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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

आनन्दरामायण (१।१२) के अनुसार सीता ने हनुमान् को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि विश्वशान्ति के उद्देश्य से गाँव-गाँव में तुम्हारी मूत्ति की पूजा की जायगी— "ग्रामारामपत्तनेषु व्रजखेटकसद्मसु । वनदुर्गपर्वतेषु सर्वदेवालयेषु च ॥ वाटिकोपवनाश्वत्थवटवृन्दावनादिषु । नदीषु क्षेत्रतीर्थेषु जलाशयेपुरेषु च ॥ त्वन्मूत्ति पूजयिष्यन्ति मानवा विघ्नशान्तये । भूतप्रेतपिशाचाद्या नश्यन्ति स्मरणात्तव ।।" (आ० रा० १।१२।१४७-१४९) ग्रामों, उद्यानों, नगरों, गोशालाओं, कसबों, घरों में, वनों, पर्वतों, दुर्गों तथा सभी देवालयों में, नदियों में; क्षेत्रों, तीर्थों, जलाशयों में, पुरों में, वाटिकाओं, उपवनों, अश्वत्थों, वटों तथा वन्दावनादि में विघ्ननिवृत्ति के लिए मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे । तुम्हारे स्मरणमात्र से भूत, प्रेत, पिशाच आदि नष्ट हो जायेंगे । आज सीताजी का यह वरदान प्रत्यक्ष सिद्ध हो रहा है । सर्वत्र हनुमान् की मूर्ति की पूजा चल रही है। भूत, प्रेतों तथा विघ्नों के निवारणार्थ हनुमान् का स्मरण कारगर सिद्ध हो रहा है। कई स्थानों में बड़े बड़े प्रेतराज हनुमान् के सेवक बनकर दुखियों का दुःख दूर कर रहे हैं । इस तरह हनुमान् का देवत्व जाज्वल्यमान है । हनुमान् का संकटमोचन नाम भी प्रसिद्ध है । बुल्के कहते हैं कि प्रायः भूतों और प्रेतों की निवृत्ति के उद्देश्य से ही हनुमत्पूजा होती है। परन्तु यह भी ठीक नहीं है । मुख्य रूप से राम-प्राप्ति के हेतु ही हनुमान् की पूजा की जातो है— "तुम्हरे भजन राम कहँ भावै । जन्म जन्म कर दुख बिसरावै ॥" (हनु० चा०) हनुमान् के ध्यान से राम का ध्यान होता है— "बन्दहुँ पवनकुमार खलबन पावक ज्ञानघन । जासु हृदय आगार वसहिं राम शर चाप धर ॥" (रा० मा० १।१७) "पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित बसहु सदा सुरभूप ॥" (हनु० चा०) आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड १३) के अनुसार राम ने विभीषण को हनुमत्कवच प्रदान किया है। उसमें भूतों एवं ज्वरों से छुटकारा मिलने की चर्चा है । वहीं गरुड़जी राम को कपि (हनुमान्) पूजन का विधान बताते हैं । महामारीनिवृत्त्यर्थ उसका विधान बताते हैं । आनन्दरामायण (राज्यकाण्ड) में सीता ने भी हनुमान् की पूजा की थी— "गोमयेनाञ्जनेयं सा कुड्ये कृत्वाच्यं जानकी । अकरोत् प्रत्यहं पुच्छवृद्धि स्वाङ्गुलिमात्रातः ॥'' क्या राम ने या जानकी ने हनुमान् की पूजा १५ वीं ईसवी में सीखी है। बुल्के स्वयं ही सोचें । पर वे तो इसे कल्पनामात्र कहेंगे, यही दुःसाहस है । लाङ्गलोपनिषद् के अनुसार हनुमान् एकादशरुद्रावतार, श्रीरामसेवक, कुमारब्रह्मचारी एवं सब रोगों और शूलों के निवारक हैं । उन्हें गर्भदोषघ्न, पुत्रपौत्रद भी कहा गया है, यह ठीक ही है । मारुतिस्तव में तो हनुमान् को पापतापसुसमापनतत्पर कहा है, वह भी ठीक ही है । हनुमत्सहस्रनामस्तोत्र में उनको महावीर, सर्वविद्याविशारद, वेद-वेदान्तपारग, रामभक्तिविधायक, पिशाचग्रहघातक, अपस्मारहर आदि के साथ ही साथ संसारभयनाशक, शरणागत-

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३७ वत्सल, भगवान् जगन्नाथ, जगदीश, अनादि, परब्रह्म भी कहा गया हैं और रुद्रावतार होने से उनके वे सब नाम सङ्गत हैं—"एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे" के अनुसार वे ब्रह्मरूप ही हैं। अतएव बुल्के का यह कहना गलत है कि "इन शब्दावलियों को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिये। पूजा की दृष्टि से संकटमोचनरूप ही प्रधान है। भूतों, बीमारियों तथा बाँझपन से छुटकारा पाने के लिए उनकी अधिकतर शरण ली जाती है।" बुल्के की दृष्टि में तो यह भी कल्पना या विश्वासमात्र ही है। पर उनका यह कहना निरर्थक ही है। ७१० वें अनु० में बुल्के अपने मन की दुर्भावनाओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं। "हनूमत्पूजा के कारणों पर विचार करने से विदित होता है कि रुद्रावतार माने जाने के कारण उनके प्रति श्रद्धा जाग्रत् होना स्वाभाविक ही था। किन्तु १० वीं, १५ वीं ईसवी में हनूमद्भक्ति का पूर्ण विकास आश्चर्यजनक ही है। उनकी संकटमोचनरूप में उपासना जो आजकल व्यापक रूप से प्रचलित है, उसका मुख्य आधार रामायण में चित्रित राक्षसों का वध, ओषधिपर्वत का आनयन नहीं, किन्तु उसका मुख्य कारण यह है कि हनुमान् का सम्बन्ध यक्ष-पूजा से स्थापित किया गया था। अत्यन्त प्राचीन काल से गाँव गाँव में यक्षों की पूजा होती थी। वे रक्षक देवता (जातक ५४५), द्वारपाल, सन्तान देनेवाले तथा वृक्षों में निवास करनेवाले (जातक ३०७ और ५०९) माने जाते थे। यक्ष तथा वीर शब्द पर्यायवाची ही हैं। उधर महावीर हनुमान् की ख्याति रामायण की लोकप्रियता द्वारा शताब्दियों से चली आ रही थी। अतः अन्य यक्षों अर्थात् वीरों के साथ हनुमान् की भी पूजा होने लगी। इस अत्यन्त प्राचीन पूजा से सम्बन्ध हो जाने पर हनुमान् की लोकप्रियता बहुत ही बढ़ गयी। उस समय तक जिस उद्देश्य से और जिस रूप में यक्षों की पूजा होती रही अब उसी उद्देश्य और उसी रूप में महावीर हनुमान् की पूजा होने लगी। हनुमान् के संकटमोचन रूप तथा द्वारपालवाला रूप वीरपूजा से सम्बन्ध रखते हैं। प्राचीन वीरपूजा तथा हनूमत्पूजा के उद्देश्यों में जो सादृश्य है वह उपर्युक्त विकास की वास्तविकता सिद्ध करता है। परन्तु डा० वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार आजकल तक हनुमान् की पूजा के दो रूप प्रचलित हैं—एक वीरपूजा या यक्षपूजा जिसमें मूत्ति से सम्बन्ध नहीं होता तथा एक दूसरा रूप जिसमें वानर की मूर्ति है और जो रामकथा पर निर्भर है।" वस्तुतः यह सब बुल्के की अनर्गल अटकल है। उपस्थित प्रत्यक्ष हेतुओं को छोड़कर अनुपस्थित हेतु ढूँढ़ने का कार्य "अव्यापारेषु" व्यापारमात्र है। यदि वीर-पूजा अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित थी तब तो हनूमत्पूजा भी अत्यन्त प्राचीन काल से ही माननी चाहिये, फिर १० वीं १५ वीं ई० में ही आश्चर्यजनक हनूमत्पूजा का पूर्ण विकास हुआ यह क्यों ? यदि यह रामायण का प्रभाव है तो हनुमान् की पूजा में उससे अन्य प्रभाव ढूँढ़ने की क्या आवश्यकता है ? फिर स्कन्दपुराण के १२ नामों की सूची का एक नाम भी यक्षपूजा से सम्बन्ध नहीं रखता। द्वादश नाम निम्नोक्त हैं—हनुमान्, अञ्जनीसुत, वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ट, फाल्गुनगोत्र, पिङ्गाक्ष, अमितविक्रम, उदधिक्रमणश्रेष्ठ, दशग्रीवदर्पहा, लक्ष्मणप्राणदाता तथा सीताशोकनिवर्तन (स्कन्दपु० अवन्तीखण्ड अ० ८३) । आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड १३।८, ९) में भी ये नाम हैं। स्कन्दपुराण के एक अन्य स्थल (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यमा० अ० ३७) में हनुमान् की स्तुति में १९ विशेषण मिलते हैं। उनमें से एक ही सर्वव्याधिहर संकटमोचन रूप से सम्बन्ध रखता है। परन्तु संकटमोचन रूप भी यक्षरूपनिरपेक्ष हनुमान् का ही है। शक्तिघात के समय लक्ष्मण का, अहिरावण की माया के समय राम-लक्ष्मण दोनों का, रावण के आतङ्क से सीता का तथा इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र- प्रयोग के समय राम, लक्ष्मण तथा सभी वानर भालू वीरों का संकट काटने के कारण हनुमान् ही वस्तुतः संकटमोचन- पदवाच्य हैं, न कि बुल्केकल्पित यक्ष । भारतीय वाङ्मय की दृष्टि से वेद अनादि हैं। उन्हीं पर वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायण, पुराण आदि आधारित हैं। इन सद्ग्रन्थों के आधार पर हनुमान् की पूजा अति-प्राचीनकाल से प्रचलित है। यक्षपूजा आदि

