रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६२ रामायणमीमांसा विंश बुद्धि है। भगवान् धर्म हैं तो भगवती सत्क्रिया हैं। किं बहुना देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि में पुंनाम से प्रसिद्ध सब विष्णु हैं एवं स्त्रीनाम से वाच्य सब श्री हैं— “नित्यैवैषा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी । यथा सर्वगतो विष्णुस्तथैवेयं द्विजोत्तम ॥ अर्थो विष्णुरियं वाणी नीतिरेषा नयो हरिः । बोधो विष्णुरियं बुद्धिर्धर्मोऽसौ सत्क्रिया त्वियम् ।। देवतिर्यङ्मनुष्यादौ पुंनामा भगवान् हरिः । स्त्रीनाम्नी श्रीश्च विज्ञेया नानयोर्विद्यते परम् ।।” (वि० पु० १।८।१७-१९) इन्द्र ने स्तुति करते हुए कहा था कि आप सब लोकों की माता हैं और देवाधिदेव विष्णु सब लोकों के पिता हैं। यह सम्पूर्ण जगत् विष्णु एवं आप के द्वारा व्याप्त है— त्वं माता सर्वलोकानां देवदेवो हरिः पिता । त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद् व्याप्तं चराचरम् ॥ (वि० पु० १।९।१२६) “विप्राः प्राहुस्तथा चैतद् यो भर्ता सा स्मृताऽङ्गना ।” (मनु० ९।४५) के अनुसार भी परब्रह्म एवं परब्रह्ममहिषी का अभेद ही है। “राघवत्वेऽभवत् सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि । एवं यदा जगत्स्वामी देवदेवो जनार्दनः ।। अवतारं करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी । अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ॥ देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी । विष्णोर्देहानुरूपा सा करोत्येवात्मनस्तनुम् ।।”(वि० पु० १।९।१४२-१४५) महालक्ष्मी ही विष्णु के राघव हो जाने पर सीता बन जाती हैं। कृष्ण होने पर रुक्मिणी बन जाती हैं। जगत्स्वामी विष्णु जब जब अवतार धारण करते हैं, महालक्ष्मी उनकी सहायिनी बन कर प्रकट होती हैं। अन्य अव- तारों में भी विष्णु के अनुरूप वे बन जाती हैं। मनुष्य बनने पर मानुषी बन जाती हैं। सर्वथापि विष्णु के अनुरूप ही अपना स्वरूप बना लेती हैं । “कमलेयं जगन्माता लीलामानुषविग्रहा । देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी ।। विष्णोर्देहानुरूपां वै करोत्येषाऽऽत्मनस्तनुम् ।” (स्कन्दपु० ब्राह्मख० सेतुमाहात्म्य २२।१६, १७ ) सीता मानुषविग्रहधारिणी कमला ही हैं। जब भगवान् देवरूप में होते हैं तब उनके अनुरूप ही देवदेहा महालक्ष्मीरूप में व्यक्त होती हैं । “अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा ।” (वा० रा० ५।११।१६) राम और सीता दोनों ने स्वीकार किया है कि सीता राम से वैसे ही अनन्य हैं जैसे भास्कर से उसकी प्रभा अभिन्न होती है— “अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा ।” (वा० रा० ५।२१।१६)