रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ६।१२८।७८, ७९ ) के अनुसार रामाभिषेक के बाद राम से मिली हुई माला सीता ने हनुमान् को प्रदान की। हनुमान् की रामभक्ति सिद्ध करने के लिए अर्वाचीन साहित्य में इस घटना को एक नवीन रूप दिया गया है। कृत्तिवासरामायण ( ६।१२८ ) के अनुसार हनुमान् ने माला हाथ में लेकर उसे ध्यान से देखा और उसकी बहुमूल्य मणियाँ तोड़कर वे खाने लगे। पूछने पर इस व्यवहार का कारण यह बताया कि इसमें रामनाम अङ्कित नहीं है। अतः मेरी दृष्टि में इसका कोई मूल्य नहीं है। इसपर किसी ने पूछा क्या तुम्हारे शरीर में राम-नाम अङ्कित है। यह सुनकर हनुमान् ने नखों से छाती फाड़कर दिखलाया। उनके शरीर में सर्वत्र रामनाम का उल्लेख था। भावार्थरामायण ( ६।८७ ) के अनुसार माला ग्रहण कर हनुमान् ने विचार किया। इस माला के कारण मेरे हृदय में अहङ्कार उत्पन्न हो सकता है, अतः उन्होंने दांतों से मणियों को फोड़ा और कहा हम वानरों को भोजन से अतिरिक्त क्या चाहिये।" परन्तु मिथ्या भाषण से बचनेवाले भक्त निरर्थक मिथ्या कल्पना से सदा परहेज ही करते हैं। अतः 'नह्यमूलं प्ररोहति' के आधार पर वह कल्पना निर्मूल नहीं है। वाल्मीकिरामायण में इसका विरोध भी नहीं है। बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ७।३९।२६, २७ ) में अयोध्या में वानर सैनिक मधु, मांसादि का सेवन करते हुए मास भर रहे। परन्तु भक्तिलीन होने के कारण उन्हें वह समय मुहूर्त्तमात्र ही प्रतीत हुआ ।” परन्तु वानरों को मांस खाने का संस्कार नहीं होता है। अतः मधु का अर्थ शहद और मांस का अर्थ फलों का भीतर का गूदा ही समझना चाहिये। क्योंकि मद्य में दुर्गन्धि ही होती है सुगन्धि नहीं। किन्तु प्रकृत में सुगन्धिमधुपान का वर्णन है— “ते पिबन्तः सुगन्धीनि मधूनि मधुपिङ्गलाः । मांसानि च सुसृष्टानि मूलानि च फलानि च ॥ एवं तेषां निवस्तां मासः साग्रो ययौ तदा। मुहूर्त्तमिव ते सर्वे रामभक्त्या च मेनिरे ॥” बुल्के कई स्थानों के अनुसार हनुमान् द्वारा राम के उच्छिष्ट खाने और राम के साथ भोजन करने की चर्चा करते हैं। परन्तु यह सब मर्यादापुरुषोत्तम वैदिक वर्णाश्रमी राम की मर्यादा के विरुद्ध होने से कल्पनामात्र ही समझना चाहिये । स्कन्दपुराण ( अवन्तीखण्ड, रेवाखण्ड ८३।२९ ) में शिव ने हनुमान् के नामों को लोकों के कल्याणकारी कहा है— “उपकाराय लोकानां नामानि तव मारुते ।” परन्तु बुल्के हनुमान् के देवत्व को आठवीं ईसवी शती की कल्पना मानते हैं, जो उनका भ्रम ही है। पुराणों का प्रामाण्य और प्राचीनता अच्छी तरह सिद्ध कर दी गयी है। व्यास भगवान् के समय से पूर्व ही हनुमान् के मन्त्र, नाम आदि का जप होता था । अतएव १० वीं तथा १५ वीं शती में हनुमद्भक्ति का पूर्ण विकास हुआ एवं १५ वीं शती में उनकी मूर्ति की पूजा प्रचलित हुई, बुल्के का यह कथन भी अत्यन्त भ्रमपूर्ण ही है; क्योंकि उनका उक्त कथन पुराणों की अर्वाचीनता मानने से ही सङ्गत हो सकता है। पर वह स्वयं ही निर्मूल है। पुराण अनादि हैं, द्वापर के अन्त में व्यास द्वारा उनका आविर्भाव हुआ है। राम का आविर्भाव भी गत त्रेता में न होकर २४ वें त्रेता में हुआ था जो करोड़ों वर्ष पूर्व का काल है। सुतरां हनुमान् की आराधना भी करोड़ों वर्षों से चली आ रही है।