६३८ रामायणमीमांसा एकोनविंश उसकी अपेक्षा अर्वाचीन ही है । गीता आदि की दृष्टि से ईश्वरपूजा, देवपूजा आदि ही सात्त्विकी पूजा है। यक्ष, राक्षस आदि की पूजा राजसी पूजा है । अनादि सिद्ध वैदिक धर्म के पूर्ण प्रचार के समय से ही ब्रह्म, परमात्मा, रुद्र, विष्णु, राम, हनुमान् आदि की पूजा प्रचलित है। वैदिक धर्म के प्रचार की मन्दता में ही यक्ष, राक्षस आदि की पूजा प्रचलित होती है। इस तरह वेदों, उपनिषदों, रामायण आदि के अनुसार ही हनुमान् की पूजा चिरकाल से ही प्रचलित है । अतः १० वी १५ वीं शती में हनुमत्पूजा का विकास मानना सर्वथा असङ्गत ही है । उसपर यक्षपूजा का प्रभाव मानना और भी असङ्गत है । प्रचलित हनुमत्पूजकों में सभी को रामायण एवं रामभक्ति के कारण तथा रुद्ररूप से ही हनुमान् का महत्त्व विदित है । सिवा उच्छृङ्खल विचारवालों के और कोई यक्षपूजा एवं हनुमत्पूजा का सम्बन्ध नहीं मानता है । अतएव हनुमान् के चरित्रचित्रण में अतिशयोक्ति और कोई अलौकिकता की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रही है, यह कथन वस्तुस्थिति से सर्वथा अस्पृष्ट ही नहीं अपितु विरुद्ध भी है । हनुमान् वानरगोत्रीय 'आदिवासी थे, यह कल्पना भी रामायण के विरुद्ध ही है । हनुमान् ने स्वयं ही अपने को वानर कहा है— “जातिरेव मम त्वेषा ।” यह दिखाया जा चुका है। इसी तरह हनुमान् की वायुपुत्र उपाधि नहीं, किन्तु वाल्मीकिरामायण तथा अन्य प्रामाणिक कथाओं के अनुसार हनुमान् वास्तव में वायु के पुत्र थे । आश्चर्य तो यही है कि पाश्चात्य एवं उनके अनुयायी सड़े से सड़े जातक को प्रमाण मान लेते हैं। परन्तु यहाँ के परम प्रमाण वेद, उपनिषद्, आर्ष इतिहास रामायण तथा महाभारत की बातों को जातकों के दृष्टिकोण से लगाने का प्रयास करते हैं । यह स्पष्ट ही बौद्धपक्षपात एवं वैदिकधर्मद्वेष है । इसी कारण वे वायुपुत्र एवं वीरपूजा या यक्षपूजा का हनुमत्पूजा पर प्रभाव भी जातकों पर ही अवलम्बित है, ऐसा अनर्गल प्रलाप करते हैं । वस्तुस्थिति तो यह है कि वैदिकधर्मद्वेषी बौद्धों तथा जैनों ने बहुतसी मनगढ़न्त वैदिकधर्म-विरुद्ध कल्पनाएँ कर रखी हैं। पाश्चात्यों की कूटनीति के शिकार बनकर अनेक उनके अनुयायी भारतीयों ने भी उन्हीं का अन्धानुकरण कर वैदिकधर्मविरुद्ध अनेक कल्पनाओं को प्रश्रय दिया है। याकोबी का यह कथन भी सारशून्य है कि हनुमान् की असाधारण लोकप्रियता का आधार रामायण में अङ्कित उनका चरित्रचित्रणमात्र नहीं हो सकता । वास्तव में उनकी यह आश्चर्यजनक लोकप्रियता शताब्दियों तक बढ़ते हुए विकास का परिणाम है। इसीलिए बुल्के को भी लाचार होकर यह मानना पड़ता है कि “रामसाहित्य का अनुशीलन करने पर डा० याकोबी के मत के विपरीत मन में यह विचार अनायास उत्पन्न होता है कि राम-कथा ने ही हनुमान् को अमरत्व के शिखर पर पहुँचा दिया है और आजकल राम की अपेक्षा रामसेवक हनुमान् की पूजा कहीं अधिक व्यापक रूप से हो रही है”, परन्तु बुल्के का यह मत भी शुद्ध नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार रामकथा का विकास हुआ । वे यह तथ्य भी कहाँ मानते हैं कि वस्तुभूत रामचरित्र ही रामायणों द्वारा वर्णित हुआ है । अनु० ७१२ में बुल्के पुनः कहते हैं कि “हनुमच्चरित विकास के अध्ययन से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं । प्रथम हनुमान् के विषय में जो विस्तृत सामग्री परवर्ती कथाओं में मिलती है वह वाल्मीकिरामायण में निहित तत्त्वों का स्वाभाविक विकास प्रतीत होती है । अतः वाल्मीकि के पूर्व राम-कथा से स्वतन्त्र हनुमद्विषय गाथाओं की कल्पना निराधार ही नहीं अनावश्यक भी हैं । दूसरे, उस सामग्री के विश्लेषण से स्पष्ट हैं कि हनुमान् का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा था, अतः हनुमान् वास्तव में किसी प्राचीन देवता से अभिन्न हैं, यह कल्पना उपलब्ध सामग्री के प्रतिकूल ही है । हनुमान् के चरित्र-चित्रण में शताब्दियों तक अतिशयोक्ति का प्रयोग होता रहा है । किन्तु आठवीं शती में उनको पहले पहल देवत्व की उपाधि से विभूषित किया गया ।” परन्तु बुल्के की ये दोनों कल्पनाएँ प्रमाणशून्य हैं ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३९ आधुनिक दृष्टि से यद्यपि यह ठीक हो सकता है कि राम-साहित्य से पृथक् हनमत्पूजा के विकास का कारण ढूंढ़ना व्यर्थ है । हनमत्पूजा में यक्षपूजा या वीरपूजा का प्रभाव मानना उपलब्ध सामग्री के प्रतिकूल ही है। पर साथ ही हनुमान् के चरित्रचित्रण में अतिशयोक्तियों का शताब्दियों तक प्रयोग होता रहा है, यह कथन प्रमाणहीन है । वास्तव में राम परब्रह्म हैं तथा हनुमान् रुद्र हैं । उनके सम्बन्ध में पूरी-पूरी वस्तुस्थिति का भी आज तक वर्णन नही हो सका है । देवदेव में देवत्व की कल्पना दूषण ही है भूषण नहीं । “महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः । अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ ( महिम्नस्तोत्र १ ) भगवान् की अनन्त महिमा का पर पार न जाननेवाले ब्रह्मादि के लिए भी भगवान् की स्तुति भगवान् की महिमा के अननुरूप ही है । निर्गुणरूप में सब के मन और वाणी पङ्गु होते हैं । अनन्त गुणगणों की दृष्टि से भी सब के मन और वाणी पार पाने में असमर्थ ही हैं । आकाश का अन्त कोई भी नहीं पा सकता है, परन्तु अपनी शक्तिभर मच्छर और गरुड़ सभी आकाश में उड़ते हैं— “नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः ।” “निजनिज मति मुनि हरिगुन गावहिं । निगम सेष सिव पार न पावहिं ॥ तुमहि आदि खग मसक प्रजंता । नभ उड़ाहिं नहि पावहिं अंता ॥ तिमि रघुपति महिमा अवगाहा । तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा ॥” ( रा० मा० ७।९०।२, ३ ) ब्रह्मादि अपनी बुद्धि के अनुसार भगवद्गुणगान कर सकते हैं तब तो अस्मदादि भी अपनी बुद्धि के अनुसार भगवद्गुणगान कर ही सकते हैं । यदि किसी वीर या यक्ष की अभिन्नता के कारण हनुमान् का यह महत्त्व बढ़ा होता तो किसी यक्ष की महिमा तथा पूजा भी प्रख्यात होनी चाहिये थी । परन्तु उसका नितान्त अभाव है । अतः रामायण एवं राम और सीता की भक्ति एवं उनके वरप्रभाव से ही हनुमान् का महत्त्व युक्त है । इस तरह विकास या परिवर्धन नहीं हुआ । अपितु भगवान् एवं उनके भक्त रुद्रस्वरूप हनुमान् की महिमा वस्तुतः अपार है । उनके सभी विद्यमान गुणों का भी वर्णन असंभव है, फिर अविद्यमान गुणों के आरोप, विकास या परिवर्धन की कल्पना ही कैसे हो सकती है ? हनुमच्चरितवर्णन करनेवाले पुराणों या रामायणांशों की अर्वाचीनता की कल्पना के आधार पर ही यह कहा जाता है कि ८वीं, १०वीं या १५वीं शती में हनुमान् की पूजा या माहात्म्य का पूर्ण विकास हुआ । परन्तु जब उक्त आधारभित्ति ही गलत है तब उस आधार पर आधारित सभी कल्पनाओं के महल सुतरां गलत एवं असङ्गत ठहरते हैं । पाश्चात्यों की काल-कल्पना सर्वथा भारतीय दृष्टिकोण से गलत है । वर्तमान रामायण शुद्ध रामायण है । उसका निर्माणकाल राम का राज्यारोहणकाल ही है । पुराण व्यासकालीन ही हैं । अतः इसके विपरीत सब कल्पनाएँ पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिमूलक ही हैं । अर्जुन के गर्व-निवारण के प्रसङ्ग में कहा गया था कि हनुमान् उसकी ध्वजा पर विराजमान होंगे । बुल्के कहते हैं, “महाभारत से विदित होता है कि प्रायः सब योद्धाओं के झण्डे पर पशुओं के चित्र अङ्कित थे । उदाहरणार्थ दुर्योधन की ध्वजा पर नाग ( ६।१७।२५ ), भीम की ध्वजा पर केसरी ( ६।९१।७० ), घटोत्कच के ध्वज पर गृध्र

( ७।१५०।१५ ), वृषसेन के ध्वज पर मयूर ( ७।८०।१६ ), जयद्रथ के झण्डे पर वराह ( ७।१२१।११ ) एवं अश्वत्थामा के झण्डे पर सिंह ( ६।१७।२१ ) । इसी तरह अर्जुन को लाङ्गूलकेतन ( ६।१७।२१ ), कृष्ण को गरुड़- ध्वज ( ७।५७।२ ) तथा प्रद्युम्न को मकरध्वज ( ७।९६।२५) कहा गया है । डब्लू हॉप्किन्स के अनुसार इन चित्रों का प्रयोजन पूजा न होकर प्रोत्साहन तथा अलङ्करणमात्र ही था । महाभारत के प्रामाणिक संस्करणों से विदित होता है कि अर्जुन के ध्वज में अन्य पशु भी अङ्कित थे, परन्तु कपि ही उनमें प्रमुख था ( २।२२।२३ ) । अर्जुन को कपि- राजकेतन कहा गया है ( ६।५६।२६ ) । इसी प्रकार वानरध्वज ( ६।११२।१४), वानरप्रवरध्वज ( ७।१७।२१ ) तथा कपिप्रवरकेतन ( ७।१६।१५ ) भी कहा गया है ।" वस्तुतः यह भी गलत है, क्योंकि सामान्य ध्वजों में चित्रों का प्रोत्साहनमात्र प्रयोजन हो सकता था, किन्तु महाभारत के प्रमाणानुसार अर्जुन का जैसा विशिष्ट रथ था, वैसा ही उसका ध्वज भी विशिष्ट ही था । उसमें केवल हनुमान् का चित्र ही नहीं था, किन्तु स्वयं हनुमान् उसपर विराजते थे और प्रत्यक्ष गर्जन करके शत्रुओं को भयभीत भी करते थे; जैसा कि द्रोणपर्व ( अध्याय ६४ ) के अनुसार विदित होता है। जब अर्जुन ने रणभूमि में शङ्ख बजाया तब अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान भूतगणों के साथ हनुमान् ने मुंह बाकर शत्रुओं को भयभीत करते हुए बड़े जोर से गर्जन किया— “ततः कपिर्महानादं सह भूतैर्ध्वजालयैः । अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ॥” ( म० भा० ६।६४।२५ ) उद्योगपर्व (अध्याय ५५) में भी कहा गया है कि विश्वकर्मा, ब्रह्मा और इन्द्र ने मिलकर उसमें छोटी बड़ी अनेक प्रकार की बहुमूल्य दिव्य मूर्तियों का निर्माण कर रखा था— “ध्वजे हि तस्मिन् रूपाणि चक्रुस्ते देवमायया । महाधनानि चित्राणि महान्ति च लघूनि च ॥” ( म० भा० ५।५५।८ ) इतना ही नहीं, महाभारत में यह भी उल्लेख है कि अर्जुन का रथ कहीं प्रतिहत नहीं होता था । वृक्षों तथा पर्वतों में भी कहीं टकराता नहीं था । अतः कहना होगा कि विशिष्ट रथों पर ध्वजों में विशेषता होती थी, केवल चित्रमात्र नहीं । आज भी ध्वजाओं का विशिष्ट सम्मान होता है । उसके सम्मान या अपमान में सारे राष्ट्र का सम्मान या अपमान माना जाता है । विशिष्ट सम्बन्धों एवं विशिष्ट कारणों से हनुमान्जी अर्जुन के रथ पर कभी अंशतः कभी युद्धादि के समय प्रत्यक्ष ही पूर्ण शक्ति के साथ विराजमान रहते थे । केवल हनुमान् की कीर्ति एवं लोकप्रियता के कारण अर्जुन की ध्वजा के साथ उनका सम्बन्ध जोड़ा नहीं गया । हनुमान् और भीम के संवाद से ही नहीं किन्तु उपर्युक्त— “अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ।” श्लोकानुसार भी हनुमान् का अर्जुन के रथ से विशिष्ट सम्बन्ध विदित होता ही है । भीम और अर्जुन पर अनुग्रह कर हनुमान् ने वर प्रदान किया था । सीता-त्याग उत्तरकाण्ड के सीतात्याग का अपलाप करते हुए बुल्के कहते हैं कि “आदिरामायण में रामकथा राम के अभिषेक तथा राम के सुखद राज्य के संक्षिप्त वर्णन पर समाप्त होती है और उसमें सीता-त्याग का निर्देश नहीं है । महाभारत के रामोपाख्यान में भी कहीं सीता-त्याग का उल्लेख नहीं है । प्राचीन पुराणों, जैसे हरिवंश, वायुपुराण, विष्णुपुराण तथा नृसिंहपुराण में सीतात्याग का संकेतमात्र भी नहीं मिलता है ।” परन्तु उनका यह कहना निरर्थक है, क्योंकि आदिरामायण नाम का ग्रन्थ कोई है ही नहीं । वर्तमान रामायण में सीता-त्याग है ही । उसको प्रक्षिप्त कहना

