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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय उत्तरकाण्ड ६४९ उनमें 'कुशीलवौ' द्विवचन प्रयोग नहीं होता । परन्तु ये दोनों सीता के पुत्र हैं। इसमें 'कुशीलवौ' कुशी शब्द को पृषोदरादि मानकर सिद्ध किया गया है, "कुशशब्दस्य कुशोभावः पृषोदरादित्वात्" (वा० रा० १।४।४ तिलकटीका) । फिर भी दुराग्रहवशात् बुल्के रामपुत्र कुश और लव को गानविद्योपजीवी कहने का हठ करते हैं। यह भी उत्तरकाण्ड में प्रसिद्ध है कि वे गानविद्योपजीवी नहीं थे। उन्होंने राम द्वारा दिलाये हुए बहुभार सुवर्ण को स्वीकार नहीं किया था और कहा था कि हम लोग कन्द, मूल और फल खानेवाले वनवासी हैं। तुम्हारे सुवर्ण हिरण्य से हमें क्या प्रयोजन ? "दीयमानं सुवर्णं तु नागृह्णीतां कुशीलवौ । वन्येन फलमूलेन निरतौ वनवासिनौ ॥ सुवर्णेन हिरण्येन किं करिष्यामहे वयम् ॥" ( वा० रा० ७।९४।१९,२० ) वहीं उनको प्रतीतिक दृष्टि से मुनिदारकौ कहा गया है (श्लोक २२) । इतने पूर्वापरसम्बद्ध शब्दों से स्पष्टतः सिद्ध है कि कुश और लव दोनों राम के पुत्र ही 'कुशीलवौ' शब्द से निर्दिष्ट किये गये हैं। अतः तत्सम्बन्धी सामग्री को विकास या प्रक्षेप मानना सर्वथा निराधार ही है। बुल्के कई जगह तीनों पाठों में न होने से कई अंशों को प्रक्षेप कहते हैं। पर यहाँ रामायण के तीनों पाठों में कुश और लव दोनों राम के पुत्र माने गये हैं। तब भी बुल्के उसे प्रक्षेप मानते हैं। यह केवल दुराग्रह ही है। ७३७ वें अनु० में बुल्के स्वयं कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड में सीता के वाल्मीकि आश्रम में दो पुत्रों को जन्म देने का वर्णन है। जिनका नाम वाल्मीकि ने कुश और लव रखा था (सर्ग ६६) । दोनों वाल्मीकि के ( वेदाध्ययन आदि करने के कारण) शिष्य बनते हैं। राम के अश्वमेध के अवसर पर रामायण का गान करते हैं। तत्पश्चात् राम दोनों का परिचय प्राप्त कर सीता को बुलाने भेजते हैं। सीता के भूमि-प्रवेश के बाद कुश और लव उत्तरकाण्ड सुनाते हैं ( वा० रा० ७।सर्ग ९३-९९) ।" रामायण के अन्त में ऐसा भी उल्लेख है कि कुश को कोशल देश तथा कुशावती राजधानी दी गयी। लव को उत्तरकोशल तथा श्रावस्ती प्राप्त होती है। ( वा० रा० ७।सर्ग १०७,१०८) । इन सब अंशों को अप्रामाणिक माना जाय तभी बुल्के की अटकल विश्वसनीय हो सकती है। पर कोई भी समझदार बुल्के की निस्सार कल्पनाओं के आधार पर इन प्रामाणिक सर्गों एवं श्लोकों को अप्रामाणिक कैसे मानेगा ? ८२

विंश अध्याय रामचरितसिंहावलोकन वेदों तथा पुराणों में अवतारवाद प्रसिद्ध है । विभिन्न शिव, विष्णु आदि देवताओं के भी अवतार होते हैं । विशेषतः विष्णु के तो असंख्य अवतार होते हैं । श्रीराम तो साक्षात् अवतारी विष्णु ही थे— “भवान्नारायणो देवः ।” “आदिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥ ( वा० रा० ७।११९।१३,१८ ) विष्णुपरक वेदमन्त्रों की व्याख्या जो पृथिवी निमित्त पृथिवी में उपार्जित कर्मफल भोग के लिए भूरादि तीन लोकों का निर्माण करते हैं तथा उत्कृष्टतर उपासकों के सहस्थान सत्यलोक को ध्रुवरूप से स्थापित करते हैं, जो स्वरचित लोकों का त्रेधा क्रमण करते हुए अतिप्रभूत गीयमान होते हैं उनके वीर्य का मैं वर्णन करता हूँ । “विष्णुर्गोपा अदाभ्यः अतो धर्माणि धारयन् ।” ( ऋ० सं० १।२२।१८ ) पृथिवी के पालक विष्णु अहिंसनीय, अप्रधृष्य हैं । वे ही विविध धर्मों को धारण करते हैं । अन्तर्यामी रूप से सभी धर्मों तथा प्रपञ्चकार्यों के धारक हैं । “इन्द्रस्य युज्यः सखा ।” ( ऋ० सं० १।२२।१९ ) विष्णु इन्द्र के उपेन्द्ररूप से सदा अभिन्नहृदय सखा हैं । “सदा पश्यन्ति सूरयः ।” ( ऋ० सं० १।२२।२० ) विद्वान् सदा ही उनका ब्रह्मरूप से दर्शन करते हैं । “तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत् परमं पदम् ॥” ( ऋ० सं० १।२२।२१ ) व्यवहारातीत निवृत्तिनिष्ठ जागरूक विद्वान् विष्णु के स्वरूपभूत परम पद ( प्राप्य ) तत्त्व को जानते हैं । “दिवो वा विष्ण उत महो वा उरोन्तरिक्षम् । उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वाप्रयच्छ दक्षिणा दोतसव्यात् ॥” (यजुः सं० ५।१९) मेधातिथि कहते हैं हे विष्णो ! पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश से विविध मणि, मुक्तादि धन-सम्पत्ति अपने दोनों हस्तों को भरकर मुझे प्रदान करो । “यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कम्भायदुत्तरं सधस्थम् ॥” (ऋ० सं० १।१५४।१) “य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा ।” ( ऋ० सं० १।१५४।४ ) जिस विष्णु ने पृथ्वीसम्बन्धी रञ्नात्मक क्षित्यादि लोकत्रयसम्बन्धी अग्नि, वायु और आदित्य रूपों का विशेषरूप से निर्माण किया था । “योस्यां पृथिव्यां द्वितीयस्यां तृतीयस्यां पृथिव्याम् ।” ( तै० सं० १।२।१२।१ ) के अनुसार अन्तरिक्ष आदि भी पृथिवी के ही भाग कहे गये हैं । अतः भूः, भुवः और स्वः तीनों लोक पृथिवीशब्दवाच्य हैं । जिस विष्णु

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५१

ने अतिविस्तीर्ण लोकत्रय के आश्रयभूत अन्तरिक्ष को उन सबके आश्रयरूप से बनाया है अथवा जिसने पृथिवीसम्बन्धी अधस्तन सप्त लोकों को बनाया है और जिसने उत्तरभावी पुण्यात्माओं के निवासयोग्य भूरादि ऊपर के सप्त लोकों को बनाया है, उन विष्णु का मैं गुणगान करता हूँ। मन्त्रद्रष्टा दीर्घतमा कहते हैं—श्रीविष्णु ने इन पार्थिव लोकों का निर्माण किया है और आकाशमण्डल को भी उन्होंने धारण कर रखा है। “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण ।” विष्णु अपने पराक्रम से स्तूयमान होते हैं। विष्णु ने त्रिधातु पृथिवी, द्युलोक और सभी भुवनों को धारण कर रखा है। “तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति । उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥” ( ऋ० सं० १ ) मैं उनके प्रियधाम को प्राप्त करना चाहता हूँ जहाँ उनकी उपासना में निरत सदा आनन्दमग्न रहते हैं। उनके परमधाम में माधुर्य का उत्स ( निर्झर ) रहता है। वे ही सभी सुकृतियों के बन्धुभूत हितकारी हैं। जो उन्हें प्राप्त कर लेते हैं उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती, इसलिए वे सुकृतियों के बन्धु हैं। “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।” ( शु० यजुः ५।२०; ऋ० सं० १।१५४।२ ) वह महानुभाव अपने वीर्य ( वीरकर्म ) से सभी के द्वारा स्तूयमान होते हैं। जैसे अपने विरोधियों का सफाया करने के लिए ढूंढ़नेवाला भीम ( भीतिजनक ) तथा कुत्सित ( हिंसादि ) कर्म करनेवाला, दुर्गम प्रदेश गन्ता पर्वतादि उन्नतप्रदेश में रहनेवाला सिंह अपने वीर्य से ही संस्तुत होता है वैसे ही विष्णु भी शत्रुओं के अन्वेष्टा, भयानक शत्रुवधादि कार्य करनेवाले तथा लोकत्रय में सञ्चारी एवं उच्छ्रित लोक में स्थित रहने से सर्वसंस्तुत हैं। जिन विष्णु के तीन संख्यावाले विस्तीर्ण पादविक्षेपों में सम्पूर्ण विश्व तथा सम्पूर्ण भूत आश्रित होकर निवास करते हैं, वह विष्णु अपने पराक्रम के प्रभाव से स्तूयमान होते हैं। “ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै ।” ( ऋ० १।१५४।६ ) इस मन्त्र में यजमान एवं पत्नी को सम्बोधित करते हुए कहा गया है कि तुम दोनों के गन्तव्यरूप उन सुखवासयोग्य स्थानों की हम कामना करते हुए विष्णु की प्रार्थना करते हैं, जहाँ अत्यन्त उन्नत आश्रयणीय अत्यन्त प्रकाशयुक्त किरणें होती हैं अथवा बड़े शृङ्गवाली आश्रयणीय गायें टहलती रहती हैं। उन स्थानों के आधारभूत दिव्य गोलोक में बहुत महात्माओं द्वारा गीयमान तथा सर्वकामवर्षी विष्णु का निरतिशय परम उत्कृष्ट प्राप्य पद स्वरूप अतिप्रभूतरूप से भासमान होता है । “अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ।” ( ऋ० सं० १।१५४।६ ) वर्षणशील उरुगाय विष्णु का परमपद देदीप्यमान होता है। 'महेशुराय विष्णवे' पूजनीय वीर विष्णु की पूजा करो । “त्रातुरवृकस्य मीढुषः ।” ( १।१५५।४ ) “युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम् ।” ( १।१५५।४ ) “यः पूर्व्याय वेधसे नवीयसे सुमज्जानये विष्णवे ददाशति । यो जातमस्य महतो महि ब्रवत् सेदु श्रवोभिर्युज्यं चिदभ्यसत् ॥” (ऋ० सं० १।१५६।२)

