भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 716

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३९ आधुनिक दृष्टि से यद्यपि यह ठीक हो सकता है कि राम-साहित्य से पृथक् हनमत्पूजा के विकास का कारण ढूंढ़ना व्यर्थ है । हनमत्पूजा में यक्षपूजा या वीरपूजा का प्रभाव मानना उपलब्ध सामग्री के प्रतिकूल ही है। पर साथ ही हनुमान् के चरित्रचित्रण में अतिशयोक्तियों का शताब्दियों तक प्रयोग होता रहा है, यह कथन प्रमाणहीन है । वास्तव में राम परब्रह्म हैं तथा हनुमान् रुद्र हैं । उनके सम्बन्ध में पूरी-पूरी वस्तुस्थिति का भी आज तक वर्णन नही हो सका है । देवदेव में देवत्व की कल्पना दूषण ही है भूषण नहीं । “महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः । अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ ( महिम्नस्तोत्र १ ) भगवान् की अनन्त महिमा का पर पार न जाननेवाले ब्रह्मादि के लिए भी भगवान् की स्तुति भगवान् की महिमा के अननुरूप ही है । निर्गुणरूप में सब के मन और वाणी पङ्गु होते हैं । अनन्त गुणगणों की दृष्टि से भी सब के मन और वाणी पार पाने में असमर्थ ही हैं । आकाश का अन्त कोई भी नहीं पा सकता है, परन्तु अपनी शक्तिभर मच्छर और गरुड़ सभी आकाश में उड़ते हैं— “नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः ।” “निजनिज मति मुनि हरिगुन गावहिं । निगम सेष सिव पार न पावहिं ॥ तुमहि आदि खग मसक प्रजंता । नभ उड़ाहिं नहि पावहिं अंता ॥ तिमि रघुपति महिमा अवगाहा । तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा ॥” ( रा० मा० ७।९०।२, ३ ) ब्रह्मादि अपनी बुद्धि के अनुसार भगवद्गुणगान कर सकते हैं तब तो अस्मदादि भी अपनी बुद्धि के अनुसार भगवद्गुणगान कर ही सकते हैं । यदि किसी वीर या यक्ष की अभिन्नता के कारण हनुमान् का यह महत्त्व बढ़ा होता तो किसी यक्ष की महिमा तथा पूजा भी प्रख्यात होनी चाहिये थी । परन्तु उसका नितान्त अभाव है । अतः रामायण एवं राम और सीता की भक्ति एवं उनके वरप्रभाव से ही हनुमान् का महत्त्व युक्त है । इस तरह विकास या परिवर्धन नहीं हुआ । अपितु भगवान् एवं उनके भक्त रुद्रस्वरूप हनुमान् की महिमा वस्तुतः अपार है । उनके सभी विद्यमान गुणों का भी वर्णन असंभव है, फिर अविद्यमान गुणों के आरोप, विकास या परिवर्धन की कल्पना ही कैसे हो सकती है ? हनुमच्चरितवर्णन करनेवाले पुराणों या रामायणांशों की अर्वाचीनता की कल्पना के आधार पर ही यह कहा जाता है कि ८वीं, १०वीं या १५वीं शती में हनुमान् की पूजा या माहात्म्य का पूर्ण विकास हुआ । परन्तु जब उक्त आधारभित्ति ही गलत है तब उस आधार पर आधारित सभी कल्पनाओं के महल सुतरां गलत एवं असङ्गत ठहरते हैं । पाश्चात्यों की काल-कल्पना सर्वथा भारतीय दृष्टिकोण से गलत है । वर्तमान रामायण शुद्ध रामायण है । उसका निर्माणकाल राम का राज्यारोहणकाल ही है । पुराण व्यासकालीन ही हैं । अतः इसके विपरीत सब कल्पनाएँ पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिमूलक ही हैं । अर्जुन के गर्व-निवारण के प्रसङ्ग में कहा गया था कि हनुमान् उसकी ध्वजा पर विराजमान होंगे । बुल्के कहते हैं, “महाभारत से विदित होता है कि प्रायः सब योद्धाओं के झण्डे पर पशुओं के चित्र अङ्कित थे । उदाहरणार्थ दुर्योधन की ध्वजा पर नाग ( ६।१७।२५ ), भीम की ध्वजा पर केसरी ( ६।९१।७० ), घटोत्कच के ध्वज पर गृध्र