अध्याय उत्तरकाण्ड ६४१ निराधार ही है। उक्त पुराणों में भी रामकथा का संक्षेप में ही वर्णन है। सभी रामचरित्र ग्रन्थों का आकर ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण ही है। रामोपाख्यान भी संक्षेप ही है। बौद्ध अनामक जातक में तो रामकथा का विकृत रूप ही है, फिर भी उसमें लोकापवाद का वर्णन है : राजा ने रानी से कहा-पति से अलग दूसरे के घरों में निवास करने के कारण चरित्र पर सन्देह किया जाता है। तुम्हें स्वीकार करने में परम्परा के अनुसार कहाँ तक औचित्य है ? रानी ने उत्तर दिया मैं उसमें पङ्कज की तरह रही थी । यदि मुझमें सतीत्व हो तो पृथ्वी फट जाय । पृथ्वी फट गयी । रानी ने कहा मेरा सतीत्व प्रमाणित हुआ । इसके बाद राजा और रानी सुखपूर्वक राज्य करने लगे । परन्तु वाल्मीकिरामायण मूल आकर ग्रन्थ है। उत्तरकाण्ड के अनुसार गर्भवती सीता तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करती हैं। राम ने उन्हें तपोवन भेजने का वचन दिया। संयोगवश राम भद्र से पूछते हैं कि मेरे, सीता तथा भरत आदि के विषय में लोग क्या कहते हैं ? तब भद्र सीता के कारण हो रहे लोकापवाद और जनता के आचरण पर पड़नेवाले उसके कुप्रभाव का उल्लेख करता है। लोग कहते हैं हमको भी अपनी स्त्रियों का ऐसा आचरण सहन करना होगा— “अस्माकमपि दारेषु सहनीयं भविष्यति । यथा हि कुरुते राजा प्रजास्तदनुवर्तते ।” (वा० रा० ७।४३।१९) यह सुनकर राम लक्ष्मण को बुलाते हैं। सीताको गङ्गा के उस पार छोड़ आने का आदेश देते हैं। वे तपोवन दिखाने के बहाने सीता को रथ पर बैठाते हैं। वाल्मीकि के आश्रम पर छोड़ देते हैं। महाकवि कालिदास के रघुवंश (सर्ग १४) की कथा में भद्र मित्र न होकर गुप्तचर माना गया है। उत्तररामचरित, कुन्दमाला तथा दशावतारचरित में भी वैसा ही वर्णन है। उत्तररामचरित में गुप्तचर का नाम दुर्मुख है। आनन्दरामायण के अनुसार उसका नाम विजय है। छलित्राम के अनुसार दो छद्मवेशी राक्षस राम को सीता के विरुद्ध उकसाते हैं । पउमचरियं (पर्व ९२–९४) के अनुसार राम स्वयं गर्भिणी सीता को वन में विभिन्न चैत्यों को दिखला रहे थे । इतने में राजधानी के नागरिक उनके पास आकर अभयदान पाकर अपने आने का कारण बतलाते हैं— पापमोहितमति, परदोषग्रहणरत, स्वभावकुटिल जनता में सीतापवाद को छोड़कर कोई चर्चा नहीं है। नागरिकों की बात सुनकर राम ने लक्ष्मण से परामर्श किया, किन्तु लक्ष्मणने सीता-त्याग का विरोध किया। किन्तु राम ने अपने सेनापति कृतान्तवदन को बुलाकर आदेश दिया कि जिनमन्दिर दिखाने के बहाने सीता को गङ्गा पार भयानक वन में छोड़ दो। सेनापति ने वैसा ही किया । संयोग से पुण्डरीकपुर के राजा वज्रजङ्घ ने उस वन में सीता का विलाप सुन लिया। वह सीता को अपने भवन ले गया और वहां सीता के दो पुत्रों का जन्म हुआ। रविषेण के पद्मचरित ( पर्व ९६ ) में सीता को ग्रहण करने के दुष्परिणाम के वर्णन में परिवर्धन किया गया है । समस्त प्रजा मर्यादारहित बतायी जाती है। स्त्रियों का हरण हुआ करता है। बाद में पुनः अपने अपने घर लौटकर स्वीकृत की जाती हैं— “प्रजाऽधुनाखिला जाता मर्यादारहितात्मिका । स्वभावादेव लोकोऽयं महाकुटिलमानसः ॥ प्रकटं प्राप्य दृष्टान्तं न किञ्चित्तस्य दुष्करम् ।” (प० च० ९६।४०-४२) हेमचन्द्रकृत योगशास्त्र के अनुसार सीतात्याग के पश्चात् राम उनको खोजने वन में जाते हैं, किन्तु सीता का कहीं पता नहीं लगता। राम ने सोचा हिंस्र सिंह, व्याघ्र आदि ने सीता का भक्षण कर लिया होगा । उन्होंने सीता का श्राद्ध भी कर दिया । वस्तुतः वाल्मीकिरामायण ही जैन रामकथाओं का आधार है। जैनों ने जैनधर्म ८१

६४२ रामायणमीमांसा एकोनविंश के दीक्षा-प्रचार के साधनरूप में रामकथाओं का भी उपयोग किया है और अनेक ढङ्ग का परिवर्तन और परिवर्धन किया है। उसका वस्तुस्थिति से कोई भी सम्बन्ध नहीं है। सीता-त्याग के सम्बन्ध में नये नये नामों का सम्बन्ध जोड़ा गया है। तेरहपन्थी तुलसी ने कुछ जैनी रामकथा और कुछ रामायणों की रामकथाओं का मिश्रण कर एक नयी खिचड़ी बनायी है और उन्होंने धोबीवाली कथा भी जोड़ दी है। जिसमें वह अपनी पत्नी को, जो घर से निकली थी, वापिस लेने से इनकार करते हुए कहता है—मैं राम की तरह नहीं हूँ, जिन्होंने दीर्घकाल तक दूसरे के घर रहने के पश्चात् सीता को ग्रहण किया । बुल्के की दृष्टि में “इसका वर्णन सर्वप्रथम गुणाढ्य की बृहत्कथा में विद्यमान था। वह सोमदेवकृत कथासरित्सागर में सुरक्षित है। उनके अनुसार गुप्तवेश में घूमते हुए राजा ने देखा कि एक पुरुष अपनी स्त्री को हाथ पकड़कर घर से बाहर निकाल रहा है और यह दोष दे रहा है कि दूसरे के घर गयी थी । वह स्त्री कहती है, राम ने सीता को राक्षस के घर में रहने पर भी नहीं छोड़ा। यह मेरा पति राम से भी बढ़कर है, क्योंकि यह मुझे बन्धु के घर जाने पर भी घर से निकाल रहा है। यह सुनकर राम को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने लोकापवाद के भय से गर्भवती सीता को वन में छोड़ दिया।” पर बुल्के की यह भ्रान्ति है जो वे इस कथा का सर्वप्रथम बृहत्कथा में उल्लेख मानते हैं, क्योंकि यह कथा श्रीमद्भागवत ( ९।११।८-१० ) आदि पुराणों से ही गुणाढ्य ने उद्धृत की है। श्रीमद्भागवत के निर्माण का काल गुणाढ्य से अर्वाचीन मानना भी भ्रान्ति ही है। जैमिन्याश्वमेध (अ० २६ ) तथा पद्मपुराण (५।५५ ) के अनुसार ही वह पुरुष धोबी था। आनन्द- रामायण ( ५।३ ), तमिलरामायण, रामचरितमानस लव-कुशकाण्ड आदि में भी इसका वर्णन है। वस्तुतः रामायण के पश्चात् रामचरित का शुद्ध आधार पुराण ही हैं, क्योंकि वे आर्ष हैं। तिब्बती रामायण के अनुसार राम किसी व्यभिचारिणी स्त्री का और उसके पति का झगड़ा सुनते हैं। पति कहता है तुम अन्य स्त्रियों के समान नहीं हो। स्त्री कहती है तुम स्त्रियों के विषय में क्या जानो ? सीता को देख लो वह एक लाख वर्ष दशग्रीव के साथ रही, फिर भी राम ने उसे ग्रहण कर लिया। यह सुनकर राम को सीता के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न होता हैं। वे छिपकर उस स्त्री से मिलते हैं। उसने राम को बताया कि ज्वर- पीड़ित मनुष्य जैसे शीतल सरिता का निरन्तर स्मरण करता रहता है वैसे ही कामपीड़ित स्त्री रूपवान् पुरुष का निरन्तर स्मरण करती रहती है। जब तक कोई देखता, सुनता रहता है तबतक वह निन्दित कर्म नहीं करती, पर एकान्त में वह बन्धनमुक्त होकर परपुरुष से अपनी कामपीड़ा शान्तकर लेती है। यह सुनकर राम की शङ्का सुदृढ़ हो जाती है और वे सीताको वनवास दे देते हैं। कहना न होगा कि यह भी वस्तुस्थिति से भिन्न काल्पनिक आधारों पर आधृत है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार अग्निपरीक्षा के अनन्तर सीता की शुद्धि के प्रति राम को कभी भी अविश्वास का प्रश्न ही नहीं हुआ, केवल लोकापवाद की दृष्टि से ही राम ने सीता को वनवास दिया था। हरिभद्र सूरि की उपदेशपद की एक संग्रहगाथा में सीता द्वारा रावण के चरणों का चित्र बनाने का संकेत मिलता है। टीकाकार मुनिचन्द्र सूरि १२वीं श० ई० के अनुसार सीता ने अपनी ईर्ष्यालु सपत्नी की प्रेरणा से रावण के चरणों का चित्र बनाया था। सपत्नी ने राम को वह चित्र दिखलाया और राम ने सीता का त्याग किया। भद्रेश्वर की कहावली के अनुसार सीता के गर्भवती होने पर उन सपत्नी जनों की ईर्ष्या बहुत बढ़ गयी। उन्होंने ही छद्मव्यवहार से रावण का चित्र बनवाया। इसपर उन्हीं लोगों ने राम के पास जाकर सीता पर अभियोग लगाया कि सीता सदा रावण का स्मरण करती रहती है। उन्होंने प्रमाणस्वरूप रावण के चरण का वह चित्र