६५२ रामायणमीमांसा विंश “तमु स्तोतारः पूर्व्यं यथा विद ऋतस्य गर्भं जनुषा पिपर्त्तन । आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन ।।' (ऋ० सं० १।१५६।३) “महस्ते विष्णो सुमति भजामहे ।” ( ऋ० सं० सं० १।१५६।३ ) “न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप ।” ( ऋ० सं० ७।९९।२ ) “जनयन्ता सूर्य्यमुषासमग्नि ।” ( ऋ० सं० ७।९९।४ ) “क्षयन्तमस्य रजसः पराके ।” ( ऋ० सं० ७।१००।५ ) “पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।” ( ऋ० सं० १०।९०।३ ) दीर्घतमा ऋषि द्वारा दृष्ट १५५ वें सूक्त में भी यही कहा गया है— हे अध्वर्यु आदि ऋत्विजो, आप लोग पालनस्वभाव पातव्य सोमरूप अन्न विष्णु के लिए सम्पादित करो अर्थात् सोम से विष्णु की अर्चा करो । विष्णु पूर्णकाम होने पर भी भक्तकृत स्तुति चाहते हैं । वे महान् एवं शूर (विक्रान्त ) हैं । व्यापनशील विष्णुदेव हैं । महानुभाव विष्णु के पौंस्य उत्कृष्ट पराक्रम की मैं स्तुति करता हूँ । विष्णु सबके स्वामी, त्राता, अहिंसक तथा हितैषी हैं । सेक्ता नित्य तरुण हैं । विष्णु सदा सर्वत्र मिश्रणशील अथवा नित्य तरुण हैं और वे अकुमार अनल्प महान् हैं । भक्तों के आह्वान पर यज्ञदेश में आते हैं । जो मनुष्य पूर्व्य पूर्वकालीन नित्य वेधा जगत्कर्त्ता नित्य नूतन अत्यन्त रमणीय स्तुत्य स्वयमेव प्रादुर्भूत होनेवाले हैं अथवा स्वयं प्रहृष्ट तथा भक्तों को प्रहृष्ट करनेवाले सुमति महालक्ष्मीरूपा जिनकी पत्नी है उन विष्णु को हवि आदि प्रदान करता है और उन महानुभाव के महत्त्वपूर्ण जन्मादि का वर्णन करता है, वह दाता एवं स्तोता भी अन्नों एवं कीर्त्तियों से युक्त होकर उनके दिव्य पद को आभिमुख्येन प्राप्त करता है । हे स्तोतृगण ! उन पूर्व्य अनादिसिद्ध तथा यज्ञरूप से आविर्भूत या उदक-कारण हिरण्यगर्भ विष्णु को जानो और स्वतः स्तोत्रादि से उनको प्रसन्न करो और इन महानुभाव विष्णु के सभी द्वारा नमनीय सर्वात्मताप्रतिपादक विष्णु इस नाम को पुरुषार्थप्रद जानते हुए समन्तात् कीर्त्तन करो । अथवा द्रव्य, देवता आदि यज्ञरूप से विष्णु ही परिणत होते हैं यह जान कर उनकी स्तुति करो । ऋषि विष्णु का साक्षात्कार करके कहते हैं—हे विष्णो ! सर्वात्मक देव ! हम लोग आप महान् विष्णु की सुमति सुन्दर स्तुति या शोभन बुद्धि को भजते हैं । हे विष्णो ! आपकी महिमा या महत्त्व का अन्त जायमान या जात कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता है । आपकी महिमा का अन्त नहीं है । अतः उसका अन्त कोई भी नहीं जान सकता है । आपने दर्शनीय महान् द्युलोक को ऊपर ही धारण कर रखा है । आपकी धारणा शक्ति से ही द्युलोक नीचे नहीं गिरता है । भूमि की प्राची आदि दिशाओं को भी आपने ही धारण कर रखा है । हे इन्द्र एवं विष्णो ! आपने यजमान के लिए विस्तृत स्वर्गलोक बना रखा है । सर्वप्रेरक सूर्य तथा तमो- निवारक उषाकाल तथा असुरों से आवृत अग्नि को आप दोनों आविर्भूत करते हैं । हे नरी नेतारौ ! आपने बृषशिप्रदास नामक उपक्षपिता असुर की मायाओं का हनन किया था । इसी प्रकार ७।१०० सूक्त के पाँचवें मन्त्र में कहा गया है—हे शिपिविष्ट रश्मियों द्वारा आविष्ट विष्णो, आपका वह प्रसिद्ध विष्णु नाम प्रख्यात है । वह सभी स्तुतियों का तथा सभी हवि का स्वामी है । ज्ञातव्य अर्थों का जाननेवाला मैं आपकी प्रकृष्ट स्तुति करता हूँ । मैं अबुद्ध साधारण प्राणी इस लोक से दूर प्रपञ्चातीत दिव्य धाम में निवास करनेवाले प्रबुद्ध विष्णु की स्तुति करता हूँ । “प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।” (शु० यजु० ५।२० )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५३ भगवान् विष्णु अपने वीर्य ( पराक्रम ) से स्तूयमान होते हैं। वह कुचर अर्थात् परब्रह्मस्वरूप में रहते हुए पृथ्वी पर राम, कृष्ण आदि रूपों से विचरण करते हैं। नृसिंह, वराह आदि रूपों से पर्वतों में रहते हैं। उब्बट के अनुसार अपहतपाप्मा, इन्द्र, परमेश्वर इन विशेषणों से विशेषित हैं। मत्स्य, कूर्मादि रूप में इन्द्र—"पृथिव्यां चरति" उब्बट । “प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते” ( यजुः ३१।१९ ) प्रजापति परमात्मा गर्भ के भीतर उत्पन्न न होता हुआ भी बहुत प्रकार से जायमान होता है। ब्रह्मवैवर्त में इसी का विवरण है— “पूर्णे च दशमे मासि गर्भः पूर्णो बभूव ह। बभूव स चलस्पन्दा जडजम्पा च नारद ॥ गर्भे च वायुना पूर्णे निर्लिप्तो भगवान् स्वयम् । हृत्पद्मदेशे देवक्या ह्यधिष्ठानं चकार सः ॥” (श्रीकृष्णजन्मख० ७।४३,४४) दसवें महीने में देवकी का गर्भ पूरा हो गया। गर्भ वायु से पूर्ण हो गया। परन्तु भगवान् ने वायु से निर्लिप्त देवकी के हृदय को अपना अधिष्ठान बनाया। अन्त में देवकी के पेट से वायु निकल जाती है। उसके हृत्पद्म से दिव्यरूप धारण कर भगवान् कृष्ण प्रकट होते हैं। ‘तत्रैव भगवान् कृष्णो दिव्यं रूपं विधाय च। हृत्पद्मकोशाद् देवक्या हरिराविर्बभूव ह॥’ (७।७२) यही भगवान् का दिव्य जन्म और कर्म है— ‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’ ( गीता ४।९ ) “एष ह देवः प्रदिशो नु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥” (यजुःसं० ३२।४) इसी का अर्थ गीता में व्यक्त है। मैं अज अव्ययात्मा तथा सभी भूतों का आत्मा होते हुए भी सच्चिदा- नन्दलक्षणा प्रकृति का आश्रयण करके अपनी माया से राम, कृष्ण आदि रूपों से आविर्भूत होता हूँ— ‘अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥” (गीता ४।६) “भद्रो भद्रया सचमानः आगात् स्वसारं जारो अभ्येति । पश्चात् सुसकेतैर्द्युभिर्वि तिष्ठन् रुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात् ॥” (ऋ० सं० १०।३।३) रामभद्र राम का नाम प्रसिद्ध है। सत्यभामा के जैसे सत्य और भामा दोनों ही नाम माने जाते हैं वैसे ही यहाँ भी भद्र पद से राम का बोध होता है, क्योंकि व्याकरण के अनुसार पूर्वपद या उत्तरपद का लोप हो जाता है— “विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्लोपः ।” (वार्तिक ५।३।६३) इसका अर्थ यह है कि भद्रा सीता से सेव्यमान रामभद्र वन में आये। पश्चात् राम के परोक्ष में जार रावण स्वसृतुल्य स्वसा सीता को ग्रहण (हरण) कर ले गया। शास्त्रों में उल्लेख है कि परदारा में मातृवत्, स्वसृवत् तथा दुहितृवत् बर्ताव करनेवाले स्वर्गगामी होते हैं।

