भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 735, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 735

तस्य कम्पितस्य शरीरस्य यन्मांसमस्ति तस्मान्मांसादरुणादिनामिकास्त्रिविधा ऋषय उद्यन्त । प्रजापतेः सत्यसङ्कल्पत्वात् तत्सङ्कल्पानुसारेण तत्तद्वस्तूत्पद्यते । तस्य शरीरस्य ये नखा आसंस्ते वैखानसनामका। मुनयोऽभवन् । ये शरीरबालाः केशास्ते बालखिल्यनामका मुनयोऽभवन् । यः शरीरस्य रसः सारांशः सोऽपां मध्ये कश्चित्कूर्मोऽभूदिति शेषः ।” कामना के अन्तर सृष्टि का वर्णन—प्रजापति ने तप किया ( यहाँ स्रष्टव्य वस्तु का पर्यालोचन ही तप है; उपवास आदि रूप तप नहीं ) और अपने शरीरको प्रकम्पित किया । प्रकम्पित प्रजापति के शरीर का जो मांस था उससे अरुण, केतु और वातरसन त्रिविध ऋषि प्रकट हुए । सत्यसंकल्पप्रजापति के संकल्प से तत्तद् वस्तुएँ उत्पन्न हुईं । उस शरीर के जो नख थे उनसे वैखानस ( वानप्रस्थ ) उत्पन्न हुए, उसके बालों से बालखिल्य और जो उसके शरीर का रस था वह जल के मध्य में कूर्म हुआ । तेन कूर्मेण सह प्रजापतेः संवादं दर्शयति— “अन्तरतः कूर्मभूतं सर्पन्तम् । तमब्रवीत् । मम वै त्वङ्मांसात् समभूः । (३) नेत्यब्रवीत् । पूर्वमेवाहमिहासमिति । तत्पुरुषस्य पुरुषत्वम् । सहस्राक्षः सहस्रपात् । भूत्वोदतिष्ठत् । तमब्रवीत् । त्वं वै पूर्वं समभूः । त्वमिदं पूर्वः कुरुष्वेति, इति ।” ( तै० आ० १।२३ ) “अन्तरतो जलस्य मध्ये कूर्माकारेण निष्पन्नं तत्रैव संचरन्तं तं पुरुषं प्रजापतिरब्रवीत्, हे कूर्म मम वै त्वङ्मांसात् त्वचो मांसस्य च सम्बन्धिनो रसात्सम्भूतस्त्वं समुत्पन्नोऽसीति । तदा स कूर्मो नेत्य- ब्रवीत्, यत्त्वयोक्तं तन्न, त्वदीयशरीररसान्नाहमुत्पन्नः किन्तु कूर्माकारं शरीरमेव निष्पन्नमभूत्, अहं तु सर्वगतनित्यचैतन्यस्वरूपत्वात् पूर्वमेवेहास्मिन् स्थाने स्थितोऽस्मि । यस्मात्पूर्वमासमित्युवाच तस्मात्पुरुष इति परमात्मनो नाम सम्पन्नम् । एवमुक्त्वा स कूर्मशरीरवर्ती परमात्मा स्वसामर्थ्यप्रकटनाय विराड्रूपं कृत्वा सहस्रसंख्याकैः शिरोभिरक्षिभिः पादैश्च युक्तो भूत्वा प्रादुर्भूत् । तदानीं प्रजापतिस्तं विराड्रूपं दृष्ट्वा तत्रत्यं परमात्मानमेवमब्रवीत् । भोः परमात्मन् मच्छरीरात् पूर्वं त्वमेव सर्वदा विद्यमानोऽतो मत्तः पूर्वभावी संस्त्वमेवेदं सर्वं जगत्कुरुष्वेति ।” ( सायणभाष्यम् ) कूर्म होकर जल में संचार करते हुए कूर्म से प्रजापति ने कहा “हे कूर्म ! तुम हमारे त्वक्मांसादिसम्बन्धी रस से उत्पन्न हुए हो”; कूर्म ने कहा “जो तुमने कहा वह सही नहीं है, मैं तो पहले ही से था । अर्थात् कूर्मशरीरमात्र तुम्हारे त्वङ्मांसादि से उत्पन्न हुआ । मैं अनन्त चैतन्यरूप ईश्वर तो पहले से ही हूँ । पूर्व में होने से ही परमेश्वर का पुरुष नाम हुआ । वह कूर्मावतारधारी भगवान् अपना महत्त्व प्रकट करने के लिए विराड्रूप धारण कर हजारों सिरों, आंखों और चरणों से युक्त होकर आविर्भूत हुए । कूर्मावतारधारी परमेश्वर से प्रजापति ने कहा मैं पूर्व में ही था, इस कथन से तुम्हारा नाम पुरुष है । हे परमात्मन् ! तुम मुझसे भी पूर्वभावी हो, इस समस्त जगत् का निर्माण तुम्हीं करो । पूर्वोक्त वाक्यों में प्रजापति का अर्थ परमेश्वर है, क्योंकि वही मुख्यरूप से सम्पूर्ण प्रजा का प्रजापति है । पर यहाँ प्रजापति का जीवरूप ही प्रजापति अर्थ है, उसके शरीरगत मांसादि रस से भगवान् का कूर्मशरीर प्रकट हुआ । ‘अर्कौघाभं किरीटान्वितमकरलसत्कुण्डलम्’ इत्याद्यागमप्रसिद्धमूर्तिधरं देवं प्रार्थयते— कोटि कोटि सूर्यतुल्य किरीट एवं मकराकार कुण्डल शोभित भगवान् हैं इत्यादि आगम प्रसिद्ध मूर्तिधारी भगवान् की स्तुति करते हैं— “नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्, इति ।” (तै० आ० १०।१।१६)