भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 719

६४२ रामायणमीमांसा एकोनविंश के दीक्षा-प्रचार के साधनरूप में रामकथाओं का भी उपयोग किया है और अनेक ढङ्ग का परिवर्तन और परिवर्धन किया है। उसका वस्तुस्थिति से कोई भी सम्बन्ध नहीं है। सीता-त्याग के सम्बन्ध में नये नये नामों का सम्बन्ध जोड़ा गया है। तेरहपन्थी तुलसी ने कुछ जैनी रामकथा और कुछ रामायणों की रामकथाओं का मिश्रण कर एक नयी खिचड़ी बनायी है और उन्होंने धोबीवाली कथा भी जोड़ दी है। जिसमें वह अपनी पत्नी को, जो घर से निकली थी, वापिस लेने से इनकार करते हुए कहता है—मैं राम की तरह नहीं हूँ, जिन्होंने दीर्घकाल तक दूसरे के घर रहने के पश्चात् सीता को ग्रहण किया । बुल्के की दृष्टि में “इसका वर्णन सर्वप्रथम गुणाढ्य की बृहत्कथा में विद्यमान था। वह सोमदेवकृत कथासरित्सागर में सुरक्षित है। उनके अनुसार गुप्तवेश में घूमते हुए राजा ने देखा कि एक पुरुष अपनी स्त्री को हाथ पकड़कर घर से बाहर निकाल रहा है और यह दोष दे रहा है कि दूसरे के घर गयी थी । वह स्त्री कहती है, राम ने सीता को राक्षस के घर में रहने पर भी नहीं छोड़ा। यह मेरा पति राम से भी बढ़कर है, क्योंकि यह मुझे बन्धु के घर जाने पर भी घर से निकाल रहा है। यह सुनकर राम को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने लोकापवाद के भय से गर्भवती सीता को वन में छोड़ दिया।” पर बुल्के की यह भ्रान्ति है जो वे इस कथा का सर्वप्रथम बृहत्कथा में उल्लेख मानते हैं, क्योंकि यह कथा श्रीमद्भागवत ( ९।११।८-१० ) आदि पुराणों से ही गुणाढ्य ने उद्धृत की है। श्रीमद्भागवत के निर्माण का काल गुणाढ्य से अर्वाचीन मानना भी भ्रान्ति ही है। जैमिन्याश्वमेध (अ० २६ ) तथा पद्मपुराण (५।५५ ) के अनुसार ही वह पुरुष धोबी था। आनन्द- रामायण ( ५।३ ), तमिलरामायण, रामचरितमानस लव-कुशकाण्ड आदि में भी इसका वर्णन है। वस्तुतः रामायण के पश्चात् रामचरित का शुद्ध आधार पुराण ही हैं, क्योंकि वे आर्ष हैं। तिब्बती रामायण के अनुसार राम किसी व्यभिचारिणी स्त्री का और उसके पति का झगड़ा सुनते हैं। पति कहता है तुम अन्य स्त्रियों के समान नहीं हो। स्त्री कहती है तुम स्त्रियों के विषय में क्या जानो ? सीता को देख लो वह एक लाख वर्ष दशग्रीव के साथ रही, फिर भी राम ने उसे ग्रहण कर लिया। यह सुनकर राम को सीता के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न होता हैं। वे छिपकर उस स्त्री से मिलते हैं। उसने राम को बताया कि ज्वर- पीड़ित मनुष्य जैसे शीतल सरिता का निरन्तर स्मरण करता रहता है वैसे ही कामपीड़ित स्त्री रूपवान् पुरुष का निरन्तर स्मरण करती रहती है। जब तक कोई देखता, सुनता रहता है तबतक वह निन्दित कर्म नहीं करती, पर एकान्त में वह बन्धनमुक्त होकर परपुरुष से अपनी कामपीड़ा शान्तकर लेती है। यह सुनकर राम की शङ्का सुदृढ़ हो जाती है और वे सीताको वनवास दे देते हैं। कहना न होगा कि यह भी वस्तुस्थिति से भिन्न काल्पनिक आधारों पर आधृत है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार अग्निपरीक्षा के अनन्तर सीता की शुद्धि के प्रति राम को कभी भी अविश्वास का प्रश्न ही नहीं हुआ, केवल लोकापवाद की दृष्टि से ही राम ने सीता को वनवास दिया था। हरिभद्र सूरि की उपदेशपद की एक संग्रहगाथा में सीता द्वारा रावण के चरणों का चित्र बनाने का संकेत मिलता है। टीकाकार मुनिचन्द्र सूरि १२वीं श० ई० के अनुसार सीता ने अपनी ईर्ष्यालु सपत्नी की प्रेरणा से रावण के चरणों का चित्र बनाया था। सपत्नी ने राम को वह चित्र दिखलाया और राम ने सीता का त्याग किया। भद्रेश्वर की कहावली के अनुसार सीता के गर्भवती होने पर उन सपत्नी जनों की ईर्ष्या बहुत बढ़ गयी। उन्होंने ही छद्मव्यवहार से रावण का चित्र बनवाया। इसपर उन्हीं लोगों ने राम के पास जाकर सीता पर अभियोग लगाया कि सीता सदा रावण का स्मरण करती रहती है। उन्होंने प्रमाणस्वरूप रावण के चरण का वह चित्र