भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६५२ रामायणमीमांसा विंश “तमु स्तोतारः पूर्व्यं यथा विद ऋतस्य गर्भं जनुषा पिपर्त्तन । आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन ।।' (ऋ० सं० १।१५६।३) “महस्ते विष्णो सुमति भजामहे ।” ( ऋ० सं० सं० १।१५६।३ ) “न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप ।” ( ऋ० सं० ७।९९।२ ) “जनयन्ता सूर्य्यमुषासमग्नि ।” ( ऋ० सं० ७।९९।४ ) “क्षयन्तमस्य रजसः पराके ।” ( ऋ० सं० ७।१००।५ ) “पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।” ( ऋ० सं० १०।९०।३ ) दीर्घतमा ऋषि द्वारा दृष्ट १५५ वें सूक्त में भी यही कहा गया है— हे अध्वर्यु आदि ऋत्विजो, आप लोग पालनस्वभाव पातव्य सोमरूप अन्न विष्णु के लिए सम्पादित करो अर्थात् सोम से विष्णु की अर्चा करो । विष्णु पूर्णकाम होने पर भी भक्तकृत स्तुति चाहते हैं । वे महान् एवं शूर (विक्रान्त ) हैं । व्यापनशील विष्णुदेव हैं । महानुभाव विष्णु के पौंस्य उत्कृष्ट पराक्रम की मैं स्तुति करता हूँ । विष्णु सबके स्वामी, त्राता, अहिंसक तथा हितैषी हैं । सेक्ता नित्य तरुण हैं । विष्णु सदा सर्वत्र मिश्रणशील अथवा नित्य तरुण हैं और वे अकुमार अनल्प महान् हैं । भक्तों के आह्वान पर यज्ञदेश में आते हैं । जो मनुष्य पूर्व्य पूर्वकालीन नित्य वेधा जगत्कर्त्ता नित्य नूतन अत्यन्त रमणीय स्तुत्य स्वयमेव प्रादुर्भूत होनेवाले हैं अथवा स्वयं प्रहृष्ट तथा भक्तों को प्रहृष्ट करनेवाले सुमति महालक्ष्मीरूपा जिनकी पत्नी है उन विष्णु को हवि आदि प्रदान करता है और उन महानुभाव के महत्त्वपूर्ण जन्मादि का वर्णन करता है, वह दाता एवं स्तोता भी अन्नों एवं कीर्त्तियों से युक्त होकर उनके दिव्य पद को आभिमुख्येन प्राप्त करता है । हे स्तोतृगण ! उन पूर्व्य अनादिसिद्ध तथा यज्ञरूप से आविर्भूत या उदक-कारण हिरण्यगर्भ विष्णु को जानो और स्वतः स्तोत्रादि से उनको प्रसन्न करो और इन महानुभाव विष्णु के सभी द्वारा नमनीय सर्वात्मताप्रतिपादक विष्णु इस नाम को पुरुषार्थप्रद जानते हुए समन्तात् कीर्त्तन करो । अथवा द्रव्य, देवता आदि यज्ञरूप से विष्णु ही परिणत होते हैं यह जान कर उनकी स्तुति करो । ऋषि विष्णु का साक्षात्कार करके कहते हैं—हे विष्णो ! सर्वात्मक देव ! हम लोग आप महान् विष्णु की सुमति सुन्दर स्तुति या शोभन बुद्धि को भजते हैं । हे विष्णो ! आपकी महिमा या महत्त्व का अन्त जायमान या जात कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता है । आपकी महिमा का अन्त नहीं है । अतः उसका अन्त कोई भी नहीं जान सकता है । आपने दर्शनीय महान् द्युलोक को ऊपर ही धारण कर रखा है । आपकी धारणा शक्ति से ही द्युलोक नीचे नहीं गिरता है । भूमि की प्राची आदि दिशाओं को भी आपने ही धारण कर रखा है । हे इन्द्र एवं विष्णो ! आपने यजमान के लिए विस्तृत स्वर्गलोक बना रखा है । सर्वप्रेरक सूर्य तथा तमो- निवारक उषाकाल तथा असुरों से आवृत अग्नि को आप दोनों आविर्भूत करते हैं । हे नरी नेतारौ ! आपने बृषशिप्रदास नामक उपक्षपिता असुर की मायाओं का हनन किया था । इसी प्रकार ७।१०० सूक्त के पाँचवें मन्त्र में कहा गया है—हे शिपिविष्ट रश्मियों द्वारा आविष्ट विष्णो, आपका वह प्रसिद्ध विष्णु नाम प्रख्यात है । वह सभी स्तुतियों का तथा सभी हवि का स्वामी है । ज्ञातव्य अर्थों का जाननेवाला मैं आपकी प्रकृष्ट स्तुति करता हूँ । मैं अबुद्ध साधारण प्राणी इस लोक से दूर प्रपञ्चातीत दिव्य धाम में निवास करनेवाले प्रबुद्ध विष्णु की स्तुति करता हूँ । “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।” (शु० यजु० ५।२० )