रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३८ रामायणमीमांसा एकोनविंश उसकी अपेक्षा अर्वाचीन ही है । गीता आदि की दृष्टि से ईश्वरपूजा, देवपूजा आदि ही सात्त्विकी पूजा है। यक्ष, राक्षस आदि की पूजा राजसी पूजा है । अनादि सिद्ध वैदिक धर्म के पूर्ण प्रचार के समय से ही ब्रह्म, परमात्मा, रुद्र, विष्णु, राम, हनुमान् आदि की पूजा प्रचलित है। वैदिक धर्म के प्रचार की मन्दता में ही यक्ष, राक्षस आदि की पूजा प्रचलित होती है। इस तरह वेदों, उपनिषदों, रामायण आदि के अनुसार ही हनुमान् की पूजा चिरकाल से ही प्रचलित है । अतः १० वी १५ वीं शती में हनुमत्पूजा का विकास मानना सर्वथा असङ्गत ही है । उसपर यक्षपूजा का प्रभाव मानना और भी असङ्गत है । प्रचलित हनुमत्पूजकों में सभी को रामायण एवं रामभक्ति के कारण तथा रुद्ररूप से ही हनुमान् का महत्त्व विदित है । सिवा उच्छृङ्खल विचारवालों के और कोई यक्षपूजा एवं हनुमत्पूजा का सम्बन्ध नहीं मानता है । अतएव हनुमान् के चरित्रचित्रण में अतिशयोक्ति और कोई अलौकिकता की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रही है, यह कथन वस्तुस्थिति से सर्वथा अस्पृष्ट ही नहीं अपितु विरुद्ध भी है । हनुमान् वानरगोत्रीय 'आदिवासी थे, यह कल्पना भी रामायण के विरुद्ध ही है । हनुमान् ने स्वयं ही अपने को वानर कहा है— “जातिरेव मम त्वेषा ।” यह दिखाया जा चुका है। इसी तरह हनुमान् की वायुपुत्र उपाधि नहीं, किन्तु वाल्मीकिरामायण तथा अन्य प्रामाणिक कथाओं के अनुसार हनुमान् वास्तव में वायु के पुत्र थे । आश्चर्य तो यही है कि पाश्चात्य एवं उनके अनुयायी सड़े से सड़े जातक को प्रमाण मान लेते हैं। परन्तु यहाँ के परम प्रमाण वेद, उपनिषद्, आर्ष इतिहास रामायण तथा महाभारत की बातों को जातकों के दृष्टिकोण से लगाने का प्रयास करते हैं । यह स्पष्ट ही बौद्धपक्षपात एवं वैदिकधर्मद्वेष है । इसी कारण वे वायुपुत्र एवं वीरपूजा या यक्षपूजा का हनुमत्पूजा पर प्रभाव भी जातकों पर ही अवलम्बित है, ऐसा अनर्गल प्रलाप करते हैं । वस्तुस्थिति तो यह है कि वैदिकधर्मद्वेषी बौद्धों तथा जैनों ने बहुतसी मनगढ़न्त वैदिकधर्म-विरुद्ध कल्पनाएँ कर रखी हैं। पाश्चात्यों की कूटनीति के शिकार बनकर अनेक उनके अनुयायी भारतीयों ने भी उन्हीं का अन्धानुकरण कर वैदिकधर्मविरुद्ध अनेक कल्पनाओं को प्रश्रय दिया है। याकोबी का यह कथन भी सारशून्य है कि हनुमान् की असाधारण लोकप्रियता का आधार रामायण में अङ्कित उनका चरित्रचित्रणमात्र नहीं हो सकता । वास्तव में उनकी यह आश्चर्यजनक लोकप्रियता शताब्दियों तक बढ़ते हुए विकास का परिणाम है। इसीलिए बुल्के को भी लाचार होकर यह मानना पड़ता है कि “रामसाहित्य का अनुशीलन करने पर डा० याकोबी के मत के विपरीत मन में यह विचार अनायास उत्पन्न होता है कि राम-कथा ने ही हनुमान् को अमरत्व के शिखर पर पहुँचा दिया है और आजकल राम की अपेक्षा रामसेवक हनुमान् की पूजा कहीं अधिक व्यापक रूप से हो रही है”, परन्तु बुल्के का यह मत भी शुद्ध नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार रामकथा का विकास हुआ । वे यह तथ्य भी कहाँ मानते हैं कि वस्तुभूत रामचरित्र ही रामायणों द्वारा वर्णित हुआ है । अनु० ७१२ में बुल्के पुनः कहते हैं कि “हनुमच्चरित विकास के अध्ययन से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं । प्रथम हनुमान् के विषय में जो विस्तृत सामग्री परवर्ती कथाओं में मिलती है वह वाल्मीकिरामायण में निहित तत्त्वों का स्वाभाविक विकास प्रतीत होती है । अतः वाल्मीकि के पूर्व राम-कथा से स्वतन्त्र हनुमद्विषय गाथाओं की कल्पना निराधार ही नहीं अनावश्यक भी हैं । दूसरे, उस सामग्री के विश्लेषण से स्पष्ट हैं कि हनुमान् का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा था, अतः हनुमान् वास्तव में किसी प्राचीन देवता से अभिन्न हैं, यह कल्पना उपलब्ध सामग्री के प्रतिकूल ही है । हनुमान् के चरित्र-चित्रण में शताब्दियों तक अतिशयोक्ति का प्रयोग होता रहा है । किन्तु आठवीं शती में उनको पहले पहल देवत्व की उपाधि से विभूषित किया गया ।” परन्तु बुल्के की ये दोनों कल्पनाएँ प्रमाणशून्य हैं ।