वहाँ तुम भी उपस्थित रहोगे। अन्त में तुम चतुरानन ब्रह्मा बनकर संसार की सृष्टि करोगे। पश्चात् मुझमें मिल जाओगे। आनन्दरामायण (१।१३।१७६,१७७) के अनुसार ब्रह्मा ने हनुमान् को वरदान दिया कि तुम अमर और अबाधगति होओगे एवं हरिभक्त बनकर विष्णु की सहायता करोगे। भविष्यपुराण में भी इसका उल्लेख है। भविष्यपु० (प्रतिसर्गपर्वखण्ड ४।१३।४६,४७) के अनुसार तपस्या करके हनुमान् ने ब्रह्मा से यह वरदान पाया था कि त्रेतायुग में राम प्रकट होंगे। तुम उनकी भक्ति कर पूर्णकाम हो जाओगे— “तस्य भक्तिञ्च सम्प्राप्य पूर्णकामो भविष्यसि।” श्रीभागवत (५।१९।१-५) के अनुसार हनुमान् हिमालय के किंपुरुषवर्ष में किन्नरों के साथ अविचल भक्तिभाव से राम की उपासना करते रहते हैं। बङ्गाल की राम-कथाओं के अनुसार लक्ष्मण शिव की वाटिका में फल तोड़ने गये थे। वहाँ हनुमान् द्वारपाल थे। उनसे लक्ष्मण का युद्ध हुआ। अन्त में शिव और राम भी आ पहुँचे। उनका भी युद्ध हुआ। शिव ने हनुमान् को राम की सेवा के लिए प्रदान किया। स्कन्दपुराण के अनुसार हनुमान् ने कई स्थलों पर शिवलिङ्गों की स्थापना की थी। पद्मपुराण (पाताल- खण्ड ११०।१७०-१८१) के अनुसार हनुमान् शिव की भक्ति करते हैं। वहाँ राम और शिव की एकता का वर्णन है। शिव और विष्णु की अभिन्नता तथा हनुमान् द्वारा दोनों की उपासना भी पुराणों में वर्णित है।