भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 736

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५९ "नरशरीराणामुपादानरूपाण्यन्नादिपञ्चभूतानि नारशब्देनोच्यन्ते । तेषु भूतेषु या आपो मुख्यास्ता अयनमाधारो यस्य विष्णोः सोऽयं नारायणः । समुद्रजलशायीत्यर्थः । मनुष्य-शरीरों के उपादान भूमि आदि पञ्च महाभूत नार कहे जाते हैं। उनमें से मुख्य जल जिनका आश्रय है वह नारायण विष्णु हैं। क्षीरसिन्धु-शायी वही कृष्णावतार में वसुदेव-पुत्र होकर वासुदेव हुए । तथा च स्मर्यते-- “आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥” ( मनु० १।१० ) "स च कृष्णावतारे वसुदेवस्य पुत्रत्वाद् वासुदेवः । स च स्वकीयेन वास्तवैन परब्रह्मरूपेण व्यापित्वाद् विष्णुः ।” इति सायणभाष्यम् । वह अपने वास्तव परब्रह्मरूप से व्यापी हैं, अतः विष्णु हैं। इस दृष्टि से विष्णु गायत्री में कहे गये हैं। हम नारायण को तत्त्वतः जानते हैं और वासुदेवरूप से उनका ध्यान करते हैं। वह व्यापी ब्रह्मरूप विष्णु हमको सत्य प्रेरणा दें । नरसिंहं प्रार्थयते— “वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि । तन्नो नारसिंहः प्रचोदयात्, इति ॥” ( तै० आ० परिशिष्ठ १०।१।६ ) “नरसिंह एव नारसिंहः । वज्रनखाय तीक्ष्णदंष्ट्राय तस्मै । पदयोजना पूर्ववत् । आयसा- स्तम्भादवतीर्य स्वनखैहिरण्यकशिपुजठरभेत्तुः कृततदीयान्त्रयज्ञोपवीतस्य भगवतो नरकण्ठीरवरूपस्य वज्रनखत्वं तीक्ष्णदंष्ट्रत्वं च युक्तमेव ।” हम वज्रतुल्य नखवाले भगवान् को तत्त्वतः जानते हैं । तीक्ष्णदंष्ट्रावाले उन्हीं नृसिंह का ध्यान करते हैं प्रह्लादप्रतिपालक नृसिंह भगवान् ने आयसप्राय स्तम्भ से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का उदर अपने नखों से विदीर्ण कर दिया और उसकी आंतों को यज्ञोपवीतवत् धारण कर लिया । उन श्रेष्ठ नरसिंह भगवान् के नख वज्रतुल्य थे । “वामनो ह विष्णुरास” ( शत० ब्रा० १।२।५।५ ) से विष्णु का वामन होना सिद्ध है । पद्मपुराण के अनुसार श्रीहरि का एक नाम समस्त वेदों के समान परम पावन है और हरि के सहस्र नामों के तुल्य एक श्रीरामनाम है । तभी तो भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं—‘हे वरानने ! मैं मनोरम राम में राम राम, राम जपता हुआ सदा रमण करता हूँ । राम का एक-एक नाम हरि के सहस्र नामों के तुल्य है— “विष्णोरेकैकनामैव सर्ववेदाधिकं मतम् । तादृङ्नामसहस्रैस्तु रामनामसमं मतम् ॥ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥” जैसे सच्चिदानन्दघन ( मूर्ति ) राम हैं वैसे ही राम की ह्लादिनी, सन्धिनी और संविन्मूर्त्ति जनक- नन्दिनी जानकी हैं । आह्लादिनी आदि शक्तियों से विशिष्ट ही परिपूर्ण ब्रह्म होता है । उसी तरह सर्वालङ्कारों से अलङ्कृता सुवर्णवर्णा द्विभुजा चिद्रूपिणी कमलधारिणी जनकनन्दिनी सीता के द्वारा आश्लिष्ट होकर ही रामचन्द्र परात्पर परब्रह्म हैं—