दिखलाया। राम ने इसपर अधिक ध्यान नहीं दिया। जिससे सपत्नियों ने रावणचित्र की कथा दासियों द्वारा जनता में फैला दी। वसन्त के समय सीता ने देवपूजा करने का दोहद प्रकट किया। पश्चात् राम ने गुप्तवेश में नगर के उद्यान में टहलते हुए लङ्कानिवास के पश्चात् सीता को ग्रहण करने के कारण अपनी निन्दा सुनी। तब उन्होंने लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण, हनुमान् को बुलाकर गुप्तचरों को आज्ञा दी कि तुम लोगों ने जो कुछ सुना है, उसका निःसंकोच विवरण दो। उन्होंने लोकापवाद की चर्चा की। यह सुनकर लक्ष्मण अत्यन्त क्रुद्ध हुए। गुप्तचरों ने जो सुना था, वह सुनाया। लक्ष्मण ने सीता का पक्ष लिया, किन्तु राम ने कृतान्तमुख द्वारा तीर्थयात्रा के बहाने सीता को जङ्गल में प्रेषित कर दिया। पश्चात् राम ने लक्ष्मण और विद्याधरों के साथ विमान में बैठकर सीता की खोज की। कहीं न देखकर समझ लिया कि सीता वन्य हिंस्र पशुओं की शिकार बन गयी। हेमचन्द्र के जैनरामायण के अनुसार सीता के गर्भवती होने पर तीन सपत्नियों को ईर्ष्या बढ़ गयी। उन्हीं के अनुरोध से सीता ने रावण का चरण-चित्र बनाया। वस्तुतः किञ्चित् परिवर्तन के साथ जैन रामकथाओं का समान ही दृष्टिकोण है। जो सर्वथा निन्द्य ही है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण के अनुसार यज्ञों में अपेक्षित होने पर भी राम ने दूसरा विवाह नहीं किया। वे स्वर्णमयी सीता की प्रतिमा को ही पत्नी के रूप में यज्ञ में बैठाते थे। ऐसी स्थिति में राम का बहुपत्नीवाद वाल्मीकिरामायण विरुद्ध होने से सर्वथा असङ्गत ही है। सीता के प्रति राम को अग्निपरीक्षा के पहले ही व्यावहारिक दृष्टिकोण से ही सन्देह हुआ था, जो कि उचित ही था। सीता को ग्रहण कर लेने पर प्राकृत पुरुषों के समान जनश्रुति के आधार पर शङ्का की कोई सङ्गति ही नहीं बैठती। अग्निपरीक्षा के अनन्तर तो किसी भी समझदार को शङ्का होनी सम्भव नहीं। फिर, लोक के मुख को बन्द करना कठिन काम है। लङ्का की अग्निपरीक्षा का प्रचार लोकमुख-पिधायक हो सकता था, परन्तु राम के द्वारा किये गये उस प्रचार को सरकारी प्रोपेगण्डा कहकर झुठलाया जाना सम्भव था। इसी लिए एक आप्तकाम पूर्णकाम महर्षि के द्वारा वह परिस्थिति लायी गयी कि जिससे अग्निपरीक्षा का ही नहीं सम्पूर्ण सीता-चरित्र का दिव्य प्रचार हुआ। कृत्तिवासरामायण (७।४४,४५) में तीनों कारणों का समन्वय है। राम ने भद्र द्वारा लोकापवाद की चर्चा सुनी। धोबी के मुख से अपनी निन्दा स्वयं सुनी और घर पहुँचकर सीता द्वारा अङ्कित रावण का चित्र देखा। सीता ने सखियों के अनुरोध से रावण का चित्र बनाया था और बनाकर सो गयी थी। चित्र देखकर राम का सन्देह दृढ़ हुआ। वे सीता-त्याग का संकल्प कर चले गये। चन्द्रावलीकृत रामायणगाथा के अनुसार सीता कैकेयी की पुत्री कुकुआ के बहकावे में आकर रावण का चित्र खींचती है। सेरीराम के अनुसार कीकवी भरत और शत्रुघ्न की सहोदरी थी। उसके अनुरोध से पंखेपर चित्र खींच दिया। कीकवी ने सोती हुई सीता पर वह चित्र रख दिया और जाकर राम से कहा कि उन्होंने उस चित्र का चुम्बन किया था। राम ने विश्वास कर सीता को वन में भेज दिया। सीता परिचरों के साथ महरीसी कलि के पास चली गयी। सीता नें परमात्मा से प्रार्थना की थी कि मेरे सतीत्व के प्रमाणस्वरूप कीकवी गूंगी बन जाये तथा सभी पक्षी मौन रहें। परमात्मा ने सुन लिया। कीकवी १२ वर्ष तक गूंगी ही बनी रही। काश्मीरीरामायण के अनुसार राम की सहोदरी बहन ने वह चित्र बनवाया था। जावा के सेरतकाण्ड के अनुसार कैकेयी स्वयं रावण का चित्र खींचती है और सोती हुई सीता के पलङ्ग पर रख देती है। आनन्दरामायण (जन्मखण्ड सर्ग ३) के अनुसार कैकेयी सीता से रावण का चित्र खींचने का आग्रह करती है। सीता कहती है—मैंने केवल उसके दाहिने पैर का अंगूठा ही देखा था और अंगूठे का ही चित्र बना दिया। कैकेयी इसी के आधार पर रावण का पूरा चित्र बनवाती है और राम को बुलाकर स्त्रीचरित्र की आलोचना करती है। राम सीता को वन भेजने का वचन देते हैं। राम ने सीता की दाहिनी भुजा काटने को भी कहा था, पर लक्ष्मण वैसा न कर सकने

६४४ रामायणमीमांसा एकोनविंश के कारण देहत्याग का विचार कर रहे थे। इतने में विश्वकर्मा ने प्रकट होकर सीता का हाथ बनाकर उनको दिया। इतना ही नहीं, हिन्दोनेशिया के हिकायत महाराज रावण में कहा गया है—रावण-वध के बाद राम सात महीने तक लंका में रहे। रावण की एक पुत्री ने अपने पिता रावण का चित्र सोती हुई सीता की छाती पर रख दिया। सीता नींद में इस चित्र का चुम्बन करती है। उसी समय राम उसके पास आते हैं। क्रोध से सीता को कोड़ों से मारकर उसके बाल काटते हैं। लक्ष्मण को बुलाकर आदेश देते हैं कि सीता को मारकर प्रमाणस्वरूप उसका हृदय लाकर दो। लक्ष्मण सीता को उसके पितृगृह पहुँचा देते हैं। बकरी का हृदय लाकर राम को विश्वास दिलाते हैं कि सीता को मार दिया गया। बुल्के भी कहते हैं कि "वृत्तान्त का इतना उग्र रूप केवल वहाँ हो सकता है जहाँ रामचरित्र का आदर्श क्षीण हो गया है।" किन्तु वास्तविक रामचरित्र से विमुख कुछ भी अनर्गल कल्पना कर सकता है। इसका यही उदाहरण कहा जा सकता है। चन्द्र की चन्द्रिका, भानु की प्रभा तथा आनन्दसिन्धु के माधुर्य्य के समान राम से सीता सर्वथा अभिन्न हैं। मनसा, वाचा तथा कर्मणा वे सदा राम की अनन्य अनुरागिणी हैं। "अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा।" (वा० रा०) स्वप्न में भी अन्य की स्फूर्ति उनके मन में सम्भावित नहीं। राम सीता के हृदयेश्वर हैं, हृदय की गतिविधि जानते हैं। पारमार्थिक दृष्टि से दोनों ही सर्वज्ञ हैं, भ्रान्ति भी सम्भावित नहीं है। रावण-वध के बाद सीता, राम और लक्ष्मण लंका में रहे, यह कल्पना जैनों की रामकथाओं से उद्धृत हुई है। वाल्मीकिरामायण की दृष्टि से तो राम ने भरत से मिलने की उत्सुकता के कारण विभीषण का आतिथ्य भी नहीं ग्रहण किया था। फिर वे भरत, शत्रुघ्न, कौशल्या, सुमित्रा आदि की उपेक्षा कर लङ्का में महीनों कैसे रुके रह सकते थे ? सर्वथापि उक्त कथा निकृष्ट विकृति ही है। सिंहलद्वीप की कथा भी ऐसी ही है। उसे भी इसी कोटि की समझना चाहिये। रामकेर्ति (सर्ग ७५) के अनुसार एक रावण की कुटुम्बिनी राक्षसी सीता की सखी का रूप धारण कर रावण का चित्र खिंचवाती है और वह स्वयं उस चित्र में प्रविष्ट होती है। फलतः सीता प्रयत्न करने पर भी उस चित्र को मिटा नहीं पाती। निराश होकर सीता उसे पलङ्ग के नीचे छिपा देती है। राम उसपर लेटते हैं तो उन्हें तीव्र ज्वर हो जाता है। चित्र का पता लगने पर राम लक्ष्मण द्वारा सीता को मारकर कलेजा लाने का आदेश करते हैं। लक्ष्मण वन में सीता पर खड्ग चलाते हैं, खड्ग फूलों की माला बन जाता है। तब इन्द्र मृग का रूप धारणकर लक्ष्मण के सामने मर जाते हैं। लक्ष्मण उसका कलेजा निकाल कर ले जाते हैं। पश्चात् इन्द्र सीता को वाल्मीकि के आश्रम में ले जाते हैं। रामकियेन के अनुसार शूर्पणखा की पुत्री सीता से रावण का चित्र खिंचवाती है। ब्रह्मचक्र की कथा में शूर्पणखा ही छद्मवेश से सीता के पास आकर चित्र खिंचवाती है। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही सभी कथाओं का सुधार करना उचित है। अपनी अपनी लौकिक भावनाओं को जोड़कर जाने अनजाने सीता की पवित्र- कथा में विकृतियाँ जोड़ दी गयी हैं। उनका परिहार कर ही सीताचरित्र समझना उचित है। रामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार लक्ष्मण को सान्त्वना देते हुए सुमन्त्र ने दुर्वासा और दशरथ का संवाद सुनाया था। विष्णु ने भृगुपत्नी की हत्या की थी। भृगु ने विष्णु को शाप दिया था कि तुमको मनुष्य बनकर पत्नी- वियोग का दुःख भोगना पड़ेगा— "तस्मात् त्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनार्दन। तत्र पत्नीवियोगं त्वं प्राप्स्यसे बहुवार्षिकम् ॥"