६५४ रामायणमीमांसा विंश “मातृवत् स्वसृवच्चैव तथा दुहितृवच्च ये । परदारेषु वर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥” रावण के मारे जाने पर अग्निश्रेष्ठ भानुमद्भिर् द्युभिर्हरिः सीतया रामदारा सीता के साथ राम के संमुख अपने श्वेतवर्ण तेज के साथ आये। 'इदं विष्णुर्विचक्रमे' ( ऋ० सं० १।२२।१७ ) में सायण का कहना है कि “विष्णोस्त्रिविक्रमावतारे पादत्रयक्रमणस्य प्रसिद्धत्वात्” विष्णु के त्रिविक्रमावतार में पादत्रयक्रमण प्रसिद्ध है । ‘ब्राह्मणो जज्ञे दशशीर्षो दशास्यः’ (अथर्वसं० ४।६।१) दससिरवाला ब्राह्मण ही -रामायण तथा पुराणों में रावणरूप से प्रसिद्ध है । • अवतारवाद एवं सीता-राम का महत्त्व “मनवे ह वै प्रातः । ....तस्यावनेनिजानस्य मत्स्यः पाणी आपेदे ।” (श० ब्रा० १।८।१।१) अवनेजन करते हुए मनु के हाथों में मत्स्य आ गया । इससे मत्स्यावतार सिद्ध होता है । “स यत् कूर्मो नाम ।” (श० ब्रा० ७।५।१।५) यह कूर्मावतार का मूल है । वाराहावतार— “आपो वा इदमग्रे वाराहो भूत्वाहरत् ।” (तै० सं० ७।१।५।१) इसमें वाराहावतार का सङ्केत है । “वराहेण पृथिवी संविदाना सूकराय जिहीते मृगाय ।” (अथर्वसं० १२।१।४६) “उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना ।” “भूमिर्धेनुर्धरणी लोकाधारिणी ।” (तै० आ० १०।१) नृसिंहावतार— “प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः ।” (ऋ० १।१५४।२) “वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्नो नरसिंहः प्रचोदयात् ।” (तै० आ० १० परिशिष्ट) इदं विष्णुर्विचक्रमे”—यह वामनावतार का सङ्केत है । त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः ॥” (ऋ० १।२२।१८) “यो रजांसि विममे पार्थिवानि त्रिश्चिद्विष्णुः ।” (ऋ० सं० ६।४९।१३) “वामनो विष्णुरास ।” (श० ब्रा० १।२।५।५) “क्रोधाद्विष्णुरुुरुगायो विचक्रमे ।” (तै० ब्रा० ३।१।२) परशुराम ( ऋ० सं० १०।११०।१ ) मन्त्र के ऋषि हैं । “कालियो नाम सर्पो नवनागसहस्रबलः । यमुनाह्रदे स जातो यो नारायणवाहनः ॥” (ऋ० सं० ७।५५।४ खिल)

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५५ गजेन्द्रमोक्ष की कथा केवल श्रीमद्भागवत और वामनपुराण में ही उपलब्ध है। यह उपाख्यान अतिप्राचीन हैं, क्योंकि भरहूतस्तूप के प्राकार में अङ्कित गजकुलीरजातक का चित्र इसी का अनुकरण है। वह गजकुलीरजातक का चित्र ई० पू० २ श० का है। श्रीभागवत एवं वामनपुराण उस चित्र से सहस्रों वर्ष पूर्व के हैं तथा उनमें वर्णित रामकथा और राम का विष्णु होना इससे हजारों वर्ष पूर्व स्वतः सिद्ध हो जाते हैं। कौशाम्बी ई० पू० २ श० में रावण के द्वारा सीता-हरण तथा अशोकवन में सीता की पक्की मिट्टी की बनी चित्रभित्ति प्राप्त हुई है। भरहूत और साँचीस्तूप ई० पू० २ श० में ऋषिभृंग एवं श्याम (सिन्धुवध) जातक के चित्र हैं। वे भी रामायण की कहानी की अनुकृतिस्वरूप हैं। “आपो वा इदमासन् सलिलमेव । स प्रजापतिर्वराहो भूत्वोपन्यमज्जत । तस्य यावन्मुखमासीत् । तावतीं मृदमुदहरत् । सेयमभवत् । यद्वराहविहतं भवत्यस्यामेवैनं प्रत्यक्षमाधत्ते । वराहो वा अस्या॒ामन्नं पश्यति । तस्मा इयं विजिहीते यद्वराहविहृतं भवति । तदेवान्नमवरुन्धे । यत् तदादत्त तदादितिर्यदप्रथत् तत्पृथिवी । यदभवत्तद्भूमिर्यद्वराहविहृतं भवति प्रथत एव प्रजया पशुभिः ।” ( काठ० सं० ८।२।४ ) यह समस्त जगत् अपनी उत्पत्ति के पहले आप (जल) ही था। प्रजापति वराह होकर जल में निमग्न हुए। उस वराह का जितना मुख था उतनी मृद् (पृथिवी) का उसने उद्धरण किया। वराह द्वारा खोदी हुई मिट्टी ही पृथ्वी है। वराहविहृत पृथ्वी पर अग्नि का आधान करना आदिवराह उद्धृत पृथ्वी पर ही आधान करना है। वराह पृथ्वी को खोदता हुआ उसमें अन्न देखता है। उसके लिए पृथ्वी अपना रूप विवृत कर देती है। वही अन्न का अवरोध करती है। वही फैल गयी, इसलिए पृथ्वी हुई जो 'अभवत्', उत्पन्न हुई इसीलिए भूमि कही गयी। जो वराह-विहृत मृत्तिका का आधान करता है वह प्रजा तथा पशु आदि द्वारा संसार में फैल जाता है, विख्यात होता है। प्रशंसा के लिए यहाँ प्रसिद्ध वराहावतार के द्वारा उद्धृत मृत्तिका-दृष्टि सामान्य वराहोद्धृत मृत्तिका में की गयी इससे शतपथ की दृष्टि में वराहावतार सिद्ध है। “इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे ।” ( ऋ० सं १।२२।१७ ) “विष्णुः त्रिविक्रमावतारधारी । इदं प्रतीयमानं सर्व विश्वमुद्दिश्य । वि विशेषेण । चक्रमे क्रमणं कृतवान् । तदा त्रिभिः प्रकारैः । पदं निदधे स्वकीयं पादं प्रक्षिप्तवान् । अस्य विष्णोः । पांसुरे धूलियुक्ते पादस्थाने । समूढम् इदं सर्वं जगत् सम्यगन्तर्भूतम् ।” त्रिविक्रमावतारधारी विष्णु ने इस प्रतीयमान विश्व को नापने के उद्देश्य से त्रिधा पादप्रक्षेप किया। इन विष्णु के धूलियुक्त पाद-स्थान में यह सब जगत् अन्तर्भूत हो गया । “त्रीणि पदा वि चक्रमे । विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥” (ऋ० सं० १।२२।१८) “अदाभ्यः केनापि हिंसितुमशक्यः । गोपाः सर्वस्य जगतो रक्षकः । विष्णुः अतः एतेषु पृथिव्या- दिस्थानेषु । त्रीणि पदानि । वि । किं कुर्वन् धर्माणि अग्निहोत्रादीनि । धारयन् पोषयन् ।” किसी के द्वारा जिसकी हिंसा नहीं हो सकती, जो सारे जगत् का रक्षक है, उस विष्णु ने अग्निहोत्रादि धर्मों का धारण करते हुए इन पृथिवी आदि स्थानों में पाद-प्रक्षेप किया अर्थात् धर्म के रक्षणार्थ बलि से तीन पग भूमि का दान लेकर उसके व्याज से त्रिलोकी इन्द्र को दे दी। असुरराज्य में धर्मादि का रक्षण नहीं हो सकता था, इसी लिए त्रिलोकी इन्द्र को प्रदान कर दी। “नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः । अश्विना सोमिनो गृहम् ॥” ( ऋ० सं० १।२२।४ )

