भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 714

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३७ वत्सल, भगवान् जगन्नाथ, जगदीश, अनादि, परब्रह्म भी कहा गया हैं और रुद्रावतार होने से उनके वे सब नाम सङ्गत हैं—"एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे" के अनुसार वे ब्रह्मरूप ही हैं। अतएव बुल्के का यह कहना गलत है कि "इन शब्दावलियों को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिये। पूजा की दृष्टि से संकटमोचनरूप ही प्रधान है। भूतों, बीमारियों तथा बाँझपन से छुटकारा पाने के लिए उनकी अधिकतर शरण ली जाती है।" बुल्के की दृष्टि में तो यह भी कल्पना या विश्वासमात्र ही है। पर उनका यह कहना निरर्थक ही है। ७१० वें अनु० में बुल्के अपने मन की दुर्भावनाओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं। "हनूमत्पूजा के कारणों पर विचार करने से विदित होता है कि रुद्रावतार माने जाने के कारण उनके प्रति श्रद्धा जाग्रत् होना स्वाभाविक ही था। किन्तु १० वीं, १५ वीं ईसवी में हनूमद्भक्ति का पूर्ण विकास आश्चर्यजनक ही है। उनकी संकटमोचनरूप में उपासना जो आजकल व्यापक रूप से प्रचलित है, उसका मुख्य आधार रामायण में चित्रित राक्षसों का वध, ओषधिपर्वत का आनयन नहीं, किन्तु उसका मुख्य कारण यह है कि हनुमान् का सम्बन्ध यक्ष-पूजा से स्थापित किया गया था। अत्यन्त प्राचीन काल से गाँव गाँव में यक्षों की पूजा होती थी। वे रक्षक देवता (जातक ५४५), द्वारपाल, सन्तान देनेवाले तथा वृक्षों में निवास करनेवाले (जातक ३०७ और ५०९) माने जाते थे। यक्ष तथा वीर शब्द पर्यायवाची ही हैं। उधर महावीर हनुमान् की ख्याति रामायण की लोकप्रियता द्वारा शताब्दियों से चली आ रही थी। अतः अन्य यक्षों अर्थात् वीरों के साथ हनुमान् की भी पूजा होने लगी। इस अत्यन्त प्राचीन पूजा से सम्बन्ध हो जाने पर हनुमान् की लोकप्रियता बहुत ही बढ़ गयी। उस समय तक जिस उद्देश्य से और जिस रूप में यक्षों की पूजा होती रही अब उसी उद्देश्य और उसी रूप में महावीर हनुमान् की पूजा होने लगी। हनुमान् के संकटमोचन रूप तथा द्वारपालवाला रूप वीरपूजा से सम्बन्ध रखते हैं। प्राचीन वीरपूजा तथा हनूमत्पूजा के उद्देश्यों में जो सादृश्य है वह उपर्युक्त विकास की वास्तविकता सिद्ध करता है। परन्तु डा० वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार आजकल तक हनुमान् की पूजा के दो रूप प्रचलित हैं—एक वीरपूजा या यक्षपूजा जिसमें मूत्ति से सम्बन्ध नहीं होता तथा एक दूसरा रूप जिसमें वानर की मूर्ति है और जो रामकथा पर निर्भर है।" वस्तुतः यह सब बुल्के की अनर्गल अटकल है। उपस्थित प्रत्यक्ष हेतुओं को छोड़कर अनुपस्थित हेतु ढूँढ़ने का कार्य "अव्यापारेषु" व्यापारमात्र है। यदि वीर-पूजा अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित थी तब तो हनूमत्पूजा भी अत्यन्त प्राचीन काल से ही माननी चाहिये, फिर १० वीं १५ वीं ई० में ही आश्चर्यजनक हनूमत्पूजा का पूर्ण विकास हुआ यह क्यों ? यदि यह रामायण का प्रभाव है तो हनुमान् की पूजा में उससे अन्य प्रभाव ढूँढ़ने की क्या आवश्यकता है ? फिर स्कन्दपुराण के १२ नामों की सूची का एक नाम भी यक्षपूजा से सम्बन्ध नहीं रखता। द्वादश नाम निम्नोक्त हैं—हनुमान्, अञ्जनीसुत, वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ट, फाल्गुनगोत्र, पिङ्गाक्ष, अमितविक्रम, उदधिक्रमणश्रेष्ठ, दशग्रीवदर्पहा, लक्ष्मणप्राणदाता तथा सीताशोकनिवर्तन (स्कन्दपु० अवन्तीखण्ड अ० ८३) । आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड १३।८, ९) में भी ये नाम हैं। स्कन्दपुराण के एक अन्य स्थल (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यमा० अ० ३७) में हनुमान् की स्तुति में १९ विशेषण मिलते हैं। उनमें से एक ही सर्वव्याधिहर संकटमोचन रूप से सम्बन्ध रखता है। परन्तु संकटमोचन रूप भी यक्षरूपनिरपेक्ष हनुमान् का ही है। शक्तिघात के समय लक्ष्मण का, अहिरावण की माया के समय राम-लक्ष्मण दोनों का, रावण के आतङ्क से सीता का तथा इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र- प्रयोग के समय राम, लक्ष्मण तथा सभी वानर भालू वीरों का संकट काटने के कारण हनुमान् ही वस्तुतः संकटमोचन- पदवाच्य हैं, न कि बुल्केकल्पित यक्ष । भारतीय वाङ्मय की दृष्टि से वेद अनादि हैं। उन्हीं पर वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायण, पुराण आदि आधारित हैं। इन सद्ग्रन्थों के आधार पर हनुमान् की पूजा अति-प्राचीनकाल से प्रचलित है। यक्षपूजा आदि