भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 721, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 721

६४४ रामायणमीमांसा एकोनविंश के कारण देहत्याग का विचार कर रहे थे। इतने में विश्वकर्मा ने प्रकट होकर सीता का हाथ बनाकर उनको दिया। इतना ही नहीं, हिन्दोनेशिया के हिकायत महाराज रावण में कहा गया है—रावण-वध के बाद राम सात महीने तक लंका में रहे। रावण की एक पुत्री ने अपने पिता रावण का चित्र सोती हुई सीता की छाती पर रख दिया। सीता नींद में इस चित्र का चुम्बन करती है। उसी समय राम उसके पास आते हैं। क्रोध से सीता को कोड़ों से मारकर उसके बाल काटते हैं। लक्ष्मण को बुलाकर आदेश देते हैं कि सीता को मारकर प्रमाणस्वरूप उसका हृदय लाकर दो। लक्ष्मण सीता को उसके पितृगृह पहुँचा देते हैं। बकरी का हृदय लाकर राम को विश्वास दिलाते हैं कि सीता को मार दिया गया। बुल्के भी कहते हैं कि "वृत्तान्त का इतना उग्र रूप केवल वहाँ हो सकता है जहाँ रामचरित्र का आदर्श क्षीण हो गया है।" किन्तु वास्तविक रामचरित्र से विमुख कुछ भी अनर्गल कल्पना कर सकता है। इसका यही उदाहरण कहा जा सकता है। चन्द्र की चन्द्रिका, भानु की प्रभा तथा आनन्दसिन्धु के माधुर्य्य के समान राम से सीता सर्वथा अभिन्न हैं। मनसा, वाचा तथा कर्मणा वे सदा राम की अनन्य अनुरागिणी हैं। "अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा।" (वा० रा०) स्वप्न में भी अन्य की स्फूर्ति उनके मन में सम्भावित नहीं। राम सीता के हृदयेश्वर हैं, हृदय की गतिविधि जानते हैं। पारमार्थिक दृष्टि से दोनों ही सर्वज्ञ हैं, भ्रान्ति भी सम्भावित नहीं है। रावण-वध के बाद सीता, राम और लक्ष्मण लंका में रहे, यह कल्पना जैनों की रामकथाओं से उद्धृत हुई है। वाल्मीकिरामायण की दृष्टि से तो राम ने भरत से मिलने की उत्सुकता के कारण विभीषण का आतिथ्य भी नहीं ग्रहण किया था। फिर वे भरत, शत्रुघ्न, कौशल्या, सुमित्रा आदि की उपेक्षा कर लङ्का में महीनों कैसे रुके रह सकते थे ? सर्वथापि उक्त कथा निकृष्ट विकृति ही है। सिंहलद्वीप की कथा भी ऐसी ही है। उसे भी इसी कोटि की समझना चाहिये। रामकेर्ति (सर्ग ७५) के अनुसार एक रावण की कुटुम्बिनी राक्षसी सीता की सखी का रूप धारण कर रावण का चित्र खिंचवाती है और वह स्वयं उस चित्र में प्रविष्ट होती है। फलतः सीता प्रयत्न करने पर भी उस चित्र को मिटा नहीं पाती। निराश होकर सीता उसे पलङ्ग के नीचे छिपा देती है। राम उसपर लेटते हैं तो उन्हें तीव्र ज्वर हो जाता है। चित्र का पता लगने पर राम लक्ष्मण द्वारा सीता को मारकर कलेजा लाने का आदेश करते हैं। लक्ष्मण वन में सीता पर खड्ग चलाते हैं, खड्ग फूलों की माला बन जाता है। तब इन्द्र मृग का रूप धारणकर लक्ष्मण के सामने मर जाते हैं। लक्ष्मण उसका कलेजा निकाल कर ले जाते हैं। पश्चात् इन्द्र सीता को वाल्मीकि के आश्रम में ले जाते हैं। रामकियेन के अनुसार शूर्पणखा की पुत्री सीता से रावण का चित्र खिंचवाती है। ब्रह्मचक्र की कथा में शूर्पणखा ही छद्मवेश से सीता के पास आकर चित्र खिंचवाती है। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही सभी कथाओं का सुधार करना उचित है। अपनी अपनी लौकिक भावनाओं को जोड़कर जाने अनजाने सीता की पवित्र- कथा में विकृतियाँ जोड़ दी गयी हैं। उनका परिहार कर ही सीताचरित्र समझना उचित है। रामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार लक्ष्मण को सान्त्वना देते हुए सुमन्त्र ने दुर्वासा और दशरथ का संवाद सुनाया था। विष्णु ने भृगुपत्नी की हत्या की थी। भृगु ने विष्णु को शाप दिया था कि तुमको मनुष्य बनकर पत्नी- वियोग का दुःख भोगना पड़ेगा— "तस्मात् त्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनार्दन। तत्र पत्नीवियोगं त्वं प्राप्स्यसे बहुवार्षिकम् ॥"

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा) · पृष्ठ 721, कुल 1049 में से · BharatKosha