रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 740, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६३ भगवान् शङ्कराचार्य ने 'स्मर्यतेऽपि च लोके' (३।१।१९) इस ब्रह्मसूत्र पर व्याख्या करते हुए शारीरिक- भाष्य में कहा है—सीता, द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्न बिना माता-पिता के ही उत्पन्न हुए थे । सर्वसाधारण की उत्पत्ति द्यौ, पर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष एवं योषित् क्रमशः पाँच अग्नियों के द्वारा होती है । परन्तु द्रोणाचार्य बिना माता के चार अग्नियों से ही उत्पन्न हुए थे । सीता, द्रौपदी आदि माता और पिता दोनों के सम्बन्ध बिना तीन अग्नियों से ही उद्भूत हुई थीं— "द्रोणधृष्टद्युम्नप्रभृतीनां सीताद्रौपदीप्रभृतीनां चायोनिजत्वम् । तत्र द्रोणादीनां योषिद्विषये- काहुतिर्नास्ति । धृष्टद्युम्नादीनान्तु योषित्पुरुषविषये द्वे अप्याहुती न स्तः ।" (शा० भा०) वाल्मीकिरामायण में सीता ने अपने अयोनिज होने की चर्चा की है— “अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् । सदृशं चाभिरूपं च महीपालः पतिं मम ।।” (वा० रा० २।११८।३७) मुझे अयोनिज जानकर मेरे अनुरूप पति न पाकर राजा चिन्तित हुए । यद्यपि कुछ लोगों के अनुसार— “धन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य तु । तस्याः कन्या महालक्ष्मीः सीता नाम्ना भविष्यति ।” इस शिवपुराण-वचन के अनुसार सीता जनक की धन्या नाम्नी योगिनी पत्नी के गर्भ से उत्पन्न हुईं । तथापि उक्त वचन में भी गर्भ से उत्पन्न होने की बात सिद्ध नहीं होती । अतः धन्या ने हलाग्र उत्पन्न अयोनिजा कन्या का ही ममत्वातिशय से पालन किया था । इसी लिए उसकी महालक्ष्मी सीताविशेष पुत्री कहलायी । यदि कहीं वैसा पाठ हो तो उसे कल्पान्तरीय कथा का समझना चाहिये । कूर्मपुराण के अनुसार यह भी विदित होता है कि सीता की आराधना से अग्नि ने छायामयी सीता का निर्माण किया था । अतः रावण द्वारा हरण उसी का हुआ था, लङ्का की अग्निपरीक्षा के पश्चात् पुनः स्वाभाविक अग्निपुरनिवासिनी सीता का अग्नि के द्वारा पुनः प्राकट्य हुआ था । “सीताराधितो वह्निश्च्छायासीतामजीजनत् । तां जहार दशग्रीवो सीता वह्निपुरं गता ।। परीक्षासमये वह्नि छायासीता विवेश सा । वह्निः सीतां समानीय स्वपुरादुदनीनयत् ॥ (कूर्मपुराणीयं चैतन्यचरितामृतधृतं वचनम् २।९।१८७) तुम पावक महु करहु निवासा। जब लगि करौं निसाचर नासां ।। (रा० मा० ३।२३।१) एतावता सीता का अयोनिजा होना भक्तों की कल्पनामात्र है, बुल्के का यह कहना निर्मूल है । काशीकेदार- माहात्म्य ( ब्रह्मवैवर्त खिल० ) आदि ग्रन्थों में सीता की लक्ष्मीरूपता तथा राम की विष्णुरूपता कही गयी है— “विष्णोः पत्न्यौ धरालक्ष्म्यौ धराजाता हि जानकी । धर्मतः सा सुता विष्णोस्तामगृह्णाद् हरिः पुनः ।। कौशल्यातनयो जातस्तत्र दोषोऽस्ति को वद ।” ( काशीके० मा० १२।४७,४८ ) माधवी ( पृथ्वी ) और लक्ष्मी दोनों ही विष्णु की पत्नियां हैं । जानकी भूमिजा भूमिपुत्री है, इस दृष्टि से सीता विष्णु की पुत्री होती हैं । विष्णु कौशल्यानन्दवर्धन रामरूप धारण कर जानकीपति हो गये । देवताओं में भी ऐसी ही स्थिति है । भिन्न क्षेत्रों में उत्पन्न होने से दाम्पत्य हो जाता है । ब्रह्मा की जिह्वा से उत्पन्न सरस्वती पार्वती से उत्पन्न होकर ब्रह्मा की पत्नी हो सकी थी !