रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“हेमाभया द्विभुजया सर्वालङ्कृतया चिता। श्लिष्टः कमलधारिण्या पुष्टः कोशलजात्मजः ॥” (वा० ता० ४।९) सकल सच्छास्त्रों का तात्पर्य श्रीसीता में है, क्योंकि सीतोपनिषद् के अनुसार ब्रह्मसत्तासामान्यरूप सीता है। तभी धीपराशरभट्ट स्वामी ने कहा है—केवल श्रीसूक्त एवं रामतापनी उपनिषद् ही हाथ उठाकर आपको ही जगत् की एकमात्र नियन्त्री नहीं कहते हैं, किन्तु रामायण महाग्रन्थ भी आपका चरित्र प्रतिपादन करके ही जीवन धारण करता है जितने स्मृतियों के प्रणेता मन्वादि हैं वे सभी पुराणों के सहित वेदों को आपकी महिमा में ही प्रमाण मानते हैं— “उद्वाहुस्त्वामुपनिषदसावाहु नेकां नियन्त्रीं श्रीमद्रामायणमपि वरं प्राणिति त्वच्चरित्रे । स्मर्तारोऽस्मिञ्जननि यतमे सेतिहासाः पुराणैर्निन्युर्वेदानपि च ततमे त्वन्महिम्नि प्रमाणम् ।।” (गुणरत्नकोश १४) “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् ।” वाल्मीकिरामायण के अनुसार सभी रामायण महाकाव्य सीता के ही महान् चरित्र हैं। सीताचरित्र होने से ही श्रीराम ने रामायणश्रवण किया था। अन्यथा धीरोदात्त नायक राम के लिए अपनी राज्य-सभा में अपना चरित्र सुनना सङ्गत न होता। शास्त्रों के अनुसार जैसे सम्राट् दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब निहार कर अपने वैभव का अनुभव करता है वैसे ही शिव शक्ति में निज प्रतिबिम्ब निहार कर अपनी पूर्णता एवं स्वतन्त्रता का अनुभव करते हैं। ठीक वैसे ही सीता की अनन्त महिमा में राम अपनी पूर्णता का अनुभव करते हैं। वैष्णवाचार्य भक्त तो स्पष्ट कहते हैं कि हे मातः मैथिली ! लङ्का में नित्य नया अपराध करनेवाली राक्षसियों की रुष्ट हनुमान् से अनेक हेतुदर्शक वाक्यों द्वारा बिना शरण में आये ही रक्षा करके आपने राघवेन्द्र की सभा को लघु बना दिया, क्योंकि राघवेन्द्र ने तो जयन्त एवं विभीषण की रक्षा शरण आने पर ही की थी, पर आप तो अपने क्षमागुण के प्राबल्य से शरणागतिनिरपेक्ष ही अहैतुकी कृपा से रक्षा करती हैं— “मातर्मैथिलि राक्षसीस्त्वयि तदैवार्द्रापराधास्त्वया रक्षन्त्या पवनात्मजाल्लघुकृता रामस्य गोष्ठी कृता । काकं तं च विभीषणं शरणमित्युक्तिक्षमौ रक्षतः सा नः सान्द्रमहागसः सुखयतु क्षान्तिस्तवाकस्मिकी ॥” संमोहनतन्त्र के अनुसार गौर तेज के बिना श्याम तेज के भजन तथा ध्यान से पूर्ण सिद्धि आदि न मिल- कर पातक ही हाथ लगता है— “गौरतेजः परित्यज्य श्यामतेजः समर्चयेत् । जपेद् वा ध्यायते वापि स भवेत् पातकी शिवे ॥” श्रीरामानुजाचार्य के अनुसार अरविन्दनयन भगवान् की प्राणेश्वरी भगवती के प्रसाद के बिना सांसारिक वैभव, अक्षर ब्रह्म तथा वैष्णव-मार्ग की मुक्ति आदि भी नहीं मिलती— “श्रेयो नह्यरविन्दलोचनमनःकान्ताप्रसादादृते संसृत्यक्षरवैष्णवाध्वसु नृणां संभाव्यते कर्हिचित् ।” शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्तासामान्य ही सीता एवं राम के रूप में प्रकट होता है, दोनों ही सच्चिदानन्द- रस-सारसर्वस्व होने पर भी सौन्दर्यसारसर्वस्व का सीतारूप में एवं प्रेमसारसर्वस्व का रामरूप में प्रादुर्भाव है। लोक