भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 726

अध्याय उत्तरकाण्ड ६४९ उनमें 'कुशीलवौ' द्विवचन प्रयोग नहीं होता । परन्तु ये दोनों सीता के पुत्र हैं। इसमें 'कुशीलवौ' कुशी शब्द को पृषोदरादि मानकर सिद्ध किया गया है, "कुशशब्दस्य कुशोभावः पृषोदरादित्वात्" (वा० रा० १।४।४ तिलकटीका) । फिर भी दुराग्रहवशात् बुल्के रामपुत्र कुश और लव को गानविद्योपजीवी कहने का हठ करते हैं। यह भी उत्तरकाण्ड में प्रसिद्ध है कि वे गानविद्योपजीवी नहीं थे। उन्होंने राम द्वारा दिलाये हुए बहुभार सुवर्ण को स्वीकार नहीं किया था और कहा था कि हम लोग कन्द, मूल और फल खानेवाले वनवासी हैं। तुम्हारे सुवर्ण हिरण्य से हमें क्या प्रयोजन ? "दीयमानं सुवर्णं तु नागृह्णीतां कुशीलवौ । वन्येन फलमूलेन निरतौ वनवासिनौ ॥ सुवर्णेन हिरण्येन किं करिष्यामहे वयम् ॥" ( वा० रा० ७।९४।१९,२० ) वहीं उनको प्रतीतिक दृष्टि से मुनिदारकौ कहा गया है (श्लोक २२) । इतने पूर्वापरसम्बद्ध शब्दों से स्पष्टतः सिद्ध है कि कुश और लव दोनों राम के पुत्र ही 'कुशीलवौ' शब्द से निर्दिष्ट किये गये हैं। अतः तत्सम्बन्धी सामग्री को विकास या प्रक्षेप मानना सर्वथा निराधार ही है। बुल्के कई जगह तीनों पाठों में न होने से कई अंशों को प्रक्षेप कहते हैं। पर यहाँ रामायण के तीनों पाठों में कुश और लव दोनों राम के पुत्र माने गये हैं। तब भी बुल्के उसे प्रक्षेप मानते हैं। यह केवल दुराग्रह ही है। ७३७ वें अनु० में बुल्के स्वयं कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड में सीता के वाल्मीकि आश्रम में दो पुत्रों को जन्म देने का वर्णन है। जिनका नाम वाल्मीकि ने कुश और लव रखा था (सर्ग ६६) । दोनों वाल्मीकि के ( वेदाध्ययन आदि करने के कारण) शिष्य बनते हैं। राम के अश्वमेध के अवसर पर रामायण का गान करते हैं। तत्पश्चात् राम दोनों का परिचय प्राप्त कर सीता को बुलाने भेजते हैं। सीता के भूमि-प्रवेश के बाद कुश और लव उत्तरकाण्ड सुनाते हैं ( वा० रा० ७।सर्ग ९३-९९) ।" रामायण के अन्त में ऐसा भी उल्लेख है कि कुश को कोशल देश तथा कुशावती राजधानी दी गयी। लव को उत्तरकोशल तथा श्रावस्ती प्राप्त होती है। ( वा० रा० ७।सर्ग १०७,१०८) । इन सब अंशों को अप्रामाणिक माना जाय तभी बुल्के की अटकल विश्वसनीय हो सकती है। पर कोई भी समझदार बुल्के की निस्सार कल्पनाओं के आधार पर इन प्रामाणिक सर्गों एवं श्लोकों को अप्रामाणिक कैसे मानेगा ? ८२