रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआनन्दरामायण (१।१२) के अनुसार सीता ने हनुमान् को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि विश्वशान्ति के उद्देश्य से गाँव-गाँव में तुम्हारी मूत्ति की पूजा की जायगी— "ग्रामारामपत्तनेषु व्रजखेटकसद्मसु । वनदुर्गपर्वतेषु सर्वदेवालयेषु च ॥ वाटिकोपवनाश्वत्थवटवृन्दावनादिषु । नदीषु क्षेत्रतीर्थेषु जलाशयेपुरेषु च ॥ त्वन्मूत्ति पूजयिष्यन्ति मानवा विघ्नशान्तये । भूतप्रेतपिशाचाद्या नश्यन्ति स्मरणात्तव ।।" (आ० रा० १।१२।१४७-१४९) ग्रामों, उद्यानों, नगरों, गोशालाओं, कसबों, घरों में, वनों, पर्वतों, दुर्गों तथा सभी देवालयों में, नदियों में; क्षेत्रों, तीर्थों, जलाशयों में, पुरों में, वाटिकाओं, उपवनों, अश्वत्थों, वटों तथा वन्दावनादि में विघ्ननिवृत्ति के लिए मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे । तुम्हारे स्मरणमात्र से भूत, प्रेत, पिशाच आदि नष्ट हो जायेंगे । आज सीताजी का यह वरदान प्रत्यक्ष सिद्ध हो रहा है । सर्वत्र हनुमान् की मूर्ति की पूजा चल रही है। भूत, प्रेतों तथा विघ्नों के निवारणार्थ हनुमान् का स्मरण कारगर सिद्ध हो रहा है। कई स्थानों में बड़े बड़े प्रेतराज हनुमान् के सेवक बनकर दुखियों का दुःख दूर कर रहे हैं । इस तरह हनुमान् का देवत्व जाज्वल्यमान है । हनुमान् का संकटमोचन नाम भी प्रसिद्ध है । बुल्के कहते हैं कि प्रायः भूतों और प्रेतों की निवृत्ति के उद्देश्य से ही हनुमत्पूजा होती है। परन्तु यह भी ठीक नहीं है । मुख्य रूप से राम-प्राप्ति के हेतु ही हनुमान् की पूजा की जातो है— "तुम्हरे भजन राम कहँ भावै । जन्म जन्म कर दुख बिसरावै ॥" (हनु० चा०) हनुमान् के ध्यान से राम का ध्यान होता है— "बन्दहुँ पवनकुमार खलबन पावक ज्ञानघन । जासु हृदय आगार वसहिं राम शर चाप धर ॥" (रा० मा० १।१७) "पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित बसहु सदा सुरभूप ॥" (हनु० चा०) आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड १३) के अनुसार राम ने विभीषण को हनुमत्कवच प्रदान किया है। उसमें भूतों एवं ज्वरों से छुटकारा मिलने की चर्चा है । वहीं गरुड़जी राम को कपि (हनुमान्) पूजन का विधान बताते हैं । महामारीनिवृत्त्यर्थ उसका विधान बताते हैं । आनन्दरामायण (राज्यकाण्ड) में सीता ने भी हनुमान् की पूजा की थी— "गोमयेनाञ्जनेयं सा कुड्ये कृत्वाच्यं जानकी । अकरोत् प्रत्यहं पुच्छवृद्धि स्वाङ्गुलिमात्रातः ॥'' क्या राम ने या जानकी ने हनुमान् की पूजा १५ वीं ईसवी में सीखी है। बुल्के स्वयं ही सोचें । पर वे तो इसे कल्पनामात्र कहेंगे, यही दुःसाहस है । लाङ्गलोपनिषद् के अनुसार हनुमान् एकादशरुद्रावतार, श्रीरामसेवक, कुमारब्रह्मचारी एवं सब रोगों और शूलों के निवारक हैं । उन्हें गर्भदोषघ्न, पुत्रपौत्रद भी कहा गया है, यह ठीक ही है । मारुतिस्तव में तो हनुमान् को पापतापसुसमापनतत्पर कहा है, वह भी ठीक ही है । हनुमत्सहस्रनामस्तोत्र में उनको महावीर, सर्वविद्याविशारद, वेद-वेदान्तपारग, रामभक्तिविधायक, पिशाचग्रहघातक, अपस्मारहर आदि के साथ ही साथ संसारभयनाशक, शरणागत-