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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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दिखलाया। राम ने इसपर अधिक ध्यान नहीं दिया। जिससे सपत्नियों ने रावणचित्र की कथा दासियों द्वारा जनता में फैला दी। वसन्त के समय सीता ने देवपूजा करने का दोहद प्रकट किया। पश्चात् राम ने गुप्तवेश में नगर के उद्यान में टहलते हुए लङ्कानिवास के पश्चात् सीता को ग्रहण करने के कारण अपनी निन्दा सुनी। तब उन्होंने लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण, हनुमान् को बुलाकर गुप्तचरों को आज्ञा दी कि तुम लोगों ने जो कुछ सुना है, उसका निःसंकोच विवरण दो। उन्होंने लोकापवाद की चर्चा की। यह सुनकर लक्ष्मण अत्यन्त क्रुद्ध हुए। गुप्तचरों ने जो सुना था, वह सुनाया। लक्ष्मण ने सीता का पक्ष लिया, किन्तु राम ने कृतान्तमुख द्वारा तीर्थयात्रा के बहाने सीता को जङ्गल में प्रेषित कर दिया। पश्चात् राम ने लक्ष्मण और विद्याधरों के साथ विमान में बैठकर सीता की खोज की। कहीं न देखकर समझ लिया कि सीता वन्य हिंस्र पशुओं की शिकार बन गयी। हेमचन्द्र के जैनरामायण के अनुसार सीता के गर्भवती होने पर तीन सपत्नियों को ईर्ष्या बढ़ गयी। उन्हीं के अनुरोध से सीता ने रावण का चरण-चित्र बनाया। वस्तुतः किञ्चित् परिवर्तन के साथ जैन रामकथाओं का समान ही दृष्टिकोण है। जो सर्वथा निन्द्य ही है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण के अनुसार यज्ञों में अपेक्षित होने पर भी राम ने दूसरा विवाह नहीं किया। वे स्वर्णमयी सीता की प्रतिमा को ही पत्नी के रूप में यज्ञ में बैठाते थे। ऐसी स्थिति में राम का बहुपत्नीवाद वाल्मीकिरामायण विरुद्ध होने से सर्वथा असङ्गत ही है। सीता के प्रति राम को अग्निपरीक्षा के पहले ही व्यावहारिक दृष्टिकोण से ही सन्देह हुआ था, जो कि उचित ही था। सीता को ग्रहण कर लेने पर प्राकृत पुरुषों के समान जनश्रुति के आधार पर शङ्का की कोई सङ्गति ही नहीं बैठती। अग्निपरीक्षा के अनन्तर तो किसी भी समझदार को शङ्का होनी सम्भव नहीं। फिर, लोक के मुख को बन्द करना कठिन काम है। लङ्का की अग्निपरीक्षा का प्रचार लोकमुख-पिधायक हो सकता था, परन्तु राम के द्वारा किये गये उस प्रचार को सरकारी प्रोपेगण्डा कहकर झुठलाया जाना सम्भव था। इसी लिए एक आप्तकाम पूर्णकाम महर्षि के द्वारा वह परिस्थिति लायी गयी कि जिससे अग्निपरीक्षा का ही नहीं सम्पूर्ण सीता-चरित्र का दिव्य प्रचार हुआ। कृत्तिवासरामायण (७।४४,४५) में तीनों कारणों का समन्वय है। राम ने भद्र द्वारा लोकापवाद की चर्चा सुनी। धोबी के मुख से अपनी निन्दा स्वयं सुनी और घर पहुँचकर सीता द्वारा अङ्कित रावण का चित्र देखा। सीता ने सखियों के अनुरोध से रावण का चित्र बनाया था और बनाकर सो गयी थी। चित्र देखकर राम का सन्देह दृढ़ हुआ। वे सीता-त्याग का संकल्प कर चले गये। चन्द्रावलीकृत रामायणगाथा के अनुसार सीता कैकेयी की पुत्री कुकुआ के बहकावे में आकर रावण का चित्र खींचती है। सेरीराम के अनुसार कीकवी भरत और शत्रुघ्न की सहोदरी थी। उसके अनुरोध से पंखेपर चित्र खींच दिया। कीकवी ने सोती हुई सीता पर वह चित्र रख दिया और जाकर राम से कहा कि उन्होंने उस चित्र का चुम्बन किया था। राम ने विश्वास कर सीता को वन में भेज दिया। सीता परिचरों के साथ महरीसी कलि के पास चली गयी। सीता नें परमात्मा से प्रार्थना की थी कि मेरे सतीत्व के प्रमाणस्वरूप कीकवी गूंगी बन जाये तथा सभी पक्षी मौन रहें। परमात्मा ने सुन लिया। कीकवी १२ वर्ष तक गूंगी ही बनी रही। काश्मीरीरामायण के अनुसार राम की सहोदरी बहन ने वह चित्र बनवाया था। जावा के सेरतकाण्ड के अनुसार कैकेयी स्वयं रावण का चित्र खींचती है और सोती हुई सीता के पलङ्ग पर रख देती है। आनन्दरामायण (जन्मखण्ड सर्ग ३) के अनुसार कैकेयी सीता से रावण का चित्र खींचने का आग्रह करती है। सीता कहती है—मैंने केवल उसके दाहिने पैर का अंगूठा ही देखा था और अंगूठे का ही चित्र बना दिया। कैकेयी इसी के आधार पर रावण का पूरा चित्र बनवाती है और राम को बुलाकर स्त्रीचरित्र की आलोचना करती है। राम सीता को वन भेजने का वचन देते हैं। राम ने सीता की दाहिनी भुजा काटने को भी कहा था, पर लक्ष्मण वैसा न कर सकने