भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 730

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५३ भगवान् विष्णु अपने वीर्य ( पराक्रम ) से स्तूयमान होते हैं। वह कुचर अर्थात् परब्रह्मस्वरूप में रहते हुए पृथ्वी पर राम, कृष्ण आदि रूपों से विचरण करते हैं। नृसिंह, वराह आदि रूपों से पर्वतों में रहते हैं। उब्बट के अनुसार अपहतपाप्मा, इन्द्र, परमेश्वर इन विशेषणों से विशेषित हैं। मत्स्य, कूर्मादि रूप में इन्द्र—"पृथिव्यां चरति" उब्बट । “प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते” ( यजुः ३१।१९ ) प्रजापति परमात्मा गर्भ के भीतर उत्पन्न न होता हुआ भी बहुत प्रकार से जायमान होता है। ब्रह्मवैवर्त में इसी का विवरण है— “पूर्णे च दशमे मासि गर्भः पूर्णो बभूव ह। बभूव स चलस्पन्दा जडजम्पा च नारद ॥ गर्भे च वायुना पूर्णे निर्लिप्तो भगवान् स्वयम् । हृत्पद्मदेशे देवक्या ह्यधिष्ठानं चकार सः ॥” (श्रीकृष्णजन्मख० ७।४३,४४) दसवें महीने में देवकी का गर्भ पूरा हो गया। गर्भ वायु से पूर्ण हो गया। परन्तु भगवान् ने वायु से निर्लिप्त देवकी के हृदय को अपना अधिष्ठान बनाया। अन्त में देवकी के पेट से वायु निकल जाती है। उसके हृत्पद्म से दिव्यरूप धारण कर भगवान् कृष्ण प्रकट होते हैं। ‘तत्रैव भगवान् कृष्णो दिव्यं रूपं विधाय च। हृत्पद्मकोशाद् देवक्या हरिराविर्बभूव ह॥’ (७।७२) यही भगवान् का दिव्य जन्म और कर्म है— ‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’ ( गीता ४।९ ) “एष ह देवः प्रदिशो नु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥” (यजुःसं० ३२।४) इसी का अर्थ गीता में व्यक्त है। मैं अज अव्ययात्मा तथा सभी भूतों का आत्मा होते हुए भी सच्चिदा- नन्दलक्षणा प्रकृति का आश्रयण करके अपनी माया से राम, कृष्ण आदि रूपों से आविर्भूत होता हूँ— ‘अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥” (गीता ४।६) “भद्रो भद्रया सचमानः आगात् स्वसारं जारो अभ्येति । पश्चात् सुसकेतैर्द्युभिर्वि तिष्ठन् रुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात् ॥” (ऋ० सं० १०।३।३) रामभद्र राम का नाम प्रसिद्ध है। सत्यभामा के जैसे सत्य और भामा दोनों ही नाम माने जाते हैं वैसे ही यहाँ भी भद्र पद से राम का बोध होता है, क्योंकि व्याकरण के अनुसार पूर्वपद या उत्तरपद का लोप हो जाता है— “विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्लोपः ।” (वार्तिक ५।३।६३) इसका अर्थ यह है कि भद्रा सीता से सेव्यमान रामभद्र वन में आये। पश्चात् राम के परोक्ष में जार रावण स्वसृतुल्य स्वसा सीता को ग्रहण (हरण) कर ले गया। शास्त्रों में उल्लेख है कि परदारा में मातृवत्, स्वसृवत् तथा दुहितृवत् बर्ताव करनेवाले स्वर्गगामी होते हैं।