अध्याय ] उत्तरकाण्ड [ ६४५ बुल्के इस अंश को भी प्रक्षेप कहते हैं। उसके हेतुरूप में वे कहते हैं "वाल्मीकिरामायण गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ में यह नहीं मिलता। भृगुपत्नी-वध का उल्लेख वैदिक साहित्य, महाभारत तथा रामायण में नहीं मिलता। पौराणिक साहित्य में भृगुशाप विष्णु के अवतार धारण का कारण कहा गया है।" किन्तु उनका यह कहना निःसार है, क्योंकि दाक्षिणात्य पाठ का भी प्रामाण्य अव्याहत ही है। रामायण, पुराण आदि वेद के ही उपबृंहण हैं। अतः रामायण तथा पुराण के आधार पर ही जानना चाहिये कि किसी लुप्त वैदिकशाखा में उसका उल्लेख होगा। वेद, पुराण, इतिहास, तन्त्र, आगम कहीं भी जो अंश मिलता है उन सबका समन्वित अर्थ ही वेदार्थ होता है। वाल्मीकिरामायण के उदीच्य, गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठों में तारा का शाप सीता-त्याग का परोक्ष कारण माना गया है। बालिवध के बाद तारा ने राम से कहा था कि मेरे शाप के कारण तुमको सीता की सङ्गति कम समय तक प्राप्त हो सकेगी— “अचिरेण तु कालेन त्वया बाणैरुपार्जिता। न सीता मम शापेन चिरं त्वयि भविष्यति ॥ आत्मनः शौचमाधाय पतिव्रतगुणा सती। याच्यमाना त्वया सीता पुनर्यास्यति भूतले॥” तारा ने कहा था कि बाणों द्वारा विजित सीता अधिक काल तक तुम्हारे पास नहीं रहेगी। अपने पवित्रता और पातिव्रत्य के गुण से युक्त वह तुम्हारे प्रार्थना करने पर भी भूतल में प्रवेश करेगी। वाल्मीकिरामायण गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ, माधवकन्दली, कृत्तिवासरामायण, बलरामदासरामायण, भावार्थरामायण आदि में भी ताराशाप का उल्लेख है। वस्तुतः अनेक कारणों से भी एक कार्य सम्पन्न होता है। अतः भृगुशाप तथा ताराशाप दोनों ही के सीता-त्याग के परोक्ष कारण होने में कोई विरोध नहीं है। पद्मपुराण (पातालखण्ड अध्याय ५७) के अनुसार किसी दिन अविवाहिता सीता अपने उद्यान में शुकों के एक जोड़े से रामकथा सुनती हैं। इस कथा को विस्तार से सुनने के लिए वे इन पक्षियों को पकड़वा लेती हैं। वे दोनों वाल्मीकि के आश्रम में सीखे हुए रामायण का गान करते हैं। कथा समाप्त होने पर सीता अपना परिचय देकर उनसे कहती है कि जब तक राम मुझे नहीं ले जाते, मैं तुम दोनों को यहाँ बन्द रखूँगी। पक्षी विनय करते हैं, विशेषतः इसलिए कि शुकी गर्भवती थी। सीता केवल नरपक्षी (नर) को छोड़ देती है। शुकी यह शाप देकर पिंजड़े में मर जाती है— “यथा त्वं पतिना सार्धं वियोजयसि मामितः। तथा त्वमपि रामेण विमुक्ता भव गर्भिणी॥ अपनी मादा की मृत्यु जानकर शुक ने भी संकल्प किया कि मैं अयोध्या में जन्म लेकर सीता के राम-वियोग का कारण बन जाऊँगा। वही गङ्गा में डूबकर रजक के रूप में अयोध्या में प्रकट हुआ। उसने राम की निन्दा की, जिससे राम ने सीता का त्याग किया। पउमचरियं (पर्व १०३) के अनुसार सीता ने पूर्वजन्म में सुदर्शन मुनि की निन्दा की थी। इसी लिए लोकापवाद की लक्ष्य बनीं। भावार्थरामायण (७।४८) के अनुसार सीता सोचती हैं कि मैंने वन में लक्ष्मण पर अधिक्षेप किया था; उसी का मुझे यह फल मिला है। इन सभी कारणों का योग भी सीता के वनवासदुःख का कारण हो सकता है। तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार वाल्मीकि क्षीरसागर पर तपस्या करने गये थे। सागर की लहरों से उन्हें कष्ट हुआ। उन्होंने सोचा कि क्षीर-सागर लक्ष्मी का जन्मदाता होने के कारण अभिमानी हो गया है, अतः

६४६ रामायणमीमांसा एकौनविंश मैं भी तपस्या द्वारा लक्ष्मी का पिता बनने का वर प्राप्त करूंगा। लक्ष्मी ने प्रकट होकर वाल्मीकि को वर प्रदान किया कि त्रेतायुग में जनकपुत्री बनकर मैं तुम्हारे आश्रम में पुत्री की तरह रहूँगी। जो भी हो, वाल्मीकिरामायण में सीता-त्याग का अभाव नहीं कहा जा सकता। अतः उत्तरकाण्ड और उसमें भी सीता-त्याग को प्रक्षेप कहना सर्वथा गलत है। सीतात्यागसम्बन्धी देश-विदेशों का विशाल साहित्य भी उसकी प्रामाणिकता सिद्ध करता है। "नह्यमूलं प्ररोहति।" मूल के बिना अङ्कुरादि-प्ररोहण नहीं बन सकता। अवास्तविक सीतात्याग तुलसीकृत गीतावली में राम की आज्ञा के अनुसार लक्ष्मण सीता को वन में न छोड़कर महर्षि वाल्मीकि के हाथों में सौंप देते हैं। दशरथ अपनी आयु पूर्ण होने के पहले स्वर्गवासी हुए थे। राम को उनकी शेष आयु मिली थी, परन्तु सीता के साथ पिता की आयु भोगना अनुचित समझ कर राम ने अपनी आयु समाप्त होने पर सीता को वन में भेज दिया था (गीताव० ७।२५)। अध्यात्मरामायण (७।२) के अनुसार भी सीतात्याग वास्तविक नहीं है। देवताओं ने कहा यदि आप पहले वैकुण्ठ पहुँच जाओगी तो रघुनाथ आकर हम सबको सनाथ करेंगे। राम ने कहा मैं लोकापवाद के बहाने तुम्हें त्याग दूंगा। वाल्मीकि के आश्रम में तुम्हारे दो पुत्र होंगे। बाद में तुम मेरे पास आकर शपथकर पृथ्वी में प्रवेश कर वैकुण्ठ जाओगी। रसिक-सम्प्रदाय के लोग भी सीतात्याग को अवास्तविक मानते हैं। आनन्दरामायण (५। सर्ग २, ३) के अनुसार सत्त्वमयी सीता राम के रूप में अदृश्य रहकर रजस्तमो- मयी स्वकीय छाया बनाकर बाह्यरूप में दृश्य थी। उन्हीं का वाल्मीकि आश्रम में लोकापवाद के कारण निवास हुआ था। बुल्के उपसंहार में सीतात्याग एवं उसके विकास, त्याग के कारणों का क्रमिक विकास मानते हैं। अन्त में छायामयी सीतामात्र के परित्याग को विकास की परिणति मानते हैं, परन्तु उनकी यह कल्पना भी प्रमाण- विरुद्ध ही है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीतात्याग एक व्यावहारिक घटना है। उसका दृष्ट कारण लोकापवाद है एवं अदृष्ट कारण भृगु-शाप आदि हैं। राम का सीता के प्रति पूर्ण अनुराग था। वह त्याग भी बहिरङ्ग ही था। वस्तुस्थिति के अनुसार सीता और राम अभिन्न तत्त्व थे। आनन्दसुधासिन्धु राम थे एवं माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी सीता थीं। गङ्गाजल से जैसे उसकी शीतलता, मधुरता और पवित्रता का पार्थक्य नहीं हो सकता है वैसे ही राम से सीता का पार्थक्य नहीं हो सकता था, अतः सीता का लङ्कानिवास या वाल्मीकि के आश्रम में निवास उनकी छाया का ही निवास समझना उचित है। कालक्रम से मूल ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण के विपरीत अनेक प्रकार की विकृतियाँ कल्पनामात्र हैं। कुश-लव चरित ७३५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "प्राचीनतम रामकथाओं में कुश-लवसम्बन्धी सामग्री का नितान्त अभाव था। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड के अन्त में राम के दस हजार वर्ष के राज्यकाल का और उनके पुत्रों तथा भाइयों के साथ बहुत से यज्ञ करने का उल्लेख किया गया है, किन्तु कुश और लव का संकेत नहीं है। महाभारत की चारों रामकथाओं, हरिवंश, ब्रह्मपुराण तथा नृसिंहपुराण में कुश-लव का उल्लेख नहीं है।" बुल्के का उक्त कथन भी सारशून्य तथा दुरभिसन्धिपूर्ण है। वर्तमान वाल्मीकिरामायण ही प्राचीनतम राम-कथा है। उसमें कुश और लव की कथा वर्णित है ही। युद्धकाण्ड के अन्तिम अध्याय में श्लोक ९१ से लेकर १०८

तक में अभिषेकोत्तर रामकथा का वर्णन है। इतने संक्षेप में कुश-लव के जन्म आदि की कथा कैसे हो सकती है ? वाल्मीकि की दृष्टि से उत्तरकाण्ड में सविस्तर कुश-लव की कथा का वर्णन करना ही था। इसके अतिरिक्त सभी पुराणों की दृष्टि से राम के अनन्तर भी राम के उत्तराधिकारी अयोध्या के राजा हुए ही हैं। अतः ऐतिहासिक दृष्टि से भी कुश और लव का होना सिद्ध है । वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में भी कुश-लव का वर्णन है ही। “ईजे बहुविधैर्यज्ञैः ससुतभ्रातृबान्धवः ।” (वा० रा० ७।१२८।१९७) यहाँ सुत शब्द कुश और लव का वाचक स्पष्ट है । बुल्के भी यह मानते ही हैं कि 'पुत्रों तथा भाइयों के साथ राम ने यज्ञ किये थे ।' जब पुत्र थे तो उनके कुछ नाम भी होंगे ही। यदि कुश-लव उनके नाम नहीं तो क्या नाम थे ? उपस्थित को छोड़कर अनुपस्थित की कल्पना असङ्गत ही है। पद्मपुराण, रामाश्वमेध आदि में कुश-लव का वर्णन है। रघुवंश आदि में भी उनका वर्णन है। हरिवंश आदि में लाघव की दृष्टि से ही कुश-लव के चरित का अभाव है ।

