रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 732, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५५ गजेन्द्रमोक्ष की कथा केवल श्रीमद्भागवत और वामनपुराण में ही उपलब्ध है। यह उपाख्यान अतिप्राचीन हैं, क्योंकि भरहूतस्तूप के प्राकार में अङ्कित गजकुलीरजातक का चित्र इसी का अनुकरण है। वह गजकुलीरजातक का चित्र ई० पू० २ श० का है। श्रीभागवत एवं वामनपुराण उस चित्र से सहस्रों वर्ष पूर्व के हैं तथा उनमें वर्णित रामकथा और राम का विष्णु होना इससे हजारों वर्ष पूर्व स्वतः सिद्ध हो जाते हैं। कौशाम्बी ई० पू० २ श० में रावण के द्वारा सीता-हरण तथा अशोकवन में सीता की पक्की मिट्टी की बनी चित्रभित्ति प्राप्त हुई है। भरहूत और साँचीस्तूप ई० पू० २ श० में ऋषिभृंग एवं श्याम (सिन्धुवध) जातक के चित्र हैं। वे भी रामायण की कहानी की अनुकृतिस्वरूप हैं। “आपो वा इदमासन् सलिलमेव । स प्रजापतिर्वराहो भूत्वोपन्यमज्जत । तस्य यावन्मुखमासीत् । तावतीं मृदमुदहरत् । सेयमभवत् । यद्वराहविहतं भवत्यस्यामेवैनं प्रत्यक्षमाधत्ते । वराहो वा अस्या॒ामन्नं पश्यति । तस्मा इयं विजिहीते यद्वराहविहृतं भवति । तदेवान्नमवरुन्धे । यत् तदादत्त तदादितिर्यदप्रथत् तत्पृथिवी । यदभवत्तद्भूमिर्यद्वराहविहृतं भवति प्रथत एव प्रजया पशुभिः ।” ( काठ० सं० ८।२।४ ) यह समस्त जगत् अपनी उत्पत्ति के पहले आप (जल) ही था। प्रजापति वराह होकर जल में निमग्न हुए। उस वराह का जितना मुख था उतनी मृद् (पृथिवी) का उसने उद्धरण किया। वराह द्वारा खोदी हुई मिट्टी ही पृथ्वी है। वराहविहृत पृथ्वी पर अग्नि का आधान करना आदिवराह उद्धृत पृथ्वी पर ही आधान करना है। वराह पृथ्वी को खोदता हुआ उसमें अन्न देखता है। उसके लिए पृथ्वी अपना रूप विवृत कर देती है। वही अन्न का अवरोध करती है। वही फैल गयी, इसलिए पृथ्वी हुई जो 'अभवत्', उत्पन्न हुई इसीलिए भूमि कही गयी। जो वराह-विहृत मृत्तिका का आधान करता है वह प्रजा तथा पशु आदि द्वारा संसार में फैल जाता है, विख्यात होता है। प्रशंसा के लिए यहाँ प्रसिद्ध वराहावतार के द्वारा उद्धृत मृत्तिका-दृष्टि सामान्य वराहोद्धृत मृत्तिका में की गयी इससे शतपथ की दृष्टि में वराहावतार सिद्ध है। “इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे ।” ( ऋ० सं १।२२।१७ ) “विष्णुः त्रिविक्रमावतारधारी । इदं प्रतीयमानं सर्व विश्वमुद्दिश्य । वि विशेषेण । चक्रमे क्रमणं कृतवान् । तदा त्रिभिः प्रकारैः । पदं निदधे स्वकीयं पादं प्रक्षिप्तवान् । अस्य विष्णोः । पांसुरे धूलियुक्ते पादस्थाने । समूढम् इदं सर्वं जगत् सम्यगन्तर्भूतम् ।” त्रिविक्रमावतारधारी विष्णु ने इस प्रतीयमान विश्व को नापने के उद्देश्य से त्रिधा पादप्रक्षेप किया। इन विष्णु के धूलियुक्त पाद-स्थान में यह सब जगत् अन्तर्भूत हो गया । “त्रीणि पदा वि चक्रमे । विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥” (ऋ० सं० १।२२।१८) “अदाभ्यः केनापि हिंसितुमशक्यः । गोपाः सर्वस्य जगतो रक्षकः । विष्णुः अतः एतेषु पृथिव्या- दिस्थानेषु । त्रीणि पदानि । वि । किं कुर्वन् धर्माणि अग्निहोत्रादीनि । धारयन् पोषयन् ।” किसी के द्वारा जिसकी हिंसा नहीं हो सकती, जो सारे जगत् का रक्षक है, उस विष्णु ने अग्निहोत्रादि धर्मों का धारण करते हुए इन पृथिवी आदि स्थानों में पाद-प्रक्षेप किया अर्थात् धर्म के रक्षणार्थ बलि से तीन पग भूमि का दान लेकर उसके व्याज से त्रिलोकी इन्द्र को दे दी। असुरराज्य में धर्मादि का रक्षण नहीं हो सकता था, इसी लिए त्रिलोकी इन्द्र को प्रदान कर दी। “नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः । अश्विना सोमिनो गृहम् ॥” ( ऋ० सं० १।२२।४ )