६५६ रामायणमीमांसा विंश “अश्विना हे अश्विनौ देवौ । सोमिनः सोमवतो यजमानस्य । गृहम् । रथेन । गच्छथः । स मार्गः वां युवयोः । दूरके दूरदेशे । नहि अस्ति । यद्वा यत्र गृहे गच्छथः तद् गृहं दूरे नहि भवति ।” हे अश्वि देवताओं, आप रथ के द्वारा सोमयाजी यजमान के घर में जाते हैं, आप दोनों के लिए यजमान का गृह कहीं भी हो दूर नहीं है । इन सब वेद-मन्त्रों से विष्णु का अवतार तथा विष्णु आदि देवताओ का विग्रह एवं रथ आदि दोनों का होना सिद्ध होता है । “स यत्कूर्मो नाम । एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजताकरोत्त्तद्यदकरोत्तस्मा- त्कूर्मः । कश्यपो वै कूर्मस्तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्य इति ।” ( श० ब्रा० ७।५।१।५ ) “अथ कूर्म इति नाम्नः प्रवृत्तिनिमित्तं दर्शयति—स यत्कूर्म इति । एतत् कूर्मसम्बन्धि । रूपम् आत्मनः कृत्वा । प्रजापतिः । प्रजा असृजत । असृजतेत्यस्य व्याख्यानम्—यदसृजताकरोदिति । असृजत इति यत् तत् अकरोत् इत्यर्थः । तत् तेन कूर्मरूपेण अकरोदिति यत् तस्मादकरोदिति कूर्मः इति कूर्मशब्दो नामधेयार्थः । कश्यपो वा इत्यादिकस्यायमर्थः कूर्मशब्दस्य करणप्रवृत्तिनिमित्तकत्वात् । कश्यपस्य प्रजापतित्वेन प्रजाकारकत्वात् कश्यपः कूर्मः खलु । अत एव सर्वाः प्रजाः काश्यप्य इति आहुर्जनाः । अतश्च कूर्मस्य कश्यपात्मकत्वात् तदुपधानं प्रशस्तमिति भावः ।” प्रजापति परमेश्वर ने कूर्मरूप धारण कर प्रजा की रचना की है । असृजत का अकरोत् अर्थ होता है । वह ‘कृञ्’ धातु का रूप है । करने के कारण ही उनका नाम ‘कूर्म’ हुआ । ‘कूर्म’ को ‘कश्यप’ कहा जाता है । उससे निर्मित होने के कारण प्रजा ‘काश्यपी’ कही जाती है । इससे ईश्वर का ‘कूर्म’ रूप धारण करना सिद्ध है । अथ वराहविहृतम् । इयत्यग्र आसीदितीयती ह वा इयमग्रे पृथिव्यास प्रादेशमात्री तामेष इति वराह उज्जघान सोऽस्याः पतिः प्रजापतिस्तेनैवेनमेतन्मिथुनेन प्रियेण धाम्ना समर्धयति कृत्स्नं करोति ‘मखस्य तेऽद्य शिरो राध्यासं देवयजने पृथिव्या मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे' इत्यसावेव बन्धुः ॥” ( श० ब्रा० १४।१।२।११ ) वराह से विहृत मृत्तिका की प्रशंसा के प्रसङ्ग में कहा गया है कि यह पृथिवी पहले प्रादेशमात्र ही थी; वराह ने उसका उत्खनन किया; वही वराह उसका पति हुआ, अतएव उस वराहविहृत मृत्तिकारूप प्रिय मिथुन को अग्नि का धाम बनाकर सम्पूर्ण मख को समृद्ध बनाया जाता है और उससे देव-यजन में यज्ञ का शिरसंधान किया जाता है । यहाँ प्रसिद्ध रसातल से पृथिवी का उद्धार करनेवाले वराहरूपधारो विष्णु या प्रजापति का उल्लेख है । 'आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत्तस्मिन् प्रजापतिर्वायुर्भूत्वाचरत्सः । इमामपश्यत्तां वराहो भूत्वाहरत्तां विश्वकर्मा भूत्वा व्यमाट् सा प्रथत ।।' (तै०सं० ७।१।५।१) “अथ त्रिरात्रं विधातुं काचिदाख्यायिकोच्यते । तस्यां चाख्यायिकायामादौ पृथिव्युत्पत्तिं दर्शयति— आपो वेति । इदमितीदानीं दृश्यमानं गिरिनदीसमुद्रादिकं जगत् पृथिव्युत्पत्तेः पूर्वं सलिलमासीत् । तस्मिन्नेव सलिले केवला आप एव न तु भूतान्तरं तत्कार्यं वा किञ्चिदपि आसीत् । तदानीं प्रजापतिर्मूर्तस्य शरीरस्यावस्थातुं स्थानाभावाद् वायुरूपो भूत्वा तस्मिन् सलिले सर्वत्राचरत् । चरित्वा च सलिले निमग्नां भूमि दृष्ट्वा स्वयं वराहो भूत्वा दंष्ट्राग्रेण तां भूमिं जलस्योपर्याहरत् । आहृत्य च वराहरूपमुत्सृज्य विश्वकर्मा भूत्वा विशेषेण मार्जनं कृत्वा तत्रत्यं द्रवमपनोय तां विस्तारितवान् । तत इयं दृश्यमाना सर्वप्राण्याधारभूता पृथिवी अभवत् । प्रथनादेव पृथिवीनाम सम्पन्नम् । ( इति सायणभाष्यम् )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५७ यहाँ 'त्रिरात्र' कर्म का विधान करने के लिए आख्यायिका कही जाती है। यह सब गिरि, समुद्रादि जगत् पहले सलिल ही था, इसमें कोई भूतान्तर या उसका कार्य नहीं था। उस समय ईश्वर ने वायुरूप से सलिल में सर्वत्र विचरण करते हुए सलिल में निमग्न पृथिवी को देखा और वराह होकर अपने दंष्ट्राग्र से भूमि को जल के ऊपर लाये। फिर वराहरूप त्याग कर विश्वकर्मा होकर विशेषरूप से मार्जन किया; द्रवांश हटाकर पृथिवी को फैला कर विस्तारित कर दिया। इसी से सब प्राणियों की आधारभूत पृथिवी कहलायी। यहाँ प्रथम मन्त्र से भी अधिक वराह अवतार का वर्णन है। अथ षष्ठं संभारं विधत्ते— “आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत् । तेन प्रजापतिरश्राम्यत् ।५। सोऽपश्यत् पुष्करपर्णं तिष्ठत् । सोऽमन्यत । अस्ति वै तत् । यस्मिन्निदमधितिष्ठतीति । स वराहो रूपं कृत्वोपन्यमज्जत् । स पृथिवीमध आर्च्छत् । तस्या उपहत्योदमज्जत् । तत्पुष्करपर्णेऽप्रथयत् । यदप्रथयत् ।६। तत्पृथिव्याः पृथिवीत्वम् ।” ( तै० ब्रा० १।२।३।५,६ ) “इदमीदानीं दृश्यमानं गिरिनदीसमुद्रादिकं स्थावरं मनुष्यगवादिकं जङ्गमं च सृष्टेः पूर्वमीदृशं नासीत् । किन्तु सलिलरूपमासीत् । इदं दृश्यमानं जगत्सलिलं कारणेन सङ्गतमविभागापन्नम् । तदानीं प्रजापतिस्तेन सिसृक्षितजगन्निमित्तेनाश्राम्यत् । पर्यालोचनरूपं तपोऽकुरुत । कथं नामेदं जगद्भवेदिति विचार्य तस्य सलिलस्य मध्ये दीर्घनालाग्रेऽवस्थितमेकं पद्मपत्रमपश्यत् । तच्च दृष्ट्वा मनस्येवमतर्कयत् । यस्मिन्नाधार इदं सनालं पद्मपत्रमधिश्रित्य तिष्ठति तद्वस्तु किञ्चिदधस्तादस्त्येवेति तर्कयित्वा च स प्रजा- पतिर्वराहो भूत्वा तदीयं रूपं च सम्यक् कृत्वा तस्य पद्मपत्रनालस्य समीपे जलमध्ये निमग्नोऽभूत् ।। मग्नश्चासावधस्तात् भूमि प्राप्तवान् । तस्या भूमेः सकाशात् कियतीमप्याद्रां मृदं स्वदंष्ट्रया पृथक्कृत्य सलिलस्योपर्यन्मज्जनं कृतवान् । तच्च मृद्रूपं तस्मिन् पुष्करपर्णे प्रसारितवान् । यस्मादियं मृत्तिका प्रथिता तस्मात्पृथिवीनाम सम्पन्नम्।” यह सब पहले सलिल था। जगत् की रचना के लिए प्रजापति ने तप किया। सलिल के मध्य में दीर्घनाल के अग्र में अवस्थित पद्मपत्र उन्हें दिखायी दिया। उसे देख कर प्रजापति ने विचार किया कि जिस आधार में यह सनाल पद्मपत्र है, नीचे वह कोई वस्तु है। तब प्रजापति ने वराहरूप धारण कर नाल के समीप ही गोता लगाया। वहीं उसने भूमि को देखा। उस भूमि की कुछ गीली मिट्टी को अपनी दंष्ट्रा से अलग कर पानी के ऊपर आकर उसी मिट्टी को पद्मपत्र पर फैला दिया। वही मृत्तिका पृथिवी हो गयी। अनादि मन्त्र, ब्राह्मण और वेद प्रसिद्ध आख्यायिका के प्रसङ्ग से ईश्वर के विविध अवतारों का वर्णन करते हैं। वेद स्वयं अनादि हैं। सृष्टि के पूर्वकाल में ही ईश्वर से निःश्वासरूप में प्रकट हुए हैं। अतः अवतार को विकास या आधुनिक कहना अनभिज्ञता ही है। कामानन्तरभाविनीं सृष्टि दर्शयति— “स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । शरीरमधूनुत । तस्य यन्मांसमासीत् । ततो अरुणाः केतवो वातरशना ऋषय उदतिष्ठन् ।२। ये नखाः । ते वैखानसाः । ये बालाः । ते बालखिल्याः । यो रसः । सोऽपाम् इति ।” “स प्रजापतिः सृष्टि कामयित्वा तपः कृतवान् । नात्र तप उपवासादिरूपं किन्तु स्रष्टव्यं वस्तु कीदृशमिति—पर्यालोचनरूपम् । अत एव आथर्वणिका आमनन्ति—‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।’ इति । प्रजापतिः तपः पर्यालोचनरूपं कृत्वा स्रष्टव्यरूपं निश्चित्य स्वकीयं शरीरमधूनुत कम्पितवान् । ८३

तस्य कम्पितस्य शरीरस्य यन्मांसमस्ति तस्मान्मांसादरुणादिनामिकास्त्रिविधा ऋषय उद्यन्त । प्रजापतेः सत्यसङ्कल्पत्वात् तत्सङ्कल्पानुसारेण तत्तद्वस्तूत्पद्यते । तस्य शरीरस्य ये नखा आसंस्ते वैखानसनामका। मुनयोऽभवन् । ये शरीरबालाः केशास्ते बालखिल्यनामका मुनयोऽभवन् । यः शरीरस्य रसः सारांशः सोऽपां मध्ये कश्चित्कूर्मोऽभूदिति शेषः ।” कामना के अन्तर सृष्टि का वर्णन—प्रजापति ने तप किया ( यहाँ स्रष्टव्य वस्तु का पर्यालोचन ही तप है; उपवास आदि रूप तप नहीं ) और अपने शरीरको प्रकम्पित किया । प्रकम्पित प्रजापति के शरीर का जो मांस था उससे अरुण, केतु और वातरसन त्रिविध ऋषि प्रकट हुए । सत्यसंकल्पप्रजापति के संकल्प से तत्तद् वस्तुएँ उत्पन्न हुईं । उस शरीर के जो नख थे उनसे वैखानस ( वानप्रस्थ ) उत्पन्न हुए, उसके बालों से बालखिल्य और जो उसके शरीर का रस था वह जल के मध्य में कूर्म हुआ । तेन कूर्मेण सह प्रजापतेः संवादं दर्शयति— “अन्तरतः कूर्मभूतं सर्पन्तम् । तमब्रवीत् । मम वै त्वङ्मांसात् समभूः । (३) नेत्यब्रवीत् । पूर्वमेवाहमिहासमिति । तत्पुरुषस्य पुरुषत्वम् । सहस्राक्षः सहस्रपात् । भूत्वोदतिष्ठत् । तमब्रवीत् । त्वं वै पूर्वं समभूः । त्वमिदं पूर्वः कुरुष्वेति, इति ।” ( तै० आ० १।२३ ) “अन्तरतो जलस्य मध्ये कूर्माकारेण निष्पन्नं तत्रैव संचरन्तं तं पुरुषं प्रजापतिरब्रवीत्, हे कूर्म मम वै त्वङ्मांसात् त्वचो मांसस्य च सम्बन्धिनो रसात्सम्भूतस्त्वं समुत्पन्नोऽसीति । तदा स कूर्मो नेत्य- ब्रवीत्, यत्त्वयोक्तं तन्न, त्वदीयशरीररसान्नाहमुत्पन्नः किन्तु कूर्माकारं शरीरमेव निष्पन्नमभूत्, अहं तु सर्वगतनित्यचैतन्यस्वरूपत्वात् पूर्वमेवेहास्मिन् स्थाने स्थितोऽस्मि । यस्मात्पूर्वमासमित्युवाच तस्मात्पुरुष इति परमात्मनो नाम सम्पन्नम् । एवमुक्त्वा स कूर्मशरीरवर्ती परमात्मा स्वसामर्थ्यप्रकटनाय विराड्रूपं कृत्वा सहस्रसंख्याकैः शिरोभिरक्षिभिः पादैश्च युक्तो भूत्वा प्रादुर्भूत् । तदानीं प्रजापतिस्तं विराड्रूपं दृष्ट्वा तत्रत्यं परमात्मानमेवमब्रवीत् । भोः परमात्मन् मच्छरीरात् पूर्वं त्वमेव सर्वदा विद्यमानोऽतो मत्तः पूर्वभावी संस्त्वमेवेदं सर्वं जगत्कुरुष्वेति ।” ( सायणभाष्यम् ) कूर्म होकर जल में संचार करते हुए कूर्म से प्रजापति ने कहा “हे कूर्म ! तुम हमारे त्वक्मांसादिसम्बन्धी रस से उत्पन्न हुए हो”; कूर्म ने कहा “जो तुमने कहा वह सही नहीं है, मैं तो पहले ही से था । अर्थात् कूर्मशरीरमात्र तुम्हारे त्वङ्मांसादि से उत्पन्न हुआ । मैं अनन्त चैतन्यरूप ईश्वर तो पहले से ही हूँ । पूर्व में होने से ही परमेश्वर का पुरुष नाम हुआ । वह कूर्मावतारधारी भगवान् अपना महत्त्व प्रकट करने के लिए विराड्रूप धारण कर हजारों सिरों, आंखों और चरणों से युक्त होकर आविर्भूत हुए । कूर्मावतारधारी परमेश्वर से प्रजापति ने कहा मैं पूर्व में ही था, इस कथन से तुम्हारा नाम पुरुष है । हे परमात्मन् ! तुम मुझसे भी पूर्वभावी हो, इस समस्त जगत् का निर्माण तुम्हीं करो । पूर्वोक्त वाक्यों में प्रजापति का अर्थ परमेश्वर है, क्योंकि वही मुख्यरूप से सम्पूर्ण प्रजा का प्रजापति है । पर यहाँ प्रजापति का जीवरूप ही प्रजापति अर्थ है, उसके शरीरगत मांसादि रस से भगवान् का कूर्मशरीर प्रकट हुआ । ‘अर्कौघाभं किरीटान्वितमकरलसत्कुण्डलम्’ इत्याद्यागमप्रसिद्धमूर्तिधरं देवं प्रार्थयते— कोटि कोटि सूर्यतुल्य किरीट एवं मकराकार कुण्डल शोभित भगवान् हैं इत्यादि आगम प्रसिद्ध मूर्तिधारी भगवान् की स्तुति करते हैं— “नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्, इति ।” (तै० आ० १०।१।१६)