राम का वैष्णव तेज में प्रवेश बुल्के यह भी कहते हैं कि 'महाभारत के रामोपाख्यान को छोड़कर उक्त रचनाओं में राम की मृत्यु का भी उल्लेख है।' परन्तु यह भी निरर्थक है। लौकिक दृष्टि से मृत्यु शब्द का व्यवहार किये जाने पर भी उत्तरकाण्ड- रामायण के अनुसार सरयू का जलस्पर्शमात्र करके राम ने विष्णुरूप धारण कर लिया। सूर्य के समान दीप्यमान राम गृह से निकले। राम के दक्षिण पार्श्व में पद्माश्री एवं वामभाग में महीदेवी उपस्थित हुईं। व्यवसाय शक्ति उनके आगे एवं उसके सहकारी नाना प्रकार के बाण एवं धनुष तथा अन्य आयुध पुरुष-विग्रह धारण करके स्थित थे। वेद तथा सर्वरक्षिणी गायत्री एवं तन्मूल ओंकार तथा वषट्कार मूर्तरूप में राम का अनुगमन कर रहे थे। वृद्ध, बालक आदि सहित सान्तःपुर भरत, शत्रुघ्न, अग्निहोत्रादि सहित मन्त्री आदि सभी राम के अनुगामी हुए (वा० रा० ७।१०९।५-१०) । ब्रह्मा ने "आगच्छ विष्णो" कहकर स्वागत किया और प्रार्थना की कि चाहे अपने वैष्णव तेज में अथवा सनातन निर्गुण ब्रह्मरूप में प्रवेश करें । आप महद्भूत ब्रह्म अजर अक्षय अचिन्त्य हैं । विशालाक्षी ज्ञानशक्ति माया को छोड़कर आपको कोई नहीं जानते हैं— “त्वं हि लोकगतिर्देव ! न त्वां केचिद्विजानते ॥ ऋते मायां विशालाक्षीं तब पूर्णपरिग्रहाम् । (वा० रा० ७।११०।१०,११) पितामह की प्रार्थना सुनकर सशरीर सहानुज राम अपने वैष्णव तेज में प्रविष्ट हो गये। अर्थात् शरीर त्यागे बिना विष्णुरूप में प्रकट हुए। उन विष्णुरूपापन्न राम का साध्य, मरुद्गण, इन्द्र, अग्नि सहित सभी देवताओं ने एवं ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सरा, सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव और राक्षसों ने पूजन किया— “विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः ॥ ततो विष्णुमयं देवं पूजयन्ति स्म देवताः ।” (वा० रा० ७।११०।१२,१३) तिलक टीका के अनुसार यज्ञज्वाला के तुल्य राम उपेन्द्र (विष्णु) के तेज में प्रविष्ट हुए । एतावता भगवान् का मनुष्यादि देहरूप से गृहीत स्वरूप दिव्य तेजोरूप हो है । तेज में प्रवेश करने से जल में जल के समान सब तेजोमय ही हो गये। एतावता भरतादि का भी सशरीर ही प्रवेश सिद्ध है । वस्तुतः ईसाई बुल्के ईसाइयत की दृष्टि से ही अपनी दुष्कल्पनाओं द्वारा रामायण को दूषित करने, राम को साधारण मनुष्य एवं उनकी मृत्यु सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। जहाँ-जहाँ राम को विष्णु या ब्रह्मरूप कहा

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६४८ रामायणमीमांसा एकोनविंश गया है, उन सब स्थलों को प्रक्षेप सिद्ध करने का उन्होंने घोर परिश्रम किया है। प्रामाणिक काण्डों में भी राम को ब्रह्मरूप कहा गया है। पर उन्हें भी वे अप्रामाणिक कहने में नहीं हिचकते हैं। ७३६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “बालकाण्ड के चतुर्थ सर्ग में कुशीलव की चर्चा है—'कुशीलवौ भ्रातरौ राजपुत्रौ" राम के अयोध्या लौटने के पश्चात् वाल्मीकि ने समस्त रामचरित के विषय में काव्यरचना की थी और उसे दो कुशीलव राजपुत्रों को सिखाया था। बाद में ये दोनों जाकर सभाओं में रामायण का गान करने लगे— “ऋषीणाञ्च द्विजातीनां साधूनां च समागमे ।" किसी दिन राम ने दोनों को अयोध्या के राजमार्ग में देखा और अपने महल में ले जाकर भरत आदि भाइयों के साथ रामायण का गान सुना। इस सर्ग में कहीं भी कुश और लव का अलग उल्लेख नहीं है। केवल दो भाइयों का वर्णन है जो राजपुत्र कुशीलव अर्थात् गायक हैं। रामायण के तीनों पाठों में ये दोनों राम के पुत्र माने गये हैं, लेकिन जिस श्लोक में इसका उल्लेख किया गया है वह तीनों पाठों में भिन्न है। अतः प्रतीत होता है कि यह तथ्य बाद में तीनों पाठों में जोड़ा गया है। उपर्युक्त वृत्तान्त के उत्तरार्ध में जहाँ राम दोनों का गान सुनते हैं कहीं भी इसका निर्देश नहीं किया गया है कि ये इनके पुत्र हैं। इससे यह अनुमान दृढ़ हो जाता है कि पहले इन दोनों कुशीलवों तथा राम के पितापुत्र सम्बन्ध का उल्लेख नहीं किया गया था।" यह भी बुल्के की दुर्भावना का ही दुष्परिणाम है, क्योंकि उनके अनुसार भी कुश और लव राम के ही पुत्र थे। वाक्यशेष के अनुसार वाक्यार्थ एवं शब्दार्थ का निर्णय मीमांसासंमत है। इसी न्याय से यव वसन्त में मोदमान कणिशशाली ओषधि को कहा जाता है— “वसन्ते सर्वशस्यानां जायते पत्रशातनम्। मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः ॥” पूर्वोक्त “ईजे बहुविधैर्यज्ञैः" श्लोक युद्धकाण्ड में राम के पुत्रों का वर्णन है। बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड में उनका नाम कुश-लव उक्त है। बालकाण्ड में बुल्के के अनुसार कुश-लव को राजपुत्र कहा गया है। वे किस राजा के पुत्र थे, क्यों वे रामायण के गान में प्रवृत्त हुए ? इसका स्पष्टीकरण उत्तरकाण्ड में किया गया है। वहाँ महर्षि वाल्मीकि ने ही स्पष्टरूप में कहा था कि ये कुश और लव दोनों ही पुत्र आपके हैं। “इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ तु यमजातको। सुतौ तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥” (वा० रा० ७।९६।१७) उत्तरकाण्ड में स्पष्ट कथा भी है कि गर्भिणी सीता लक्ष्मण द्वारा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के समीप में छोड़ी गयी थीं। महर्षि वाल्मीकि उन्हें अपने आश्रम में ले गये। सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया। उसी रात्रि में उस आश्रम में शत्रुघ्न भी पहुँचे थे। महर्षि ने ही उन बालकों का संस्कार करके उन्हें वेद, वेदाङ्ग, धनुर्वेद आदि पढ़ाया और वेद का उपबृंहण करने के लिए रामायण का अध्ययन कराया था। क्रौञ्चवध से क्रौंची के विलाप से महर्षि वाल्मीकि में करुण रस का उद्रेक अकस्मात् नहीं हुआ था। किन्तु उस समय महर्षि के आश्रम में सीता निवास करती थीं। उनका करुण क्रन्दन क्रौंची के करुण क्रन्दन के तुल्य था। इसी संस्कार से महर्षि प्रभावित हुए थे। “सीतायाश्चरितं महत्" के अनुसार महर्षि ने सीता के लोकापवाद के निवारणार्थ ही स्पष्ट सीताचरित्र का वर्णन किया था। उसके प्रचारार्थ ही महर्षि ने जानकी के पुत्रों एवं अपने शिष्यों कुश और लव को रामायण-गानार्थ नियुक्त किया था। गानविद्योपजीवी कुशलव एक विशेष जाति के होते हैं।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६४९ उनमें 'कुशीलवौ' द्विवचन प्रयोग नहीं होता । परन्तु ये दोनों सीता के पुत्र हैं। इसमें 'कुशीलवौ' कुशी शब्द को पृषोदरादि मानकर सिद्ध किया गया है, "कुशशब्दस्य कुशोभावः पृषोदरादित्वात्" (वा० रा० १।४।४ तिलकटीका) । फिर भी दुराग्रहवशात् बुल्के रामपुत्र कुश और लव को गानविद्योपजीवी कहने का हठ करते हैं। यह भी उत्तरकाण्ड में प्रसिद्ध है कि वे गानविद्योपजीवी नहीं थे। उन्होंने राम द्वारा दिलाये हुए बहुभार सुवर्ण को स्वीकार नहीं किया था और कहा था कि हम लोग कन्द, मूल और फल खानेवाले वनवासी हैं। तुम्हारे सुवर्ण हिरण्य से हमें क्या प्रयोजन ? "दीयमानं सुवर्णं तु नागृह्णीतां कुशीलवौ । वन्येन फलमूलेन निरतौ वनवासिनौ ॥ सुवर्णेन हिरण्येन किं करिष्यामहे वयम् ॥" ( वा० रा० ७।९४।१९,२० ) वहीं उनको प्रतीतिक दृष्टि से मुनिदारकौ कहा गया है (श्लोक २२) । इतने पूर्वापरसम्बद्ध शब्दों से स्पष्टतः सिद्ध है कि कुश और लव दोनों राम के पुत्र ही 'कुशीलवौ' शब्द से निर्दिष्ट किये गये हैं। अतः तत्सम्बन्धी सामग्री को विकास या प्रक्षेप मानना सर्वथा निराधार ही है। बुल्के कई जगह तीनों पाठों में न होने से कई अंशों को प्रक्षेप कहते हैं। पर यहाँ रामायण के तीनों पाठों में कुश और लव दोनों राम के पुत्र माने गये हैं। तब भी बुल्के उसे प्रक्षेप मानते हैं। यह केवल दुराग्रह ही है। ७३७ वें अनु० में बुल्के स्वयं कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड में सीता के वाल्मीकि आश्रम में दो पुत्रों को जन्म देने का वर्णन है। जिनका नाम वाल्मीकि ने कुश और लव रखा था (सर्ग ६६) । दोनों वाल्मीकि के ( वेदाध्ययन आदि करने के कारण) शिष्य बनते हैं। राम के अश्वमेध के अवसर पर रामायण का गान करते हैं। तत्पश्चात् राम दोनों का परिचय प्राप्त कर सीता को बुलाने भेजते हैं। सीता के भूमि-प्रवेश के बाद कुश और लव उत्तरकाण्ड सुनाते हैं ( वा० रा० ७।सर्ग ९३-९९) ।" रामायण के अन्त में ऐसा भी उल्लेख है कि कुश को कोशल देश तथा कुशावती राजधानी दी गयी। लव को उत्तरकोशल तथा श्रावस्ती प्राप्त होती है। ( वा० रा० ७।सर्ग १०७,१०८) । इन सब अंशों को अप्रामाणिक माना जाय तभी बुल्के की अटकल विश्वसनीय हो सकती है। पर कोई भी समझदार बुल्के की निस्सार कल्पनाओं के आधार पर इन प्रामाणिक सर्गों एवं श्लोकों को अप्रामाणिक कैसे मानेगा ? ८२

