रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५१
ने अतिविस्तीर्ण लोकत्रय के आश्रयभूत अन्तरिक्ष को उन सबके आश्रयरूप से बनाया है अथवा जिसने पृथिवीसम्बन्धी अधस्तन सप्त लोकों को बनाया है और जिसने उत्तरभावी पुण्यात्माओं के निवासयोग्य भूरादि ऊपर के सप्त लोकों को बनाया है, उन विष्णु का मैं गुणगान करता हूँ। मन्त्रद्रष्टा दीर्घतमा कहते हैं—श्रीविष्णु ने इन पार्थिव लोकों का निर्माण किया है और आकाशमण्डल को भी उन्होंने धारण कर रखा है। “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण ।” विष्णु अपने पराक्रम से स्तूयमान होते हैं। विष्णु ने त्रिधातु पृथिवी, द्युलोक और सभी भुवनों को धारण कर रखा है। “तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति । उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥” ( ऋ० सं० १ ) मैं उनके प्रियधाम को प्राप्त करना चाहता हूँ जहाँ उनकी उपासना में निरत सदा आनन्दमग्न रहते हैं। उनके परमधाम में माधुर्य का उत्स ( निर्झर ) रहता है। वे ही सभी सुकृतियों के बन्धुभूत हितकारी हैं। जो उन्हें प्राप्त कर लेते हैं उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती, इसलिए वे सुकृतियों के बन्धु हैं। “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।” ( शु० यजुः ५।२०; ऋ० सं० १।१५४।२ ) वह महानुभाव अपने वीर्य ( वीरकर्म ) से सभी के द्वारा स्तूयमान होते हैं। जैसे अपने विरोधियों का सफाया करने के लिए ढूंढ़नेवाला भीम ( भीतिजनक ) तथा कुत्सित ( हिंसादि ) कर्म करनेवाला, दुर्गम प्रदेश गन्ता पर्वतादि उन्नतप्रदेश में रहनेवाला सिंह अपने वीर्य से ही संस्तुत होता है वैसे ही विष्णु भी शत्रुओं के अन्वेष्टा, भयानक शत्रुवधादि कार्य करनेवाले तथा लोकत्रय में सञ्चारी एवं उच्छ्रित लोक में स्थित रहने से सर्वसंस्तुत हैं। जिन विष्णु के तीन संख्यावाले विस्तीर्ण पादविक्षेपों में सम्पूर्ण विश्व तथा सम्पूर्ण भूत आश्रित होकर निवास करते हैं, वह विष्णु अपने पराक्रम के प्रभाव से स्तूयमान होते हैं। “ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै ।” ( ऋ० १।१५४।६ ) इस मन्त्र में यजमान एवं पत्नी को सम्बोधित करते हुए कहा गया है कि तुम दोनों के गन्तव्यरूप उन सुखवासयोग्य स्थानों की हम कामना करते हुए विष्णु की प्रार्थना करते हैं, जहाँ अत्यन्त उन्नत आश्रयणीय अत्यन्त प्रकाशयुक्त किरणें होती हैं अथवा बड़े शृङ्गवाली आश्रयणीय गायें टहलती रहती हैं। उन स्थानों के आधारभूत दिव्य गोलोक में बहुत महात्माओं द्वारा गीयमान तथा सर्वकामवर्षी विष्णु का निरतिशय परम उत्कृष्ट प्राप्य पद स्वरूप अतिप्रभूतरूप से भासमान होता है । “अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ।” ( ऋ० सं० १।१५४।६ ) वर्षणशील उरुगाय विष्णु का परमपद देदीप्यमान होता है। 'महेशुराय विष्णवे' पूजनीय वीर विष्णु की पूजा करो । “त्रातुरवृकस्य मीढुषः ।” ( १।१५५।४ ) “युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम् ।” ( १।१५५।४ ) “यः पूर्व्याय वेधसे नवीयसे सुमज्जानये विष्णवे ददाशति । यो जातमस्य महतो महि ब्रवत् सेदु श्रवोभिर्युज्यं चिदभ्यसत् ॥” (ऋ० सं० १।१५६।२)