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५९ "नरशरीराणामुपादानरूपाण्यन्नादिपञ्चभूतानि नारशब्देनोच्यन्ते । तेषु भूतेषु या आपो मुख्यास्ता अयनमाधारो यस्य विष्णोः सोऽयं नारायणः । समुद्रजलशायीत्यर्थः । मनुष्य-शरीरों के उपादान भूमि आदि पञ्च महाभूत नार कहे जाते हैं। उनमें से मुख्य जल जिनका आश्रय है वह नारायण विष्णु हैं। क्षीरसिन्धु-शायी वही कृष्णावतार में वसुदेव-पुत्र होकर वासुदेव हुए । तथा च स्मर्यते-- “आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥” ( मनु० १।१० ) "स च कृष्णावतारे वसुदेवस्य पुत्रत्वाद् वासुदेवः । स च स्वकीयेन वास्तवैन परब्रह्मरूपेण व्यापित्वाद् विष्णुः ।” इति सायणभाष्यम् । वह अपने वास्तव परब्रह्मरूप से व्यापी हैं, अतः विष्णु हैं। इस दृष्टि से विष्णु गायत्री में कहे गये हैं। हम नारायण को तत्त्वतः जानते हैं और वासुदेवरूप से उनका ध्यान करते हैं। वह व्यापी ब्रह्मरूप विष्णु हमको सत्य प्रेरणा दें । नरसिंहं प्रार्थयते— “वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि । तन्नो नारसिंहः प्रचोदयात्, इति ॥” ( तै० आ० परिशिष्ठ १०।१।६ ) “नरसिंह एव नारसिंहः । वज्रनखाय तीक्ष्णदंष्ट्राय तस्मै । पदयोजना पूर्ववत् । आयसा- स्तम्भादवतीर्य स्वनखैहिरण्यकशिपुजठरभेत्तुः कृततदीयान्त्रयज्ञोपवीतस्य भगवतो नरकण्ठीरवरूपस्य वज्रनखत्वं तीक्ष्णदंष्ट्रत्वं च युक्तमेव ।” हम वज्रतुल्य नखवाले भगवान् को तत्त्वतः जानते हैं । तीक्ष्णदंष्ट्रावाले उन्हीं नृसिंह का ध्यान करते हैं प्रह्लादप्रतिपालक नृसिंह भगवान् ने आयसप्राय स्तम्भ से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का उदर अपने नखों से विदीर्ण कर दिया और उसकी आंतों को यज्ञोपवीतवत् धारण कर लिया । उन श्रेष्ठ नरसिंह भगवान् के नख वज्रतुल्य थे । “वामनो ह विष्णुरास” ( शत० ब्रा० १।२।५।५ ) से विष्णु का वामन होना सिद्ध है । पद्मपुराण के अनुसार श्रीहरि का एक नाम समस्त वेदों के समान परम पावन है और हरि के सहस्र नामों के तुल्य एक श्रीरामनाम है । तभी तो भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं—‘हे वरानने ! मैं मनोरम राम में राम राम, राम जपता हुआ सदा रमण करता हूँ । राम का एक-एक नाम हरि के सहस्र नामों के तुल्य है— “विष्णोरेकैकनामैव सर्ववेदाधिकं मतम् । तादृङ्नामसहस्रैस्तु रामनामसमं मतम् ॥ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥” जैसे सच्चिदानन्दघन ( मूर्ति ) राम हैं वैसे ही राम की ह्लादिनी, सन्धिनी और संविन्मूर्त्ति जनक- नन्दिनी जानकी हैं । आह्लादिनी आदि शक्तियों से विशिष्ट ही परिपूर्ण ब्रह्म होता है । उसी तरह सर्वालङ्कारों से अलङ्कृता सुवर्णवर्णा द्विभुजा चिद्रूपिणी कमलधारिणी जनकनन्दिनी सीता के द्वारा आश्लिष्ट होकर ही रामचन्द्र परात्पर परब्रह्म हैं—

“हेमाभया द्विभुजया सर्वालङ्कृतया चिता। श्लिष्टः कमलधारिण्या पुष्टः कोशलजात्मजः ॥” (वा० ता० ४।९) सकल सच्छास्त्रों का तात्पर्य श्रीसीता में है, क्योंकि सीतोपनिषद् के अनुसार ब्रह्मसत्तासामान्यरूप सीता है। तभी धीपराशरभट्ट स्वामी ने कहा है—केवल श्रीसूक्त एवं रामतापनी उपनिषद् ही हाथ उठाकर आपको ही जगत् की एकमात्र नियन्त्री नहीं कहते हैं, किन्तु रामायण महाग्रन्थ भी आपका चरित्र प्रतिपादन करके ही जीवन धारण करता है जितने स्मृतियों के प्रणेता मन्वादि हैं वे सभी पुराणों के सहित वेदों को आपकी महिमा में ही प्रमाण मानते हैं— “उद्वाहुस्त्वामुपनिषदसावाहु नेकां नियन्त्रीं श्रीमद्रामायणमपि वरं प्राणिति त्वच्चरित्रे । स्मर्तारोऽस्मिञ्जननि यतमे सेतिहासाः पुराणैर्निन्युर्वेदानपि च ततमे त्वन्महिम्नि प्रमाणम् ।।” (गुणरत्नकोश १४) “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् ।” वाल्मीकिरामायण के अनुसार सभी रामायण महाकाव्य सीता के ही महान् चरित्र हैं। सीताचरित्र होने से ही श्रीराम ने रामायणश्रवण किया था। अन्यथा धीरोदात्त नायक राम के लिए अपनी राज्य-सभा में अपना चरित्र सुनना सङ्गत न होता। शास्त्रों के अनुसार जैसे सम्राट् दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब निहार कर अपने वैभव का अनुभव करता है वैसे ही शिव शक्ति में निज प्रतिबिम्ब निहार कर अपनी पूर्णता एवं स्वतन्त्रता का अनुभव करते हैं। ठीक वैसे ही सीता की अनन्त महिमा में राम अपनी पूर्णता का अनुभव करते हैं। वैष्णवाचार्य भक्त तो स्पष्ट कहते हैं कि हे मातः मैथिली ! लङ्का में नित्य नया अपराध करनेवाली राक्षसियों की रुष्ट हनुमान् से अनेक हेतुदर्शक वाक्यों द्वारा बिना शरण में आये ही रक्षा करके आपने राघवेन्द्र की सभा को लघु बना दिया, क्योंकि राघवेन्द्र ने तो जयन्त एवं विभीषण की रक्षा शरण आने पर ही की थी, पर आप तो अपने क्षमागुण के प्राबल्य से शरणागतिनिरपेक्ष ही अहैतुकी कृपा से रक्षा करती हैं— “मातर्मैथिलि राक्षसीस्त्वयि तदैवार्द्रापराधास्त्वया रक्षन्त्या पवनात्मजाल्लघुकृता रामस्य गोष्ठी कृता । काकं तं च विभीषणं शरणमित्युक्तिक्षमौ रक्षतः सा नः सान्द्रमहागसः सुखयतु क्षान्तिस्तवाकस्मिकी ॥” संमोहनतन्त्र के अनुसार गौर तेज के बिना श्याम तेज के भजन तथा ध्यान से पूर्ण सिद्धि आदि न मिल- कर पातक ही हाथ लगता है— “गौरतेजः परित्यज्य श्यामतेजः समर्चयेत् । जपेद् वा ध्यायते वापि स भवेत् पातकी शिवे ॥” श्रीरामानुजाचार्य के अनुसार अरविन्दनयन भगवान् की प्राणेश्वरी भगवती के प्रसाद के बिना सांसारिक वैभव, अक्षर ब्रह्म तथा वैष्णव-मार्ग की मुक्ति आदि भी नहीं मिलती— “श्रेयो नह्यरविन्दलोचनमनःकान्ताप्रसादादृते संसृत्यक्षरवैष्णवाध्वसु नृणां संभाव्यते कर्हिचित् ।” शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्तासामान्य ही सीता एवं राम के रूप में प्रकट होता है, दोनों ही सच्चिदानन्द- रस-सारसर्वस्व होने पर भी सौन्दर्यसारसर्वस्व का सीतारूप में एवं प्रेमसारसर्वस्व का रामरूप में प्रादुर्भाव है। लोक