विंश अध्याय रामचरितसिंहावलोकन वेदों तथा पुराणों में अवतारवाद प्रसिद्ध है । विभिन्न शिव, विष्णु आदि देवताओं के भी अवतार होते हैं । विशेषतः विष्णु के तो असंख्य अवतार होते हैं । श्रीराम तो साक्षात् अवतारी विष्णु ही थे— “भवान्नारायणो देवः ।” “आदिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥ ( वा० रा० ७।११९।१३,१८ ) विष्णुपरक वेदमन्त्रों की व्याख्या जो पृथिवी निमित्त पृथिवी में उपार्जित कर्मफल भोग के लिए भूरादि तीन लोकों का निर्माण करते हैं तथा उत्कृष्टतर उपासकों के सहस्थान सत्यलोक को ध्रुवरूप से स्थापित करते हैं, जो स्वरचित लोकों का त्रेधा क्रमण करते हुए अतिप्रभूत गीयमान होते हैं उनके वीर्य का मैं वर्णन करता हूँ । “विष्णुर्गोपा अदाभ्यः अतो धर्माणि धारयन् ।” ( ऋ० सं० १।२२।१८ ) पृथिवी के पालक विष्णु अहिंसनीय, अप्रधृष्य हैं । वे ही विविध धर्मों को धारण करते हैं । अन्तर्यामी रूप से सभी धर्मों तथा प्रपञ्चकार्यों के धारक हैं । “इन्द्रस्य युज्यः सखा ।” ( ऋ० सं० १।२२।१९ ) विष्णु इन्द्र के उपेन्द्ररूप से सदा अभिन्नहृदय सखा हैं । “सदा पश्यन्ति सूरयः ।” ( ऋ० सं० १।२२।२० ) विद्वान् सदा ही उनका ब्रह्मरूप से दर्शन करते हैं । “तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत् परमं पदम् ॥” ( ऋ० सं० १।२२।२१ ) व्यवहारातीत निवृत्तिनिष्ठ जागरूक विद्वान् विष्णु के स्वरूपभूत परम पद ( प्राप्य ) तत्त्व को जानते हैं । “दिवो वा विष्ण उत महो वा उरोन्तरिक्षम् । उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वाप्रयच्छ दक्षिणा दोतसव्यात् ॥” (यजुः सं० ५।१९) मेधातिथि कहते हैं हे विष्णो ! पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश से विविध मणि, मुक्तादि धन-सम्पत्ति अपने दोनों हस्तों को भरकर मुझे प्रदान करो । “यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कम्भायदुत्तरं सधस्थम् ॥” (ऋ० सं० १।१५४।१) “य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा ।” ( ऋ० सं० १।१५४।४ ) जिस विष्णु ने पृथ्वीसम्बन्धी रञ्नात्मक क्षित्यादि लोकत्रयसम्बन्धी अग्नि, वायु और आदित्य रूपों का विशेषरूप से निर्माण किया था । “योस्यां पृथिव्यां द्वितीयस्यां तृतीयस्यां पृथिव्याम् ।” ( तै० सं० १।२।१२।१ ) के अनुसार अन्तरिक्ष आदि भी पृथिवी के ही भाग कहे गये हैं । अतः भूः, भुवः और स्वः तीनों लोक पृथिवीशब्दवाच्य हैं । जिस विष्णु

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५१

ने अतिविस्तीर्ण लोकत्रय के आश्रयभूत अन्तरिक्ष को उन सबके आश्रयरूप से बनाया है अथवा जिसने पृथिवीसम्बन्धी अधस्तन सप्त लोकों को बनाया है और जिसने उत्तरभावी पुण्यात्माओं के निवासयोग्य भूरादि ऊपर के सप्त लोकों को बनाया है, उन विष्णु का मैं गुणगान करता हूँ। मन्त्रद्रष्टा दीर्घतमा कहते हैं—श्रीविष्णु ने इन पार्थिव लोकों का निर्माण किया है और आकाशमण्डल को भी उन्होंने धारण कर रखा है। “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण ।” विष्णु अपने पराक्रम से स्तूयमान होते हैं। विष्णु ने त्रिधातु पृथिवी, द्युलोक और सभी भुवनों को धारण कर रखा है। “तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति । उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥” ( ऋ० सं० १ ) मैं उनके प्रियधाम को प्राप्त करना चाहता हूँ जहाँ उनकी उपासना में निरत सदा आनन्दमग्न रहते हैं। उनके परमधाम में माधुर्य का उत्स ( निर्झर ) रहता है। वे ही सभी सुकृतियों के बन्धुभूत हितकारी हैं। जो उन्हें प्राप्त कर लेते हैं उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती, इसलिए वे सुकृतियों के बन्धु हैं। “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।” ( शु० यजुः ५।२०; ऋ० सं० १।१५४।२ ) वह महानुभाव अपने वीर्य ( वीरकर्म ) से सभी के द्वारा स्तूयमान होते हैं। जैसे अपने विरोधियों का सफाया करने के लिए ढूंढ़नेवाला भीम ( भीतिजनक ) तथा कुत्सित ( हिंसादि ) कर्म करनेवाला, दुर्गम प्रदेश गन्ता पर्वतादि उन्नतप्रदेश में रहनेवाला सिंह अपने वीर्य से ही संस्तुत होता है वैसे ही विष्णु भी शत्रुओं के अन्वेष्टा, भयानक शत्रुवधादि कार्य करनेवाले तथा लोकत्रय में सञ्चारी एवं उच्छ्रित लोक में स्थित रहने से सर्वसंस्तुत हैं। जिन विष्णु के तीन संख्यावाले विस्तीर्ण पादविक्षेपों में सम्पूर्ण विश्व तथा सम्पूर्ण भूत आश्रित होकर निवास करते हैं, वह विष्णु अपने पराक्रम के प्रभाव से स्तूयमान होते हैं। “ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै ।” ( ऋ० १।१५४।६ ) इस मन्त्र में यजमान एवं पत्नी को सम्बोधित करते हुए कहा गया है कि तुम दोनों के गन्तव्यरूप उन सुखवासयोग्य स्थानों की हम कामना करते हुए विष्णु की प्रार्थना करते हैं, जहाँ अत्यन्त उन्नत आश्रयणीय अत्यन्त प्रकाशयुक्त किरणें होती हैं अथवा बड़े शृङ्गवाली आश्रयणीय गायें टहलती रहती हैं। उन स्थानों के आधारभूत दिव्य गोलोक में बहुत महात्माओं द्वारा गीयमान तथा सर्वकामवर्षी विष्णु का निरतिशय परम उत्कृष्ट प्राप्य पद स्वरूप अतिप्रभूतरूप से भासमान होता है । “अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ।” ( ऋ० सं० १।१५४।६ ) वर्षणशील उरुगाय विष्णु का परमपद देदीप्यमान होता है। 'महेशुराय विष्णवे' पूजनीय वीर विष्णु की पूजा करो । “त्रातुरवृकस्य मीढुषः ।” ( १।१५५।४ ) “युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम् ।” ( १।१५५।४ ) “यः पूर्व्याय वेधसे नवीयसे सुमज्जानये विष्णवे ददाशति । यो जातमस्य महतो महि ब्रवत् सेदु श्रवोभिर्युज्यं चिदभ्यसत् ॥” (ऋ० सं० १।१५६।२)

६५२ रामायणमीमांसा विंश “तमु स्तोतारः पूर्व्यं यथा विद ऋतस्य गर्भं जनुषा पिपर्त्तन । आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन ।।' (ऋ० सं० १।१५६।३) “महस्ते विष्णो सुमति भजामहे ।” ( ऋ० सं० सं० १।१५६।३ ) “न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप ।” ( ऋ० सं० ७।९९।२ ) “जनयन्ता सूर्य्यमुषासमग्नि ।” ( ऋ० सं० ७।९९।४ ) “क्षयन्तमस्य रजसः पराके ।” ( ऋ० सं० ७।१००।५ ) “पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।” ( ऋ० सं० १०।९०।३ ) दीर्घतमा ऋषि द्वारा दृष्ट १५५ वें सूक्त में भी यही कहा गया है— हे अध्वर्यु आदि ऋत्विजो, आप लोग पालनस्वभाव पातव्य सोमरूप अन्न विष्णु के लिए सम्पादित करो अर्थात् सोम से विष्णु की अर्चा करो । विष्णु पूर्णकाम होने पर भी भक्तकृत स्तुति चाहते हैं । वे महान् एवं शूर (विक्रान्त ) हैं । व्यापनशील विष्णुदेव हैं । महानुभाव विष्णु के पौंस्य उत्कृष्ट पराक्रम की मैं स्तुति करता हूँ । विष्णु सबके स्वामी, त्राता, अहिंसक तथा हितैषी हैं । सेक्ता नित्य तरुण हैं । विष्णु सदा सर्वत्र मिश्रणशील अथवा नित्य तरुण हैं और वे अकुमार अनल्प महान् हैं । भक्तों के आह्वान पर यज्ञदेश में आते हैं । जो मनुष्य पूर्व्य पूर्वकालीन नित्य वेधा जगत्कर्त्ता नित्य नूतन अत्यन्त रमणीय स्तुत्य स्वयमेव प्रादुर्भूत होनेवाले हैं अथवा स्वयं प्रहृष्ट तथा भक्तों को प्रहृष्ट करनेवाले सुमति महालक्ष्मीरूपा जिनकी पत्नी है उन विष्णु को हवि आदि प्रदान करता है और उन महानुभाव के महत्त्वपूर्ण जन्मादि का वर्णन करता है, वह दाता एवं स्तोता भी अन्नों एवं कीर्त्तियों से युक्त होकर उनके दिव्य पद को आभिमुख्येन प्राप्त करता है । हे स्तोतृगण ! उन पूर्व्य अनादिसिद्ध तथा यज्ञरूप से आविर्भूत या उदक-कारण हिरण्यगर्भ विष्णु को जानो और स्वतः स्तोत्रादि से उनको प्रसन्न करो और इन महानुभाव विष्णु के सभी द्वारा नमनीय सर्वात्मताप्रतिपादक विष्णु इस नाम को पुरुषार्थप्रद जानते हुए समन्तात् कीर्त्तन करो । अथवा द्रव्य, देवता आदि यज्ञरूप से विष्णु ही परिणत होते हैं यह जान कर उनकी स्तुति करो । ऋषि विष्णु का साक्षात्कार करके कहते हैं—हे विष्णो ! सर्वात्मक देव ! हम लोग आप महान् विष्णु की सुमति सुन्दर स्तुति या शोभन बुद्धि को भजते हैं । हे विष्णो ! आपकी महिमा या महत्त्व का अन्त जायमान या जात कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता है । आपकी महिमा का अन्त नहीं है । अतः उसका अन्त कोई भी नहीं जान सकता है । आपने दर्शनीय महान् द्युलोक को ऊपर ही धारण कर रखा है । आपकी धारणा शक्ति से ही द्युलोक नीचे नहीं गिरता है । भूमि की प्राची आदि दिशाओं को भी आपने ही धारण कर रखा है । हे इन्द्र एवं विष्णो ! आपने यजमान के लिए विस्तृत स्वर्गलोक बना रखा है । सर्वप्रेरक सूर्य तथा तमो- निवारक उषाकाल तथा असुरों से आवृत अग्नि को आप दोनों आविर्भूत करते हैं । हे नरी नेतारौ ! आपने बृषशिप्रदास नामक उपक्षपिता असुर की मायाओं का हनन किया था । इसी प्रकार ७।१०० सूक्त के पाँचवें मन्त्र में कहा गया है—हे शिपिविष्ट रश्मियों द्वारा आविष्ट विष्णो, आपका वह प्रसिद्ध विष्णु नाम प्रख्यात है । वह सभी स्तुतियों का तथा सभी हवि का स्वामी है । ज्ञातव्य अर्थों का जाननेवाला मैं आपकी प्रकृष्ट स्तुति करता हूँ । मैं अबुद्ध साधारण प्राणी इस लोक से दूर प्रपञ्चातीत दिव्य धाम में निवास करनेवाले प्रबुद्ध विष्णु की स्तुति करता हूँ । “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।” (शु० यजु० ५।२० )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५३ भगवान् विष्णु अपने वीर्य ( पराक्रम ) से स्तूयमान होते हैं। वह कुचर अर्थात् परब्रह्मस्वरूप में रहते हुए पृथ्वी पर राम, कृष्ण आदि रूपों से विचरण करते हैं। नृसिंह, वराह आदि रूपों से पर्वतों में रहते हैं। उब्बट के अनुसार अपहतपाप्मा, इन्द्र, परमेश्वर इन विशेषणों से विशेषित हैं। मत्स्य, कूर्मादि रूप में इन्द्र—"पृथिव्यां चरति" उब्बट । “प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते” ( यजुः ३१।१९ ) प्रजापति परमात्मा गर्भ के भीतर उत्पन्न न होता हुआ भी बहुत प्रकार से जायमान होता है। ब्रह्मवैवर्त में इसी का विवरण है— “पूर्णे च दशमे मासि गर्भः पूर्णो बभूव ह। बभूव स चलस्पन्दा जडजम्पा च नारद ॥ गर्भे च वायुना पूर्णे निर्लिप्तो भगवान् स्वयम् । हृत्पद्मदेशे देवक्या ह्यधिष्ठानं चकार सः ॥” (श्रीकृष्णजन्मख० ७।४३,४४) दसवें महीने में देवकी का गर्भ पूरा हो गया। गर्भ वायु से पूर्ण हो गया। परन्तु भगवान् ने वायु से निर्लिप्त देवकी के हृदय को अपना अधिष्ठान बनाया। अन्त में देवकी के पेट से वायु निकल जाती है। उसके हृत्पद्म से दिव्यरूप धारण कर भगवान् कृष्ण प्रकट होते हैं। ‘तत्रैव भगवान् कृष्णो दिव्यं रूपं विधाय च। हृत्पद्मकोशाद् देवक्या हरिराविर्बभूव ह॥’ (७।७२) यही भगवान् का दिव्य जन्म और कर्म है— ‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’ ( गीता ४।९ ) “एष ह देवः प्रदिशो नु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥” (यजुःसं० ३२।४) इसी का अर्थ गीता में व्यक्त है। मैं अज अव्ययात्मा तथा सभी भूतों का आत्मा होते हुए भी सच्चिदा- नन्दलक्षणा प्रकृति का आश्रयण करके अपनी माया से राम, कृष्ण आदि रूपों से आविर्भूत होता हूँ— ‘अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥” (गीता ४।६) “भद्रो भद्रया सचमानः आगात् स्वसारं जारो अभ्येति । पश्चात् सुसकेतैर्द्युभिर्वि तिष्ठन् रुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात् ॥” (ऋ० सं० १०।३।३) रामभद्र राम का नाम प्रसिद्ध है। सत्यभामा के जैसे सत्य और भामा दोनों ही नाम माने जाते हैं वैसे ही यहाँ भी भद्र पद से राम का बोध होता है, क्योंकि व्याकरण के अनुसार पूर्वपद या उत्तरपद का लोप हो जाता है— “विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्लोपः ।” (वार्तिक ५।३।६३) इसका अर्थ यह है कि भद्रा सीता से सेव्यमान रामभद्र वन में आये। पश्चात् राम के परोक्ष में जार रावण स्वसृतुल्य स्वसा सीता को ग्रहण (हरण) कर ले गया। शास्त्रों में उल्लेख है कि परदारा में मातृवत्, स्वसृवत् तथा दुहितृवत् बर्ताव करनेवाले स्वर्गगामी होते हैं।

