रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 725, कुल 1049 में से
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६४८ रामायणमीमांसा एकोनविंश गया है, उन सब स्थलों को प्रक्षेप सिद्ध करने का उन्होंने घोर परिश्रम किया है। प्रामाणिक काण्डों में भी राम को ब्रह्मरूप कहा गया है। पर उन्हें भी वे अप्रामाणिक कहने में नहीं हिचकते हैं। ७३६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “बालकाण्ड के चतुर्थ सर्ग में कुशीलव की चर्चा है—'कुशीलवौ भ्रातरौ राजपुत्रौ" राम के अयोध्या लौटने के पश्चात् वाल्मीकि ने समस्त रामचरित के विषय में काव्यरचना की थी और उसे दो कुशीलव राजपुत्रों को सिखाया था। बाद में ये दोनों जाकर सभाओं में रामायण का गान करने लगे— “ऋषीणाञ्च द्विजातीनां साधूनां च समागमे ।" किसी दिन राम ने दोनों को अयोध्या के राजमार्ग में देखा और अपने महल में ले जाकर भरत आदि भाइयों के साथ रामायण का गान सुना। इस सर्ग में कहीं भी कुश और लव का अलग उल्लेख नहीं है। केवल दो भाइयों का वर्णन है जो राजपुत्र कुशीलव अर्थात् गायक हैं। रामायण के तीनों पाठों में ये दोनों राम के पुत्र माने गये हैं, लेकिन जिस श्लोक में इसका उल्लेख किया गया है वह तीनों पाठों में भिन्न है। अतः प्रतीत होता है कि यह तथ्य बाद में तीनों पाठों में जोड़ा गया है। उपर्युक्त वृत्तान्त के उत्तरार्ध में जहाँ राम दोनों का गान सुनते हैं कहीं भी इसका निर्देश नहीं किया गया है कि ये इनके पुत्र हैं। इससे यह अनुमान दृढ़ हो जाता है कि पहले इन दोनों कुशीलवों तथा राम के पितापुत्र सम्बन्ध का उल्लेख नहीं किया गया था।" यह भी बुल्के की दुर्भावना का ही दुष्परिणाम है, क्योंकि उनके अनुसार भी कुश और लव राम के ही पुत्र थे। वाक्यशेष के अनुसार वाक्यार्थ एवं शब्दार्थ का निर्णय मीमांसासंमत है। इसी न्याय से यव वसन्त में मोदमान कणिशशाली ओषधि को कहा जाता है— “वसन्ते सर्वशस्यानां जायते पत्रशातनम्। मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः ॥” पूर्वोक्त “ईजे बहुविधैर्यज्ञैः" श्लोक युद्धकाण्ड में राम के पुत्रों का वर्णन है। बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड में उनका नाम कुश-लव उक्त है। बालकाण्ड में बुल्के के अनुसार कुश-लव को राजपुत्र कहा गया है। वे किस राजा के पुत्र थे, क्यों वे रामायण के गान में प्रवृत्त हुए ? इसका स्पष्टीकरण उत्तरकाण्ड में किया गया है। वहाँ महर्षि वाल्मीकि ने ही स्पष्टरूप में कहा था कि ये कुश और लव दोनों ही पुत्र आपके हैं। “इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ तु यमजातको। सुतौ तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥” (वा० रा० ७।९६।१७) उत्तरकाण्ड में स्पष्ट कथा भी है कि गर्भिणी सीता लक्ष्मण द्वारा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के समीप में छोड़ी गयी थीं। महर्षि वाल्मीकि उन्हें अपने आश्रम में ले गये। सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया। उसी रात्रि में उस आश्रम में शत्रुघ्न भी पहुँचे थे। महर्षि ने ही उन बालकों का संस्कार करके उन्हें वेद, वेदाङ्ग, धनुर्वेद आदि पढ़ाया और वेद का उपबृंहण करने के लिए रामायण का अध्ययन कराया था। क्रौञ्चवध से क्रौंची के विलाप से महर्षि वाल्मीकि में करुण रस का उद्रेक अकस्मात् नहीं हुआ था। किन्तु उस समय महर्षि के आश्रम में सीता निवास करती थीं। उनका करुण क्रन्दन क्रौंची के करुण क्रन्दन के तुल्य था। इसी संस्कार से महर्षि प्रभावित हुए थे। “सीतायाश्चरितं महत्" के अनुसार महर्षि ने सीता के लोकापवाद के निवारणार्थ ही स्पष्ट सीताचरित्र का वर्णन किया था। उसके प्रचारार्थ ही महर्षि ने जानकी के पुत्रों एवं अपने शिष्यों कुश और लव को रामायण-गानार्थ नियुक्त किया था। गानविद्योपजीवी कुशलव एक विशेष जाति के होते हैं।