रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 738, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६१ में जैसे रूप, आलोक एवं नेत्र तीन होने पर भी मूलतः तीनों ही एक तेज हैं। वैसे ही लोक में सौन्दर्य, सौन्दर्यज्ञान एवं सौन्दर्यज्ञानजनित प्रेम तीन होने पर भी मूल में तो एक ही सत्यं शिवं सुन्दरं हैं। रसास्वादन की दृष्टि से सौन्दर्यसार सीता के रूप में एवं प्रेमसार राघवेन्द्र के रूप में प्रकट हैं। भक्तों ने यह भी माना है कि लीलाविग्रहदृष्टि से युवत्वादि गुण दोनों में समान होने पर भी पुरुषत्व के अनुरूप स्वातन्त्र्य, शत्रुदमन, स्थैर्यादि गुण भगवान् में हैं और स्त्रीत्व के अनुरूप मृदिमा, पतिपरायणता, करुणा, क्षमा आदि पराम्बा में हैं। इस तरह एक दूसरे के गुणों का रसास्वादन करने के लिए ही एकरूप होने पर भी उन्होंने दो रूप धारण कर रखे हैं। "युवत्वादौ तुल्येऽप्यपरवशताशत्रुदमन- स्थिरत्वादीन् कृत्वा भगवति गुणान् पुंस्त्वसुलभान्। त्वयि स्त्रीत्वैकान्तान् मृदिमपतिपराथिकरुणा- क्षमादीन् वा भोक्तुं भवति युवयोरात्मनि भिदा ॥" भक्त कहता है, हे जननि, आपके प्रेयान् राघवेन्द्र पिता के समान जीवों के हितार्थ उनके महान् अपराधों को देखकर जब कभी-कभी खूब कुपित होते हैं और क्षमा न करके उन अशुभों को आसुरी योनियों में ही भेजने पर प्रस्तुत हो जाते हैं— "क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।" तब मैथिली भगवान् को रुष्ट देखकर प्रेम से प्रार्थना कर उन्हें समझा कर जीवों के अनुकूल बनाने का प्रयास करती हुई कहती हैं—इस दोषागार संसार में निर्दोष कौन है, अतः पुत्रों (जीवों) पर क्रोध न करके अपने सर्वरक्षक, सर्वशरण्य आदि विरुदावली के अनुसार कृपा ही करें। इस प्रकार विविध उपायों से प्रभु के समक्ष जीवों के अपराधों की स्मृति प्रभु के मन से निकाल कर प्रभु को उनके अनुकूल बनाकर उन्हें अपनाती हैं। राक्षसों को हनुमान् से बचाने के लिए भगवती सीता ने कहा था कि कोई पापी हो, पुण्यात्मा हो, चाहे वध के योग्य भी क्यों न हो बड़ों को ऐसे जीवों पर भी कृपा ही करनी चाहिये, क्योंकि निरपराध कोई है नहीं— "पापानां वाशुभानां वा वधार्हाणामथापि वा। कार्यं कारुण्यमार्येण न कश्चिन्नापराध्यति ॥" (वा० रा० ६।११३।४५) किं बहुना श्रीसीता और राम दोनों अत्यन्त अभिन्न होते हुए भी भगवान् की भक्ति, सेवा या आराधना का आदर्श स्थापन करने और भक्तों को रसास्वादन कराने तथा स्वयं भक्ति, प्रेम एवं माधुर्य रस का आस्वादन करने के लिए दो रूपों में प्रकट होते हैं। 'श्रिञ्' सेवायाम् धातु से 'श्रीशब्द' निष्पन्न होता है। उसके अनुरूप श्रीहरि की सेवा करनेवाली श्री है। श्रयते हरि या सा श्रीः। चाहनेवालों से निरपेक्ष होकर श्री ने परमनिरपेक्ष हरि का वरण किया था। सब देवता लोग श्री को चाहते थे, परन्तु हरि अत्यन्त निरपेक्ष थे। फिर भी सापेक्ष अन्य देवों का वरण न करके निरपेक्ष हरि को ही श्री ने अपनाया। उनके इस लोकोत्तर गुण से श्रीहरि ने प्रसन्न होकर श्री को हृदय (वक्षःस्थल) पर आवासस्थान देकर उन्हें अपने हृदय की अधीश्वरी बना लिया। इससे समस्त गुण श्री की आराधना करने लगे। श्रीयते सर्वैर्गुणैर्य्या सा श्रीः। जो सब गुणों से सेवित हैं वही श्री हैं। अन्त में स्वयं हरि भी उनकी उपासना करने लगे। श्रीयते हरिणापि या सा श्रीः। आह्लादिनीसारसर्वस्व भक्तिस्वरूपा भगवती ही सर्वसेव्या हैं। विष्णुपुराण के अनुसार जैसे विष्णु सर्वगत हैं वैसे ही उनकी अनपायिनी नित्या शक्ति भी सर्वगत एवं नित्य ही हैं एवं विष्णु अर्थ हैं तो लक्ष्मी वाणी हैं, भगवती नीति हैं तो भगवान् नय हैं, विष्णु बोध हैं तो लक्ष्मी