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६१ में जैसे रूप, आलोक एवं नेत्र तीन होने पर भी मूलतः तीनों ही एक तेज हैं। वैसे ही लोक में सौन्दर्य, सौन्दर्यज्ञान एवं सौन्दर्यज्ञानजनित प्रेम तीन होने पर भी मूल में तो एक ही सत्यं शिवं सुन्दरं हैं। रसास्वादन की दृष्टि से सौन्दर्यसार सीता के रूप में एवं प्रेमसार राघवेन्द्र के रूप में प्रकट हैं। भक्तों ने यह भी माना है कि लीलाविग्रहदृष्टि से युवत्वादि गुण दोनों में समान होने पर भी पुरुषत्व के अनुरूप स्वातन्त्र्य, शत्रुदमन, स्थैर्यादि गुण भगवान् में हैं और स्त्रीत्व के अनुरूप मृदिमा, पतिपरायणता, करुणा, क्षमा आदि पराम्बा में हैं। इस तरह एक दूसरे के गुणों का रसास्वादन करने के लिए ही एकरूप होने पर भी उन्होंने दो रूप धारण कर रखे हैं। "युवत्वादौ तुल्येऽप्यपरवशताशत्रुदमन- स्थिरत्वादीन् कृत्वा भगवति गुणान् पुंस्त्वसुलभान्। त्वयि स्त्रीत्वैकान्तान् मृदिमपतिपराथिकरुणा- क्षमादीन् वा भोक्तुं भवति युवयोरात्मनि भिदा ॥" भक्त कहता है, हे जननि, आपके प्रेयान् राघवेन्द्र पिता के समान जीवों के हितार्थ उनके महान् अपराधों को देखकर जब कभी-कभी खूब कुपित होते हैं और क्षमा न करके उन अशुभों को आसुरी योनियों में ही भेजने पर प्रस्तुत हो जाते हैं— "क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।" तब मैथिली भगवान् को रुष्ट देखकर प्रेम से प्रार्थना कर उन्हें समझा कर जीवों के अनुकूल बनाने का प्रयास करती हुई कहती हैं—इस दोषागार संसार में निर्दोष कौन है, अतः पुत्रों (जीवों) पर क्रोध न करके अपने सर्वरक्षक, सर्वशरण्य आदि विरुदावली के अनुसार कृपा ही करें। इस प्रकार विविध उपायों से प्रभु के समक्ष जीवों के अपराधों की स्मृति प्रभु के मन से निकाल कर प्रभु को उनके अनुकूल बनाकर उन्हें अपनाती हैं। राक्षसों को हनुमान् से बचाने के लिए भगवती सीता ने कहा था कि कोई पापी हो, पुण्यात्मा हो, चाहे वध के योग्य भी क्यों न हो बड़ों को ऐसे जीवों पर भी कृपा ही करनी चाहिये, क्योंकि निरपराध कोई है नहीं— "पापानां वाशुभानां वा वधार्हाणामथापि वा। कार्यं कारुण्यमार्येण न कश्चिन्नापराध्यति ॥" (वा० रा० ६।११३।४५) किं बहुना श्रीसीता और राम दोनों अत्यन्त अभिन्न होते हुए भी भगवान् की भक्ति, सेवा या आराधना का आदर्श स्थापन करने और भक्तों को रसास्वादन कराने तथा स्वयं भक्ति, प्रेम एवं माधुर्य रस का आस्वादन करने के लिए दो रूपों में प्रकट होते हैं। 'श्रिञ्' सेवायाम् धातु से 'श्रीशब्द' निष्पन्न होता है। उसके अनुरूप श्रीहरि की सेवा करनेवाली श्री है। श्रयते हरि या सा श्रीः। चाहनेवालों से निरपेक्ष होकर श्री ने परमनिरपेक्ष हरि का वरण किया था। सब देवता लोग श्री को चाहते थे, परन्तु हरि अत्यन्त निरपेक्ष थे। फिर भी सापेक्ष अन्य देवों का वरण न करके निरपेक्ष हरि को ही श्री ने अपनाया। उनके इस लोकोत्तर गुण से श्रीहरि ने प्रसन्न होकर श्री को हृदय (वक्षःस्थल) पर आवासस्थान देकर उन्हें अपने हृदय की अधीश्वरी बना लिया। इससे समस्त गुण श्री की आराधना करने लगे। श्रीयते सर्वैर्गुणैर्य्या सा श्रीः। जो सब गुणों से सेवित हैं वही श्री हैं। अन्त में स्वयं हरि भी उनकी उपासना करने लगे। श्रीयते हरिणापि या सा श्रीः। आह्लादिनीसारसर्वस्व भक्तिस्वरूपा भगवती ही सर्वसेव्या हैं। विष्णुपुराण के अनुसार जैसे विष्णु सर्वगत हैं वैसे ही उनकी अनपायिनी नित्या शक्ति भी सर्वगत एवं नित्य ही हैं एवं विष्णु अर्थ हैं तो लक्ष्मी वाणी हैं, भगवती नीति हैं तो भगवान् नय हैं, विष्णु बोध हैं तो लक्ष्मी

६६२ रामायणमीमांसा विंश बुद्धि है। भगवान् धर्म हैं तो भगवती सत्क्रिया हैं। किं बहुना देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि में पुंनाम से प्रसिद्ध सब विष्णु हैं एवं स्त्रीनाम से वाच्य सब श्री हैं— “नित्यैवैषा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी । यथा सर्वगतो विष्णुस्तथैवेयं द्विजोत्तम ॥ अर्थो विष्णुरियं वाणी नीतिरेषा नयो हरिः । बोधो विष्णुरियं बुद्धिर्धर्मोऽसौ सत्क्रिया त्वियम् ।। देवतिर्यङ्मनुष्यादौ पुंनामा भगवान् हरिः । स्त्रीनाम्नी श्रीश्च विज्ञेया नानयोर्विद्यते परम् ।।” (वि० पु० १।८।१७-१९) इन्द्र ने स्तुति करते हुए कहा था कि आप सब लोकों की माता हैं और देवाधिदेव विष्णु सब लोकों के पिता हैं। यह सम्पूर्ण जगत् विष्णु एवं आप के द्वारा व्याप्त है— त्वं माता सर्वलोकानां देवदेवो हरिः पिता । त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद् व्याप्तं चराचरम् ॥ (वि० पु० १।९।१२६) “विप्राः प्राहुस्तथा चैतद् यो भर्ता सा स्मृताऽङ्गना ।” (मनु० ९।४५) के अनुसार भी परब्रह्म एवं परब्रह्ममहिषी का अभेद ही है। “राघवत्वेऽभवत् सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि । एवं यदा जगत्स्वामी देवदेवो जनार्दनः ।। अवतारं करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी । अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ॥ देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी । विष्णोर्देहानुरूपा सा करोत्येवात्मनस्तनुम् ।।”(वि० पु० १।९।१४२-१४५) महालक्ष्मी ही विष्णु के राघव हो जाने पर सीता बन जाती हैं। कृष्ण होने पर रुक्मिणी बन जाती हैं। जगत्स्वामी विष्णु जब जब अवतार धारण करते हैं, महालक्ष्मी उनकी सहायिनी बन कर प्रकट होती हैं। अन्य अव- तारों में भी विष्णु के अनुरूप वे बन जाती हैं। मनुष्य बनने पर मानुषी बन जाती हैं। सर्वथापि विष्णु के अनुरूप ही अपना स्वरूप बना लेती हैं । “कमलेयं जगन्माता लीलामानुषविग्रहा । देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी ।। विष्णोर्देहानुरूपां वै करोत्येषाऽऽत्मनस्तनुम् ।” (स्कन्दपु० ब्राह्मख० सेतुमाहात्म्य २२।१६, १७ ) सीता मानुषविग्रहधारिणी कमला ही हैं। जब भगवान् देवरूप में होते हैं तब उनके अनुरूप ही देवदेहा महालक्ष्मीरूप में व्यक्त होती हैं । “अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा ।” (वा० रा० ५।११।१६) राम और सीता दोनों ने स्वीकार किया है कि सीता राम से वैसे ही अनन्य हैं जैसे भास्कर से उसकी प्रभा अभिन्न होती है— “अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा ।” (वा० रा० ५।२१।१६)