६५४ रामायणमीमांसा विंश “मातृवत् स्वसृवच्चैव तथा दुहितृवच्च ये । परदारेषु वर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥” रावण के मारे जाने पर अग्निश्रेष्ठ भानुमद्भिर् द्युभिर्हरिः सीतया रामदारा सीता के साथ राम के संमुख अपने श्वेतवर्ण तेज के साथ आये। 'इदं विष्णुर्विचक्रमे' ( ऋ० सं० १।२२।१७ ) में सायण का कहना है कि “विष्णोस्त्रिविक्रमावतारे पादत्रयक्रमणस्य प्रसिद्धत्वात्” विष्णु के त्रिविक्रमावतार में पादत्रयक्रमण प्रसिद्ध है । ‘ब्राह्मणो जज्ञे दशशीर्षो दशास्यः’ (अथर्वसं० ४।६।१) दससिरवाला ब्राह्मण ही -रामायण तथा पुराणों में रावणरूप से प्रसिद्ध है । • अवतारवाद एवं सीता-राम का महत्त्व “मनवे ह वै प्रातः । ....तस्यावनेनिजानस्य मत्स्यः पाणी आपेदे ।” (श० ब्रा० १।८।१।१) अवनेजन करते हुए मनु के हाथों में मत्स्य आ गया । इससे मत्स्यावतार सिद्ध होता है । “स यत् कूर्मो नाम ।” (श० ब्रा० ७।५।१।५) यह कूर्मावतार का मूल है । वाराहावतार— “आपो वा इदमग्रे वाराहो भूत्वाहरत् ।” (तै० सं० ७।१।५।१) इसमें वाराहावतार का सङ्केत है । “वराहेण पृथिवी संविदाना सूकराय जिहीते मृगाय ।” (अथर्वसं० १२।१।४६) “उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना ।” “भूमिर्धेनुर्धरणी लोकाधारिणी ।” (तै० आ० १०।१) नृसिंहावतार— “प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः ।” (ऋ० १।१५४।२) “वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्नो नरसिंहः प्रचोदयात् ।” (तै० आ० १० परिशिष्ट) इदं विष्णुर्विचक्रमे”—यह वामनावतार का सङ्केत है । त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः ॥” (ऋ० १।२२।१८) “यो रजांसि विममे पार्थिवानि त्रिश्चिद्विष्णुः ।” (ऋ० सं० ६।४९।१३) “वामनो विष्णुरास ।” (श० ब्रा० १।२।५।५) “क्रोधाद्विष्णुरुुरुगायो विचक्रमे ।” (तै० ब्रा० ३।१।२) परशुराम ( ऋ० सं० १०।११०।१ ) मन्त्र के ऋषि हैं । “कालियो नाम सर्पो नवनागसहस्रबलः । यमुनाह्रदे स जातो यो नारायणवाहनः ॥” (ऋ० सं० ७।५५।४ खिल)

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५५ गजेन्द्रमोक्ष की कथा केवल श्रीमद्भागवत और वामनपुराण में ही उपलब्ध है। यह उपाख्यान अतिप्राचीन हैं, क्योंकि भरहूतस्तूप के प्राकार में अङ्कित गजकुलीरजातक का चित्र इसी का अनुकरण है। वह गजकुलीरजातक का चित्र ई० पू० २ श० का है। श्रीभागवत एवं वामनपुराण उस चित्र से सहस्रों वर्ष पूर्व के हैं तथा उनमें वर्णित रामकथा और राम का विष्णु होना इससे हजारों वर्ष पूर्व स्वतः सिद्ध हो जाते हैं। कौशाम्बी ई० पू० २ श० में रावण के द्वारा सीता-हरण तथा अशोकवन में सीता की पक्की मिट्टी की बनी चित्रभित्ति प्राप्त हुई है। भरहूत और साँचीस्तूप ई० पू० २ श० में ऋषिभृंग एवं श्याम (सिन्धुवध) जातक के चित्र हैं। वे भी रामायण की कहानी की अनुकृतिस्वरूप हैं। “आपो वा इदमासन् सलिलमेव । स प्रजापतिर्वराहो भूत्वोपन्यमज्जत । तस्य यावन्मुखमासीत् । तावतीं मृदमुदहरत् । सेयमभवत् । यद्वराहविहतं भवत्यस्यामेवैनं प्रत्यक्षमाधत्ते । वराहो वा अस्या॒ामन्नं पश्यति । तस्मा इयं विजिहीते यद्वराहविहृतं भवति । तदेवान्नमवरुन्धे । यत् तदादत्त तदादितिर्यदप्रथत् तत्पृथिवी । यदभवत्तद्भूमिर्यद्वराहविहृतं भवति प्रथत एव प्रजया पशुभिः ।” ( काठ० सं० ८।२।४ ) यह समस्त जगत् अपनी उत्पत्ति के पहले आप (जल) ही था। प्रजापति वराह होकर जल में निमग्न हुए। उस वराह का जितना मुख था उतनी मृद् (पृथिवी) का उसने उद्धरण किया। वराह द्वारा खोदी हुई मिट्टी ही पृथ्वी है। वराहविहृत पृथ्वी पर अग्नि का आधान करना आदिवराह उद्धृत पृथ्वी पर ही आधान करना है। वराह पृथ्वी को खोदता हुआ उसमें अन्न देखता है। उसके लिए पृथ्वी अपना रूप विवृत कर देती है। वही अन्न का अवरोध करती है। वही फैल गयी, इसलिए पृथ्वी हुई जो 'अभवत्', उत्पन्न हुई इसीलिए भूमि कही गयी। जो वराह-विहृत मृत्तिका का आधान करता है वह प्रजा तथा पशु आदि द्वारा संसार में फैल जाता है, विख्यात होता है। प्रशंसा के लिए यहाँ प्रसिद्ध वराहावतार के द्वारा उद्धृत मृत्तिका-दृष्टि सामान्य वराहोद्धृत मृत्तिका में की गयी इससे शतपथ की दृष्टि में वराहावतार सिद्ध है। “इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे ।” ( ऋ० सं १।२२।१७ ) “विष्णुः त्रिविक्रमावतारधारी । इदं प्रतीयमानं सर्व विश्वमुद्दिश्य । वि विशेषेण । चक्रमे क्रमणं कृतवान् । तदा त्रिभिः प्रकारैः । पदं निदधे स्वकीयं पादं प्रक्षिप्तवान् । अस्य विष्णोः । पांसुरे धूलियुक्ते पादस्थाने । समूढम् इदं सर्वं जगत् सम्यगन्तर्भूतम् ।” त्रिविक्रमावतारधारी विष्णु ने इस प्रतीयमान विश्व को नापने के उद्देश्य से त्रिधा पादप्रक्षेप किया। इन विष्णु के धूलियुक्त पाद-स्थान में यह सब जगत् अन्तर्भूत हो गया । “त्रीणि पदा वि चक्रमे । विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥” (ऋ० सं० १।२२।१८) “अदाभ्यः केनापि हिंसितुमशक्यः । गोपाः सर्वस्य जगतो रक्षकः । विष्णुः अतः एतेषु पृथिव्या- दिस्थानेषु । त्रीणि पदानि । वि । किं कुर्वन् धर्माणि अग्निहोत्रादीनि । धारयन् पोषयन् ।” किसी के द्वारा जिसकी हिंसा नहीं हो सकती, जो सारे जगत् का रक्षक है, उस विष्णु ने अग्निहोत्रादि धर्मों का धारण करते हुए इन पृथिवी आदि स्थानों में पाद-प्रक्षेप किया अर्थात् धर्म के रक्षणार्थ बलि से तीन पग भूमि का दान लेकर उसके व्याज से त्रिलोकी इन्द्र को दे दी। असुरराज्य में धर्मादि का रक्षण नहीं हो सकता था, इसी लिए त्रिलोकी इन्द्र को प्रदान कर दी। “नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः । अश्विना सोमिनो गृहम् ॥” ( ऋ० सं० १।२२।४ )