रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 718, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय उत्तरकाण्ड ६४१ निराधार ही है। उक्त पुराणों में भी रामकथा का संक्षेप में ही वर्णन है। सभी रामचरित्र ग्रन्थों का आकर ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण ही है। रामोपाख्यान भी संक्षेप ही है। बौद्ध अनामक जातक में तो रामकथा का विकृत रूप ही है, फिर भी उसमें लोकापवाद का वर्णन है : राजा ने रानी से कहा-पति से अलग दूसरे के घरों में निवास करने के कारण चरित्र पर सन्देह किया जाता है। तुम्हें स्वीकार करने में परम्परा के अनुसार कहाँ तक औचित्य है ? रानी ने उत्तर दिया मैं उसमें पङ्कज की तरह रही थी । यदि मुझमें सतीत्व हो तो पृथ्वी फट जाय । पृथ्वी फट गयी । रानी ने कहा मेरा सतीत्व प्रमाणित हुआ । इसके बाद राजा और रानी सुखपूर्वक राज्य करने लगे । परन्तु वाल्मीकिरामायण मूल आकर ग्रन्थ है। उत्तरकाण्ड के अनुसार गर्भवती सीता तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करती हैं। राम ने उन्हें तपोवन भेजने का वचन दिया। संयोगवश राम भद्र से पूछते हैं कि मेरे, सीता तथा भरत आदि के विषय में लोग क्या कहते हैं ? तब भद्र सीता के कारण हो रहे लोकापवाद और जनता के आचरण पर पड़नेवाले उसके कुप्रभाव का उल्लेख करता है। लोग कहते हैं हमको भी अपनी स्त्रियों का ऐसा आचरण सहन करना होगा— “अस्माकमपि दारेषु सहनीयं भविष्यति । यथा हि कुरुते राजा प्रजास्तदनुवर्तते ।” (वा० रा० ७।४३।१९) यह सुनकर राम लक्ष्मण को बुलाते हैं। सीताको गङ्गा के उस पार छोड़ आने का आदेश देते हैं। वे तपोवन दिखाने के बहाने सीता को रथ पर बैठाते हैं। वाल्मीकि के आश्रम पर छोड़ देते हैं। महाकवि कालिदास के रघुवंश (सर्ग १४) की कथा में भद्र मित्र न होकर गुप्तचर माना गया है। उत्तररामचरित, कुन्दमाला तथा दशावतारचरित में भी वैसा ही वर्णन है। उत्तररामचरित में गुप्तचर का नाम दुर्मुख है। आनन्दरामायण के अनुसार उसका नाम विजय है। छलित्राम के अनुसार दो छद्मवेशी राक्षस राम को सीता के विरुद्ध उकसाते हैं । पउमचरियं (पर्व ९२–९४) के अनुसार राम स्वयं गर्भिणी सीता को वन में विभिन्न चैत्यों को दिखला रहे थे । इतने में राजधानी के नागरिक उनके पास आकर अभयदान पाकर अपने आने का कारण बतलाते हैं— पापमोहितमति, परदोषग्रहणरत, स्वभावकुटिल जनता में सीतापवाद को छोड़कर कोई चर्चा नहीं है। नागरिकों की बात सुनकर राम ने लक्ष्मण से परामर्श किया, किन्तु लक्ष्मणने सीता-त्याग का विरोध किया। किन्तु राम ने अपने सेनापति कृतान्तवदन को बुलाकर आदेश दिया कि जिनमन्दिर दिखाने के बहाने सीता को गङ्गा पार भयानक वन में छोड़ दो। सेनापति ने वैसा ही किया । संयोग से पुण्डरीकपुर के राजा वज्रजङ्घ ने उस वन में सीता का विलाप सुन लिया। वह सीता को अपने भवन ले गया और वहां सीता के दो पुत्रों का जन्म हुआ। रविषेण के पद्मचरित ( पर्व ९६ ) में सीता को ग्रहण करने के दुष्परिणाम के वर्णन में परिवर्धन किया गया है । समस्त प्रजा मर्यादारहित बतायी जाती है। स्त्रियों का हरण हुआ करता है। बाद में पुनः अपने अपने घर लौटकर स्वीकृत की जाती हैं— “प्रजाऽधुनाखिला जाता मर्यादारहितात्मिका । स्वभावादेव लोकोऽयं महाकुटिलमानसः ॥ प्रकटं प्राप्य दृष्टान्तं न किञ्चित्तस्य दुष्करम् ।” (प० च० ९६।४०-४२) हेमचन्द्रकृत योगशास्त्र के अनुसार सीतात्याग के पश्चात् राम उनको खोजने वन में जाते हैं, किन्तु सीता का कहीं पता नहीं लगता। राम ने सोचा हिंस्र सिंह, व्याघ्र आदि ने सीता का भक्षण कर लिया होगा । उन्होंने सीता का श्राद्ध भी कर दिया । वस्तुतः वाल्मीकिरामायण ही जैन रामकथाओं का आधार है। जैनों ने जैनधर्म ८१