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६३ भगवान् शङ्कराचार्य ने 'स्मर्यतेऽपि च लोके' (३।१।१९) इस ब्रह्मसूत्र पर व्याख्या करते हुए शारीरिक- भाष्य में कहा है—सीता, द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्न बिना माता-पिता के ही उत्पन्न हुए थे । सर्वसाधारण की उत्पत्ति द्यौ, पर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष एवं योषित् क्रमशः पाँच अग्नियों के द्वारा होती है । परन्तु द्रोणाचार्य बिना माता के चार अग्नियों से ही उत्पन्न हुए थे । सीता, द्रौपदी आदि माता और पिता दोनों के सम्बन्ध बिना तीन अग्नियों से ही उद्भूत हुई थीं— "द्रोणधृष्टद्युम्नप्रभृतीनां सीताद्रौपदीप्रभृतीनां चायोनिजत्वम् । तत्र द्रोणादीनां योषिद्विषये- काहुतिर्नास्ति । धृष्टद्युम्नादीनान्तु योषित्पुरुषविषये द्वे अप्याहुती न स्तः ।" (शा० भा०) वाल्मीकिरामायण में सीता ने अपने अयोनिज होने की चर्चा की है— “अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् । सदृशं चाभिरूपं च महीपालः पतिं मम ।।” (वा० रा० २।११८।३७) मुझे अयोनिज जानकर मेरे अनुरूप पति न पाकर राजा चिन्तित हुए । यद्यपि कुछ लोगों के अनुसार— “धन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य तु । तस्याः कन्या महालक्ष्मीः सीता नाम्ना भविष्यति ।” इस शिवपुराण-वचन के अनुसार सीता जनक की धन्या नाम्नी योगिनी पत्नी के गर्भ से उत्पन्न हुईं । तथापि उक्त वचन में भी गर्भ से उत्पन्न होने की बात सिद्ध नहीं होती । अतः धन्या ने हलाग्र उत्पन्न अयोनिजा कन्या का ही ममत्वातिशय से पालन किया था । इसी लिए उसकी महालक्ष्मी सीताविशेष पुत्री कहलायी । यदि कहीं वैसा पाठ हो तो उसे कल्पान्तरीय कथा का समझना चाहिये । कूर्मपुराण के अनुसार यह भी विदित होता है कि सीता की आराधना से अग्नि ने छायामयी सीता का निर्माण किया था । अतः रावण द्वारा हरण उसी का हुआ था, लङ्का की अग्निपरीक्षा के पश्चात् पुनः स्वाभाविक अग्निपुरनिवासिनी सीता का अग्नि के द्वारा पुनः प्राकट्य हुआ था । “सीताराधितो वह्निश्च्छायासीतामजीजनत् । तां जहार दशग्रीवो सीता वह्निपुरं गता ।। परीक्षासमये वह्नि छायासीता विवेश सा । वह्निः सीतां समानीय स्वपुरादुदनीनयत् ॥ (कूर्मपुराणीयं चैतन्यचरितामृतधृतं वचनम् २।९।१८७) तुम पावक महु करहु निवासा। जब लगि करौं निसाचर नासां ।। (रा० मा० ३।२३।१) एतावता सीता का अयोनिजा होना भक्तों की कल्पनामात्र है, बुल्के का यह कहना निर्मूल है । काशीकेदार- माहात्म्य ( ब्रह्मवैवर्त खिल० ) आदि ग्रन्थों में सीता की लक्ष्मीरूपता तथा राम की विष्णुरूपता कही गयी है— “विष्णोः पत्न्यौ धरालक्ष्म्यौ धराजाता हि जानकी । धर्मतः सा सुता विष्णोस्तामगृह्णाद् हरिः पुनः ।। कौशल्यातनयो जातस्तत्र दोषोऽस्ति को वद ।” ( काशीके० मा० १२।४७,४८ ) माधवी ( पृथ्वी ) और लक्ष्मी दोनों ही विष्णु की पत्नियां हैं । जानकी भूमिजा भूमिपुत्री है, इस दृष्टि से सीता विष्णु की पुत्री होती हैं । विष्णु कौशल्यानन्दवर्धन रामरूप धारण कर जानकीपति हो गये । देवताओं में भी ऐसी ही स्थिति है । भिन्न क्षेत्रों में उत्पन्न होने से दाम्पत्य हो जाता है । ब्रह्मा की जिह्वा से उत्पन्न सरस्वती पार्वती से उत्पन्न होकर ब्रह्मा की पत्नी हो सकी थी !

६६४ रामायणमीमांसा विश स्वाध्यायोऽध्येतव्यः । अग्निहोत्रं जुहुयात् । दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत । सोमेन यजेत । अश्वमेधेन यजेत । ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च सत्यं च तपश्च दमश्च शमश्च । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदित- व्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि त्वया सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि ।” ( तैत्ति० आ० १।९।११।१,२ ) “सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः । अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ॥ अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भरतु संमनाः । जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम् ॥ मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा । सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥ ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वियोष्ट संराध्यन्तः मधुराश्चरन्तः । अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि ॥ समानी प्रपा सह वोन्नभागाः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि । सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः ॥” ( अथ० सं० ३।१२,३,५,६ ) स्वाध्यायपदवाच्य सकल वेदराशि का अध्ययन करना । अग्निहोत्र करना । दर्श, पूर्णमास, ज्योतिष्टोम, अश्वमेध आदि यज्ञ करना । सूनृता वाणी बोलना । स्वाध्याय तथा प्रवचन में संलग्न रहना । सत्य भाषण, तप, दम, शम और स्वाध्याय आदि करना । सत्य बोलना । धर्म का आचरण करना । स्वाध्याय में प्रमाद न करना । आचार्य को अभीष्ट दक्षिणा प्रदान कर के समावर्तन संस्कार कर गृहस्थ होकर प्रजातन्तु का व्यवच्छेद न करना, सत्य से, धर्म से, शुभ कर्म से तथा ऐश्वर्यप्राप्ति से प्रमाद न करना । माता को देवता मानना, पिता को देवता मानना, आचार्य को देवता मानना, अतिथि को देवता मानना, निर्दोष कर्म करना । सदोष कर्म से बचना । आचार्य जनों के सुचरितों का अनुवर्तन करना । सांमनस्य सूक्तों द्वारा सबसे सहृदयता, सांमनस्य एवं अविद्वेष स्थापित करके परस्पर ऐसा प्रेम बढ़ाया जाता है जैसे गौ अपने नवजात बछड़े में प्रेम करती है । पुत्र पिता के प्रति अनुवर्ती हो, माता के प्रति भक्तिमान् हो, जाया पति के साथ मधुर तथा शान्तियुक्त वाणी बोले । भाई भाई से विद्वेष न करे, बहन बहन से द्वेष न करे । सभी पवित्र व्रत धारण करके एक दूसरे से भद्रबुद्धि से व्यवहार करें । बड़ों के प्रति उत्तम विचार रखो । परस्पर विलग मत होओ । सम्यक् कर्म करते हुए अग्रणी बनो । परस्पर मधुर भाषण करो । हम सबको सांमनस्य करते हैं । तुम लोगों की प्रपा एवं अन्नभाग समान हो । हम समान सूत्र में तुम सबको संबन्धित करते हैं । तुम लोग सम्यक् प्रकार से अग्नि तथा ज्योतिर्मय ब्रह्म की पूजा करो । जैसे रथचक्र की नाभि का आश्रयण अर करते हैं वैसे ही सब उस परमेश्वर का आश्रयण करें । उक्त तथा अनुक्त सभी धर्म राम में परिलक्षित होते हैं । राम ने कहा था कि सत्य ही ईश्वर है । सत्य में ही धर्म स्थित है । दत्त, इष्ट, हुत, तप सब सत्यमूलक ही हैं— ‘सत्यमेवेश्वरः’, ‘सत्ये धर्मः सदा स्थितः ।' ( वा० रा० २।१०९।१३ )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६५ राम ने कहा था कि पिता के वचन से मैं पावक में प्रविष्ट हो सकता हूँ, समुद्र में गिर सकता हूँ। चन्द्रमा से उसकी लक्ष्मी (शोभा) भले पृथक् हो जाय, हिमवान् हिमरहित हो जाय एवं समुद्र मर्यादा भले छोड़ दे, पर मैं पिता की आज्ञा नहीं टाल सकता— ‘लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥” (वा० रा० २।११२।१८) कैकेयी भी मानती हैं कि राम कौशल्या से अधिक मेरा मान करते हैं— "कौशल्यातोऽतिरिक्तञ्च मम शुश्रूषते बहु ।" अन्य माताओं ने भी अनुभव किया था कि राम झूठा कलङ्क लगाने पर भी क्रोध नहीं करते और स्वयं क्रोध करानेवाली बातें नहीं करते। क्रुद्ध लोगों को भी प्रसन्न कर लेनेवाले तथा दूसरों के दुःख में समान दुःखवाले राम अब कहाँ चले जा रहे हैं। महातेजा राम जैसे कौशल्या में भक्ति रखते हैं वैसे ही हम सब में भी भक्ति रखते हैं। "न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् । क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क्व गच्छति ॥ कौशल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते । तथा यो वर्त्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति ॥” (वा० रा० २।४१।३,४) भाइयों के प्रति राम ने कहा था—लक्ष्मण, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी का राज्य तुम भाइयों के लिए चाहता हूँ। भ्राताओं के संग्रहार्थ एवं सुखार्थ ही मैं राज्य भी चाहता हूँ। यह मैं आयु- धका स्पर्श कर सत्य कहता हूँ। बिना भरत के, बिना तुम्हारे और बिना शत्रुघ्न के जो भी सुख हो अग्निदेव उसे जला कर भस्म कर दें— “धर्ममर्थं च कामञ्च पृथिवीं चापि लक्ष्मण । इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिशृणोमि ते ॥ भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण । राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे ॥ यद् विना भरतं त्वां वा शत्रुघ्नं वापि मानद । भवेन्मम सुखं किञ्चिद् भस्म तत्कुरुतां शिखी ॥” (वा० रा० २।९७।५-८) विभीषण ने लङ्का-विजय के बाद राम से अनुरोध किया कि लङ्का में कुछ समय रह कर मेरा आतिथ्य ग्रहण करके तब अयोध्या के लिए प्रस्थान किया जाय। इसपर शीलसिन्धु राम ने कहा कि मैं तुम्हारी बात न मानूं यह सर्वथा असंभव है। परन्तु मेरा मन उस भाई भरत के लिए त्वरावान् हो रहा है, जिसने चित्रकूट तक आकर मुझे लौटाने के लिए बहुत प्रार्थना की थी, किन्तु मैंने उसे स्वीकार नहीं किया था— “न खल्वेतान्न कुर्यां ते वचनं राक्षसेश्वर । तं तु मे भ्रातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मनः ॥” (वा० रा० २।१२३।१८) रामने बहुजनहिताय बहुजनसुखाय नहीं, किन्तु सर्वजनसुखाय सर्वजनहिताय अपनी प्राणेश्वरी स्वात्मभूता जनकनन्दिनी जानकी को वनवास देकर भाईभतीजावाद या कुनबापरस्ती का स्पर्श नहीं होने दिया। सीताजी की निन्दा करनेवाले का भी अघौघ नष्ट कर उसे भी बसाया— "सिय निन्दक अघ ओघ नसाये। लोक विशोक बनाइ बसाये ॥”

६६६ रामायणमीमांसा विंश देवताओं, वानरों और भालुओं के समक्ष होनेवाली अग्निपरीक्षा द्वारा सीताशुद्धि का प्रचार स्वयं न कर के उसकी जिम्मेदारी अन्भक्ष, वायुभक्ष, वल्कलवसनधारी महर्षियों पर डालकर स्वयं कर्त्तव्य-पालन में ही व्यस्त रहे और यह प्रतिज्ञा चरितार्थ कर दिखायी कि स्नेह, दया, सुख, राज्य आदि तथा जानकी को भी लोकरञ्जन के लिए त्यागने में मुझे व्यथा नहीं होगी— “स्नेहं दयांश्च सौख्यञ्च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ।।” ( उ० रा० च० ) इतने पर भी माधुर्य सारसर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता के प्रति अखण्ड प्रेम ज्यों का त्यों बना ही रहा । राम की हृदयसिंहासनाधीश्वरी सीता ही रहीं। कुन्दमालाकार ने कितने सुन्दर शब्दों में राम के भावों का चित्रण किया है— “त्वं देवि चित्तनिहिता गृहदेवता मे स्वप्नागता शयनमध्यसखी त्वमेव । दारान्तरग्रहणनिःस्पृहमानसस्य यागे तव प्रतिकृतिर्मम धर्मपत्नी ॥” ( कुन्दमाला १।१४ ) हे देवि, तुम मेरे चित्त की अधिष्ठात्री गृहलक्ष्मी हो । स्वप्न में भी एकमात्र तुम्हीं मेरे शयन की सखी हो । मेरे मन में दूसरी पत्नी का ग्रहण करने की किञ्चिन्मात्र भी स्पृहा नहीं है। तुम्हारी सुवर्णमयी प्रतिमा ही यज्ञ में मेरी धर्मपत्नी है । राम ने अपने सौशील्य से वानर एवं भालुओं को अपना सखा स्वीकार किया । और उनका परिचय देते हुए अपने गुरु वसिष्ठ से कहा कि ये सब मेरे सखा हैं । समरसागर में इन्होंने बेड़े का काम किया है। मेरे हित के लिए इन्होंने अपना जन्म ही लगा दिया है । ये भरत से भी अधिक मेरे प्रिय हैं— “ये सब सखा सुनिय मुनि मेरे । भये समर सागर मह बेरे ॥ ( रा० मा० ७।७।४ ) राम ने वानरों को गुरु वसिष्ठजी का परिचय देकर प्रणाम करने को कहा— “गुरु वसिष्ठ कुलपूज्य हमारे । इनकी कृपा दनुज रन मारे ॥” ( रा० मा० ७।७।३ ) मित्रता के लिए यह राम का आदर्श वाक्य है— “जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिनहिं विलोकत पातक भारी ॥” ( रा० मा० ४।६।१ ) आढ्य हो या दरिद्र हो, निर्दोष हो अथवा सदोष हो मित्र के लिए वही परम गति है— “आढ्यो वापि दरिद्रो वा दुःखितः सुखितोऽपि वा । निर्दोषश्च सदोषश्च वयस्यः परमा गतिः ॥” ( वा० रा० ४।८।८ ) शरण में आये हुए को राम ने त्यागने में महान् दोष देखा है— “शरणागत कहँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि । ते नर पामर पापमय तिन्हहि विलोकत हानि ॥ ( रा० मा० ५।४३ )

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६७ राम सदा प्रशान्तात्मा और मृदुता के साथ बोलते थे । कोई रूक्षता या कठोरता से बोलता था तो भी वे उससे कठोर नही बोलते थे । वे भूल में भी किये गये एक उपकार से भी तुष्ट हो जाते थे । परन्तु सैकड़ों अपकारों को वे स्मरण भी नहीं करते थे, क्योंकि आत्मवान् थे । वे बुद्धिमान्, मधुरभाषी और पहले ही बोलते थे । वीर्यवान् थे, परन्तु अपने वीर्य से गर्व का अनुभव नहीं करते थे— “सदा नित्यं प्रशान्तात्मा मृदुपूर्वं प्रभाषते । उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥ कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥ बुद्धिमान् मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवदः । वीर्यवान् न च वीर्येण महता स्वेन विस्मितः ।।” (वा० रा० २।१।१०-१३) राम कोई बात दो बार नहीं करते थे, जो कह दिया वह कह दिया । वह पाषाणरेखा के तुल्य अमिट होता था । राम यद्यपि अङ्गुल्यग्रमात्र से संसार के सभी दानवों, यक्षों, गन्धर्वों तथा राक्षसों को मार सकते हैं— “पृथिव्यां दानवान् सर्वान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥” ( वा० रा० ६।१८।२३ ) फिर क्या शत्रु-वध में वानर और भालुओं की सहायता अपेक्षित थी— “किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ।” फिर भी राम की कृतज्ञता उदारता देखते ही बनती है । आप हनुमान् से कहते हैं, जो तुमने मेरे साथ उपकार किया है उसका बदला मैं चुका नहीं सकता। यदि एक एक उपकार के बदले मैं प्राणों को भी समर्पण कर दूँ तो भी तुम्हारे बहुत उपकार शेष ही रहेंगे । उनके लिए मैं सदा ही ऋणी रहूँगा । फिर भी मैं चाहता हूँ कि वे ऋण मेरे अन्दर ही जीर्ण हो जायें मेरे लिए उनके बदले प्रत्युपकार करने का अवसर ही न आये । क्योंकि प्राणी विपत्ति में ही प्रत्युपकार का पात्र बनता है। राम कभी यह नहीं चाहते हैं कि [कभी हनुमान् पर विपत्ति आये और उस समय राम को उपकार के बदले में प्रत्युपकार करने का अवसर आये— “एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे । शेषस्योपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ॥ मदङ्गे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे । नरः प्रत्युपकाराणां आपत्स्वायाति पात्रताम् ॥” (वा० रा० ७।४०।२३, २४) “रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।” राम का पराक्रम दुर्धर्ष है । वैसे तो अनन्त ब्रह्माण्ड का उत्पादन, पालन तथा संहरण सबसे बड़ा पराक्रम है ही । व्यवहार में भी राम और रावण के संग्राम की दूसरी उपमा नहीं है— आरम्भिक युद्धों में रावण ने घोर संग्राम में लक्ष्मण को शक्ति से आहत करके विभिन्न वीरों को आहत कर क्षत-विक्षत कर दिया । राम ने अपने तीक्ष्ण बाणों से धनुष तथा किरीट को ध्वस्त कर रावण को दयनीय बनाकर अनुकम्पा दिखाते हुए कहा कि तुमने महाभीम कर्म किया है । तुमने हमारे बड़े-बड़े योद्धाओं को मार दिया है। फिर भी तुम परिश्रान्त हो, इसलिए मैं इस समय तुम्हें नहीं मारता हूँ। जाओ लङ्का में विश्राम करो, रथी और धन्वी होकर आओ, फिर मेरा बल देखना ।

६६८ रामायणमीमांसा विंश राम के गुण तथा स्वभाव “वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि । लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ॥” ( उ० रा० च० ) उत्तररामचरित के अनुसार लोकोत्तर ईश्वरों के चरित वज्र से भी कठोर एवं कुसुम से भी कोमल होते हैं । उन्हें कौन जान सकता है । ‘अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् । न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥” (वा० रा० ३।१०।१८,१९) राम कहते हैं—सीते, मैं लक्ष्मण और तुमको भी त्याग सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता हूँ । “दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम् । अपि जीवितहेतोर्वा रामः सत्यपराक्रमः ॥” ( वा० रा० ५।३३।२५ ) सत्यपराक्रमी राम देते ही हैं, प्रतिग्रह नहीं करते हैं । सत्य ही बोलते हैं, अनृत नहीं बोलते हैं । “नास्य क्रोधः प्रसादश्च निरर्थोऽस्ति कदाचन । हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति ॥” ( वा० रा० १।१।४५,४९ ) राम के क्रोध और प्रसाद निरर्थक नहीं होते अर्थात् उनके क्रोध और प्रसाद अमोघ हैं । वे वध्य व्यक्ति का अवश्य वध करते हैं और निर्दोष अवध्य के प्रति कभी भी कुपित नहीं होते हैं । “धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता मित्रेऽवञ्चकता गुरौ विनयिता चित्तेऽतिगम्भीरता । आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेऽतिविज्ञानता रूपे सुन्दरता हरौ भजनिता चैते गुणा राघवे ॥” ( चाणक्य १२।१५ ) राम की धर्म में तत्परता एवं मुख में मधुरता स्तुत्य थी । दान में उनका समुत्साह तथा मित्र के प्रति अवञ्चकता भी लोकोत्तर थी । गुरु के प्रति वे विनयी थे । उनके चित्त में गम्भीरता, आचार में पवित्रता, गुणों में रुचि, शास्त्रों में अभिज्ञता, रूप में सुन्दरता एवं हरि में भक्ति भी अत्यन्त उत्कृष्ट था । इसी लिए ऋषियों की दृष्टि में राम से भिन्न कोई काव्यों के यश का भाजन हो ही नहीं सकता— “नह्यन्योऽर्हति काव्यानां यशोभाग् राघवादृते ।” “आनृशंस्यमनुक्रोशः श्रुतं शीलं दमः शमः । राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषर्षभम् ॥” ( वा० रा० २।३३।१२ ) मृदुता, करुणा, श्रुत (परम्परा से वेदादि शास्त्रों का ज्ञान), शील, इन्द्रिय-निग्रह तथा मनोनिग्रह ये छः गुण राघवेन्द्र राम को शोभित करते हैं । शोभा, कान्ति, छवि, वर्ण, लक्षण, लावण्य, आभिजात्य, सौभाग्य, राग आदि रूप के सभी भेद राम के सम्बन्ध से ही शोभित होते हैं । “रूपं वर्णः प्रभा राग आभिजात्यं विलासिता । लावण्यं लक्षणं छाया सौभाग्यं चेत्यमी गुणाः ॥”